कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Sunday, February 13, 2011

एक प्रेमी के नोट्स


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प्यार ना प्यास है, ना पानी। ना फानी है, ना रूहानी। मिठास है, तो कड़वाहट भी। बेचैनी है तो राहत भी। पहला प्यार अक्सर भोला होता है। भले ही उम्र पंद्रह की हो या फिर पचपन की। कैसे-कैसे अहसास भी तो होते हैं पहले प्यार में। एक प्रेमी के नोट्स पढिए, इस वैधानिक चेतावनी के साथ-इनसे इश्क का इम्तिहान हल नहीं होगा, क्योंकि हर बार नए सवाल पैदा होते हैं-




संयोग के दिन

तुमसे मिलने के बाद पहला जाड़ा
सुबह के चार बजे हैं। बाहर तेज हवा चल रही है, फिर भी खिड़कियों पर टंगे परदे हिल नहीं रहे। थमे हैं। सन्नाटा अक्सर रह-रहकर शोर के आगोश में गुम हो जाता है। तेज हवा का शोर। दरवाजा खटखटाए बिना ठंड कमरे में घुस आई है पर मैं तो गर्म हूं...एक शोर मुझमें भी है। सीना धक-धक के साथ गूंजता है पर रजाई पुरानी पड़ जाने के बाद भी सर्दी नहीं लग रही। कल शाम तुम्हारी हथेलियों में जकड़ा मेरा दाहिना हाथ अब तक तप रहा है, जैसे!

लाल रंग का वो छोटा-सा छाता
सुबह से बारिश हो रही है। मैं भीग रहा हूं एक बस स्टैंड की ओट में खड़े होकर। कपड़े सब सूखे हैं पर अंदर कहीं कुछ बहुत गीला हो चुका है। यकायक घड़ी देखता हूं- तीन बज चुके हैं। तुम जाने वाली होगी। मैं भागता हूं। फिसलता हूं। कीचड़ में गिर गया हूं मैं और अब मिट्टी से लबालब। हाथों से अपना चेहरा पोंछने की नाकामयाब कोशिश करता हूं। मिट्टी महक रही है, तुम्हारे बालों में लगे चमेली के तेल सी। मेरा दौड़ना जारी है और घड़ी की सुइयों का भी। सवा तीन बज चुके हैं। तुम्हारी बस रेंगने लगी है। खिड़की से झांकतीं तुम्हारी लालची आंखें। तुम हाथ बढ़ाती हो और थमा देती हो—एक छोटी-सी लाल रंग की छतरी!

नहीं आता था पतझड़
पेड़ को छोड़ रिस रहा है एक-एक पत्ता-पत्ता। दरख्त ठूंठ बन चुके हैं, लेकिन मैं यकायक लहलहा उठा हूं। घर के सामने एक पीपल का पेड़ है। वो मुझे बुलाता है, उसे मैं छूता हूं और लगता है-तुम्हारी खुरदरी एडियों से एक लता फूटी है और मेरे इर्द-गिर्द लिपट गई है। तुम हंसती हो—बस, तुम यूं ही जड़ बने रहना।

लो मिल लो, ये हैं श्रीमान वसंत...

छोटा-सा स्टूल है और बेशुमार चिट्ठियां  हैं। शायद पांच-सात साल पुरानी। बार-बार पढ़ रहा हूं। एक-एक चिटी लगता है, तुमने ही लिखी है। रात नागफनी का गमला खिड़की के बगल रखा है, उसमें खिल गई है गुलाब की कली।

जाती हुई रात, आ रहे सूरज के घोड़े


गर्मी आ गई है पर दिन भर ही रहती है। रातें उमस भरी ठंडी हैं। भोर के पांच बजे हैं और मैं तुम्हारे घर के पास लगे लैंपपोस्ट के नीचे मौजूद हूं। ना सूरज उगा है, ना चांद ढल सका है। लैंपपोस्ट का बल्ब भी टिमटिमा रहा है। आसमान पर जाती हुई रात की लाल-लाल डोरों वाली आंखें हैं और धीरे-धीरे सुनाई देने लगी है सूर्य के घोड़ों के चलने की आवाजें। अलसाई आंखों के इशारे से जैसे घर का दरवाजा हटाती हो तुम... कुछ झुंझलाई हुई सी। 

वियोग की रातें...

जाने के बाद का जाड़ा
दोपहर आने को है। सुबह कई महीनों से नहीं देखी। हाथों से सिगरेट के कई बरबाद टोटों की महक आ रही है। नुक्कड़ पर अलाव जल रहा है। सोचता हूं—हाथ सेंक लूं। तुम पूछोगी कि फिर से सिगरेट पी, तो बहाना बनाऊंगा—नहीं, अलाव पर हाथ रखे थे। ... पर तुम तो हो नहीं। यकायक, थरथराने लगा हूं। नसें ज्यूं जम रही हैं। खड़े-खड़े गल जाता हूं।

पिघलती हुई रूह

यह वही शहर है, जहां हम मिले। टिन की छत पर बहुत बड़ी-बड़ी बूंदें गिर रही हैं। बाहर आ जाता हूं, भीगने का मन है। तुम नहीं, तो गम नहीं, अकेले ही भीग लूंगा...पर कर नहीं पाता। बूंदें ज्यादा बड़ी हैं। सिर पर टप-टप गिर रही हैं। कानों में हवा भर रही है। सांस फूल जाती है और मैं भीगा हुआ लबालब घर के अंदर हूं...इस दफा कपड़े भीगे हैं पर मन भभक रहा है, धुआं बहुत ज्यादा नहीं हो गया क्या...और ताजा हवा बिल्कुल नहीं।

पतझड़ और वसंत की दोस्ती

वसंत बहुत दिन से नहीं आया। दगाबाज है। किसकी तरह पता नहीं। शायद हम दोनों जैसा ही साबित हुआ। उसने पतझड़ से दोस्ती कर ली है। तुमने मचलती हुई उंगलियों से धनिया के बीज रोपे थे और नींबू का पौधा लगाया था। खट्टा-खट्टा कितना अच्छा लगता था हम दोनों को। ब्रेड पकौड़े अब भी बनते हैं बुतरू की दुकान पर, लेकिन तुम्हें पता है—हमारे घर के पिछवाड़े की धनिया और नीबू, दोनों सूख चुके हैं।

जल जाऊंगा, थोड़ा-सा पानी है क्या
उमस बहुत है। सांस लेनी भारी लग रही है। लगता है—कोयले की भटी से निकली राख सीने में अटक गई है। कोला में बर्फ डालकर शराबी होने की नाकामयाब कोशि श कर रहा हूं...बेकार है, बेअसर है। गोलगप्पे भी ताजा नहीं कर पा रहे, पुदीना भी नहीं। तुम आओगी क्या...होंठों के एकदम करीब, बस अपनी सांसों से मेरी आंखों में फूंक मार देने के लिए देखो, नाराज ना होना। किचन में फुल क्रीम दूध का पूरा पैकेट पड़ा है और तुम्हारी पसंदीदा लिपटन की चाय भी। हा हा हा। खैर, ना हो तो एक ग्लास पानी ही दे दो। जल रहा हूं।

Tuesday, September 7, 2010

क्यूंकि आज शिक्षक दिवस नहीं है





एक नज़ारा…

- राजस्थान के अजमेर जिले के विजयनगर स्थित बड़ा आसन गांव के निजी स्कूल में छोटी-सी बात पर शिक्षक ने छात्र से ईंटें उठवाईं और फिर जमकर पीटा
- एक कला विद्यालय के छात्र की पेंटिंग्स जला दी गईं, परिणाम–भविष्य का ख़ूबसूरत कलाकार ‍विक्षिप्त हो गया…

और ये राह भी…

- गरीबी से जूझ रहे एक बच्चे की शिक्षक ने मदद की, उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया…आज वही छात्र इंजीनियर है…
- पहली बार क्लास में ना बोल पाने वाले छात्र की हिचक ऐसी दूर की कि वो अब एफएम चैनल में रेडियो जॉकी है…

टीचर-स्टूडेंट के रिश्तों में बदलाव की वज़हें हैं ख़ास, इन्हें समझना भी है ज़रूरी

चौथाई सदी गुज़र गई होगी अब तो…जब मैं तीसरी-चौथी क्लास का स्टूडेंट रहा होऊंगा…जाड़े की एक थराथराती सुबह, कोहरे से दो-दो हाथ करते हुए जैसे ही प्राइमरी स्कूल के भुतहा लगने वाले कमरे में पहुंचा, बिना किसी दुआ-सलाम, हाल-चाल के हाथ पर फटाक से स्केल बज गई…बड़े हीरो बने घूम रहे हो, होमवर्क करके नहीं लाए हो ना…। ये थे घिर्राऊलाल…। नाम तो कुछ और ही होगा, लेकिन बच्चों को घसीट-घसीटकर (अवधी में घिर्राकर) पीटते थे, इसलिए उन्हें अपन सब के सब घिर्राऊलाल ही कहने लगे थे…
और इसके बारह साल बाद…बीए में सचमुच छैलाबाबू बनने के समय, एक दिन जब एक्स्टेंपोर कंप्टीशन में ज़बान लड़खड़ा गई, पांव कांपने लगे, अल्फाज़ दिमाग का साथ छोड़, हाथ छुड़ाकर भाग निकले, तो सामने से बस एक मुस्कान तैरती हुई आई और सारा काम बन गया…ये मुस्कराहट थी शैलेंद्र संभव की…हिंदी टीचर…ख़ैर, जब शील्ड को माशूका की तरह सीने से लगाए हॉल से बाहर निकला, तो मिठास से सना एक ही वाक्य कानों तक पहुंचा…ये हुई ना बात! डरते क्यों हो मेरे मिट्टी के शेर…। मस्त रहा करो।
अब मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं, ना ही मेरे ये दोनों टीचर किसी भी पद्मश्री, श्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित गुरु कम नेता हैं, जो आप ये दास्तान और सुनना चाहें…, लेकिन मेरे जैसे लद्धड़ (बोले तो कमज़ोर) और घिर्राऊ मार्का सख़्त व शैलेंद्र जैसे ममतामयी शिक्षक पूरी हिंदी पट्टी के शैक्षणिक जगत के ज्यादातर चेला-गुरु परंपरा के प्रतीक हैं…, यानी एक नुकीले पत्थर की तरह ज़ोर-ज़बर में यक़ीन करने वाला, तो दूसरा–मिसरी घोलकर शिष्य को सही राह पर ले जाने वाला…।
यूं, ये सवाल उठ सकता है कि गुरु की याद पांच सितंबर को ही क्यों आती है? पूरे साल क्या इनकी ज़रूरत नहीं होती, मन में, दिमाग़ के किसी कोने में मास्टर जी की इमेज क्यों फ्लैश नहीं होती…? सो दिन विशेष पर ही किसी की बात क्यों हो, पूरे समय उनकी महानता-काम की चर्चा क्यों ना की जाए, ये बड़ी बहस का मुद्दा है और फ़िलहाल, इसमें ना फंसते हुए मैं तो यही कहूंगा–गुरु, तभी राह दिखा पाते हैं, जब वो बड़े भाई जैसे भरोसेमंद और मज़बूत हों…ऐसे गुरु अंधकार से बाहर नहीं निकाल पाते, जो गुरु घंटाल होते हैं, ना ही ऐसे मास्टर साहब, कोई राह दिखा पाते हैं, जो बस नाज़ुक दोस्त की तरह हां में हां मिलाते हैं…।
सो आप कहेंगे, मटुक छाप गुरु क्या हैं? और वो शाहरुख की कौन-सी फ़िल्म थी, शायद–‘मैं हूँ ना’, जिसमें वो साहब सुष से लव-लेक्चर सुनना चाहते हैं…तो ऐसों के बारे में फ़िल्मियाना अंदाज़ में ही डॉयलॉग सुना दें–ये सब गुरु जैसे प्रोफेशन पर धब्बा हैं, लेकिन इतने से तो हल निकलने वाला नहीं है…। फिर कहें क्या…समझें क्या…। समझने वाली बात ये है कि जैसी सोसायटी है, लोग हैं, रिश्तों का उलझाव है, वैसे ही आजकल के गुरु भी हो गए हैं।
वैसे भी, मास्टरी सबसे सुविधाजनक प्रोफेशन मान लिया गया है, जहां रहकर कोचिंग, ट्यूशन, छुट्टियां जैसी सौगात आसानी से हासिल की जा सकती है, वहीं जब चाहें तब पॉलिटिक्स करने निकल पड़ें। यक़ीन नहीं होता, तो देश के कई बड़े नेताओं को देख लीजिए…जो टीचर थे, या फिर अब भी हैं…लेकिन आराम से एमएलए, एमपी बन रहे हैं।
…अब उठता है बड़ा सवाल…हमें ऐसे ही गुरु चाहिए थे, जो टीचिंग जैसे नोबेल प्रोफेशन को अपनी कुंठाएं शांत करने, ख्वाहिशें परवान चढ़ाने में इस्तेमाल करें? ऐसे में प्रतिप्रश्न भी खड़ा होगा–क्या ऐसे ही स्टूडेंट होते हैं, जो अपनी टीचर को प्रपोज़ करने का मौका भी नहीं छोड़ते। सवाल बहुत हैं, कन्फ्यूजन भी हज़ार हैं, लेकिन इन सबका जवाब वही है–हर पेशा और पेशेवर सोसायटी के उलझाव से अछूता नहीं है और उसका असर ही टीचिंग जैसे प्रोफेशन पर भी दिख रहा है…। और हल–वही, टीचर बड़े भाई जैसा ही हो।
हिंदी साहित्य में जिन नौजवानों ने धमकदार हस्तक्षेप किया है, उनमें विनीत कुमार का नाम खास है, तो लगे हाथ उनकी बात सुन लेते हैं। चर्चित ब्लॉगर विनीत कुमार किसी एफएम चैनल पर दिन भर चली एक बकवास का हवाला देते हुए अपने ब्लॉग पर निजी स्कूल की टीचर का एक्सपीरिएंस सांझा करते हैं–बच्चे कैसे पहले से कई गुना स्मार्ट हो गए हैं, ऐसे बहाने बनाते हैं कि आप चाहेंगे कि आपको भी ऐसे ही बच्चे मिलें…। बीते बरस के टीचर्स डे पर विनीत को निजी रेडियो ने ऐसा-ऐसा धमाल सुनाया कि उन्हें जान तेरे नाम का गाना…माना कि कॉलेज में पढ़ना चाहिए…रोमांस का भी एक लेक्चर होना चाहिए…याद आ गया…। बात बस विनीत की ही नहीं, जो बताते हैं कि आजकल बच्चे (यानी हर उम्र के छात्र-छात्राएं) कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हो गए हैं। वो टीचर को एक सिम्पैथी बॉक्स की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, हर युवा के दिमाग में ये सवाल पनपने लगा है कि प्राइमरी से स्कूल और फिर कॉलेज तक जाते हुए टीचर का रंग-रूप-चेहरा किस क़दर बदले, कितना बदले और ये रिश्ता कैसे परवान चढ़े…कैसा हो?
गुज़रे साल दस्तक के 41वें अंक में राजेश्वरी की एक कविता छपी थी–शिक्षक! मेरे बच्चे को रट्टू तोता मत बनाना / उसे अक्षर बताना / शिक्षक! मेरे बच्चे को लूट की तरकीब मत बताना… आज वो बहुत याद आ रही है…क्योंकि ये कविता नहीं, चिंता है…हर पिता-मां की, जो स्कूल-कॉलेज में टीचिंग के गिरते स्तर और शिक्षक-स्टूडेंट संबंधों के उलझाव में उलझा है।
आइए, इसी सिलसिले में कुछ ख़बरों पर नज़र डाल लेते हैं…
- मोहाली के नया गांव में 10 साल की एक लड़की के यौन शोषण के आरोप में स्कूल का वाइस प्रिंसिपल गिरफ्तार।
- गुस्साई भीड़ ने भांडुप के किंग जार्ज हिल्स स्कूल के आरोपी अंग्रेजी अध्‍यापक की पिटाई की…शिक्षक ने छात्राओं के अश्लील एमएमएस बनाए थे…
- धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में छात्राओं के साथ शिक्षकों ने छेड़छाड़ की
और हां…कुछ आंकड़े भी देखने की ज़रूत है…
- 19 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में केवल एक टीचर है।
- 10 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।
- 25 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूल टीचर अपने काम से ग़ैरहाज़िर रहते हैं।
हो सकता है, पाठक कहें कि बात तो रिश्तों की हो रही थी, जो आमतौर पर स्कूल (यानी हाईस्कूल) और कॉलेज में (ग्रैजुएशन, पीजी) के दौरान पनपते-बढ़ते हैं, फिर प्राइमरी पढ़ाई के समय हुए क्राइम की बात क्यों, उसके आंकड़े क्यों…इन पर नज़र डालना इसलिए ज़रूरी है…क्योंकि शुरुआती स्तर पर जो विचलन शुरू होता है, वही पूरे पारिदृश्य पर असर डालता है।
सरकार की महत्वाकांक्षी योजना शिक्षामित्र पर ग्रहण लग चुका है। गांवों के पंच-सरपंचों के रिश्तेदार इस योजना में ऐसे टीचर बन रहे हैं, जिन्हें स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं, इच्छा नहीं है। ऐसे ही देश के हज़ारों गांवों-कस्बों में अब भी दलित टीचर्स को उचित सम्मान नहीं मिलता। यूपी के बहुतेरे स्कूलों में मुख्यमंत्री मायावती की उस योजना के परखचे उड़ा दिए गए हैं, जिसमें वो दलित महिला के हाथों का पकाया भोजन मिड डे मील में परोसने की ताकीद कर चुकी हैं…।
हमारा मंसूबा, मंतव्य और इरादा ये नहीं कि राजनीतिक-सामाजिक छुआछूत और समीकरणों की व्याख्या करें, लेकिन समस्या की जड़ें तलाशनी तो ज़रूरी हैं। अगर शिक्षक स्वार्थी, अपराधी और आलसी नज़र आ रहे हैं, तो क्या इसकी सारी वज़ह उनका अवसर-पसंद, अवसरवादी होना है? बेशक नहीं!
ढर्रे पर थमी, रटी-रटाई, नोट्स बनाने, पुर्जियां तैयार करने और कॉपी में कट-पेस्ट कर ज्ञान-वमन करने की पद्धति पर चर्चित लेखक महेश पुनेठा एक लेख में सवाल खड़ा करते हैं–स्कूलों को सृजनशीलता की कब्रगाह तो नहीं बना रहे हैं? हालांकि वो भी मानते हैं कि आज के माहौल में ना शिक्षक के लिए सृजनशील होने की परिस्थितियां हैं और ना बच्चों के लिए…पुनेठा का तर्क भी वही है कि बाजारवादी व्यवस्था मनुष्यों के पृथक्करण और अमानुषीकरण के जरिए उनकी सृजनात्मक शक्तियों को कुंठित कर रही है…।
डरा-धमकाकर जिस स्कूली शिक्षा की नींव बच्चे के कोमल मन पर पड़ती है, वो कॉलेज तक पहुंचते हुए अगर शिक्षक को भी काहिल और अवसरवादी या फिर प्रेमी-प्रेमिका समझने, मानने की समझदारी पैदा कर दे, तो इसमें किसका दोष कहेंगे? शिक्षक मटुकनाथ जैसे होने लगें? छात्राओं का एमएमएस बनाने लगें, तो क्या टीचिंग के पेशे पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं? साफ़तौर पर ये बात माननी होगी कि बहुत-से शिक्षक अब गुरु नहीं रहे…लेकिन उन्हें ऐसा बनने-बनाने की प्रेरणा और फ़ोर्स तरक्की-पसंदगी के नाम पर भटके हुए समाज से ही मिल रही है। उन अभिभावकों की भी कम ग़लती नहीं, जो अपने बच्चों को किसी भी क़ीमत पर रट्टू तोता बनाकर, इंजीनियर और डॉक्टर की शक्ल में ढाल देना चाहते हैं। ऐसे ही कुछ पुराने लोगों का भी कम योगदान नहीं, जो शिक्षक रहते हुए बा
की सबकुछ बन गए, भले ही टीचर नहीं रहे…। शिक्षकों को दोष देते हुए हम ये क्यों भुला देते हैं कि हम बच्चों को मास्टर बनने की प्रेरणा नहीं देते।
हिंदी फ़िल्में ही देख लीजिए, शिक्षकों के एक से एक डिब्बामार्का पोट्रेट मिल जाएंगे। यहां या तो गुरु भगवान है या फिर फटीचर। फिल्मी टीचर लाचार-कमज़ोर, आदर्शवादी बातें करते हैं या कुछ आगे बढ़ जाएं, तो हिटलर की छवि लेकर नज़र आएंगे। ‘मोहब्बतें’ और ‘मेजर साब’ में अमिताभ बच्चन कड़क हैं, लेकिन ‘कसमे वादे’ और ‘ब्लैक’ में आत्मीय गुरु का चरित्र है। अब इसमें सिर्फ ब्लैक ऐसी फ़िल्म है, जिसमें देवराज सहाय सरीखा चरित्र ही गुरु के रूप में हर स्टूडेंट चाहेगा…और हां, आमिर खान जैसा ‘तारे जमीं पर’ का टीचर…। फ़िल्मी टीचर की बात करें, तो ‘स्वदेस’ में गायत्री जोशी, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ और थ्री ईडियट्स में बोमन और ‘कल किसने देखा’ में ऋषि कपूर के किरदार भी याद आते हैं…तीनों अलग-अलग तरह के।
ये सबकुछ जानने के बाद समझना मुश्किल नहीं कि टीचर के बारे में सोचते वक्त स्टूडेंट के चेहरे पर मुस्कान कम क्यों उभरती है, खीझ या फिर किसी और किस्म की लालसा ही जगह क्यों पाती है? बच्चे भी जानते हैं, ये गुरु भगवान वाली किस्म के नहीं हैं और अध्यापक भी समझ चुके हैं कि बात उतनी सीधी-सादी और गौरवमयी नहीं रही, जितनी पुराने ज़माने में थी।
इन हालात में शिक्षक दिवस मनाने का भी तभी मतलब निकलेगा, जब टीचर अपने पेशे की ज़िम्मेदारियां समझें, छात्र उनका यथोचित सम्मान करें, समाज भी समझे कि गुरु पेड सरकारी नौकर भर नहीं है…और टीचर बदलते वक्त की ज़रूरत के मद्देनज़र छात्र-छात्राओं के साथ दोस्त जैसा नहीं, पर बड़े भाई जैसा व्यवहार ज़रूर करें।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और एक पत्रकारिता विद्यालय में स्क्रिप्ट राइटिंग विशेषज्ञ के रूप में पढ़ाते भी हैं)


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  चण्डीदत्त शुक्ल :  ये आलेख जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की साप्ताहिक परिशिष्ट हमलोग 
   <http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/05092010/Humlog-Article/17836.html> में और              पोर्टल... नेटवर्क-6 <http://www.network6.in/2010/09/06/क्यूंकि-आज-शिक्षक-दिवस-नह/> पर भी आ चुका है।



Sunday, July 4, 2010

आते हैं तुम्हें मौत के बहाने बहुत, ज़िंदगी से जरा-सी मोहब्बत कर लो!



प्यार में पागल जोड़े जब गुनगुनाते हैं—चैन से जीना अगर है,  मुझ पे ज़रा मर ले / आ खुशी से खुदकुशी कर ले…तब बात समझ में आती है, लेकिन कोई सबकुछ छोड़, ज़िंदगी को पीठ दिखा, जान देने पर उतारू हो जाए, तो उसकी झुंझलाहट गले नहीं उतरती। यूं भी, बहुत मुश्किल से मिलती है ज़िंदगी, हज़ार नियामतें लेकर आती है...फिर भला क्यों कोई अपने ही हाथों अपनी सांसें बंद कर देना चाहे? इससे बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती, ये हर कोई जानता है। सभी मज़हब आत्महत्या के ख़िलाफ़ हैं...फिर भी ये तथ्य निरी कल्पना नहीं...ये परेशान करने वाला सच है। दरअसल, बहुत-से लोगों को लगता है—ज़िंदगी से भाग जाना मुश्किलों का हल है!  वज़हें अपनी-अपनी हैं, बहाने अपने-अपने हैं  और खुदकुशियों के बढ़ते आंकड़े भी सामने हैं। कोई दिल हारकर जान देता है, तो कोई भूख से जूझते हुए।
किसी को रिश्तों की उलझन ले डूबती है, तो किसी को काम-कारोबार और प्यार में नाकामयाबी। हैरत तो तब होती है, जब ग्लैमर वर्ल्ड की कोई चर्चित हस्ती ज़हर खाकर, नींद की गोलियां निगलकर, फंदे से लटककर जान दे देती है। जहां हर राह में सितारे जड़े कालीन हैं, शोहरत है, दौलत है, दोस्त हैं, भीड़ है, कैमरों की फ्लैशलाइट्स हैं, वहां मौत और मातम क्या काम? फिर भला कोई क्यों जान देता है? 
हाल में ही कामसूत्र विज्ञापन से फ़ेमस हुईं विवेका बालाजी की आत्महत्या ने ये सवाल फिर गर्मा दिया है। कहते हैं—विवेका अकेली थीं, रिश्तों में धोखे से टूटी हुई थीं, इसलिए दुनिया से जाने में ही उन्होंने बेहतरी समझी। 
यूं, विवेका चमक-दमक से भरी मॉडलिंग, फैशन, टीवी और सिनेमा की दुनिया की इकलौती स्टार नहीं हैं, जिन्होंने आत्महत्या कर ली। कई सितारे असमय ही अपनी चमक खोकर खो गए। वज़ह—वही अकेलापन! धोखा, असुरक्षा का डर और खोखले होते जाने का अहसास। माना कि दिल टूटने की आवाज़ सुनाई देती है ताज़िंदगी, फिर भी जीने का हुनर सीख लेते तो अच्छा होता...। वैसे, ये बात उन सितारों की समझ में नहीं आई, जिन्होंने आत्महत्या कर लेने को ही हर मुसीबत का हल समझा।
9 जुलाई, 1925 को जन्मे गुरुदत्त ने भी जान दे दी थी। लड़की पसंद की थी, फिर शादी बनाई, लेकिन दिल नहीं लगा, सो घुटते रहे। मोहब्बत की कोशिश की, वहां साथ नहीं मिला...फिर भी जिए और क्या खूब जिए। ऐसा काम किया, जिसे अब तक सराहा जाता है। चौदहवीं का चांद, प्यासा, साहब बीवी और गुलाम, काग़ज़ के फूल...एक से एक नायाब नगीने। एक शाम, दिल डूबा। निराशा उभर आई। पता नहीं, प्यार में हार जाने की खीझ बड़ी लगी या कारोबारी झटके...10 अक्टूबर, 1964 की सुबह पता चला—गुरु की बेज़ान देह बिस्तर पर पड़ी है। बाद में लोगों ने बताया, उस रात गुरु ने बहुतों को फ़ोन कर अपने पास बुलाया था, लेकिन कोई नहीं आया, जो उनका दुख बांट ले, उनसे हंस ले, बतिया ले। 
•   ग़ज़ल सिंगर चित्रा सिंह की बेटी मोनिका चौधरी ने जान दे दी, तो इसकी वज़ह भी था—तनाव, बेचैनी और अवसाद।
•  जुलाई, 2004 में कामयाब मॉडल, एक्ट्रेस, वीजे और पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स नफीसा जोसेफ ने आत्महत्या कर ली, वजह—मंगेतर से रिश्ता टूट जाना।



•  टीवी धारावाहिक कैट्स की एक्ट्रेस कुलजीत रंधावा ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि बतौर मॉडल उन्हें अपना कैरियर डूबता हुआ लग रहा था।


•   अप्रैल, 1993 में एक दिन सारा देश स्तब्ध रह गया था, जब पांच मंज़िला इमारत से छलांग लगाकर एक्ट्रेस दिव्या भारती ने जान दे दी थी। कहते हैं—माफिया की धमकी से परेशान होकर दिव्या ने ये क़दम उठाया था।




• 1996 का सितबंर महीना। भारत की मर्लिन मुनरो कहलाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री 
सिल्क स्मिता ने चेन्नई स्थित अपार्टमेंट में फांसी लगा ली। कारण बनीं आर्थिक दिक्कतें और प्यार में मिला धोखा...। पहले स्मिता ने शराब में डूबकर हर गम भुलाने की कोशिश की और जब कहीं राहत नहीं मिली, तो जान दे दी।
•  फरवरी, 2002 में तमिल अभिनेत्री प्रत्यूषा ने ज़हर खा लिया। प्रेमी से वादा किया था, तुम्हारे बिना संसार में नहीं रहूंगी और बस इसलिए खुद को खत्म कर लिया।
•   नवीन निश्चल सबके पसंदीदा अभिनेता हैं, लेकिन उनकी अपनी ज़िंदगी उलझावों से घिरी है। अप्रैल, 2006 में पत्नी गीतांजलि निश्चल ने खुदकुशी की, तो इसका ज़िम्मेदार नवीन को ही बताया।
•  2009 में ब्यूटिशियन शहनाज हुसैन के पुत्र और फ़ेमस रैप सिंगर समीर हुसैन ने आत्महत्या कर ली। ख़राब आर्थिक हालात ही इसका कारण थे।
•  शारान्या भारद्वाज, एक्टर कुणाल सिंह, आशा भोंसले की पत्रकार बेटी वर्षा…ऐसे सैकड़ों नाम हैं, जिन्होंने असमय ही संसार का साथ छोड़ दिया। 
जन्म-जन्म तक साथ निभाने की लिए की गई शादी का टूट जाना, दोस्तों से मिले कारोबारी और भावनात्मक धोखे, कैरियर बरबाद होने का वहम और कई बार ऐसी परिस्थितियों का बनना...यही वो वज़हें हैं, जिनसे जूझते हुए ग्लैमर इंडस्ट्री के लोग जान दे देने का फ़ैसला कर लेते हैं। लेकिन क्या कोई भी नाकामयाबी इतनी बड़ी हो सकती है, क्या कोई धोखा इतना तोड़ सकता है कि सांसों की सौगात को सुलगा देने का फैसला कर लिया जाए?


सिनेमा के संसार की 
सुपर सितारा मीनाकुमारी के हवाले से एक बात...मीना के लिए भी ज़िंदगी बहुत मुश्किल थी। अपनी डायरी में एक जगह वो लिखती हैं—तारीखों ने बदलना छोड़ दिया है, क्या कहूं अब?...मीना के लिए समय ठहर गया था। अरमान झुलस चुके थे। वो मानती थीं—`अचानक आ गई हो वक्त को मौत जैसे / मुझे ज़िंदगी से हमेशा झूठ ही क्यों मिला? क्या मैं किसी सच के काबिल नहीं थी!’ बहुत-से सवाल जहन में थे। कोई आस ना थी, फिर भी मीना जीती रहीं। संसार से तब गईं, जब आखिरी बुलावा आया। 
जीना इसी का नाम है। आखिरी सांस तक लड़ना। मोहब्बत में धोखा मिला, तो क्या? उसकी याद ही सही...और फिर प्रेम का इंतज़ार भी क्या कम है? कैरियर डूब रहा है फिर भी हौसला तो यही होना चाहिए ना कि लड़ेंगे, फिर से सूरज की तरफ बढ़ेंगे। जीना इसी का नाम है। 
बनावट भरी ज़िंदगी जीते समय अगर कुछ वक़्त रिश्तों को संजोए रखने के लिए निकाल पाएं, तो फिर हमारे प्यारे सितारे हमें छोड़कर खुदकुशी की राह नहीं चुनेंगे। ऐसा होगा ना? आमीन!
  
पलायनवादी नायक...
सारे संसार में साहित्य, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में दिग्गज माने जाने वाले बहुत-से नायकों ने आत्महत्या की राह पकड़कर पलायनवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। दुनिया भर को बदलाव के लिए उत्साहित करने वाले कानू सान्याल ने हाल में ही व्यवस्था से परेशान होकर जान दे दी। खूबसूरत, प्रेरणादायक कविताएं लिखने वाले गोरख पांडेय ने नौजवानों को दिशा दिखाई पर खुद ऐसे टूटे कि 1989 में आत्महत्या कर ली। मलयालम की युवा लेखिका टीए राजलक्ष्मी 35 साल की थीं, तो दुनिया छोड़कर चली गईं। 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे को 1954 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और सात साल बाद 1961 में उन्होंने खुदकुशी कर ली। विंसेंट वान गॉग ने सैकड़ों चित्र और ड्राइंग बनाईं, लेकिन 37 साल के थे, तभी खुद को गोली मार ली। अमेरिकी रचनाकार जॉन बेरीमैन ने ‘ द ड्रीम सांग्स’ सरीखी कालजयी कविता लिखी, फिर ये संसार अपनी मर्जी से छोड़ दिया। स में येजनीन ने तीस साल तक ही जीना पसंद किया। और तो और, सारे संसार की मानसिक उलझन का हल तलाशने वाले मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने भी खुदकुशी की कोशिश की थी।
उलझाव, दुख, हताशा...कारण चाहे जो भी हो, इन नायकों ने युवाओं को पलायन का रास्ता दिखाकर सही नहीं किया। यक़ीनन वो भी जब आसमां से इस जहां की ओर देखते होंगे, तो कहते होंगे...हमने हिम्मत छोड़ दी थी, तुम सब लड़ते रहना।


जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/04072010/humlog-article/13432.html  में प्रकाशित आलेख

Monday, June 28, 2010

कामयाबी का जायका : पैट्रिका नारायण




आमतौर पर रेहड़ी-पटरी वाले क्या बेचते हैं? यही—चाय या फिर सिगरेट!  लेकिन 21 जून, 1982 को चेन्नई के मैरीना बीच में पैट्रिका नारायण की रेहड़ी पर सबकुछ हाज़िर था—कटलेट, समोसा, जूस, चाय और कॉफी। वो चाहती थीं—इतनी कमाई हो जाए, जिससे घर चल निकले। दिल में ज़रूर कामयाब होने का इरादा पल रहा था, लेकिन ये ख़्वाब पलकों के तले आंखों में सहमा हुआ, सिमटा ही था। पैट्रिका के पास आसमान छूने जैसे बड़े सपने देखने की हिम्मत नहीं थी…तो पहले दिन महज पचास पैसे का बिज़नेस हुआ। यही वो रकम थी, जिसके एवज में पैट्रिका ने ग्राहक को एक कप कॉफी बेची और छोटा-सा कारोबार शुरू कर दिया। घर लौटकर पैट्रिका रोने लगीं, लेकिन मां ने समझाया—कोई भी शुरुआत ऐसे ही होती है। छोटी, लेकिन भविष्य के लिए बड़ी। पैट्रिका फिर रेहड़ी के साथ मैरिना बीच पर लौट आईं। अगले दिन ही सात सौ रुपये की कमाई हुई। फिर तो ठेले पर आइसक्रीम, सैंडविच, फ्रेंच फ्राई भी आ गया। 2003 तक तो हर दिन पच्चीस हज़ार रुपये की बिक्री होने लगी थी। फिर स्लम क्लियरेंस बोर्ड ने उन्हें कैंटीन चलाने का ऑफर दिया। एक और क़दम फिर...कामयाबी ही कामयाबी।
और अब?  आज सारी बाधाएं पैट्रिका की हिम्मत के आगे सिर झुका चुकी हैं। उन्हें `फिक्की वुमेन एंटरप्रेन्योर’ अवार्ड मिला है और वो `संदीपा’ नाम की रेस्टोरेंट चेन की मालकिन हैं। हालांकि कामयाबी का ये जायका उन्हें आसानी से नहीं हासिल हुआ। तकरीबन तीस साल पहले मैरीना बीच पर जब पैट्रिका ठेला लेकर निकलीं, तो उस पर खाने-पीने का बहुत-सा सामान था। केतली में उबलती हुई चाय उनके मन में धधकती हुई शंकाएं, अविश्वास, दु:ख, डर और परेशानी। शादीशुदा ज़िंदगी वीरान थी।
नशेड़ी पति और दो बच्चों की ज़िम्मेदारी उठा रहीं पैट्रिका ने कारोबारी बनने के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। उन्होंने रेहड़ी लगाने का फैसला भी घर की ज़िम्मेदारियां पूरी करने की वज़ह से ही लिया था। हां, एक और वज़ह ये थी कि पैट्रिका को नए-नए व्यंजन बनाने और लोगों को खिलाने का शौक था।
अब मीडिया से बात करते समय पैट्रिका बीता वक्त धीमी हंसी के साथ जैसे उड़ा देना चाहती हैं, `हमारी शादी ने ही मुझे कामयाब बनाया। पहले पूरी तरह तोड़ दिया और अब आसमान तक पहुंचा दिया है। ना शादी होती, ना मैं इतनी परेशान होती और ना ही व्यवसाय शुरू करती। वो ब्राह्मण थे और मैं क्रिश्चियन। घर के लोग नहीं चाहते थे कि हमारी शादी हो, लेकिन मैं अड़ी रही। आख़िरकार, हम सात फेरों में तो बंध गए, लेकिन विवाह असफल रहा। वो तमाम तरह के नशों से घिरे थे। ड्रग्स, अल्कोहल और पता नहीं क्या-क्या! शुरुआत में मैंने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन फिर हार मान ली। क्या करती, जब कोई समझना ही ना चाहे।‘
पिता ने भी पैट्रिका को कोई मदद नहीं दी। अब वो दो बच्चों के साथ सड़क पर थीं। भूख मिटाने की ज़द्दोज़हद थी, सिर छुपाने के लिए एक अदद छत की तलाश थी। ख़ैर, किसी तरह रहने का ठिकाना मिला और फिर पैट्रिका ने सोच लिया—ग़रीबी को ऐसा जवाब देंगी कि वो लौटकर उनके घर में आने की हिम्मत भी नहीं करेगी। मां से सौ रुपये उधार लेकर उन्होंने अचार, स्क्वैश और जैम बनाने का काम शुरू किया। सारा दिन अचार सप्लाई करने के लिए जातीं और फिर रात भर अचार बनातीं। कुछ पैसा आया, तो हिम्मत भी बढ़ी। इस बीच पैट्रिका के पिता के एक दोस्त ने उन्हें रेहड़ी दिला दी। उनकी शर्त भी लाज़वाब थी—पैट्रिका उनके उस स्कूल के दो बच्चों को काम दें। रेहड़ी लेकर पैट्रिका मैरिना बीच की तरफ निकल पड़ीं और फिर तो उनकी किस्मत की गाड़ी भी चल निकली। पैट्रिका ने एक साल तक ये अनुमति पाने के लिए संघर्ष किया कि मैरिना बीच के सेंटर प्वाइंट में वो रेहड़ी लगा सकें। आख़िरकार, उन्हें इजाज़त मिली और फिर क्या था...उनके व्यंजनों का जायका लोगों की ज़ुबान पर इस तरह चढ़कर बोला कि नोट बरसने लगे, गरीबी भाग गई और अब पैट्रिका बुलंदी के सातवें आसमान पर हैं... तो है ना ग़ज़ब की प्रेरणादायक कहानी। अब कभी किसी रेहड़ी पर चाय पीते समय उसके मालिक-मालकिन को गौर से देखिएगा, हो सकता है—आप भविष्य की किसी और पैट्रिका के पास खड़े हों।

जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/27062010/humlog-article/13012.html में प्रकाशित आलेख

Wednesday, June 23, 2010

हंसकर गुज़ारी तनहा ज़िंदगी : गैरी कोलमैन

कहते हैं-जिंदगी क्या-क्या रंग दिखाती है हमें...और गैरी कोलमैन ने तो ये बात ता-जिंदगी महसूस की। कभी शोहरत की बुलंदी पर पहुंचे तो कभी अपनो से ही जूझते रहे। बचपन में स्टारडम का मजा मिला तो बड़े होकर अकेलापन और उदासी। हाल ही हुई उनकी मौत के बाद भी उनकी संपत्ति को लेकर खासा विवाद गहराया हुआ है...

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फरवरी, 1968 को गैरी कोलमैन जिओन, अमेरिका में जन्मे। 42 साल की उम्र में ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली। एक बीमारी, जिसने उन्हें कभी बड़ा नहीं होने दिया और आखिरकार, मस्तिष्क आघात, जो उनकी सांसें ही निगल गया। 1978 से लेकर 2010 तक गैरी दर्शकों के दिलों पर छाए रहे, लेकिन उनका दिल हरदम वीरान रहा। 


पेशे से नर्स एडमोनिया स्यू और लिफ्ट ऑपरेटर डब्ल्यूजी कोलमैन के दत्तक पुत्र गैरी की शादीशुदा जिंदगी अच्छी नहीं रही। 2006 में कॉमेडी फिल्म चर्च बेल के सेट पर वो शैनन प्राइस से मिले। दोनों की आंखें चार हुई। पांच महीने तक एक-दूसरे को परखने के बाद 2007 में शादी कर ली। हालांकि ये रिश्ता महज दो साल चला। साथ छूटने का दर्द तो और बात है, गैरी की सेहत भी अक्सर खराब रही।
1978 से 1986 तक उन्होंने अमेरिकी टेलिविजन धारावाहिक "डिफरेंट स्ट्रोक्स" में बाल कलाकार के रूप में जादुई अभिनय किया। अर्नोल्ड जैक्सन के किरदार में गैरी ने अपनी अदाकारी से सभी को दीवाना बना दिया। कई फिल्मों में काम किया, कुछ टेलीफिल्में बनाई, एनिमेटेड सीरीज़ में किरदार निभाए। 1982 में उनके नाम से तैयार किया गया कार्यक्रम गैरी कोलमैन शो भी खूब मशहूर हुआ। और तो और, वीडियो गेम द क्रूज ऑफ मंकी आइसलैंड और पोस्टल में भी गैरी ने बच्चों को खूब लुभाया। लेकिन खुशियां उनके खाते में कम ही थीं। 1989 में गैरी को अभिभावकों और व्यापार सलाहकार से लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। ये बात दीगर है कि मुश्किल दौर में भी गैरी हारे नहीं। आखिरकार, उन्होंने अपने हक की जंग जीत ली। अफसोस की बात यही है कि पैसों के लिए लड़ी गई लड़ाई में तो वो जीत गए, लेकिन सेहत की जंग में थके हुए सैनिक की तरह ही नजर आए। किडनी से जुड़ी एक बीमारी से गैरी लगातार जूझते रहे।
जिंदगी की जंग में वो कई बार डगमगाए। 1993 में एक टेलिविजन शो में गैरी ने कबूल किया कि उन्होंने दो बार ढेर सारी दवाइयां खाकर जान देने की कोशिश की थी, लेकिन ऎन मौके पर जीने की तमन्ना जाग गई या फिर लोगों ने उन्हें बचा लिया। ये जीवन को जैसा है, वैसे ही कबूल करने की जिद थी। गैरी का रोग इतना बढ़ा कि उनका विकास ही अवरूद्ध हो गया। जवान होने के बाद भी वो एक छोटे-से बच्चे की तरह दिखते थे। जीवन में घटी इस त्रासदी से गैरी को एक कलाकार के रूप में लाभ मिला और वो डिफरेंट स्ट्रोक्स में प्रभावी भूमिका निभा सके, लेकिन हर दिन डायलिसिस कराने पर मजबूर गैरी की हर सांस बोझ से दबी होगी...इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। गैरी को दो बार—पहले 1973 में और फिर 1984 में किडनी ट्रांसप्लांट भी करानी पड़ी। हां! मुश्किलें क्या करें, जो हौसला बुलंद हो। यही वजह है कि वीएच-1 ने जब टेलीविजन के 100 महानतम सितारों की सूची तैयार की, तो गैरी का नाम काफी ऊपर था। इसे कहते हैं—कुदरत के सितम का हंसकर जवाब देना!
डिफरेंट स्ट्रोक्स की कामयाबी ने गैरी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। इसके हर एपिसोड के लिए उन्हें लाखों रूपये मिलते थे। अभिभावकों, वकीलों, सलाहकारों का हिस्सा और वेतन बांटने के बाद गैरी कर चुकाते थे, फिर भी उनके दोनों हाथ पैसों से भरे रहते थे और दिल एकदम खाली! बीमारी, अपनों से मिला धोखा और अकेलापन...ये सब गैरी के दुश्मन थे, लेकिन महज चार फिट, आठ इंच के इस शख्स के अंदर पहाड़ जैसा हौसला पलता था। हर परेशानी को मुंहतोड़ जवाब देते हुए गैरी ने तय कर लिया कि सियासत में कदम रखेंगे। 2003 में वो कैलिफोर्निया के गर्वनर के चुनाव में उम्मीदवार भी बने। वैसे, समीकरण कुछ ऎसे बदले कि गैरी को राजनीति से अरूचि हो गई। उन्होंने चुनाव में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई, इसके बावजूद हर दिल अजीज गैरी को 135 उम्मीदवारों में आठवीं जगह मिली और कुल चौदह हजार दो सौ बयालिस वोट हिस्से में आए। 2005 में कोलमैन उताह चले गए और आखिरी सांस तक वहीं रहे।
खैर, गैरी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब भी वो धरती की ओर देखते होंगे, तो आठ-आठ आंसू बहाते होंगे। कोलमैन की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के अधिकार को लेकर भी विवाद गहराया रहा। इस सवाल का जवाब गैरी जरूर जानना चाहते होंगे—सितारों की जिंदगी इतनी रंगीन नजर आती है तो ऎसी वीरान क्यों होती है भला?

(जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ के रविवारीय सप्लिमेंट हम लोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/20062010/Humlog-Article/12549.html में प्रकाशित)