कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Friday, April 23, 2010

मक्खन-सी तुम्हारी याद

नीले-नीले बाल, संतरी रंग का चेहरा, पॉल्का डॉट्स से सजी फ्रॉक...ये लड़की कौन है? कुछ जानी-पहचानी सी है ना! याद आ गया या बता दूं? ये वही तो है—अमूल मक्खन के रैपर पर मुस्कराती, इठलाती किशोरी...जिसकी शक्ल देखते ही दिमाग में कहीं गूंजने लगती है ये लाइन...`अटरली, बटरली, डिलिशस... ‘ और बस मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन आज ये लड़की उदास है। इसकी आंख में पानी है...। उदास तो आप भी हो जाएंगे ये जानकर कि मक्खन के खास ब्रैंड के लिए इतनी ख़ूबसूरत और नटखट लड़की की तस्वीर उकेरने वाले ऑस्टेस फर्नांडिस अब इस दुनिया में नहीं रहे...।
फर्नांडिस ने अपने प्रशंसकों को उस दौर में आखिरी सलाम बोला है, जब इस एड कैंपेन को गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिलनी तय है। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि चालीस साल से भी ज्यादा समय पहले इस अभियान की नींव रख दी गई थी। फ़िलहाल, ये भारत में सबसे पुराना और सबसे ज्यादा चलाया गया एड कैंपेन बन चुका है। पता नहीं, ये मक्खन के जायके का कमाल है, या फिर अमूल के विज्ञापनों से सजी होर्डिंग्स पर लिखे वन-लाइनर्स का जादू कि हर सुबह फिगर कॉन्शस लोग भी ताजी-सिंकी ब्रेड पर मक्खन लगाकर खाना नहीं भूलते।
ठीक इसी तरह `मक्खन-गर्ल’ के जनक को भी नहीं भुलाया जा सकता। रेडिएस एडवर्टाइजिंग के डायरेक्टर ऑस्टेस फर्नांडिस ने महज 75 साल की उम्र में दुनिया छोड़ दी है। आज वो नहीं हैं, तब और शिद्दत के साथ उन वन-लाइनर्स की याद आ रही है, जिनका आधार फर्नांडिस ने तैयार किया था। यूं तो, इन विज्ञापनों को दाकुन्हा कम्युनिकेशन के चेयरमैन सेल्वेस्टर दा कुन्हा ने ही मूलरूप में तैयार किया है। वो 1966 से ही अमूल से जुड़े रहे हैं, लेकिन ऑस्टेस और दा कुन्हा की की जोड़ी राजकपूर और मुकेश की तरह है, जैसे—एक ने तस्वीर उकेरी और दूसरे ने रंग भरे!
किसी उत्पाद को कोई क्यों खरीदता है और बार-बार की जाने वाली खरीदारी की क्या वज़ह होती है? ऑस्टेस ये बात जानते थे। वो समझते थे—जब तक आप खरीदार का भरोसा नहीं जीत लेते और उसकी ज़िंदगी में अपने उत्पाद की ज़रूरत स्थापित नहीं कर देते, तब तक वो लगातार वही प्रोडक्ट नहीं खरीदता। यही वजह है कि अमूल गर्ल का स्वरूप तैयार करते समय उन्होंने एकदम पास-पड़ोस जैसी नज़र आने वाली चुलबुली लड़की को दिमाग में रखा।
किसी सुपर कंप्यूटर को भी मात कर देने वाली रफ्तार के मालिक फर्नांडिस पर उम्र कभी कोई असर नहीं डाल सकी। वो जब भी काम करते, तो लोग उनकी स्पीड देखते ही रह जाते। एक नायाब कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर के रूप में ऑस्टेस काफी मशहूर हुए। अपने विश्वसनीय सहयोगियों के साथ 1974 में उन्होंने विज्ञापन कंपनी रेडिएस एडवर्टाइजिंग की शुरुआत की। उनकी सहयोगी राधा और ऑस्टेस के नामों के शुरुआती अक्षर मिलाकर ही तो इस कंपनी का नाम रखा गया था, ठीक वैसा ही प्रयोग—जैसा मक्खन विज्ञापन की कैचलाइंस में होता है!
शीतल पेय कंपनी लिम्का के विज्ञापनों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी ऑस्टेस को ही जाता है। उन्होंने रंगों और छवियों के तालमेल के साथ शुरुआती दौर में कलाकारों के बिना ऐसे विज्ञापन बनाए, जिन्हें देखते ही कोल्ड ड्रिंक पीने को दिल ललचाने लगे। भारतीय जीवन बीमा निगम की योजनाओं को लोकप्रिय बनाने में भी उनका बड़ा योगदान है। कैसे? जाहिर है—रचनात्मक ढंग से तैयार किए गए विज्ञापनों के ज़रिए!
ऑस्टेस ने व्यवसाय की पारी सफलता के साथ खेली। उनको हंसी का मर्म पता था। वो जानते थे कि एक ग़मज़दा, मुश्किलों के मारे, रोजमर्रा के कामकाज से दबे, घर-दफ्तर की परेशानी से बोझिल इंसान को हंसाकर अपना बनाया जा सकता है। मध्यवर्गीय भारतीयों की इसी सोच को ऑस्टेस ने अपने व्यापार को सफल बनाने के मंत्र के रूप में भी इस्तेमाल किया। हालांकि ये कोशिश भावनात्मक शोषण नहीं थी। ऑस्टेस ने बस वो नब्ज पकड़ ली थी, जिसे छूने भर से आदमी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। चुभती हुई, गुदगुदाती हुई कुछ लाइनें कानों और आंखों से होकर दिल में उतर जाती हैं और वो गुनगुनाने लगता है...अटरली...बटरली...!

एक लाइन का कमाल
मक्खन के खास ब्रांड `अमूल’ की क्रिएटिव टीम हर बार मस्तमौला अंदाज में समसामयिक विषय पर विज्ञापन तैयार करती रही है। गुजरात में आमिर खान की `फ़ना’ की रिलीज को लेकर दिक्कतें आ रही थीं। हर तरफ गर्मागर्म बहस जारी थी, इसी बीच एक दिन टंग गई एक नई विज्ञापन होर्डिंग...`मना...कभी मना नहीं!’
सौरव गांगुली के ख़राब फॉर्म पर sorrow ganguly  का हास्य हो, या फिर मुगल-ए-आजम रिलीज होते समय फ़िल्म की टाइटिल से तुक मिलाकर लिखी गई लाइन—maskaa-e-aazma...विज्ञापनों की ये शैली अनूठी और यादगार है । ऐसे ही एक वन लाइनर के सहारे महमूद को भी अनूठी श्रद्धांजलि दी गई—हम तेरे तेरे तेरे चाहने वाले हैं।
ओल्ड इज गोल्ड वाले मुंबइया फ़िल्म जगत से लेकर नए दौर के बॉलीवुड तक मक्खन ब्रांड के विज्ञापनों में हर हलचल छाई रही है। नौजवानों की पसंदीदा बनी फ़िल्म दिल चाहता है की रिलीज के मौके पर कैचलाइन थी—डिश चाहता है, तो स्वदेश का स्वागत इस पंक्ति ने किया—स्वाद डिश! महज फ़िल्म जगत की बात नहीं, चर्चा में आया हर विषय मक्खन-विज्ञापन की कैचलाइन के रूप में होर्डिंग्स पर उतर आया है।

जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित आलेख





Thursday, April 22, 2010

कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी


आज फिर खोली
जंग लगे ताले से बंधी
पुरानी लोहे वाली संदूक
भरभराकर ढहा वर्तमान
किस तरह कस रहा अतीत
जैसे, फिर आईं तुम 
बांह में जकड़ने को भागी-भागी सी...
लौटी भीगी-भीगी शाम
पहली-पहली बारिश की बूंदें लेकर
उतराई आंख के सामने 
हर रात की तस्वीर
झिलमिलाती हुई सही
भीगी पलक में सिमट नहीं रहे लमहे
शुक्रिया संदूक 
तुमने समेटे रखे
पीले-ज़र्द पड़े कुछ खत
धुंधली-फ़ीकी स्याही और चटख तुम्हारी याद...
सुनो
फिर धड़क रहा दिल धक-धक
उस दोपहर
डाकिया पटक गया था
तुम्हारे नाम के हज़ार बैरंग खत
मेरे घर की चौखट पर
हां, मैंने चुकाए थे पैसे
उन बैरंग खतों की एवज में
और 
भर लिए थे जीवन में रंग हज़ार...
सांझ की चादर पर प्रेम-सिंदूर लगाकर
थक कर सो गया उसे ही सिर तक ओढ़कर
रुनझुन-रुनझुन करतीं तुम आईं फिर
पूछा—क्यों लीं मेरे नाम की चिट्ठियां
बांच भी ली होंगी... 
तब से / अब तक / मेरे पास
बंधी रखी हैं / बिना बांची चिट्ठियां तुम्हारी 
आओ...ले लो 
पढ़ लेना तुम्हीं उन्हें
और कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी

Monday, April 19, 2010

अविनाश वाचस्पति रहे पुकार...कहां हो प्यारे टाटा जी




चौराहा पर पहली बार...किसी और की...(नहीं तो, ये अपने ही हैं...) अविनाश वाचस्पति जी की रचना....

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टाटा मोटर्स की इंडिका धोखे से पुराना मॉडल दे दिया गया : खरीदने से अब तक कर रही है लगातार परेशान (माननीय रतन टाटा जी से विनम्र अनुरोध)


मैंने 14 मार्च 2008 को मैसर्स विवेक ऑटोमोबाइल्‍स, करौल बाग से टाटा इंडिका जीएलजी DL 3C AY 5018 की खरीद की थी परन्‍तु मुझे बिना मेरी जानकारी में लाए वर्ष 2007 में निर्मित कार दे दी गई। जिस दिन से कार शो रूम से लेकर चला हूं तभी से तंग कर रही है। विवेक ऑटोमोबाइल्‍स के श्री दिनेश चावला ने कई बार मांगने के बाद भी पूरा भुगतान लेने पर भी ब्‍यौरेवार पूरा विवरण नहीं दिया। कार के साथ नंबर प्‍लेट भी नहीं दी गई जबकि उसके चार्जिस ले लिए गए। मैंने ट्यूबलैस टायर लगवाने के लिए कहा, जिसका अंतर 3000/- रुपये तो लिए गए परन्‍तु उनकी कोई रसीद नहीं दी गई। इस बारे में मैंने कई बार श्री दिनेश चावला को फोन पर भी कहा है और ई मेल भी भेजी हैं परन्‍तु उन्‍होंने आश्‍वासनों के अतिरिक्‍त कुछ नहीं किया। कार की डिलीवरी लेने से एक दिन पहले भी मैंने उन्‍हें ई मेल भेजी थी कि क्‍या इंडिका जीएलजी पेट्रोल वर्जन में सीएनजी किट लगवाने पर समस्‍या आती है तो उन्‍होंने इस संभावना को सिरे से ही नकार दिया। जबकि कार मुझे लेने के दिन से पेट्रोल पर और सीएनजी लगवाने पर (जब तक किट बदलवाकर दूसरी स्‍वीकृत सीक्‍वल किट नहीं लगवाई गई), इसका इंजन भी एक बार बदल चुका है, कभी स्‍टार्टिंग में परेशानी सेल्‍फ संबंधी, कभी सर्विसिंग में लापरवाही (कुल मिलाकर मेरी परेशानियों में दिनोंदिन इजाफा) अब तक बेसाख्‍ता परेशान कर रही है। इस बारे में पूरे इतिहास की आप जांच करवा सकते हैं।
नई कार जिस सुकून और आराम के लिए ली जाती है, वो तो मुझे नसीब ही नहीं हुआ है। बनिस्‍बत इसके मेरे जीवन में इसके आने से परेशानियों का अंबार लग गया है। जिससे राहत के लिए मैंने कई बार टाटा मोटर्स के कस्‍टमर केयर को ई मेल से सूचनाएं दी हैं। कंपनी के अधिकारियों से मिलने पर भी कई बार अनुरोध किया है परन्‍तु नतीजा वही ढाक के तीन पात। आप तक पहुंचने के लिए न तो मुझे ई मेल पता ही दिया गया और न ही मेरी समस्‍या आप तक पहुंच सकी है। मजबूर होकर मुझे सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखनी पड़ी है।
अब इन समस्‍याओं से आजिज आकर मैं अपनी समस्‍या सार्वजनिक कर रहा हूं। जिससे मेरी पुकार आप तक पहुंच सके और मुझे मेरी राशि हर्जाने सहित वापिस मिल सके। मुझे पूरा विश्‍वास है कि आप सत्‍य और न्‍याय पर अमल करते हैं। सफलता हासिल करने के लिए जिन खासियतों की इंसान को जरूरत होती है, वे सब आप में हैं। पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिएगा
माननीय रतन टाटा जी से अनुरोध कि टाटा मोटर्स की इस खराब कार के मामले में हस्‍तक्षेप करने का कष्‍ट करें ?
इस संबंध में पाठक अपनी राय उपर वाले लिंक पर क्लिक करके दे सकते हैं।

Tuesday, February 23, 2010

काश...हम होते...उंगलियां एक हाथ की!


काश! तुम होते
गर्म चाय से लबालब कप
हर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप...
दिल होता मिठास से भरा
काश!
मैं होती
तुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..
सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़र
काश! मैं होती रुमाल...
और तुम पोंछते उससे आंख...
हौले-से ठहर जाती पलक के पास कहीं
झुंझलाते तुम...
काश, होती जीभ मैं तुम्हारी
गोल होकर फूंक देती...आंख में...।
काश,
हम दोनों होते एक ही हाथ में
उंगलियां बनकर साथ-साथ
रहते हरदम संग,
वही
गर्म चाय से लबालब कप पकड़ते हुए
छू लेते एक-दूसरे को, सहला लेते...
काश, मैं होती तेज़ हवा,
उड़ाती अपने संग धूल
बंद हो जाती सबकी नज़र, पल भर को ही सही
जब तुम छूते मुझे
कोई देख भी ना पाता...

Monday, February 15, 2010

वेलेंटाइन डे : मंटो के बहाने अनूठी मोहब्‍बत के चंद अफसाने

http://mohallalive.com/2010/02/14/valentine-day-special-writeup-by-chandidutt-shukla/ से साभार...



कहते हैं, दिल की लगी क्या जाने ऊंच-नीच, रीत-रिवाज, घर-बिरादरी और लोक-लाज। फिर क्यों भला मोहब्बत के अफसाने सुनते-सुनाते वक्त भी किसी लड़की की निगाह लड़के की जेब पर और लड़कों की निगाह लड़की के फिगर पर अटक जाती है! मोहब्बत करने वाले खफा होंगे, तमतमा जाएंगे, कहेंगे – अंगूर खट्टे हैं मोहतरम के! खुद को लैला नहीं मिली, सो मोहब्बत को बदनाम करने चले हैं। लेकिन जनाब, कम ही सही, सच तो है ये भी। बहुत-सी मोहब्बतें टाइमपास हो गयी हैं। बड़ी गाड़ी, भरी जेब और महंगे गिफ्ट। बड़े से बड़े आशिक दिल का जनाजा निकालने और बेवफाई की दास्तान लिखने के लिए उकसाने को काफी हैं।

ऐसी बहुत-सी मोहब्बतें, जो बरिस्ता, मैकडी या पार्कों की बेंचों पर शुरू होती हैं, एक-आधे थप्पड़ और कुछ अश्लील एसएमएस के साथ खत्म हो जाती हैं। तो ऐसी चाहतों का क्या कीजिए। आराम बड़ी चीज है, मुंह ढंक के सोइए या फिर लगाते रहिए दिल बार-बार और हर बार तुड़वाने को तैयार हो जाइए। या फिर हो भी सकता है कि सच्ची मोहब्बत मिल ही जाए, कभी-कहीं! खैर, हमारे पाठक कहेंगे, गजब की मनहूसियत है मियां! वेलेंटाइन डे के दिन इश्क के इजहार की बात होती तो कुछ बात बनती।

ये जनाब तो बेवफाई और झूठी मोहब्बतों का रोना ले बैठे। सो मोहतरम… बात तो मोहब्बत की ही करेंगे हम भी, लेकिन ये आशिकी जरा अलग-सी है, अनूठी है। अच्छा, अफसाना शुरू करने से पहले जरा कुछ सवाल-जवाब हो जाएं। आप ही बताएं, आपका महबूब गर किसी गैर की बाहों में सिमट जाए, तो आप उसे चाहेंगे? या तड़पेंगे, झुलसेंगे और भुला देंगे? और कहीं पता चले कि वो नैतिक ही नहीं है, देह की उसे फिक्र ही नहीं है, तो? तब पक्का है कि आप थर्रा जाएं। कल तक जिसका नाम रटते-रटते आपकी जुबान नहीं थकती थी, वो ही आपकी नजर से गिर जाए! पर मंटो, ऐसे महबूब से ही प्यार करता था… क्यों? बताएंगे हम, आगे की लाइनों में। अब शुरू करते हैं हम अफसाना… अनूठी मोहब्बत का।

लीजिए साहब, जब ढोल-ताशे बज ही गये, एलान हो गया नये अफसाने की शुरुआत का, तो बात मुद्दे की हो जाए। एक मियां मंटो हुए हैं अदब की दुनिया में। खुद बा-होश रहे और ऐसी-ऐसी बातें लिखीं कि पढ़ कर अच्छे-खासे लोग बेहोश हो जाएं। उसकी निगाह में मोहब्बत का बयान भी अनूठा है… मंटो कहता है, “किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए, तो मैं उसे जुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ जरूर खींचेगा, जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियां जान देती हैं, लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा। इस बजाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियां भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा।”

कमाल का है मंटो, तभी तो उसने कई ऐसे अफसाने लिखे, जो अदालत तक खींच ले जाने का सबब बने। एक कहानी तो कहर ही बरपाती है – “बू”। कहानी कुछ यूं शुरू होती है – बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवन के स्प्रिंगदार पलंग पर, जो अब खिड़की के पास थोड़ा इधर सरका दिया गया, एक घाटन लड़की…

आगे की लाइनें यहां नहीं लिखी जा सकतीं? क्यों भला… अश्‍लील लगेंगी। पर मंटो को कोई दिक्कत नहीं होती। वो नैतिकता के नाम पर घबराने, थर्रा जाने और लोगों को परेशान करने वालों से कहता है, जब तुम्हारा समाज ऐसा है, तो उसे साफ करो। मैं तो जो है, वो ही लिखता हूं।

इस कहानी का पढ़ा-लिखा नायक रणधीर सब कुछ समझता था, लेकिन वो कभी “मिट्टी पर पानी छिड़कने से निकलने वाली सोंधी-सोंधी बू” नहीं भुला सका। एक वन-डे स्टैंड में घाटन नायिका से मिला रणधीर उस बू को हरदम याद करता है, जो “…कुछ और ही तरह की थी। उसमें लेवेंडर और इत्र की मिलावट नहीं थी, वह बिलकुल असली थी, औरत और मर्द के शारीरिक संबंध की तरह असली और पवित्र।”

अब क्या कहेंगे! क्या इसे अपवित्र, अनैतिक कहकर अनूठी किस्म की मोहब्बत का एक हिस्सा मानने से इनकार कर दिया जाए? ये लगाव नहीं, तो और क्या है, जो “हिना के इत्र की तेज खुशबू” से अलग हटाकर रणधीर के दिमाग में किसी के जिस्म की बू भर देती है!

पाक-साफ, सच्ची मोहब्बतों की दास्तान पढ़ कर खुद को लैला-मजनू समझ लेने वालों को मंटो बार-बार झटका देता है। उसकी एक कहानी है – “सौ कैंडल पावर का बल्ब”। यहां भी कोई जन्म-जन्म की मोहब्बत नहीं है… सिर्फ एक रात की बात है। रात है और एक शहर… नौजवान मुसाफिर एक दलाल से मिलता है। तमाम रातों की जागी हुई एक वेश्या के पास जाता है, जो मजबूरी की शिकार होकर, उनींदी सी ग्राहक के साथ चल देती है। भलामानस ग्राहक उसे वापस पहुंचा देता है, ताकि वो दो घड़ी नींद हासिल कर सके। दो दिन बाद ही वो फिर उसके ठिकाने पर जाता है। बार-बार खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खुलता, तो वो झांककर देखता है। वेश्या ने दलाल का सिर ईंट से तोड़ दिया है और खुद चैन की नींद सो रही है। हाजरीन कहेंगे – इसमें मोहब्बत कहां है? जनाब, मोहब्बत क्या सिर्फ लड़के और लड़की के बीच दिलों के कारोबार को कहते हैं? इश्क क्या महज जन्म-जन्म की कसमें खाने के व्यापार को कहते हैं? यहां शुरुआत में वेश्या के जिस्म की भूख भले हो, ग्राहक के लिए उसकी नींद अपने दैहिक सुख से ज्यादा बड़ी लगती है…। पल भर की सही, एक दिन की सही, ऐसी मोहब्बत अनूठी नहीं, तो क्या है? (भले ही आप इसे हमदर्दी जैसा कुछ मान लें!)

एक कहानी, जिसका शीर्षक याद नहीं आता, में तवायफ अपने आशिक की जान बचा लेती है, खुद हलाक होकर। कौन कहेगा, इससे ज्यादा वफादार कोई पतिव्रता औरत भी होगी? ऐसे ही तो झटके हमेशा देता रहा मंटो। मंटो का जिस्म भले अब दुनिया में न हो, लेकिन उसने अपने अफसानों में सच का जो तेजाब भरा, वो सभ्य समाज के खोखले बदन को पता नहीं, कब तक झुलसाता रहेगा। मंटो तवायफों पर कहानियां लिखता था और उन्हें किसी भी समर्पित प्रेमिका से ज्यादा ईमानदार और पवित्र मानने से कभी गुरेज नहीं करता था। वो मजहबी था या नहीं, इस पर कोई फैसला कर पाना आसान नहीं है, लेकिन कहानियों की शुरुआत से पहले कागज पर 786 लिखने वाला मंटो अपने अफसानों में मोहब्बत के रंग खुद ही भरता था। इसके लिए उसने किसी ईश्वरीय सत्ता से परमिशन लेने की भी जरूरत नहीं समझी। कहीं पढ़ा था – कब्र में पड़ा मंटो अब भी सोच रहा है कि वो ज्यादा बड़ा अफसानानिगार है या खुदा? यही सच भी तो है…

मोहब्बत किससे हो, कितनी हो, कब तक हो, हो भी तो क्यों हो, होने से क्या मिले… इतना जिसने सोचा, उसने मोहब्बत कहां की… इतना सोच-विचार करके दिल लगाने वालों से तो लाख गुना अच्छे मंटो के बुरे चरित्र वाले, खूब खराब नायक-नायिकाएं। वो कम से कम संस्कारों, आदर्शों, नैतिकताओं के नाम पर न जिस्म की गुहार का मुंह बांधते हैं, न ही दिल को रोक लेते हैं – नहीं, इस गली से नहीं गुजरना। यहां कोयला बिकता है… चेहरे पर कालिख लग जाएगी!

Friday, February 12, 2010

अपने ही गर्भ में छिपा लो…सिखा दो…अभेद्य मंत्र


अनजाने चेहरों वाली / सीमाओं से पार / भाषाओं से इतर / कई तस्वीरें / देखीं / सुनीं / पहली-पहली बार / तुम्हारे ही संग / उनमें बसा प्रेम / उभरा तब तुम्हारी आंख से / छलका हमारे होंठों तक / आज फिर / गया उसी दौर में / पर अबूझ रह गए / वो चित्र / जड़ हैं नायक / स्थिर नायिकाएं / ना वहां युद्ध था / ना प्रेम / था तो बस / एक अटूट एकांत / सन्नाटा / जिसे चीर पाना / नहीं मुमकिन / मेरे लिए / बिना तुम्हारे / अब अपने ही गर्भ में / छिपा लो / जन्म देने से पहले / सिखा देना / अवाक् हो जाने के / चक्रव्यूह से निकलने का / अभेद्य मंत्र

Sunday, February 7, 2010

हमारे प्रेम के विरुद्ध…हम…फिर भी ज़िंदा चाहत-संगीत

हर बार उभर आते हैं
मेरे चेहरे पर
तुम्हारे प्रेम के निशान
तब
जब हम मिलते हैं

सूरज मुस्कराता है
और, और तेज़ बहने लगती है नदी
फर्राटा भर-भर हांफ उठती है
धरती

पर 
ये उन्माद नही
ये सब करते हैं
व्यंग्य
हम पर
हम भी 
लगातार निचोड़ते रहे
अपने-अपने हिस्से का प्यार
सोचा
सुखा देंगे सब
देखो 
विधि भी प्रतिकूल है 
और हमारा समय भी
हम खुद हैं
अपने प्रेम के विरुद्ध
पर अफ़सोस…
माफ़ी के साथ कह रहा हूं
सारे षड्यंत्रों के बावज़ूद
कितना ज़िद्दी है
हमारे प्रेम का राग
जब, तब 
जैसे-तैसे 
आकर धर दबोचता है
हमारी घृणा को 
और भरने लगता है 
कंठ तक लबालब
चाहत-संगीत

Thursday, February 4, 2010

सूख गया गुलाब…अब और भी महकता है





तमाम गीत चुनकर मैंने रख लिए हैं/ उस गुलदस्ते में / जिसमें पहली-पहली बार / तुम्हारे जूड़े से निकालकर / लगा लिया था / लाल गुलाब / अब वो सूख गया है / पर महक़ अब तक है / वैसी की वैसी / जैसी थी नए-नकोर फूल में / और देखो / महकता ही जा रहा है / बिना मिलन के खाद-पानी के भी / वो गुलाब अब बंद रहता है / दिल की किताब के / दो मुड़े हुए पन्नों के बीच / जिन पर दर्ज है तारीखें / हमारे संयोग की / आओ पलट दें / पन्ने / पढ़ लें, रच लें नई गजल