कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Tuesday, November 23, 2010

अतीत के एलबम से यादों के पन्ने

स्मृतियों का आवेग किसी हैंगओवर से कम नहीं होता, जिससे उबारता है जिम्मेदारी का नींबू पानी। ऎसे ही पहले प्यार की कसक जिंदगी भर साथ रहती है। कितने ही शायरों ने हजारों कलाम टूटे हुए दिल में बसे महबूब के अक्स की तारीफ में लिख डाले, लेकिन अलविदा कहकर चले गए आशिक के साथ बिताए लम्हे भी कौन, कब तक संभालकर रख सका है? फैज अहमद फैज भी ऎसा ही बयान करते हैं- दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया, तुझ से भी दिल फरेब हैं गम रोजगार के।

बीते लम्हों के अक्स जब भी आंखों में उभरते हैं, दिल का कतरा-कतरा जख्मी हो जाता है पर ऎसा नहीं कि हर बार यादें चोट पहुंचाती हों, अक्सर ये भर देती हैं ऎसी कसक से, जिसका कोई अंत नहीं होता। बारहा आंखों में उभरता है बारिश में छप-छप करती नन्ही-नन्ही हथेलियों का क्लोजअप। याद आता है-दौड़के बेर तोड़ना, भागकर साथी को पकड़ना, दादी की गोद में सिर रखकर आधी रात तक कहानियां सुनना। बचपन-जो हर पल साथ रहता है, कभी नहीं छोड़ता। आपको याद आई जगजीत सिंह की आवाज और सुदर्शन फाकिर की गजल-

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना/ वो चिडिया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना/ वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी/ वो ख्वाबों-खिलौनों की जागीर अपनी/ न दुनिया का डर था, न रिश्तों के बंधन/ बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी...वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी...।

...बचपन ही क्यों, यादों की एलबम के पन्ने ज्यूं-ज्यूं पलटते हैं, जिंदगी का हर लम्हा जवान होता है। परेशान करता है, अपने आंचल में समेट लेने को जैसे घेर लेता है। आखिर कौन है, जो अतीत से मुक्त हो सका है। वर्तमान और भूत के बीच ये जद्दोजहद अक्सर चलती है। यूं, जिम्मेदारियों की रस्सी बहुत मजबूती से बांधे रहती है, फिर भी हम अतीत की संदूक खोलकर उसमें झांक लेते हैं। ये क्या है, अतीत मोह, नास्टेल्जिया या फिर कुछ और। बिना भूत के किसी का कोई अस्तित्व नहीं। कहते हैं- किसी देश को खत्म करना हो, तो उसका इतिहास नष्ट कर दो। ऎसे ही तो बिना अतीत, बिना इतिहास के हम नहीं, लेकिन किस हद तक। किस कीमत पर। ये सवाल भी मौजू हैं और उतने ही जरूरी, ताकि इन पर जमकर बहस की जाए। समाधान निकाले जाएं। 

यादें क्या हैं और कैसी होनी चाहिए, उनमें किस कदर पड़ा जाए, उनकी कितनी छानबीन हो, ये भी सवाल उठता है पर कहां किसी के हाथ में है स्मृतियों के उलझाव में नाप-तौलकर पड़ना। जिंदगी अपने आप में इम्तिहान है, सो गुजरी और गुजरती जा रही उम्र का हर पड़ाव किसी क्वेश्चन पेपर से कम नहीं। बशीर बद्र तो बाजादि बयान करते हैं-उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।

यकीनन, अलग-अलग लोगों के लिए जिंदगी के मायने भी अलग हैं। किसी के लिए जहर है, तो इसे पीना मजबूरी है, सो किसी और के लिए सेलिब्रेशन। सुदर्शन फाकिर कहते हैं-जिंदगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले/ जीने वाले तो गुनाहों की सजा कहते हैं। वहीं आजकल लाइफ स्पिरिट से भरपूर है, मस्ती और आशा से लबालब है। वो अतीत में डूबना किसी उलझाव की तरह समझते हैं। पर ऎसे भी लोग हैं, जिनकी निगाहों में हर पल यादों का नशा छलकता है। यादें अक्सर उदास करती हैं। सुदर्शन फाकिर के शेर गवाही देते है-

गम बढ़े आते हैं कातिल की निगाहों की तरह / तुम छुपा लो मुझे ऎ दोस्त गुनाहों की तरह/ अपनी नजरों में गुनहगार न होते क्यों कर / दिल ही दुश्मन था मुखालिफ के गवाहों की तरह / हर तरफ जीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त / बस तेरी याद के साये हैं पनाहों की तरह।

जीवन ही क्यों, इसका आईना यानी साहित्य ही अतीत-मोह से कहां बच पाया है। ललित निबंध जैसी विधा और संस्मरण भी नास्टेल्जिया के सबसे बड़े उदाहरण हैं। चर्चित आलोचक अष्टभुजा शुक्ल, हरिशंकर परसाई के ललित निबंधों के बारे में बताते हैं--उनमें व्यक्ति और आत्म का जो स्पर्श है, वह निरंतर गहरी सामाजिकता में रचा-बसा है। दरअसल, चेतना, स्मृति और वर्तमान का अंतर्द्वद्व ही जीवन की सच्चाई है। राजेन्द्र यादव भी कह चुके हैं कि हिंदी में ललित निबंध की मूल चेतना नास्टेल्जिया है।

रामदरश मिश्र जैसे साहित्यकार हों या प्रेमचंद सरीखे अमर कलमकार, सबका साहित्य स्मृति-अंशों से फला-फूला है। हां, हमारे फिल्मी गानों और दृश्यों की अटकाऊ, उलजाई याद-रसायन से इतर वहां आत्ममुग्धता की जगह अतीत की सटीक और निष्पक्ष समीक्षा है। दिक्कत तब होती है, जब वर्तमान को धिक्कार भाव से देखने की सोच अतीत को अधिक रूमानी बना देती है। ये बिंदु जोरदार तरीके से बहस के दायरे में लाने की जरूरत है। वास्तविकता ये कि अतिरिक्त मोह खतरनाक होता है, चाहे वो जीवन के किसी खास चरण के लिए हो या फिर देश, प्रदेश-जिले-मोहल्ले का हो, कोई शख्स दिल की धड़कन पर कुंडली मारकर बैठा हो या फिर विचार का अतिRमण कर रहा हो, नास्टेल्जिया पर मुग्ध होने के साथ ये बात भी भुलाई नहीं जा सकती। 

यूं, जयशंकर प्रसाद इससे अलग बात अपने एक पात्र मधुआ के हवाले से कहते हैं, मौज-मस्ती की एक घड़ी भी ज्यादा सार्थक होती है एक लंबी निरर्थक जिंदगी से। ऎसे में अतीत-मोह से निकल पाने का हल क्या है। क्या बीती हुई यादों मुझे इतना ना रूलाओ, अब चैन से रहने दो, मेरे पास ना आओ, कहने भर से स्मृतियों से पीछा छुड़ाया जा सकता है? नहीं...यकीनन नहीं।

प्रभाष जोशी ने तो बड़ी कड़ी टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था--यथार्थवादी वर्तमानवादी होते हैं। वर्तमान में सिर्फ पशु ही जीते हैं, क्योंकि उसका कोई अतीत नहीं होता...आदमी-आदमी हुआ तो इसलिए कि उसके स्मृति मिली और वह भविष्य के सपने देखने लगा। वर्तमान यथार्थ हो सकता है, परन्तु यथार्थ सत्य नहीं हो सकता। इसी सिलसिले में एग्स विल्सन की बात याद आती है--भारत एक भौगोलिक वास्तविकता से कहीं अधिक परंपरा और एक बौद्धिक आध्यात्मिक ढांचा है। लूट, गुलामी, विध्वंस, बगावत और पुन:निर्माण से जूझते भारत देश में स्मृतियों का पुन: पुन: जागरण एक कुदरती प्रçRया भी तो है। यहीं पर रामदरश मिश्र कहते हैं--बहुत-से लोग गांव से आकर शहर में खो जाते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं कहीं बचा हुआ हूं। 

इसका श्रेय गांव को है, मेरे पैतृक संस्कार को है। वो बताते हैं कि लेखक अपनी जमीन, अपने गांव से जुड़कर उसके बदलाव को रेखांकित करता हुआ भी उसके मूल्यों को भीतर से तलाशता है और ये मूल्य कहीं हैं? उस सही जगह को देखने की कोशिश करता है। यहां अतीत से जुड़ाव कितना सकारात्मक सिद्ध हुआ है। है कि नहीं? पर यही तब बड़ी फांस बन जाता है, जब वर्तमान की उपेक्षा होने लगती है। और अंत में फिर रामदरश जी की बात--वास्तव में नास्टेल्जिया खराब अर्थ में तभी होता है जब आप अपने समय की पहचान छोड़कर 25 साल, 30 साल के समय में दुबक जाते हैं।

सवाल वही-यादों में उलझकर वर्तमान की खिन्नता के साथ उपेक्षा करें या फिर जिम्मेदारियों का बोझ संभालते हुए कुछ- कुछ देर को आंखें भी मूंदते रहें, ताकि बचपन की छुपन-छुपैया खेलने और बारिश में कागज की कश्ती तैराने के दृश्य उभर सकें? जवाब आप ही तलाशें।


Daily News


डेली न्यूज, जयपुर के हमलोग सप्लिमेंट में प्रकाशित (
http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/21112010/Humlog-Special-article/22666.html) कवर स्टोरी

Sunday, July 4, 2010

आते हैं तुम्हें मौत के बहाने बहुत, ज़िंदगी से जरा-सी मोहब्बत कर लो!



प्यार में पागल जोड़े जब गुनगुनाते हैं—चैन से जीना अगर है,  मुझ पे ज़रा मर ले / आ खुशी से खुदकुशी कर ले…तब बात समझ में आती है, लेकिन कोई सबकुछ छोड़, ज़िंदगी को पीठ दिखा, जान देने पर उतारू हो जाए, तो उसकी झुंझलाहट गले नहीं उतरती। यूं भी, बहुत मुश्किल से मिलती है ज़िंदगी, हज़ार नियामतें लेकर आती है...फिर भला क्यों कोई अपने ही हाथों अपनी सांसें बंद कर देना चाहे? इससे बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती, ये हर कोई जानता है। सभी मज़हब आत्महत्या के ख़िलाफ़ हैं...फिर भी ये तथ्य निरी कल्पना नहीं...ये परेशान करने वाला सच है। दरअसल, बहुत-से लोगों को लगता है—ज़िंदगी से भाग जाना मुश्किलों का हल है!  वज़हें अपनी-अपनी हैं, बहाने अपने-अपने हैं  और खुदकुशियों के बढ़ते आंकड़े भी सामने हैं। कोई दिल हारकर जान देता है, तो कोई भूख से जूझते हुए।
किसी को रिश्तों की उलझन ले डूबती है, तो किसी को काम-कारोबार और प्यार में नाकामयाबी। हैरत तो तब होती है, जब ग्लैमर वर्ल्ड की कोई चर्चित हस्ती ज़हर खाकर, नींद की गोलियां निगलकर, फंदे से लटककर जान दे देती है। जहां हर राह में सितारे जड़े कालीन हैं, शोहरत है, दौलत है, दोस्त हैं, भीड़ है, कैमरों की फ्लैशलाइट्स हैं, वहां मौत और मातम क्या काम? फिर भला कोई क्यों जान देता है? 
हाल में ही कामसूत्र विज्ञापन से फ़ेमस हुईं विवेका बालाजी की आत्महत्या ने ये सवाल फिर गर्मा दिया है। कहते हैं—विवेका अकेली थीं, रिश्तों में धोखे से टूटी हुई थीं, इसलिए दुनिया से जाने में ही उन्होंने बेहतरी समझी। 
यूं, विवेका चमक-दमक से भरी मॉडलिंग, फैशन, टीवी और सिनेमा की दुनिया की इकलौती स्टार नहीं हैं, जिन्होंने आत्महत्या कर ली। कई सितारे असमय ही अपनी चमक खोकर खो गए। वज़ह—वही अकेलापन! धोखा, असुरक्षा का डर और खोखले होते जाने का अहसास। माना कि दिल टूटने की आवाज़ सुनाई देती है ताज़िंदगी, फिर भी जीने का हुनर सीख लेते तो अच्छा होता...। वैसे, ये बात उन सितारों की समझ में नहीं आई, जिन्होंने आत्महत्या कर लेने को ही हर मुसीबत का हल समझा।
9 जुलाई, 1925 को जन्मे गुरुदत्त ने भी जान दे दी थी। लड़की पसंद की थी, फिर शादी बनाई, लेकिन दिल नहीं लगा, सो घुटते रहे। मोहब्बत की कोशिश की, वहां साथ नहीं मिला...फिर भी जिए और क्या खूब जिए। ऐसा काम किया, जिसे अब तक सराहा जाता है। चौदहवीं का चांद, प्यासा, साहब बीवी और गुलाम, काग़ज़ के फूल...एक से एक नायाब नगीने। एक शाम, दिल डूबा। निराशा उभर आई। पता नहीं, प्यार में हार जाने की खीझ बड़ी लगी या कारोबारी झटके...10 अक्टूबर, 1964 की सुबह पता चला—गुरु की बेज़ान देह बिस्तर पर पड़ी है। बाद में लोगों ने बताया, उस रात गुरु ने बहुतों को फ़ोन कर अपने पास बुलाया था, लेकिन कोई नहीं आया, जो उनका दुख बांट ले, उनसे हंस ले, बतिया ले। 
•   ग़ज़ल सिंगर चित्रा सिंह की बेटी मोनिका चौधरी ने जान दे दी, तो इसकी वज़ह भी था—तनाव, बेचैनी और अवसाद।
•  जुलाई, 2004 में कामयाब मॉडल, एक्ट्रेस, वीजे और पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स नफीसा जोसेफ ने आत्महत्या कर ली, वजह—मंगेतर से रिश्ता टूट जाना।



•  टीवी धारावाहिक कैट्स की एक्ट्रेस कुलजीत रंधावा ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि बतौर मॉडल उन्हें अपना कैरियर डूबता हुआ लग रहा था।


•   अप्रैल, 1993 में एक दिन सारा देश स्तब्ध रह गया था, जब पांच मंज़िला इमारत से छलांग लगाकर एक्ट्रेस दिव्या भारती ने जान दे दी थी। कहते हैं—माफिया की धमकी से परेशान होकर दिव्या ने ये क़दम उठाया था।




• 1996 का सितबंर महीना। भारत की मर्लिन मुनरो कहलाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री 
सिल्क स्मिता ने चेन्नई स्थित अपार्टमेंट में फांसी लगा ली। कारण बनीं आर्थिक दिक्कतें और प्यार में मिला धोखा...। पहले स्मिता ने शराब में डूबकर हर गम भुलाने की कोशिश की और जब कहीं राहत नहीं मिली, तो जान दे दी।
•  फरवरी, 2002 में तमिल अभिनेत्री प्रत्यूषा ने ज़हर खा लिया। प्रेमी से वादा किया था, तुम्हारे बिना संसार में नहीं रहूंगी और बस इसलिए खुद को खत्म कर लिया।
•   नवीन निश्चल सबके पसंदीदा अभिनेता हैं, लेकिन उनकी अपनी ज़िंदगी उलझावों से घिरी है। अप्रैल, 2006 में पत्नी गीतांजलि निश्चल ने खुदकुशी की, तो इसका ज़िम्मेदार नवीन को ही बताया।
•  2009 में ब्यूटिशियन शहनाज हुसैन के पुत्र और फ़ेमस रैप सिंगर समीर हुसैन ने आत्महत्या कर ली। ख़राब आर्थिक हालात ही इसका कारण थे।
•  शारान्या भारद्वाज, एक्टर कुणाल सिंह, आशा भोंसले की पत्रकार बेटी वर्षा…ऐसे सैकड़ों नाम हैं, जिन्होंने असमय ही संसार का साथ छोड़ दिया। 
जन्म-जन्म तक साथ निभाने की लिए की गई शादी का टूट जाना, दोस्तों से मिले कारोबारी और भावनात्मक धोखे, कैरियर बरबाद होने का वहम और कई बार ऐसी परिस्थितियों का बनना...यही वो वज़हें हैं, जिनसे जूझते हुए ग्लैमर इंडस्ट्री के लोग जान दे देने का फ़ैसला कर लेते हैं। लेकिन क्या कोई भी नाकामयाबी इतनी बड़ी हो सकती है, क्या कोई धोखा इतना तोड़ सकता है कि सांसों की सौगात को सुलगा देने का फैसला कर लिया जाए?


सिनेमा के संसार की 
सुपर सितारा मीनाकुमारी के हवाले से एक बात...मीना के लिए भी ज़िंदगी बहुत मुश्किल थी। अपनी डायरी में एक जगह वो लिखती हैं—तारीखों ने बदलना छोड़ दिया है, क्या कहूं अब?...मीना के लिए समय ठहर गया था। अरमान झुलस चुके थे। वो मानती थीं—`अचानक आ गई हो वक्त को मौत जैसे / मुझे ज़िंदगी से हमेशा झूठ ही क्यों मिला? क्या मैं किसी सच के काबिल नहीं थी!’ बहुत-से सवाल जहन में थे। कोई आस ना थी, फिर भी मीना जीती रहीं। संसार से तब गईं, जब आखिरी बुलावा आया। 
जीना इसी का नाम है। आखिरी सांस तक लड़ना। मोहब्बत में धोखा मिला, तो क्या? उसकी याद ही सही...और फिर प्रेम का इंतज़ार भी क्या कम है? कैरियर डूब रहा है फिर भी हौसला तो यही होना चाहिए ना कि लड़ेंगे, फिर से सूरज की तरफ बढ़ेंगे। जीना इसी का नाम है। 
बनावट भरी ज़िंदगी जीते समय अगर कुछ वक़्त रिश्तों को संजोए रखने के लिए निकाल पाएं, तो फिर हमारे प्यारे सितारे हमें छोड़कर खुदकुशी की राह नहीं चुनेंगे। ऐसा होगा ना? आमीन!
  
पलायनवादी नायक...
सारे संसार में साहित्य, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में दिग्गज माने जाने वाले बहुत-से नायकों ने आत्महत्या की राह पकड़कर पलायनवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। दुनिया भर को बदलाव के लिए उत्साहित करने वाले कानू सान्याल ने हाल में ही व्यवस्था से परेशान होकर जान दे दी। खूबसूरत, प्रेरणादायक कविताएं लिखने वाले गोरख पांडेय ने नौजवानों को दिशा दिखाई पर खुद ऐसे टूटे कि 1989 में आत्महत्या कर ली। मलयालम की युवा लेखिका टीए राजलक्ष्मी 35 साल की थीं, तो दुनिया छोड़कर चली गईं। 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे को 1954 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और सात साल बाद 1961 में उन्होंने खुदकुशी कर ली। विंसेंट वान गॉग ने सैकड़ों चित्र और ड्राइंग बनाईं, लेकिन 37 साल के थे, तभी खुद को गोली मार ली। अमेरिकी रचनाकार जॉन बेरीमैन ने ‘ द ड्रीम सांग्स’ सरीखी कालजयी कविता लिखी, फिर ये संसार अपनी मर्जी से छोड़ दिया। स में येजनीन ने तीस साल तक ही जीना पसंद किया। और तो और, सारे संसार की मानसिक उलझन का हल तलाशने वाले मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने भी खुदकुशी की कोशिश की थी।
उलझाव, दुख, हताशा...कारण चाहे जो भी हो, इन नायकों ने युवाओं को पलायन का रास्ता दिखाकर सही नहीं किया। यक़ीनन वो भी जब आसमां से इस जहां की ओर देखते होंगे, तो कहते होंगे...हमने हिम्मत छोड़ दी थी, तुम सब लड़ते रहना।


जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/04072010/humlog-article/13432.html  में प्रकाशित आलेख