मैंने दीं अश्कों से नम शामें / तुमने खिलखिलाहटों से भरी सुबहें / मैं काला हुआ, चीखता ही रहा / तुम गुलाबी रहीं, कभी ना मद्धम हुईं / नादां था, हरदम भटकता रहा / अब जो तुम...नासाज़ हो---नाराज़ हो / पछता रहा हूं/ यकीन मानो / छीजता ही जा रहा हूं.../ ढीठ हूं, सो चाहता हूं / मेरी पलकों में सिमटे आंसू पी लो / होंठों से..../ और मैं / अपने सीने में घुटी मुस्कान / टांक दूं / तुम्हारे लबों पर..
कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द
मुसाफ़िर...
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Tuesday, January 19, 2010
तेरे लब कहां हैं, ओढ़ ले मेरी मुस्कान
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