कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Sunday, February 27, 2011

ट्विंकल है उदास...चले गए अंकल पै

स्मृति-शेष


किस्से-कहानियां सुनाने वाली दादी अब साथ नहीं रहती...घर छोटे हैं...बिल्डिंगें बड़ी हैं...दादी का जी शहर में नहीं लगता...वैसे भी, कार्टून और एनिमेशन का ज़माना है, वो भी डिज़्नी वाले कार्टून्स का। पिछले दिनों `माई फ्रेंड गणेशा’ और `हनुमान’ जैसे कैरेक्टर ज़रूर देखे थे, लेकिन ऐसा कम ही होता है। बहुतायत में तो अब भी अंगरेज़ हावी हैं, पैंट के ऊपर चड्ढी पहनने वाले हीरो! 
यह कोई आज की बात नहीं है। साठ-सत्तर साल पहले से अब तक, कभी बैटमैन, तो कभी स्पाइडरमैन, तो कहीं-कहीं फैंटम जलवा बिखेरते रहे हैं। प्राण के चाचा चौधरी और अंकल पै की ट्विंकल ने ज़रूर धक्का मारकर इनको कई बार भगाया है। बात यह नहीं कि कॉमिक्स के कैरेक्टर स्वदेशी हों। यह राष्ट्रवाद का मामला तो है नहीं, लेकिन इससे भी कौन इनकार करेगा कि अपने बगीचे में फला-पका आम कुछ ज्यादा ही जायका देता है...नहीं क्या? ऐसे ही, रियल इंडियन हीरोज़ के क्रिएटर थे अंकल पै, यानी अनंत पै।
याद आए? हां, अब उनकी याद ही बाकी है। बीते गुरुवार को अनंत पै का निधन हो गया है। उनके परिवार में पत्नी ललिता हैं और हम सबके जेहन में अंकल की यादें...ट्विंकल की बातें और अमर चित्रकथा की तस्वीरें।
बहुत-से साल गुज़र गए, वैसे ही बचपन बीत गया, लेकिन तब मोहल्ले के परचूनिए से ऑरेंज वाली टॉफियां खरीदने के लिए घर से अठन्नी मिलती थी। कई बार मिलती, तो कई दफा हम किसी ना किसी तरीके से झटक लेते। बहुत दफा टॉफी ना आती, उसकी जगह हम कॉमिक्स ले आते। तीन-चार चवन्नियां मिलाकर, या फिर पैसे कम पड़ते तो किराए पर ही सही। सबसे ज्यादा डिमांड इंद्रजाल कॉमिक्स की होती। बाद में यही मांग ट्विंकल और अमर चित्रकथा की हो गई थी। कॉमिक्स इधर हाथ में आई नहीं कि धमाचौकड़ी शुरू...भाई फील्डिंग-वील्डिंग तो सब ठीक है, लेकिन बैटिंग पहले हम ही करेंगे...की तर्ज वाली होड़—कॉमिक्स तो हमें ही पढ़नी है सबसे आगे होकर। 
बहुत बार पैसे ना होते, तो बिरजू चाचा की दुकान पर जाते। कॉमिक्स देखने का बहाना करते और सर्राटे के साथ एक-एक तस्वीर और शब्द ऐसे पी लेते, जैसे—ताज़ा नींबू का शरबत पिया हो। बाद में बिरजू चाचा भी चालाकी समझ गए थे पर वो किस्सा फिर कभी सही। बात अंकल पै की हो रही थी, उनके जादू की, कारनामे की।

दो साल के थे अनंत, जब माता-पिता नहीं रहे। बारह साल के थे, तब मुंबई आ गए। अपना बचपन मां-बाप के बिना गुज़ारा, लेकिन यह ठान ली—दुनिया भर के बच्चों के चेहरे मुस्कान के खजाने से भर देंगे।
रसायन विज्ञान में पढ़ाई करने के साथ-साथ अनंत समझ चुके थे कि बच्चों का दिल लुभाने, यानी उनके दिमाग में केमिकल लोचा करने के लिए क्या-क्या करना होगा? 1967 में उन्होंने अमर चित्रकथा छापनी शुरू की। यह वह दौर था, जब कॉमिक्स ज्यादातर अंगरेज़ी में मिलती। वह भी ऐसी, जिसके हीरो-हीरोइन हमारे कल्चर से एकदम अलग, यानी तकरीबन डरावने होते। हालांकि बच्चों की ऐसी कोई डिमांड नहीं थी कि हीरो हिंदुस्तानी चाहिए, और फिर रामायण-महाभारत की कहानियां तो सबको मुंहज़बानी याद थीं, ऐसे में उनमें कोई खास इंट्रेस्ट नहीं था...लेकिन कमाल थे अंकल पै।
उन्होंने वही पुरानी कहानियां सुनाईं...बस उन्हें पेश करने का अंदाज़ ऐसा था कि वो आदत बन गईं...नस में उतर गईं...। हिम्मतवाले भीम, हरदम सच बोलने वाले युधिष्ठिर, बंशी बजाते कान्हा, माखन चुराते गोपाल...पढ़कर लगता, जैसे हम किसी नए हीरो से मिल रहे हैं।
1929 में कर्नाटक के करकाला में पैदा हुए अंकल पई का 81 साल की उम्र में निधन हुआ है। इस दौरान उन्होंने भरपूर ज़िंदगी जी है। ठीक उसी जोश के साथ, जिस तरह उन्होंने टाइम्स ग्रुप की नौकरी छोड़कर अमर चित्रकथा का प्रकाशन शुरू किया था। क्या कोई सोच सकता है, पुरानी कहानियों की नई पेशकश का उनका अंदाज़ बेस्ट सेलर बन जाएगा। हां, यह रिकॉर्डेड फैक्ट है कि अमर चित्रकथा की कॉपीज़ दस करोड़ से ज्यादा बिक चुकी हैं।
अंकल पै इस मायने में खास हैं कि उन्होंने इतिहास को फिर से रचा (अमर चित्रकथा), फिर 1980 में हिंदी और अंगरेज़ी, दोनों ज़ुबानों में ट्विंकल प्रकाशित करनी शुरू की। कपीश और ट्विंकल जैसे किरदार अब तक घर के मेंबर्स की तरह लगते हैं—यह अंकल पै का ही तो कमाल है। आज तमाम अखबारों में दिखने वाली कॉमिक्स स्ट्रिप्स के पीछे अनंत पै का योगदान कौन भुला सकता है? 1969 में उन्होंने रेखा फीचर्स की शुरुआत की थी और जगह-जगह कार्टून और कॉमिक्स स्ट्रिप्स भेजने का सिलसिला भी।
पिछले दिनों ख़बर सुनी थी कि अमर चित्रकथा अब आईफोन, आईपॉड और सेलफोन पर उपलब्ध होगी। इसके बाद पता चला कि इस लोकप्रिय सीरीज़ पर टेलिविजन सीरियल भी बनने वाला है। यह सबकुछ होगा। बचपन फिर हंसेगा। अपने पुरखों के कारनामे हम याद करेंगे, सबकुछ होगा...बस अंकल पै ना होंगे।

Saturday, February 19, 2011

फिर सुनें स्त्री-मन और जीवन की कहानियां

चर्चा में किताब

कथा में नई दृष्टि और भाषा गढ़ती हैं रीता सिन्हा 


चूल्हे पर रखी पतीली में धीरे-धीरे गर्म होता और फिर उफनकर गिर जाता दूध देखा है कभी? ऐसा ही तो है स्त्री-मन। संवेदनाओं की गर्माहट कितनी देर में और किस कदर कटाक्ष-उपेक्षा की तपन-जलन में तब्दील हो जाएगी, पहले से इसका अंदाज़ा लगाना संभव होता, तो स्त्री-पुरुष संबंधों में आई तल्खी यूं, ऐसे ना होती, ना समाज का मौजूदा अविश्वसनीय रूप बन पाता। सच तो ये है कि स्त्री के चित्त-चाह-आह और नाराज़गी को शब्द कम ही मिले हैं। ज्यादातर समय अहसास या तो चूल्हे से उठते धुएं में गुम हो गए हैं या फिर दौड़ में शामिल होने के लिए लगाई जा रही चटख लिपिस्टिक के रंगों में लिपट बदरंग होते रहते हैं। समझदारी और समझ के बीच की तहें खोलने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जद्दोज़हद में स्त्री कभी भरती है, तो कई बार पूरी तरह खाली हो जाती है। किसी ने सच कहा है—कामयाबी के शीर्ष पर खड़ी स्त्रियां अकेली होती हैं, वहीं घर-परिवार के भरपूर जीवन में भी तो उन्हें तनहा ही होना होता है। वैसे, बात स्त्री के अपने अस्तित्व-जद्दोज़हद की ही नहीं, वह समाज का हिस्सा भी तो है, इसलिए चाहे-अनचाहे उसे वज़ूद के साथ मौजूदगी के ख़तरों-ज़िम्मेदारियों से अनिवार्य तौर पर रूबरू होना होता है। स्त्री की इसी सोच-संवेदना-संत्रास और स्वप्न यात्रा को शब्दों में पिरोने का खूबसूरत काम किया है रीता सिन्हा ने। सामयिक प्रकाशन से आया उनका नया कथा संग्रह—डेस्कटॉप इस काम को बखूबी अंजाम देता है।
बिहार की रीता सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में एडहॉक असिस्टेंट प्रोफेसर एवं इग्नू (दिल्ली) में एकेडेमिक काउंसलर हैं। हिंदी भाषा में एमए, पीएच-डी करने के अलावा, रीता आकाशवाणी से कहानियों और कविताओं तथा दूरदर्शन से कविताओं का पाठ कर चुकी हैं। बीस वर्षों से प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां, कविताएं, समीक्षाएं एवं लेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।
खासी पढ़ी-लिखी रीता के साथ सकारात्मक बात यह है कि वह संतुष्ट हो जाने की जगह सजग हैं। यही सजगता उनकी कहानियों में भी नज़र आती है।
रीता कहती हैं—जब विसंगतियों या विडंबनाओं के कारण भीतर प्रश्नाकुलता की बेचैनी होती है, तब मेरे मस्तिष्क में बिम्बों का सृजन होने लगता है। ये बिम्ब कभी शृंखलाबद्ध होते हैं और कभी टुकड़ों में बनने लगते हैं। इसी के साथ मेरे भीतर की रचनाशीलता भी प्रतिक्रयात्मक संवेगों के साथ सक्रिय होने लगती है। जबतक मैं इन्हें अभिव्यक्त नहीं कर लूँ, मेरे भीतर की बेचैनी खत्म नहीं होती। मैं मानती हूं कि लेखक का समाज के प्रति बहुत बड़ा दायित्व भी होता है। व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को आइने में अपने वास्तविक स्वरूप दिखाने का कार्य भी लेखक ही करता है। मैं अपने लेखन के द्वारा आसपास की उन विडंबनाओं को सामने लाना चाहती हूं, जिन्हें हम देखते तो हर समय हैं, पर उनपर सोचना नहीं चाहते।
तकरीबन पौने दो सौ पृष्ठों के कहानी संग्रह डेस्कटॉप की कीमत ढाई सौ रुपए है, जो कुछ ज्यादा लग सकती है, लेकिन नई सोच और भाषा की जादुई बुनावट के लिए इसे पढ़ा जा सकता है। नए प्रतीकों, मीडिया की अक्षमता-विवशता, मौद्रिक नीतियों के कु-फल, स्त्री की सनातन छटपटाहट और रिश्तों के खोखलेपन को रेखांकित करते इस कथा संग्रह का आमुख प्रख्यात कहानीकार चित्रा मुद्गल ने लिखा है और वह भी मानती हैं कि रीता सिन्हा का कथा-वितान सीमाओं की जकड़बंदी से मुक्त, विस्तृत, गहन और व्यापक है। ठीक ऐसी ही राय हिंदी आलोचना के प्रख्यात पुरुष नामवर सिंह की है, जो रीता की भाषा को आज के दौर के लिए ज़रूरी बताते हैं। तकरीबन चौदह कहानियों से सजे इस संग्रह की खासियत यह भी है कि यहां पुरुष घृणा का पात्र या असभ्य, असमान्य नहीं है (बहुधा स्त्री-विमर्श में रेखांकित किए जाने की तरह), बल्कि वह स्त्री का साथी है और अपनी संपूर्ण छुद्रताओं-स्वाभाविकता के साथ मौजूद है।



रीता सिन्हा से छह सवाल


- लेखन आपके लिए आश्वस्तिकारक है या फिर महज खुद को रिलीज़ करने का माध्यम?
0 लेखन मुझे आश्वस्ति प्रदान करता है। सिर्फ अपनी भावनाओं को बाहर फेंक देने का काम किसी ज़िम्मेदार लेखक का हो ही नहीं सकता, इसलिए मेरा भी नहीं है।
. एक लेखक के कितने आड़े आता है महानगरीय परिवेश?
0 महानगरीय परिवेश में लोगों की गिव एंड टेक की मानसिकता लेखन के आड़े तो आती है, लेकिन यदि लेखक में अनुभूति की ईमानदारी के लिए प्रतिबद्धता और लेखन के प्रति निष्ठा हो, तो यह मानसिकता या प्रवृत्ति अधिक कुप्रभावित नहीं कर सकती।
- स्त्री-विमर्श की आपकी अपनी परिभाषा क्या है?
0 स्त्री विमर्श दृष्टिकोण, विचार या चिन्तन का कोई एक आयाम नहीं है। यह सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्त्री-जीवन का ऐसा मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और बौद्धिक विश्लेषण है, जिसमें किसी तरह का विशेषाग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह नहीं हो सकता।

- भाषा के लिहाज से आप नए प्रतिमान गढ़ सकी हैं। यह उपलब्धि है। इसके लिए बधाई के साथ ही यह सवाल भी कि एक लेखिका के लिए भाषा बड़ा टूल है या विचार?
0 लेखन के लिए भाषा बड़ा टूल है। सशक्त भाषा और शिल्प के द्वारा ही लेखक आज की संश्लिष्ट संवेदनाओं, विडंबनाओं और जटिल यथार्थ को अभिव्यक्ति देने में समर्थ हो सकता है।

- बतौर लेखिका आप ऑब्जर्वेशन और इंप्रोवाइजेशन, में से किसे कथा रचना के लिए ज्यादा ज़रूरी समझती हैं?
0 मैं कथा लेखन में ऑब्जर्वेशन को ज्यादा ज़रूरी मानती हूँ।

Tuesday, February 15, 2011

बिना पते और स्टैंप के एक चिट्ठी

गुज़रा हुआ प्रेम बिसार पाना मुश्किल होता है, तक़रीबन नामुमकिन। कोई जगह, कोई लमहा सबकुछ लेकर आ जाता है सामने। यादों की ऐसी ही एक पोटली…एक चिट्ठी, उसके नाम, जो जिस्म से साथ नहीं है पर यादें अश्क बनकर आंख में मौजूद हैं और धड़कन की शक्ल में दिल के बीच ज़िंदा…। फिज़ाओं में प्यार की खुशबू बिखरी हुई है। फूलों, तोहफ़ों और मुस्कराहटों के मौसम में मिला है यही खत, जो अपने पते तक पहुंच नहीं पाया अब तक…।



सुनो,
तुम्हें जो लिखी थीं, वो चिट्ठियां पुरानी हो चुकी हैं…कुछ ज्यादा ही ज़र्द। पीली पड़ गई हैं चिट्ठियां। इन पर कोई स्टैंप भी तो नहीं है। बस बिना लिफाफे के यहां-वहां रखी हैं। रजिस्टरों में, डायरियों में और हां, एक तो कोट की अंदर वाली जेब में भी रखी है। वहीं सूखे गुलाब के साथ तुमने रख दी थी। मस्त हैं ना यार हम दोनों। और चिट्ठियां भी क्या…कहीं, किसी लाइन में तो आईलवयू नहीं लिखा। कंजूस! कहीं-कहीं तो अनामिका स्याही में डुबाकर लकीर भर खींच दी। पूरा, सादा पन्ना और कोने में खिंची लकीर, लेकिन मैं सबकुछ पढ़ लेता हूं। कितनी ही लालसा, इच्छाएं, इंतज़ार और अब बस…एक ठंडी सांस।
ऐसी ही एक लकीर मैंने भी खींच दी थी तुम्हारे दाएं गाल पर। चिहुंक उठी थीं तुम—धत…ये क्या करते हो। मैं भी तो कितना शैतान था, होली है भाई होली है…और रंग नहीं तो क्या हुआ…स्केच पेन तो थी हाथ में। तुम भी ग़ज़ब…दो दिन तक स्याही धुली ही नहीं। सहेलियां चिढ़ा-चिढ़ाकर पूछतीं—क्या है ये और तुम बस मुस्करा देतीं। मुझे मौसमी चटर्जी अक्सर याद आती है। मुस्कराते हुए हंसी छलका देने वाली। तुम्हारी जुड़वा तो नहीं है ना?
उफ़…अब क्या हुआ। फिर तुनक गईं। दो-चार महीनों का साथ कितना छोटा था। देखो, गुज़र गया। रूठने-मनाने में। कल शाम की बात बताऊं। बस स्टैंड पर खड़ा था। तेज़ हवा चली, लगा जैसे—शॉल उतारकर ढक दोगी। पर कहां हो तुम…। ठिठुरते हुए खड़ा रहा…कानों में गूंज रही थी खनकती हंसी। बिना बात के हंसने की कला कोई तुमसे सीखे। उल्लुओं और पाजियों की तरह…। देखो, मैं भी तो हंस पड़ा हूं तुम्हारे साथ-साथ।
लो…गुज़र गई एक बस। टूटी-फूटी, इसकी खिड़कियों पर कांच नहीं हैं। हवा के साथ कदम मिलाते हुए उड़ी जा रही है। आज तुम होतीं, तो हम दोनों फिर बैठ जाते ना इसमें। ऐसे सफ़र पर चलने के लिए, जिसका कोई ठिकाना ना हो। बस जेब में जितने पैसे होते, उतने कंडक्टर को थमाकर और जब थक जाते, तो बीच राह में उतर जाते। सस्ते से किसी ढाबे में कुछ खाने और उससे ज्यादा बातें करने।
हूं, याद आया उस कॉफी का टेस्ट। कड़वी कॉफी। उसके भी हम सत्रह रुपए चुकाते थे, लेकिन ग़ज़ब की दोस्ती निभाई। हम घंटों उसी सहारे तो जमे रहते थे। और चाय भी तो…किचन में तुम घुसतीं और मैं बुलाता—सुनो, लिपटन की चाह है क्या? तुम तुनकतीं—दादा कोंडके मत बनो, समझे।
कैसी-कैसी तो बेगैरत रातें थीं। जब आतीं, तो सता जातीं। सारी रात मोबाइल पर…पता नहीं कैसी-कैसी बातें। मूवीज़, लिट्रेचर, पोएट्री, मंटो-किशोर कुमार…ग़ज़ब-ग़ज़ब के कॉम्बिनेशन, ना ओर ना छोर…लेकिन तुम भी ना…आई लव यू नहीं बोला बस। लगातार डिस्चार्ज होती बैट्री और सॉकेट में चार्जर लटकाकर बस बातें करते जाना। यार-दोस्त पूछते भी—क्या बातें करते हो तुम दोनों? क्या जवाब देता उन्हें?
हमारी शादी नहीं हुई। चलो, अच्छा ही हुआ। नहीं क्या? हो जाती, तो तुम मेरे ड्रेसिंग सेंस पर खूब चुटकुले सुनाती। कमेंट्स पास करतीं…लेकिन ऐसा क्यों कहूं…तुमने ही तो मुझे बताया था—कपड़े सुंदर नहीं होते, इंसान होता है। मैं खुद को गांव वाला कहता और तुम हंस पड़तीं—बहुत चालू हो। ये सब इमोशनल ब्लैकमेलिंग है बस्स। थैंक्यू बोलूं क्या? सॉरी-सॉरी, यूं ही मुंह से निकल गया। पिटने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
एक कन्फेशन करूं। तुम्हारे जाने के बाद मुझे फिर प्यार हो गया है। नहीं-नहीं, कुछ ऐसा-वैसा मत सोचना। तुम्हारी यादों से प्यार कर बैठा हूं यार। खूब रोया, मिस करता रहा। अक्सर फेसबुक प्रोफाइल पर जाकर देखता हूं तुम्हें। मोबाइल में साल भर पुरानी तुम्हारी मिस्ड कॉल्स पड़ी हैं। उन्हें देखता हूं, तारीख़ वाले कोने पर से झट आंख भर हटा लेता हूं। सोचता हूं—कल ही तो तुमसे बातें हुईं थी रात भर।
तुम नहीं हो। तारीखें गुज़रती जा रही हैं। सच बोलूं, तो ज़िंदगी के बारे में सोचते ही जी कहता है…हूं…कुछ तो है जो अपनी-सी रफ्तार से गुज़र रहा है। कितनी ही प्रेम-पातियां लिखीं तुम्हारे लिए पर कभी पोस्ट नहीं कीं, ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब पता है, तुम्हें भेज सकता हूं, लेकिन कहां…कोई ठिकाना नहीं, जहां कोई रिसीव कर ले ये लेटर्स…। फिलहाल, चिट्ठियां बैरंग हैं, इन पर नेह का टिकट लगाया नहीं जा सका। अब जिसे भी मिलेंगी, वो मेरी नहीं है, कह के लौटा ही तो देगा…।
ऐसे हाल में कुछ तो सलाह दो। शायद फूट-फूटकर रोना चाहिए, लेकिन मैं अक्सर हंस पड़ता हूं। कल ही खूब हंसी आई। तुम्हारी बॉलकनी के नीचे से गुज़रते हुए ऊपर निगाह डाली। तुम नहीं थीं वहां, तभी किसी ने पुकारा। पता है—चाय वाला था। हमने बहुत से कप भर-भरकर चाय पी थी ना वहां। कुल 115 रुपए का हिसाब बना था। ख़ैर, मैंने दे दिए हैं। अब बकाया नहीं है। वैसे ही, तुम पर भी मेरा कुछ शेष नहीं है। हम दोनों चुका चुके हैं, जो कुछ लेन-देन था। हां, प्यार नहीं चुका। उसे चुकने भी ना देना। हर बार प्यार का मतलब साथ तो नहीं होता…और फिर साथ तो हम हैं ही। जिस्म की भला क्या बिसात…दूर है तो दूर सही…।

I-NEXT में प्रकाशित

Sunday, February 13, 2011

एक प्रेमी के नोट्स


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प्यार ना प्यास है, ना पानी। ना फानी है, ना रूहानी। मिठास है, तो कड़वाहट भी। बेचैनी है तो राहत भी। पहला प्यार अक्सर भोला होता है। भले ही उम्र पंद्रह की हो या फिर पचपन की। कैसे-कैसे अहसास भी तो होते हैं पहले प्यार में। एक प्रेमी के नोट्स पढिए, इस वैधानिक चेतावनी के साथ-इनसे इश्क का इम्तिहान हल नहीं होगा, क्योंकि हर बार नए सवाल पैदा होते हैं-




संयोग के दिन

तुमसे मिलने के बाद पहला जाड़ा
सुबह के चार बजे हैं। बाहर तेज हवा चल रही है, फिर भी खिड़कियों पर टंगे परदे हिल नहीं रहे। थमे हैं। सन्नाटा अक्सर रह-रहकर शोर के आगोश में गुम हो जाता है। तेज हवा का शोर। दरवाजा खटखटाए बिना ठंड कमरे में घुस आई है पर मैं तो गर्म हूं...एक शोर मुझमें भी है। सीना धक-धक के साथ गूंजता है पर रजाई पुरानी पड़ जाने के बाद भी सर्दी नहीं लग रही। कल शाम तुम्हारी हथेलियों में जकड़ा मेरा दाहिना हाथ अब तक तप रहा है, जैसे!

लाल रंग का वो छोटा-सा छाता
सुबह से बारिश हो रही है। मैं भीग रहा हूं एक बस स्टैंड की ओट में खड़े होकर। कपड़े सब सूखे हैं पर अंदर कहीं कुछ बहुत गीला हो चुका है। यकायक घड़ी देखता हूं- तीन बज चुके हैं। तुम जाने वाली होगी। मैं भागता हूं। फिसलता हूं। कीचड़ में गिर गया हूं मैं और अब मिट्टी से लबालब। हाथों से अपना चेहरा पोंछने की नाकामयाब कोशिश करता हूं। मिट्टी महक रही है, तुम्हारे बालों में लगे चमेली के तेल सी। मेरा दौड़ना जारी है और घड़ी की सुइयों का भी। सवा तीन बज चुके हैं। तुम्हारी बस रेंगने लगी है। खिड़की से झांकतीं तुम्हारी लालची आंखें। तुम हाथ बढ़ाती हो और थमा देती हो—एक छोटी-सी लाल रंग की छतरी!

नहीं आता था पतझड़
पेड़ को छोड़ रिस रहा है एक-एक पत्ता-पत्ता। दरख्त ठूंठ बन चुके हैं, लेकिन मैं यकायक लहलहा उठा हूं। घर के सामने एक पीपल का पेड़ है। वो मुझे बुलाता है, उसे मैं छूता हूं और लगता है-तुम्हारी खुरदरी एडियों से एक लता फूटी है और मेरे इर्द-गिर्द लिपट गई है। तुम हंसती हो—बस, तुम यूं ही जड़ बने रहना।

लो मिल लो, ये हैं श्रीमान वसंत...

छोटा-सा स्टूल है और बेशुमार चिट्ठियां  हैं। शायद पांच-सात साल पुरानी। बार-बार पढ़ रहा हूं। एक-एक चिटी लगता है, तुमने ही लिखी है। रात नागफनी का गमला खिड़की के बगल रखा है, उसमें खिल गई है गुलाब की कली।

जाती हुई रात, आ रहे सूरज के घोड़े


गर्मी आ गई है पर दिन भर ही रहती है। रातें उमस भरी ठंडी हैं। भोर के पांच बजे हैं और मैं तुम्हारे घर के पास लगे लैंपपोस्ट के नीचे मौजूद हूं। ना सूरज उगा है, ना चांद ढल सका है। लैंपपोस्ट का बल्ब भी टिमटिमा रहा है। आसमान पर जाती हुई रात की लाल-लाल डोरों वाली आंखें हैं और धीरे-धीरे सुनाई देने लगी है सूर्य के घोड़ों के चलने की आवाजें। अलसाई आंखों के इशारे से जैसे घर का दरवाजा हटाती हो तुम... कुछ झुंझलाई हुई सी। 

वियोग की रातें...

जाने के बाद का जाड़ा
दोपहर आने को है। सुबह कई महीनों से नहीं देखी। हाथों से सिगरेट के कई बरबाद टोटों की महक आ रही है। नुक्कड़ पर अलाव जल रहा है। सोचता हूं—हाथ सेंक लूं। तुम पूछोगी कि फिर से सिगरेट पी, तो बहाना बनाऊंगा—नहीं, अलाव पर हाथ रखे थे। ... पर तुम तो हो नहीं। यकायक, थरथराने लगा हूं। नसें ज्यूं जम रही हैं। खड़े-खड़े गल जाता हूं।

पिघलती हुई रूह

यह वही शहर है, जहां हम मिले। टिन की छत पर बहुत बड़ी-बड़ी बूंदें गिर रही हैं। बाहर आ जाता हूं, भीगने का मन है। तुम नहीं, तो गम नहीं, अकेले ही भीग लूंगा...पर कर नहीं पाता। बूंदें ज्यादा बड़ी हैं। सिर पर टप-टप गिर रही हैं। कानों में हवा भर रही है। सांस फूल जाती है और मैं भीगा हुआ लबालब घर के अंदर हूं...इस दफा कपड़े भीगे हैं पर मन भभक रहा है, धुआं बहुत ज्यादा नहीं हो गया क्या...और ताजा हवा बिल्कुल नहीं।

पतझड़ और वसंत की दोस्ती

वसंत बहुत दिन से नहीं आया। दगाबाज है। किसकी तरह पता नहीं। शायद हम दोनों जैसा ही साबित हुआ। उसने पतझड़ से दोस्ती कर ली है। तुमने मचलती हुई उंगलियों से धनिया के बीज रोपे थे और नींबू का पौधा लगाया था। खट्टा-खट्टा कितना अच्छा लगता था हम दोनों को। ब्रेड पकौड़े अब भी बनते हैं बुतरू की दुकान पर, लेकिन तुम्हें पता है—हमारे घर के पिछवाड़े की धनिया और नीबू, दोनों सूख चुके हैं।

जल जाऊंगा, थोड़ा-सा पानी है क्या
उमस बहुत है। सांस लेनी भारी लग रही है। लगता है—कोयले की भटी से निकली राख सीने में अटक गई है। कोला में बर्फ डालकर शराबी होने की नाकामयाब कोशि श कर रहा हूं...बेकार है, बेअसर है। गोलगप्पे भी ताजा नहीं कर पा रहे, पुदीना भी नहीं। तुम आओगी क्या...होंठों के एकदम करीब, बस अपनी सांसों से मेरी आंखों में फूंक मार देने के लिए देखो, नाराज ना होना। किचन में फुल क्रीम दूध का पूरा पैकेट पड़ा है और तुम्हारी पसंदीदा लिपटन की चाय भी। हा हा हा। खैर, ना हो तो एक ग्लास पानी ही दे दो। जल रहा हूं।

Monday, January 31, 2011

घर...

आ से आशियाना
daily-news01
अब हर इंसान का पूरी दुनिया में कहीं ना कहीं घर तो होता ही है। छोटा-मोटा या फिर आलीशान, फिर हर शहर में, जहां वो रह रहा है, मकान बनाने की क्या मजबूरी है? वैसे भी, हमारी जड़ें कहीं ना कहीं तो हैं ही। किसी ना किसी गांव, कस्बे, मोहल्ले, जिले में...।

इंसान को क्या चाहिए भला? दोनों वक्त दो-दो गर्म फुलके, हंसते-खेलते बच्चे, अच्छी और लगातार बची हुई नौकरी, खूबसूरत बीवी, और? और घर। पर घर क्या सचमुच इंसान का अपना सपना है? या यूं कहें कि मकान बनाने का ख्वाब किस कदर मनुष्य स्वयं देखता है...? हां, हमें बचपन से यही समझाया गया है—रोटी, कपड़ा और मकान सबसे जरूरी चीजें हैं, तो? मकान का सपना मूलभूत सपना हुआ या नहीं? पाठक सोच रहे होंगे, कैसा लेखक है, खुद ही सवाल करता है और जवाब भी खुद दे रहा है, पर दोस्तों, सवाल गहरा है, उलझा है। क्वेश्चन और कन्फ्यूजन का फ्यूजन-सा हो रहा है। वैसे भी, जो चीज मन चाहे, ललचाए, खींचकर ले जाए, वो मूल इच्छा हो सकती है, लेकिन जिस ओर पूरा बाजार चिल्ला-चिल्लाकर कहे—यह तुम्हारी जरूरत है ही, उसे थोड़ा ठीक से, ठिठककर समझने का जी जरूर करता है। ऎसा ही हो चुका है, बना दिया गया है—घर का सपना।

छोटे-छोटे शहरों की बड़ी-बड़ी इमारतों में रात के सात-आठ घंटे गुजारने का इंतजाम करने के लिए दस-पंद्रह-सत्रह लाख की पूंजी लगाने का न्यौता बिल्डर देते हैं, बैंक लुभाते हैं और लोग समझाते हैं—अपना घर तो होना ही चाहिए। अव्वल बात समझाने तक होती, तो भी कुछ कम गम था, पर हालत डराने तक जा पहुंची है। रियल इस्टेट कंपनियां इंसान के छत" वाले ख्वाब को ना सिर्फ बेचती हैं, बल्कि धीरे-से कान में यह भी बता देती हैं—जिसका मकान नहीं, उसकी कोई हैसियत भी नहीं है। टीवी के विज्ञापन हों या फिर फिल्मों की कहानियां, सब जगह समझाया जाता है—फ्लैट नहीं तो कुछ नहीं। याद आया आपको— दो दीवाने शहर में, रात में-दोपहर में, आबोदाना ढूंढ़ते हैं, इक आशियाना ढूंढ़ते हैं। (हालांकि यहां बड़ी चतुराई से यह बात गुल कर दी जाती है कि बात शहर में मकान की हो रही है, जड़ों से जुड़ने की नहीं, घर बनाने की नहीं!)। मकान की होड़ में काम के जज्बे को भुला देने की कांस्पिरेसी होती है, सो अलग। जैसे, इंसान के लिए जीवन का कोई और लक्ष्य बचा ही नहीं है।

अब हर इंसान का पूरी दुनिया में कहीं ना कहीं घर तो होता ही है। छोटा-मोटा या फिर आलीशान, फिर हर शहर में, जहां वो रह रहा है, मकान बनाने की क्या मजबूरी है? वैसे भी, हमारी जड़ें कहीं ना कहीं तो हैं ही। किसी ना किसी गांव, कस्बे, मोहल्ले, जिले में...। बड़े शहरों में अगर रोजी-रोटी की जरूरत खींच लाई है, तो वहां जायदाद खड़ी करने की यदि सनक के सिवा और क्या है? कहीं, इस यदि को जोर इसलिए तो नहीं दिया जा रहा है कि शहरों में स्थाई निवास बनेंगे, लोग जमे रहेंगे तो क्रयशक्ति बनी-बढ़ी रहेगी, वस्तुओं की बिक्री जोर पकड़ेगी और सेवानिवृत्ति के बाद अगर लोग अपने-अपने गांव लौट गए, तो बाजार मंदा रह जाएगा? बाजार के समीकरणों के अलावा, एक अदद निजी मकान के इस ख्वाब ने और बहुत-सी जरूरी चीजें गुम कर दी हैं। इनमें से दो का हवाला हम पहले दे चुके हैं, जैसे—काम का जज्बा और जीवन का लक्ष्य।

हम अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी इस उधेड़बुन में गंवा रहे हैं कि मकान बना ही लें। उसके लिए प्रॉपर्टी तलाशने से लेकर रजिस्ट्री के इंतजाम की फि क्रऔर फिर बाकी बची उम्र ईएमआई चुकाने में गर्त होती है। इन हालात में रोजमर्रा के जीवन का आनंद कहीं फुस्स नहीं हो जाता है क्या?... सवाल उठता है, फिर कोई रहे कहां? काम से रिटायरमेंट लेने से पहले क्या किराए के मकानों में भटकता रहे? इस प्रश्न का कोई सही, सटीक जवाब नहीं है। हां, एक दोस्त की बात जरूर याद आती है—खाना होटल में, रहना किराए के कमरे में और मौत हॉस्टल में हो, इससे खूबसूरत ख्वाब कभी नहीं देखा। खैर, इसे पलायनवाद भी समझा जा सकता है, लेकिन यहीं से कई और मजेदार बातें भी सामने आती हैं।

सोचिए, बंजारों के घर कहां होते हैं। कुनबे का कुनबा सड़कों पर जीवन गुजारता है, लेकिन उनकी अलमस्ती, नाच, उल्लास और करतबों के धमाल कोई जवाब है हमारे पास? ऎसे ही यायावरों से कभी मिले हैं आप? जंगल-जंगल, गली-गली, डगर-डगर ट्रैवलर बैग लादे, आड़े- तिरछे रास्तों पर कदम संभालते-भटकने वाले लड़के-लड़कियों और बुजुर्गो से कोई पूछे— क्यों घर-परिवार छोड़कर इधर-उधर फिर रहे हो, क्या मिलता है?, तो वहां से जवाब की जगह मुस्कान मिलेगी, कानों तक चौड़े हुए होंठों की मुस्कान! ऎसा ही सुख है बिना मकान के रहने का भी।

इससे अलग एक और बात भी कुछ कम रोचक नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में ऎसे लोगों ने नायाब सफलताएं और जिंदगी का संतोष हासिल किया है, जिन्होंने अपना कुनबा और ठिकाना छोड़ दिया। महात्मा बुद्ध याद आ रहे हैं? राजपाट त्यागकर ज्ञान की तलाश में वन चल दिए। गोस्वामी तुलसीदास को भी जब रत्नावली से तिरस्कार मिला, तो वो प्रभु की खोज में डूब गए। कबीर के पास अपना मकान था ही नहीं। वो कहते हैं—कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ / जो घर फूंके आपना, चलै हमारे साथ।" जगह-जगह मकान बनाने की जगह जीवन के आनंद को ज्यादा संजोने की जरूरत है और कबीर भी जड़ता को नष्ट कर देने की ही बात करते हैं। राजा जनक सरीखे लोग भी हुए हैं, जो गृहस्थ जीवन में संन्यासी की तरह शामिल हुए। हिंदू धर्म की मान्यता ही है कि संन्यास के बाद ही प्रभु से सायुज्ज होता है। आप ईश्वर से मिल पाते हैं। उनका दर्शन कर पाते हैं...। यहां तो मकान की बात ही क्या, घर की धारणा भी खत्म कर दी गई है। बिनायक सेन का नाम हाल में खूब चर्चा में रहा। उन्हें नक्सलियों से संबंध रखने के इलजाम में जेल भेज दिया गया था।

इस बात में कितनी सच्चाई है, इस पर बहस फिर कभी, फिलहाल उनके बारे में सबसे जरूरी ये जानकारी है कि बिनायक अपनी सुख-समृद्धि और शोहरत छोड़कर जंगलों में भटकते हुए गरीब-दुखियारों के घाव पर मरहम लगाते थे। उनका मुफ्त इलाज करते थे। शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह को ही लें। ना शादी की, ना गद्दारों के आगे घुटने टेके। देश को आजादी दिलाने के महान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने घर-परिवार सब छोड़ दिया। ये चंद उदाहरण साफ कर देते हैं—बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति करनी है, तो कंकरीट की छत के सपने से थोड़ा दूर ही रहना होगा। वैसे भी, जड़ों से बंधे रहने और जड़ हो जाने में बड़ा फर्क है। यही फर्क है—बड़े-बड़े मकान बनाकर उनमें बिना रिश्तों के रहने के जीवन का। शहरों में बनीं बिल्डिंगों में क्या सचमुच के घर बनते हैं या फिर ये वक्त काटने का ठिकाना भर होते हैं? क्यों ना, ऎसी चिंताओं से अलग, बारिश के पानी में भीगने, खिलखिलाने का हौसला बना लें। कोई एक रात किसी पार्क में गुजारने की हिम्मत कर बैठें? किसी मोड़ पे अजनबी बनकर एक-दूसरे से मिलने और मुस्कराने का करतब कर डालें? मैं तो ऎसा करने के मूड में हूं और आप?

Monday, January 10, 2011

सियासत और सेक्स की कॉकटेल-कथा ...कुछ और किस्से

मोहब्बत के बदले मौत... 
यौन शोषण की तोहमतों  के घेरे में  आए तीन विधायकों की `प्रेम? कथा’ आपने पढ़ी, अब बारी है, एक ऐसी ही लव स्टोरी की, जिसमें बात क़त्ल तक पहुंच गई। एक बहुत पुरानी फ़िल्म का गाना है—मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए...बड़ी चोट खाई, जवानी पे रोए। कुछ ऐसी ही है सियासत और सेक्स की कॉकटेल कथा, जिसे सुनकर-पढ़कर-देखकर बस माथा पीटने का मन करता है...सिर धुनने को जी कर उठता है। ऐसी ही तो थी मधुमिता-अमर की प्रेमकथा, जिसे अमरत्व नसीब नहीं हुआ। मधु थी यूपी की एक तेज़-तर्रार कवयित्री, जो शब्दों के तीर चलाकर बड़े-बड़ों को घायल कर देती थी पर उसकी निगाहों के तीर से उत्तर प्रदेश के एक विधायक जी ऐसे घायल हुए कि घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां तक भुला बैठे।

2003 के मई महीने की एक तारीख़। अचानक यूपी के लोग ये ख़बर सुनकर थर्रा उठते हैं कि युवा छंदकार मधुमिता शुक्ला का लखनऊ की पेपर कॉलोनी स्थित घर में कोल्ड ब्लडिड मर्डर कर दिया गया है—यानी नृशंस तरीके से हत्या। किसी की समझ में नहीं आता कि मंचों की जान मानी जाने वाली मधु का मर्डर किसने और क्यों कर दिया। पंचनामा हुआ, बयान दर्ज हुए, पोस्टमार्टम किया गया, जांच हुई, सबूत तलाशे गए और फिर सामने आया—दहला देने वाला सच। मधु की हत्या के पीछे उत्तर प्रदेश के विधायक और पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी का हाथ बताया गया।

सच तो ये है कि मधुमिता को क़त्ल ना होना पड़ता, लेकिन उसने मंत्री-प्रेमी-नेता के कॉम्बिनेशन वाले अमरमणि से ज़िद कर ली—अब मुझे जन्म-जन्म का साथी बनाओ। ये छिप-छिपकर मिलते रहने से जो रुसवाई मेरे माथे पर आ रही है, वह बर्दाश्त नहीं होती। अमरमणि को अब तक जो मोहब्बत ज़िंदा रखती थी, मधुमिता का वही साथ अब उन्हें काट खाने दौड़ने लगा। जानकार कहते हैं, यही वो पल था, जब अमर ने ठान लिया—अब मधुमिता को अपने जीवन में शामिल नहीं करना है।

मधुमिता भी मज़बूर थी। उसके पेट में अमरमणि का बच्चा पल रहा था। शक की सुई उठने पर अमर ने इनकार  किया—नहीं, मेरा मधु से कोई रिश्ता नहीं था, लेकिन डीएनए टेस्ट से साबित हुआ—मधु के गर्भ में पल रहे बच्चे के वही पिता हैं। 21 सितंबर, 2003 को अमर गिरफ्तार कर लिए गए। अदालत ने उनकी ज़मानत की अर्जी भी खारिज कर दी। इसके बाद 24 अक्टूबर को देहरादून की स्पेशल कोर्ट ने अमरमणि त्रिपाठी, पत्नी मधुमणि त्रिपाठी, उनके चचेरे भाई रोहित चतुर्वेदी और सहयोगी संतोष राय को मधुमिता शुक्ला की हत्या के मामले में दोषी करार दिया। अदालत ने अमरमणि को उम्रकैद की सज़ा सुना दी। अमर के पास अपील के मौके हैं। वो कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन मधु किससे दुहाई दे। उसने कब सोचा था—जिस लीडर पर सबकी रक्षा करने की ज़िम्मेदारी है, वही यूं रुसवा करेगा और जान का ही दुश्मन बन जाएगा!

: एक फूल, दो माली... : एक था गुल और एक थी बुलबुल...ये नग्मा तो बहुत ख़ूबसूरत है पर गुल एक हो और बुलबुल, बल्कि भौरें  दो हो जाएं, तो मुश्किल खड़ी हो ही जाती है। अमिता मोदी के भी दो चाहने वाले थे।  एक तो उनके हमसफ़र, हमनवां और नेशनल बैडमिंटन चैंपियन  सैयद मोदी और दूसरे यूपी की सियासत के जाने-माने नाम—संजय सिंह। सैयद मोदी उन दिनों  उत्तर प्रदेश के खेल जगत  में चमकते हुए सितारे के रूप में पहचाने जाते थे। उन्होंने आठ बार राष्ट्रीय  बैडमिंटन चैंपियनशिप में  जीत हासिल की थी। इसी  तरह संजय सिंह भी अपनी ऊर्जा  व वक्तव्य की नई शैली के चलते नाम कमा रहे थे।  कहते हैं, संजय और अमिता की नज़दीकियां गहराईं और यही  अंतरंगता सैयद के लिए जान  जाने का सबब बन गई।

23 जुलाई 1988 की सुबह सैयद मोदी लखनऊ के केडी बाबू स्टेडियम से देर तक एक्सरसाइज करने के बाद बाहर निकल रहे थे, तभी कुछ अज्ञात हमलावरों ने उनका मर्डर कर दिया था। शक की सुई जनमोर्चा नेता और यूपी के पूर्व ट्रांसपोर्ट  मिनिस्टर डॉ. संजय सिंह पर उठी  और फिर सीबीआई ने उन्हें आईपीसी की धारा-302 के तहत गिरफ्तार कर लिया। सीबीआई ने क़त्ल  के दो दिन बाद पुलिस से मामला अपने पास ले लिया था और डॉ. संजय सिंह, सैयद मोदी और अमिता मोदी के बीच प्रेम  त्रिकोण की जांच शुरू कर दी थी। सीबीआई को शक़ था कि प्रेम के इस ट्रांइगल की वज़ह से ही सैयद का क़त्ल हुआ है।

दस दिन बाद  सीबीआई ने दावा किया कि मामले  का खुलासा हो गया है और उसने पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया। इनमें अखिलेश सिंह, अमर बहादुर सिंह, भगवती  सिंहवी, जितेंद्र सिंह और बलाई सिंह शामिल थे। अखिलेश पर आरोप था कि उसने हत्यारों को सुपारी दी थी और अमर, भगवती  व जितेंद्र गाड़ी लेकर सैयद की हत्या कराने पहुंचे थे। बलाई सिंह को रायबरेली से गिरफ्तार किया गया। सीबीआई ने संजय सिंह और अमिता मोदी के घरों पर छापे मारे और अमिता  की डायरी से इस खूनी मोहब्बत के सुराग तलाशने लगी। यही डायरी थी, जिसने बताया—श्रीमती मोदी और संजय सिंह के बीच `क्लोज रिलेशनशिप’ है। संजय सिंह को मामले का प्रमुख साज़िशकर्ता बताया गया। दो दिन बाद अमिता भी गिरफ्तार कर ली गईं। 26 अगस्त को उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया। इसके बाद 21 सितंबर को डॉ. संजय सिंह भी लखनऊ की ज़िला और सेशन अदालत के निर्देश के मुताबिक, दस हज़ार के निजी मुचलके पर जमानत हासिल कर जेल से बाहर आ गए।

इसके बाद सैयद मोदी के कत्ल के पीछे की कथा  इतिहास के पन्नों में कैद  होकर रह गई। आज तक इसका खुलासा नहीं हो सका है कि मोदी का मर्डर किसने किया और किसने  कराया? चंद रोज बीते, संजय और अमिता की शादी हो गई। संजय बीजेपी से राज्यसभा के सांसद बने और अमिता अमेठी से लोकसभा का चुनाव जीतीं। अब दोनों साथ-साथ हैं। चुनाव लड़ते हैं, जीतते हैं। सैयद की आत्मा अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रही है। अदालत में ये साबित नहीं हुआ कि संजय का कोई गुनाह है। अमिता भी बरी हो गईं...बस सैयद ज़िंदा नहीं हैं...।

सीडी, जिसने सनसनी  मचा दी... 
साल-2006 : उत्तर प्रदेश के एक पूर्वमंत्री का घर। बैकड्रॉप में मंत्रीजी के शपथग्रहण समारोह का चित्र लगा है। एक और तस्वीर डिप्लोमा संघ के अभिनंदन समारोह की है। यहां भी वो मौजूद हैं। इसी कमरे में हरे रंग की सलवार और कुर्ता पहने हुए एक युवती बैठी है। कुछ देर बाद वहां शिक्षाजगत के एक वरिष्ठ अधिकारी पहुंचते हैं...।

यह सबकुछ एक सीडी में दर्ज किया गया  और जब यही सीडी निजी टेलिविजन चैनल पर टेलिकास्ट हुई, तो सियासत की दुनिया में भूचाल  आ गया। सीडी में सेंट्रल  कैरेक्टर निभाने वाली युवती  थी—डॉ. कविता चौधरी। चौधरी  चरण सिंह विश्वविद्यालय  में कविता अस्थाई प्रवक्ता थी और हॉस्टल में ही रहती थी। ये उस दौर की बात है, जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। एक टीवी चैनल ने यूपी के पूर्व कैबिनेट मिनिस्टर मेराजुद्दीन और मेरठ यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर आरपी सिंह के साथ कविता के अंतरंग संबंधों की गवाही देती सीडी जारी की। सनसनी भरी इस सीडी के रिलीज होने के बाद सियासत के गलियारों में सन्नाटा छा गया और यूपी के कई मिनिस्टर इसकी आंच में झुलसने से बाल-बाल बचे। सपा सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री किरणपाल, राष्ट्रीय लोकदल से आगरा विधायक और राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त बाबू लाल समेत मेरठ से सपा सरकार में सिंचाई मंत्री रह चुके डॉ. मेराजुद्दीन इस चक्कर में खूब परेशान हुए।... हालांकि ये सीडी सियासी लोगों को परेशान करने का सबब भर नहीं थी। कई ज़िंदगियां भी इसकी लपट में झुलस गईं।

23 अक्टूबर, 2006 : कविता चौधरी बुलंदशहर में अपने गांव से मेरठ के लिए निकली। 27 अक्टूबर तक वो मेरठ नहीं पहुंची, ना ही उसके बारे में कोई सुराग मिला। इसके बाद कविता के भाई सतीश मलिक ने मेरठ के थाना सिविल लाइन में कविता के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने इंदिरा आवास गर्ल्स हॉस्टल, मेरठ स्थित कविता के कमरे का ताला तोड़ा। यहां से कई चिट्ठियां बरामद की गईं। एक चिट्ठी में लिखा था—रविन्द्र प्रधान मेरा कत्ल करना चाहता है और मैं उसके साथ ही जा रही हूं। कुछ दिन बाद कविता के भाई के पास एक फ़ोन आया, दूसरी तरफ कविता थी। वो कुछ कह रही थी, तभी किसी ने फोन छीन लिया...।

पुलिसिया जांच में पता चला—रविन्द्र प्रधान ही मेन विलेन था। उसने बताया—मैंने कविता की हत्या  कर दी है। रविन्द्र ने 24 दिसंबर को सरेंडर कर दिया और उसे  डासना जेल भेज दिया गया। इसके बाद कविता केस सीबीआई के पास चला गया। रविन्द्र ने बताया—24 अक्टूबर को मैं  और योगेश कविता को लेकर इंडिका कार से बुलंदशहर की ओर चले। लाल कुआं पर हमने नशीली गोलियां मिलाकर कविता  को जूस पिला दिया। बाद  में दादरी से एक लुंगी  खरीदी और उससे कविता का गला घोंट दिया। आगे जाकर सनौटा पुल से शव नहर में  फेंक दिया। रविन्द्र ने बताया  कि कविता की लाश उसने नहर  में बहा दी थी। पुलिस  ने कविता का शव खूब तलाशा, लेकिन वह नहीं मिला। भले  ही लाश रिकवर नहीं हुई, लेकिन  पुलिस ने मान लिया कि कविता  का कत्ल कर दिया गया है।

30 जून, 2008 को गाजियाबाद की डासना जेल में बंद रविन्द्र प्रधान की भी रहस्यमय हालात में मृत्यु हो गई। बताया गया कि उसने ज़हर खा लिया है। हालांकि रविंद्र की मां बलबीरी देवी ने आरोप लगाया कि उनके बेटे ने खुदकुशी नहीं की, बल्कि उसका मर्डर कराया गया है। ऐसा उन लोगों ने किया है, जिन्हें ये अंदेशा था कि रविन्द्र सीबीआई की ओर से सरकारी गवाह बन जाएगा और फिर उन सफ़ेदपोशों का चेहरा बेनकाब हो जाएगा, जो कविता के संग सीडी में नज़र आए थे। कविता के भाई ने भी आरोप लगाया कि चंद मिनिस्टर्स और एजुकेशनिस्ट्स के इशारे पर उनकी बहन का खून हुआ और रविन्द्र प्रधान को भी मार डाला गया।

... पर कहानी  इतनी सीधी-सादी नहीं।  इसमें ऐसे-ऐसे पेंच थे, जो दिमाग चकरा देते  हैं। कविता की हत्या  के आरोपी रविन्द्र ने  कई बार बयान बदले। पहले  कहा गया कि एक मंत्री  के कविता के साथ नाजायज़  ताल्लुकात थे, फिर यह  बात सामने आई कि कविता  का रिश्ता ऐसे गिरोह  से था, जो नामचीन हस्तियों  के अश्लील वीडियोज़ बनाकर  उन्हें ब्लैकमेल करता  था। कविता इनकी ओर से हस्तियों को फांसने का काम करती थी। एक स्पाई कैम के सहारे ये ब्ल्यू सीडीज़ तैयार की जाती थीं।

पुलिस की मानें, तो कविता के इस काम में रविन्द्र प्रधान और योगेश नाम के दो लोग साथ देते थे। उन्होंने लखनऊ में पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ. मेराजुद्दीन  की अश्लील सीडी बनाई और उनसे पैंतीस लाख रुपए वसूल किए। रवीन्द्र ने बताया था कि कविता के कब्जे में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर आर. पी. सिंह और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष कुंवर बिजेंद्र सिंह की अश्लील सीडी भी थी।

ब्लैकमेलिंग के एवज में मिले पैसे के बंटवारे को लेकर तीनों के बीच झगड़ा  हुआ, तो कविता ने धमकी दी कि वो सारे राज़ का पर्दाफ़ाश कर देगी। रविन्द्र और योगेश ने फिर योजना बनाई और कविता को गला दबाकर मार डाला।  पुलिस की थ्योरी मानें, तो कविता को भी इसका इलहाम  था और उसने अपने कमरे में कुछ चिट्ठियां लिखकर रखी थीं। इनमें ही लिखा था—मुझे रविन्द्र से जान का ख़तरा है। इस मामले में योगेश और त्रिलोक  भी कानून के शिकंजे में आए। जांच में पता चला कि कविता के मोबाइल फोन की लास्ट कॉल में उसकी राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त बाबू लाल से बातचीत हुई थी।

सीबीआई और पुलिस ने बार-बार कहा कि कई मंत्री इस मामले में इन्वॉल्व हैं और उनसे भी पूछताछ होगी। विवाद बढ़ने के बाद राज्य के पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ. मेराजुद्दीन ने राष्ट्रीय लोकदल से इस्तीफा दे दिया, वहीं बाबू लाल ने भी पद से त्यागपत्र दे दिया। सियासत और सेक्स के इस कॉकटेल ने खुलासा किया कि महत्वाकांक्षा की शिकार महिलाएं, वासना के भूखे लोग और आपराधिक मानसिकता के चंद युवा...ये सब पैसे और जिस्म के लालच में इतने भूखे हो चुके हैं कि उन्हें इंसानियत की भी फ़िक्र नहीं है। दागदार नेताओं को कोई सज़ा नहीं हुई, रविन्द्र और कविता, दोनों दुनिया में नहीं हैं, अब कुछ बचा है... तो यही बदनाम कहानी!

लेखक चण्डीदत्त शुक्ल स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा चार किश्तों में स्वाभिमान टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है. सियासत और सेक्स के काकटेल पर सीरिज जारी है.

Saturday, January 8, 2011

सियासत और सेक्स का कॉकटेल-1

 सेक्स का कॉकटेल देश के तीन माननीय विधायक आरोपों के घेरे में हैं। एक यौन शोषण की तोहमत ङोलते हुए जान से हाथ धो बैठे, दूसरे बता रहे हैं-मैं नपुंसक हूं, रेप कैसे करूंगा और तीसरे पर लगा है किडनैपिंग का चार्ज। दुहाई है-दुहाई है..



ये महामहिम हैं, माननीय विधायक जी हैं, इनके दम से ही लोकतंत्र ज़िंदा है। पचास बरस से भी ज्यादा बूढ़ी हो चुकी मुल्क की आज़ादी ने हमें यही बात सिखाई है, लेकिन हाय रे राम, दुहाई है-दुहाई है..लोकतंत्र के रखवालों पर यह कैसी शामत आई है?दो दिन पहले बिहार में भाजपा विधायक राज किशोरी केसरी को एक महिला टीचर ने चाकू मारकर हलाल कर डाला, तो बुधवार को यूपी के एक एमएलए दुहाई देते नज़र आए। प्रेसवालों से कहने लगे—साहब, मैं तो नपुंसक हूं। भला रेप कैसे कर सकता हूं? बात यहीं खत्म नहीं होती। लोकतंत्र के रखवाले तमाम हैं, उनके किस्से भी हज़ार हैं। ऐसे-कैसे ख़त्म हो जाएं। बुधवार को ही सुल्तानपुर के एमएलए अनूप संडा पर आरोप लगा है कि उन्होंने अपनी प्रेमिका की बेटी को किडनैप करा लिया है..। वाह रे एमएलए साहब, आपको तो पब्लिक ने चुना था इसलिए, ताकि आप सड़कें बनवाएं, पुल बनवाएं, इन्क्रोचमेंट हटवाएं, बिजली-पानी मुहैया कराएं और यह तो आपका क्या हाल हो रहा है? आरोपों की सफ़ाई देते-देते हलकान हो रहे हैं..ये क्या हो रहा है आपके साथ?चलिए, सुन लेते हैं सियासत और सेक्स के कॉकटेल की ताज़ातरीन टॉप थ्री स्टोरीज़—पहले बात दिवंगत भाजपा विधायक राज किशोरी केसरी की। दो दिन पहले पूर्णिया के एक स्कूल की प्रिंसिपल रुपम पाठक ने चाकू मारकर उनकी जान ले ली थी। उसका आरोप था कि विधायक जी यौन शोषण कर रहे थे और शिकायत करने पर पुलिस कोई सुनवाई नहीं कर रही है। अब लालूप्रसाद जैसे बड़े नेता इस हत्याकांड की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। पूर्णिया के उप महानिरीक्षक अमित कुमार कह रहे हैं कि आरोपी का कैरेक्टर संदिग्ध था। ..और विधायक जी तो अब रहे नहीं, लेकिन उनके चरित्र पर जाते-जाते जितने धब्बे लग चुके हैं, उनकी सफाई कौन देगा? बिहार के भाजपा विधायक के बाद अब यूपी में बांदा के बीएसपी विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी की बात। उन पर एक नाबालिग लड़की को बंधक बनाकर रेप करने का आरोप लगा है। फिलहाल, द्विवेदी जी कह रहे हैं कि वो नपुंसक हैं। उनका दावा है—मेरे ऊपर दुष्कर्म का आरोप आधारहीन है। मैं बलात्कार करने में समर्थ नहीं हूं। उन्होंने तो ये भी कह डाला है कि जो मैं ये बात साबित करने के लिए किसी भी मेडिकल स्पेशलिस्ट से जांच कराने के लिए तैयार हूं। और चलते-चलते सुन लीजिए सुल्तानपुर (यूपी) के सदर विधायक अनूप संडा जी से। संडा पर उन्हीं के शहर की एक महिला समरीन ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था और विधायक ने उस पर ब्लैकमेलिंग का। दोनों के खिलाफ मुकदम चल रहे हैं। समरीन जेल भी काट चुकी है। चंद रोज पहले उसके ब्यूटी पार्लर पर कुछ लोगों ने हमला किया था। इससे पहले समरीन ने भी विधायक के पेट्रोल पंप पर तोड़-फोड़ की थी और अब बुधवार को समरीन की ओर से आरोप लगाया गया है कि उसकी मासूम बेटी को विधायक के इशारे पर अगवा कर लिया गया है। इन सब विधायकों (केसरी तो रहे नहीं, सो उनके समर्थकों) का कहना है कि आरोप राजनीति से प्रेरित हैं। सच क्या है, न्यायपालिका तय करेगी। हम तो यही कहेंगे—सियासत और सेक्स के इस कॉकटेल में कुछ तो काला है और वो इतना काला है कि लोकतंत्र की अस्मिता पर, उसके चेहरे पर शर्म की कालिख पुतती ही जा रही है।

Friday, December 31, 2010

मैं बेचारा, महंगाई का मारा

मैं हूं आम आदमी... सरकार का मारा...मेरी आवाज़ सुनो... दर्द का राज सुनो... फ़रियाद सुनो। मनमोहन सिंह जी, आप तो सुनो... कुछ जवाब दो। जी हां, मैं इसी मुल्क का बाशिंदा हूं, जहां मुकेश और अनिल अंबानी रहते हैं। पहले मुकेश ने तारों से बातें करने वाला दुनिया का सबसे महंगा घर ' एंटिला' 4500 करोड़ खर्च करके बनाया और अब अनिल बड़े भाई से बड़ा घर बनवा रहे हैं। मेरा नाम तो आपको पता नहीं है, हां, वो घर जब बनकर तैयार होगा, तो उसका नाम ज़रूर जानेंगे। और क्या पूछा आपने, मैं कहां रहता हूं? अरे साहब, छोटे-छोटे कमरों में, कहीं झुग्गियों में, तो कभी पाइप लाइन में...क्यों? क्योंकि मैं आम आदमी हूं। अनिल अंबानी का घर 150 मीटर ऊंचा होगा और मेरा...? सच कहूं—मैंने बड़े ख्वाब देखने छोड़ दिए हैं। घर का ख्वाब बड़े सपनों में ही शामिल है। सुना है, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंकों ने फिर से ब्याज दर बढ़ा दी है। एक ने 0.75 फीसदी का इजाफा किया, तो दूसरे बैंक ने 0.50 प्रतिशत दर बढ़ा दी। यही वज़ह है कि होम लोन महंगा हो गया है। अब जिन लोगों ने फ्लोटिंग रेट पर होम लोन लिया होगा, उनकी हालत पूछिए...। पसीना छूट रहा है। यही वज़ह है कि मैं अपना घर जैसी सोच को सपनों में भी नहीं आने देता।
घर की तो दूर, सुबह चाय पीने की सोचना भी भारी लगता है। आप तो जानते ही होंगे— मदर डेयरी का दूध फिर महंगा हो गया है। तैंतीस रुपए खर्च करके कौन दूध खरीदेगा चाय पीने के लिए? मेरी तो हिम्मत नहीं पड़ती। कहीं फिर से वही दिन तो नहीं लौटने वाले, जब मां आटे में पानी घोलकर रखेगी और कहेगी—बेटे, पी लो, दूध है। दूध उत्पादक कहते हैं—लागत बढ़ी है। पशुपालकों का शिकवा है—खर्चे बढ़े हैं। हम क्या कहें, किससे कहें, कोई हमें बता दे।
कल की ही बात  है, बच्चे ज़िद कर रहे थे कि गाड़ी से चलेंगे। वो भी यहां-वहां नहीं, डायरेक्ट शिमला। अब इन्हें कौन समझाए—टैक्सियों में सफर करना इतना महंगा हो चुका है कि साल भर की बचत कर लो, तो अपनी गाड़ी, कम से कम नैनो का तो ख्वाब देख ही सकते हैं।
पेट्रोल के दाम तीन रुपए बढ़े, ऐसे में टैक्सी यूनियनें भी किराया बढ़ाने की मांग कर रही हैं। उन्हें ही गैरवाज़िब कैसे ठहराएं? सोल्यूशन क्या है—जो मिले खाएं और मुंह ढककर सो जाएं। किसी शायर ने भी तो कहा है—आराम बड़ी चीज है, मुंह ढक के सोइए।
वैसे, कार भी कुछ दिन में ख्वाबों में शामिल करने वाली चीज ही होने वाली है। नैनो ने भले थोड़ी राहत दी थी, लेकिन नई खबर पता है आपको? वो यह है—मारुति सुजुकी इंडिया और हुंडई कारों के दाम बढ़ा रही हैं। बोले तो, बैलगाड़ी ज़िंदाबाद।
दिल्ली की बसों में जेब कट जाती है, तो पंजाब  में बस से चलने की सोच ही नहीं सकते। हाल में ही सुखबीर साहब की सरकार ने पंजाबी जूती से वैट घटा दिया है और बसों का किराया महंगा कर दिया है, यानी 10 पैसे प्रति किलोमीटर के हिसाब से।
खैर, मैं एक कन्फेशन कर लूं। भटक गया था, कॉमन मैन हूं ना। गाड़ियों, बसों की बात करने लगा था। यहां तो दिक्कत दो जून रोटी की है ज़नाब। खबर आई है कि एलपीजी भी सौ रुपए तक महंगी हो सकती है। तेल मंत्रालय के आकाओं से गुहार लगानी पड़ेगी। उनके आंकड़े भी अजब-गजब हैं। पूर्वी एशिया में एलपीजी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हम ही करते हैं और इसके लिए हर साल 30 लाख टन कुकिंग गैस आयात की जाती है।
सो... हम आंकड़े नहीं समझते मंत्रीजी। रहम करें, ताकि अगस्त के बाद से कुकिंग गैस की कीमतों में हर सिलिंडर पर पचास से सौ रुपए का इजाफा ना हो। माना कि एक साल में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में दो तिहाई की तेजी आ चुकी है। अमीर मुल्क तो झेल लेंगे साहब, हमारा क्या होगा। सुन रहे हैं ना मनमोहन जी?
बहुत डर लगता है ये सुनकर भी कि 2011 में वैश्विक खाद्य संकट हो सकता है। एफएओ ने चेतावनी दी है कि 2011 में दुनिया वैश्विक खाद्य संकट से जूझ रही होगी। हमारी भूख का हल क्या होगा पीएम साहब?
भूखे पेट बच्चे भी भला कैसे स्कूल जाएंगे, उस पर भी पता चला है कि स्कूलों की फ़ीस बढ़ने वाली है! प्राइवेट स्कूल बसों की फीस में इजाफा हो रहा है। एमपी के निजी स्कूल दस से पंद्रह फीसदी तक फीस बढ़ाने वाले हैं। विडंबना भी जान लीजिए, फीस बढ़ाने वालों में ज्यादातर सीबीएसई से एफिलेटेड हैं। और एमपी ही क्यों, दिल्ली में भी ऐसा होने वाला है... पर स्कूल वाले इसे मज़बूरी में लिया गया फ़ैसला बता रहे हैं। वो कहते हैं—तीन साल में डीजल 43 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ चुका है। स्कूल बसों का खर्च भी तो बढ़ रहा है, ऐसे में इसकी पूर्ति कैसे की जाएगी? सच कह रहे हैं प्रिंसिपल साहब, पर आम आदमी क्या करे? आप ही कुछ सुझाइए पीएम साहब।
हम लोग कौन  हैं...छोटी-मोटी फैक्टरियों में काम करते हैं, दफ्तरों में वर्कर हैं या फिर दुकानें चलाते हैं। कहां से लाएं पैसे, कैसे करें महंगाई का मुकाबला?
खबरें खूब हैं, सब की सब डराती हैं। एक खबर ये भी है कि रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति सख्त हो सकती है। ऐसा हुआ, तब तो छोटे और मझोले उद्योगों की हालत और खस्ता हो जाएगी। विदेश से सप्लाई के लिए मांग कम हो गई थी। अब वो सुधरी है, तो डॉलर कमज़ोर हो रहा है। एक तो नीम, दूसरे करैला चढ़ा। बैंक भी ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं। कर्ज महंगा हो जाएगा, बाजार में रकम कम हो रही है, ऐसे में छोटे-मोटे उद्योग क्या करेंगे?
पंजाब नेशनल बैंक पहले नए ग्राहकों के लिए अपनी आधार दर आधा फीसदी बढ़ाकर नौ फीसदी कर चुका है। उसके ज़रिए मिलने वाले सभी कर्ज महंगे हो गए हैं। पेट्रोल भी लगातार महंगा होता जा रहा है।
केंद्र सरकार पेट्रोल की कीमतों से नियंत्रण हटा चुकी है। कारोबारी मनमानी कर रहे हैं। कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले साल जून में नियंत्रण हटाया गया था। तब से पेट्रोल 17-18 फीसदी महंगा हो चुका है। तेल कंपनियां कच्चे तेल की कीमतों और उत्पादक लागत को आधार बनाकर इसकी कीमत तय करने के लिए आज़ाद हो गई हैं। ऐसे में लगातार कीमतें बढ़ती जाएंगी। सुन रहे हैं मंत्री जी? क्या इसीलिए, आपने नियंत्रण हटाया था, ताकि मनमानापन शुरू हो जाए?
माना कि पेट्रोल के कारोबारी घाटे को कम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं, लेकिन आप तो पेट्रोल पर लगाए जाने वाले टैक्स में कमी ला सकते हैं। सुना है, डीजल भी महंगा करने की तैयारी हो रही है। खैर, पेट्रोल की बात ही क्या करें। जयपुर में तो कर्नाटक मॉडल पर पानी के रेट बढ़ाने की तैयारी हो रही है।
तो... सब्जियां महंगी, दूध महंगा, टमाटर महंगा, प्याज महंगा, लहसुन महंगा, अब इस महंगाई की मार से घर का, ज़िंदगी का कौन-सा कोना अछूता बचा है? सरकार को कोई सुध नहीं है। आम आदमी चाहे हड़ताल करे या आंदोलन। मैं बेचारा सचमुच हूं... सरकार का मारा।
और महंगे हो सकते हैं
* पेट्रोल-डीजल, दूध, बिजली, परिवहन, सब्जियां, दालें।
* डीजल की कीमतों में दो रुपए प्रति लीटर की वृद्धि का प्रस्ताव विचाराधीन।
लेखक चंडीदत्‍त शुक्‍ल स्‍वाभिमान टाइम्‍स के समाचार संपादक हैं. इनकी साहित्‍य में भी रूच‍ि है