कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Monday, April 16, 2012

म्यां, नाराज़ क्यूं हो?

- चण्डीदत्त शुक्ल
 
नाराज़ हो,
मेरे से.
म्यां,
कोई नई बात कही होती.
ये क्या,
भूत भगाने को,
इबादत की खातिर
लोहबान जलाना.
कभी
गुड नाइट छोड़के
मच्छर-मक्खी भगाने कू लोहबान  जलाओ न.
अमां.
दिल के जले से मूं फुल्लाने वाले तुम कोन-से नए आदमी हो
किसी टकीला वाले अंबानी से गुस्सा के देखो.
आशिक को तो गली का कुत्ता भी भूंकता है
पूरा पंचम राग में
तार सप्तक छेड़ते हुए
ऊं-ऊं-उआं करके रोता है,
किसी रात साला किसी दरोगा पे रोके दिखाए
नाराज़ मती होओ
हम इश्क के मारे हैं,
तुम्हारी नाराज़गी बेकार जाएगी।
किब्ला.
इश्क ही कल्लो
नाराज़गी फरज़ी लगैगी
फिर तो,
एक ही कंबल में मूं लपेटे हमारे साथ पड़े रहोगे.
ये रोग किसी छूत से नहीं होता
हां, इस रोग की छूत बड़ी बुरी होवे है...

Tuesday, January 10, 2012

क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती



 - चण्डीदत्त शुक्ल@08824696345
तुम्हारा दोस्त दुखी है...
उससे न पूछना, उसकी कातरता की वज़ह,
दुख की गंध सूखी हुई आंख में पड़ी लाल लकीरों में होती है।
ये सवाल न करना, तुम क्यों रोए?
कोई, कभी, ठीक-ठीक नहीं बता सकता अपनी पीड़ा का कारण।
कहानियों के ब्योरों में नहीं बयान होते हताशा के अध्याय,
न ही दिल के जख्मों को बार-बार, ताज़ा चमड़ी उधेड़कर दिखाना मुमकिन होता है साथी।
कोई कैसे बताएगा कि वह क्यों रोया?
इतना ही क्यों, इस बार ही क्यों, इतनी छोटी-सी वज़ह पर?
ऐसे सवाल उसे चुभते हैं।
रो भी न पड़ना उसे हताश देखकर,
वह घिर जाएगा ग्लानि में और उम्र भर के लिए।
नैराश्य होगा ही उसकी ज़ुबान पर और लड़खड़ा जाएगी जीभ,
बहुत उदास और अधीर होगा, अगर उसे सुनानी पड़ी अपनी पीड़ा की कथा।
तब भी यकीन करो, शब्दों में नहीं बांध पाएगा वह अपनी कमज़ोरी।
हो सके तो उसे छूना भी नहीं।
तुम्हारी निगाह में एक भरोसे का भाव है उसका सबसे कारगर मरहम,
उसमें बस लिखा रहे ये कहना – तुम अकेले नहीं हो।
उसकी भीगी पलकों को सूखने का वक्त देना
और ये कभी संभव नहीं होगा, उसे यह समझाते हुए –
गलतियां ये की थीं, इसलिए ऐसा हुआ!
हर दुखी आदमी मन में बांचता है अपने अपराध।
वह जड़ नहीं होता, नहीं तो रोया ही न होता।
दुख नए फैशन का छींटदार बुशर्ट नहीं है कि वह बता सके उसे ओढ़ने की वज़ह,
कोई मौसम भी नहीं आता रुला देने में जो हो कारगर।
हर बार आंख भी नहीं भीग जाती दुख में।
जब कोई खिलखिलाता हुआ चुप हो जाए यकायक,
तब समझना, कहीं गहरे तक गड़ी है एक कील,
जिसे छूने से भी चटख जाएंगी दिल की नसें।
उसके चेहरे पर पीड़ा दिखनी भी जरूरी नहीं है।
एक आहत चुप्पी, रुदन और क्षोभ की त्रासदी की गवाही है।
उसे समझना और मौजूद रहना,
बिना कुछ कहे,
क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती।

Tuesday, October 18, 2011

चांद, स्त्री और तुम्हारे खोने की रपट : तीन कविताएं

# चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345 #

बिना तुम्हारे वसंत ने किया नामंजूर

राम की तो राम जानें /
खग-मृग से उन्होंने क्या पूछा,
क्या सुना जवाब
पर व्याकुल, एकाकी मैं…
तलाशता रहा तमाम ठीहे,
जहां, कोई खग दिखे,
चोंच में तिनका या चिट्ठियां दबाए…
पर, नदारद सब के सब
पक्षिशास्त्र की किताबों में शामिल ब्योरों बीच कहीं गुटरगूं करते होंगे।
मृग,
`जू’ में तालियां बचाते बच्चों के कंकड़ों और व्यर्थ के कुरकुरे संग कन्फ्यूज़ हैं…
सो, खग-मृग के बिना,
मृ़गनयनी तुम्हारे न होने की रपट मैं कहां दर्ज कराता,
किससे पूछता सवाल
बिरला मंदिर के ऐन सामने, कौन-सा है असली पंडित पावभाजी वाला…
यह जरूर तलाशता था…, तभी चिल्लाया कानों के ठीक बगल कोई…
कहो कहां है तुम्हारी वसंतलता…
कहां गई वो मृगनयनी!
मैं निस्तब्ध, अवाक्…
निरुत्तर हूं,
उन शहरों के सभी रास्ते,
जहां हम-तुम साथ-साथ हमेशा `रंगे हृदय’ पकड़े गए थे,
मुझसे सवाल करते हैं,
अकेले, तुम अकेले, कहां गई वह…
जिसके साथ तुम ज़िंदा थे भरपूर।
अब उदास मुंह लिए कैसे फिर सकते हो?
राहों ने मेरे तनहा क़दम संभालने से इनकार कर दिया है।
अल्बर्ट हॉल में संरक्षित ममी ने पूछा–
तुम वहां, बाहर, क्या करते हो…
बिना प्रेम का लेप लगाए,
वक्त की दीमक तुम्हें खा लेगी, बेतरह!
शाम के तारे,
दोपहर का ताप
और सुबह का गुलाल…
नहीं सहा जाता कुछ भी मुझसे
न ही मुझे स्वीकार करता है कोई बगैर तुम्हारे…
वसंत,
तुम्हारे न होने को मंजूर कर लिया है मैंने.
इन दिशाओं से, रास्तों और राहगीरों से भी कह दो
मान लें,
हम-तुम कभी साथ नहीं चले,
नहीं रहे!


तुम रहना स्त्री, बचा रहे जीवन

हे सुनो न स्त्री
तुम, हां बस तुम ही तो हो
जीने का ज़रिया,
गुनगुनाने की वज़ह.
बहती हो कैसे?
साझा करो हमसे सजनी…
होंठ पर गीत बनकर,
ढलकर आंख में आंसू,
छलकती हो दंतपंक्तियों पर उजास भरी हंसी-सी!
उफ़…
तुम इतनी अगाध, असीम, अछोर
बस…एक गुलाबी भोर!
चांद को छलनी से जब झांकती हो तुम,
देखा है कभी ठीक उसी दौरान उसे?
कितना शरमाया रहता है, मुग्ध, बस आंखें मींचे
हां, कभी-कभी पलक उठाकर…
इश्श! वो देखो, मुए ने झांक लिया तुम्हारा गुलाबी चेहरा…
वसंतलता, जलता है वो मुझसे,
तुमसे,
हम दोनों की गुदगुदाती दोस्ती से…
स्त्री…
तुम न होतीं,
तो सच कहो…
होते क्या ये सब पर्व, त्योहार, हंसी-खुशी के मौके?
उत्सव के ज्वार…
मौसम सब के सब, और ये बहारें?
कहां से लाते हम यूं किसी पर, इस कदर मर-मिटने का जज़्बा?
बेढंगे जीवन के बीच, कभी हम यूं दीवाने हो पाते क्या?
कहो न सखी…
जब कभी औचक तुम्हें कमर से थामकर ढुलक गया हूं संपूर्ण,
तुमने कभी-कहीं नहीं धिक्कारा…
सीने से लगाकर माथा मेरा झुककर चूम ही तो लिया…
स्त्री, सच कहता हूं.
तुम हो, तो जीवन के होने का मतलब है…
है एक भरोसा…
कोई सन्नाटा छीन नहीं सकेगा हमारे प्रेम की तुमुल ध्वनि का मधुर कोलाहल
हमारे चुंबनों की मिठास संसार की सारी कड़वाहटों को यूं ही अमृत-रस में तब्दील करती रहेगी.
तुम रहना स्त्री,
हममें बची रहेगी जीवन की अभिलाषा…
उफ़… तुम्हारे न होने पर हो जाते हैं कैसे शब्दकोश बेमानी
आ जाओ, तुम ठीक अभी…
आज खुलकर, पागलों की तरह, लोटपोट होकर हंसने का मन है




हट पाजी चांद
चल हट पाजी,
तू क्या इतराए है
बादलों की मुंडेर पर
जुल्फ खोले हुए…
चांद कहता है खुद को…
देखा है कभी,
मेरी आंख में बसा `टिकुली’ जैसा चांद?
वो न वसंत-नयन की चमक है प्यारे…
कभी मद्धम नहीं होती /
मेरी ज़िंदगी की रोशनी!
तुम्हारी तो राह घेरता राहु
डराता है सूरज।
वसंतलता सम्मुख नत सब मौसम…
बनना हो तो चांद बनो उसकी तरह…
भरी दोपहर में है वो शीतल
और ममता की उष्णता से लबालब हर समय…
बोलो…तुम हो पाओगे ऐसे?
नहीं, तो जाओ चांद…
छुप जाओ…! 


चण्डीदत्त शुक्ल। पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, दैनिक जागरण, फोकस टीवी, स्वाभिमान टाइम्स में विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर नौकरी के बाद अब दैनिक भास्कर की मैगज़ीन डिवीज़न में फीचर संपादक। चौराहा के मॉडरेटर।

Wednesday, August 10, 2011

चंडीदत्त शुक्ल की कविताएँ

काश…हम होते…उंगलियां एक हाथ की!

काश! तुम होते
गर्म चाय से लबालब कप
हर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप…
दिल होता मिठास से भरा
काश!
मैं होती
तुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..
सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़र
काश! मैं होती रुमाल…
और तुम पोंछते उससे आंख…
हौले-से ठहर जाती पलक के पास कहीं
झुंझलाते तुम…
काश, होती जीभ मैं तुम्हारी
गोल होकर फूंक देती…आंख में…।
काश,
हम दोनों होते एक ही हाथ में
उंगलियां बनकर साथ-साथ
रहते हरदम संग,
वही
गर्म चाय से लबालब कप पकड़ते हुए
छू लेते एक-दूसरे को, सहला लेते…
काश, मैं होती तेज़ हवा,
उड़ाती अपने संग धूल
बंद हो जाती सबकी नज़र, पल भर को ही सही
जब तुम छूते मुझे
कोई देख भी ना पाता..

प्यार का प्रूफ पढ़ते हुए…

अक्सर,
प्रूफ पढ़ने वालों की
आंखों में होता है
धुंध का बसेरा
एक अक्षर से दूसरे अक्षर की ओर बढ़ते हुए
वर्तनी की गलतियों को टांकते
अर्धविराम और पूर्णविराम को आंकते
वे झुंझलाते नहीं
मूल से नया पाठ मिलाते हुए
प्रूफ पढ़ने वाले
रेखांकित करते हैं त्रुटियां
और भर लेते हैं
अपने चेहरे की झुर्रियों में
कितने ही थके, छूटे शब्द
यूं ही मैं
तु्म्हारी यादों के निशान टटोलता हूं
पढ़ने की कोशिश करता हूं
कि मूल में क्या होगा
और नए पाठ से उसका ताल्लुक कैसे बिठाऊं
सहज नहीं होता हर बार
सही-सही थाम पाना गलत और सही शब्द का छोर
तभी तो
तुम्हारी मुस्कान में प्रेम के चिह्न ढूंढता हूं
और बाद में पता चलता है
यहां वितृष्णा और व्यंग्य की हंसी थी
अब, जब तुम भी नहीं साथ हो
गुज़रे वक्त और आज के दिन में
कुछ वीक सिग्नल्स की तरह
गुजरे प्रेम के बिंदु जोड़ पाना
नहीं रह गया है आसान
माफ़ करना, मैं ठीक नहीं हूं
प्रेम की प्रूफ रीडिंग के मामले में

प्रेम के रफू–बीच

उंगलियों के पोरों बीच
एक पतली सुई की पूंछ थामे
चुभन को नसों में बहते देखकर भी
एक बार को सी नहीं करता रफूगर
धागा-दर-धागा
फटी-ख़राब-वीभत्स आकृतियों को
एकरंग करता जाता है
उस की तर्ज पर जब-जब मैंने सोचा
उधड़े हुए प्रेम को भी सिल लूंगा
सुई यकायक चुभ गई
और छलछला उठा पोरों में खून
रंग लाल ही था इस खून का
तुम्हारे प्रेम की तरह
पर कहां वह उन्माद
वैसा लगाव
वहां के घाव मरहम की मानिंद थे
और अब ये जख्म
चुभता है
तुम, घायल उंगलियों को जीभ से गर्म तो करोगी नहीं?
मैं जानता हूं
जीवन भर रहूंगा प्रेम के रफूकार की प्रतीक्षा में
और वो कभी नहीं आएगा
मेरे जख्म सिलने के लिए

सब हो गए बेवफ़ा

आज गायब है गंध
किवाम से
modern_art_gallery_-contemporary_galleries_of_modern_art_paintings_merello__mujer_caobaज़र्द है ज़र्दा
चूना भी नहीं काटता जीभ
देखो… सब हो गए बेवफा- बेअसर
तुम भी तो सी-सी करती
नहीं काटती अपने ही दांतों से अपनी जीभ
ना ही पोंछ देती हो
कथियाई उँगलियों को रुमाल समझकर
मेरी शर्ट की बांह से
उफनाता नहीं है कल्पना में कोई झरना
सूखते सब स्रोत
तुमने भी तो छोड़ दिया रियाज़ करने से पहले
गला तर करके कुल्ली करना
और कहीं, रुक गयी है बयार
अब तुम ही कहाँ भरती हो
संसार की दशा पर `उफ़’ कहती हुई निश्वास
नहीं हो तुम
तो रुकी है
पूरी पृथ्वी
तुम हंस दो अब खिलखिलाकर
ताकि खिल जाएँ सब फूल
और लौट आये जीवन भरपूर-भरापूरा

- साभार, परिकल्पना...

Tuesday, February 15, 2011

बिना पते और स्टैंप के एक चिट्ठी

गुज़रा हुआ प्रेम बिसार पाना मुश्किल होता है, तक़रीबन नामुमकिन। कोई जगह, कोई लमहा सबकुछ लेकर आ जाता है सामने। यादों की ऐसी ही एक पोटली…एक चिट्ठी, उसके नाम, जो जिस्म से साथ नहीं है पर यादें अश्क बनकर आंख में मौजूद हैं और धड़कन की शक्ल में दिल के बीच ज़िंदा…। फिज़ाओं में प्यार की खुशबू बिखरी हुई है। फूलों, तोहफ़ों और मुस्कराहटों के मौसम में मिला है यही खत, जो अपने पते तक पहुंच नहीं पाया अब तक…।



सुनो,
तुम्हें जो लिखी थीं, वो चिट्ठियां पुरानी हो चुकी हैं…कुछ ज्यादा ही ज़र्द। पीली पड़ गई हैं चिट्ठियां। इन पर कोई स्टैंप भी तो नहीं है। बस बिना लिफाफे के यहां-वहां रखी हैं। रजिस्टरों में, डायरियों में और हां, एक तो कोट की अंदर वाली जेब में भी रखी है। वहीं सूखे गुलाब के साथ तुमने रख दी थी। मस्त हैं ना यार हम दोनों। और चिट्ठियां भी क्या…कहीं, किसी लाइन में तो आईलवयू नहीं लिखा। कंजूस! कहीं-कहीं तो अनामिका स्याही में डुबाकर लकीर भर खींच दी। पूरा, सादा पन्ना और कोने में खिंची लकीर, लेकिन मैं सबकुछ पढ़ लेता हूं। कितनी ही लालसा, इच्छाएं, इंतज़ार और अब बस…एक ठंडी सांस।
ऐसी ही एक लकीर मैंने भी खींच दी थी तुम्हारे दाएं गाल पर। चिहुंक उठी थीं तुम—धत…ये क्या करते हो। मैं भी तो कितना शैतान था, होली है भाई होली है…और रंग नहीं तो क्या हुआ…स्केच पेन तो थी हाथ में। तुम भी ग़ज़ब…दो दिन तक स्याही धुली ही नहीं। सहेलियां चिढ़ा-चिढ़ाकर पूछतीं—क्या है ये और तुम बस मुस्करा देतीं। मुझे मौसमी चटर्जी अक्सर याद आती है। मुस्कराते हुए हंसी छलका देने वाली। तुम्हारी जुड़वा तो नहीं है ना?
उफ़…अब क्या हुआ। फिर तुनक गईं। दो-चार महीनों का साथ कितना छोटा था। देखो, गुज़र गया। रूठने-मनाने में। कल शाम की बात बताऊं। बस स्टैंड पर खड़ा था। तेज़ हवा चली, लगा जैसे—शॉल उतारकर ढक दोगी। पर कहां हो तुम…। ठिठुरते हुए खड़ा रहा…कानों में गूंज रही थी खनकती हंसी। बिना बात के हंसने की कला कोई तुमसे सीखे। उल्लुओं और पाजियों की तरह…। देखो, मैं भी तो हंस पड़ा हूं तुम्हारे साथ-साथ।
लो…गुज़र गई एक बस। टूटी-फूटी, इसकी खिड़कियों पर कांच नहीं हैं। हवा के साथ कदम मिलाते हुए उड़ी जा रही है। आज तुम होतीं, तो हम दोनों फिर बैठ जाते ना इसमें। ऐसे सफ़र पर चलने के लिए, जिसका कोई ठिकाना ना हो। बस जेब में जितने पैसे होते, उतने कंडक्टर को थमाकर और जब थक जाते, तो बीच राह में उतर जाते। सस्ते से किसी ढाबे में कुछ खाने और उससे ज्यादा बातें करने।
हूं, याद आया उस कॉफी का टेस्ट। कड़वी कॉफी। उसके भी हम सत्रह रुपए चुकाते थे, लेकिन ग़ज़ब की दोस्ती निभाई। हम घंटों उसी सहारे तो जमे रहते थे। और चाय भी तो…किचन में तुम घुसतीं और मैं बुलाता—सुनो, लिपटन की चाह है क्या? तुम तुनकतीं—दादा कोंडके मत बनो, समझे।
कैसी-कैसी तो बेगैरत रातें थीं। जब आतीं, तो सता जातीं। सारी रात मोबाइल पर…पता नहीं कैसी-कैसी बातें। मूवीज़, लिट्रेचर, पोएट्री, मंटो-किशोर कुमार…ग़ज़ब-ग़ज़ब के कॉम्बिनेशन, ना ओर ना छोर…लेकिन तुम भी ना…आई लव यू नहीं बोला बस। लगातार डिस्चार्ज होती बैट्री और सॉकेट में चार्जर लटकाकर बस बातें करते जाना। यार-दोस्त पूछते भी—क्या बातें करते हो तुम दोनों? क्या जवाब देता उन्हें?
हमारी शादी नहीं हुई। चलो, अच्छा ही हुआ। नहीं क्या? हो जाती, तो तुम मेरे ड्रेसिंग सेंस पर खूब चुटकुले सुनाती। कमेंट्स पास करतीं…लेकिन ऐसा क्यों कहूं…तुमने ही तो मुझे बताया था—कपड़े सुंदर नहीं होते, इंसान होता है। मैं खुद को गांव वाला कहता और तुम हंस पड़तीं—बहुत चालू हो। ये सब इमोशनल ब्लैकमेलिंग है बस्स। थैंक्यू बोलूं क्या? सॉरी-सॉरी, यूं ही मुंह से निकल गया। पिटने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
एक कन्फेशन करूं। तुम्हारे जाने के बाद मुझे फिर प्यार हो गया है। नहीं-नहीं, कुछ ऐसा-वैसा मत सोचना। तुम्हारी यादों से प्यार कर बैठा हूं यार। खूब रोया, मिस करता रहा। अक्सर फेसबुक प्रोफाइल पर जाकर देखता हूं तुम्हें। मोबाइल में साल भर पुरानी तुम्हारी मिस्ड कॉल्स पड़ी हैं। उन्हें देखता हूं, तारीख़ वाले कोने पर से झट आंख भर हटा लेता हूं। सोचता हूं—कल ही तो तुमसे बातें हुईं थी रात भर।
तुम नहीं हो। तारीखें गुज़रती जा रही हैं। सच बोलूं, तो ज़िंदगी के बारे में सोचते ही जी कहता है…हूं…कुछ तो है जो अपनी-सी रफ्तार से गुज़र रहा है। कितनी ही प्रेम-पातियां लिखीं तुम्हारे लिए पर कभी पोस्ट नहीं कीं, ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब पता है, तुम्हें भेज सकता हूं, लेकिन कहां…कोई ठिकाना नहीं, जहां कोई रिसीव कर ले ये लेटर्स…। फिलहाल, चिट्ठियां बैरंग हैं, इन पर नेह का टिकट लगाया नहीं जा सका। अब जिसे भी मिलेंगी, वो मेरी नहीं है, कह के लौटा ही तो देगा…।
ऐसे हाल में कुछ तो सलाह दो। शायद फूट-फूटकर रोना चाहिए, लेकिन मैं अक्सर हंस पड़ता हूं। कल ही खूब हंसी आई। तुम्हारी बॉलकनी के नीचे से गुज़रते हुए ऊपर निगाह डाली। तुम नहीं थीं वहां, तभी किसी ने पुकारा। पता है—चाय वाला था। हमने बहुत से कप भर-भरकर चाय पी थी ना वहां। कुल 115 रुपए का हिसाब बना था। ख़ैर, मैंने दे दिए हैं। अब बकाया नहीं है। वैसे ही, तुम पर भी मेरा कुछ शेष नहीं है। हम दोनों चुका चुके हैं, जो कुछ लेन-देन था। हां, प्यार नहीं चुका। उसे चुकने भी ना देना। हर बार प्यार का मतलब साथ तो नहीं होता…और फिर साथ तो हम हैं ही। जिस्म की भला क्या बिसात…दूर है तो दूर सही…।

I-NEXT में प्रकाशित

Tuesday, August 10, 2010

प्रतिभा कटियार की कविता...चिड़िया नहीं हूं मैं...








स्त्री-विमर्श की दुनिया में खरी-खरी कहने के लिए चर्चित और अपनी संवेदना-पगी कहानियों के ज़रिए मुग्ध और सोचाकुल करने में माहिर प्रतिभा कटियार लखनऊ में रहती हैं और हमारे वक्त की ज़रूरी रचनाकार हैं। इन्हें पढ़ना एक अनूठे अनुभव से साक्षात्कार करना है। दैनिक हिंदुस्तान में छपी उनकी एक कविता चौराहा के पाठकों के लिए प्रतिभा जी की अनुमति और नुक्कड़ के सहयोग से यहां हाज़िर है। 

मेरी राय में कविता-- ये स्त्री का स्वतंत्र स्नेहगान है, जिसमें तुम केवल श्रद्धा हो या फिर भटका हुआ संसार हो...इस तरह के दोनों आकलन से अलग स्त्री का स्वाभाविक भाष्य है, स्वयं के बारे में...नहीं, मैं इतनी सहज नहीं हूं कि तुम छल लो, ना ही मैं इतनी कठिन हूं कि हल नहीं निकाल पाओ. जैसी दृष्टि रखोगे, वैसा ही दर्शन पाओगे और नहा जाओगे नेह ही नेह से...नेह ही नेह में.



अब आप सबकी राय का इंतज़ार...

Saturday, July 10, 2010

एक कविता



ज़मीन बिछी / क़दमों तले / तब / तलाशता रहा / खड्डे / छलने के निशान 
अब / धरती पपड़ा गई / और मैं / गिड़गिड़ा रहा--
पुरखों की मिट्टी / ना बिके  / सजावटी गमले / बनकर 
लाल ना होने दो / सुरमई शामें / आंख रखते ही / वहां / आ जाती थी नींद
डरा हूं / कहीं / चोरी ना हो जाए/ रात के नयनों का काजल
गीली मिट्टी / सन जाती थी / दांतों के साथ / चुभलाता रहा / दरदरी-सी जीभ / अपनी ही 
ना सूखने पाए / उस सुधा का रस / भंवरे / चूस ना लें / अमृत-स्रोत
ना ढहें / मेरे हिस्से के पहाड़ / इनमें कमंद फंसाकर/ नापी थी ऊंचाई /जाना जीवन सुख / हरारत भरे होंठों में भर ली/ बर्फीली ठंडक 
देखता हूं / पिघल रही / क़तरा-क़तरा बर्फ / बची रहने दो पहाड़ी / जहां फूटता है / ममता का सोता / जो भर देता है / भूख भरा पेट / अंदर के शिशु का 
सलामत है नदी / मुंह लगाते ही / बुझी हर बार / प्यास की आग / 
बनी रहने देना ज़िंदगी...















Sunday, May 30, 2010

फिर क्या बोलें, क्यों बोलें ये लब


बताना ही क्या
कि
पहली बारिश के बाद
किस तरह मन का पोर-पोर
सहलाती है
माटी से उठती महक.
कहना ही क्या
कि 
मधुयामिनी में
प्रिय प्रतीक्षा के अंतराल के बाद
प्रेमाष्पद से मिलने का हर्ष क्या होता है...
कुछ लोग पूछते हैं...
बारिश में भीगते हुए,
छुप-छुपकर सिर्फ देखना...
ये क्या है...
ये बेवकूफ़ी ही है...
समझदार ये सब नहीं किया करते...
पहली बार प्रिय की पाती पढ़कर
जिस तरह होता है रोम स्फुरण
भावोद्रेक करा देता है कंठावरोध
वैसे ही
साक्षी है क्रूर समय...
जिसका मारा मैं...
प्रतीक्षा की एक-एक सांस का बोझ गिना है...
कहता हूं गवाह बनाकर 
काल चक्र को...
जैसा अमावस के बाद
सुख मिलता है धरा को...
चंद्र दर्शन का,
वैसे ही--
बरखा में भीगे तुम
दिखते हो,
तब मन मयूर करने लगता है नर्तन...
क्यों बोलें ये लब...
जब हृदय की धड़कनें तक जुड़ी हैं..
प्रिय स्मरण के क्रम से...
तुम्हारा आगमन और बिछोह ही
बढ़ाता-घटाता है
मेरे संवेदी क्रम को...
और मन कनबतियां करता रहता है
आसपास की बयार से...
फिर क्या बोलें, क्यों बोलें ये लब

रात के 4.25 बजे, गोंडा, सितंबर 1997

Thursday, May 27, 2010

पनीली आंखों के आगे खुशबूदार शाम


तुमने कहा 
क्या फायदा हुआ-
इस साथ से?
हम नहीं रह पाए पास...
नहीं हो सकी
संवेदना के मुक्तप्रवाही निर्झर में-
भावनाओं की उछलकूद 
मानता हूं मित्र
हमने जाना अपने आपको एक अरसे में
पहचानने में तो और भी वक़्फा लग गया
कुछ उधेड़बुन अब भी हो रही है...
अहसास में.
लेकिन इतना पास होने पर...
भी क्यों हैं उखड़े-उखड़े से...
बिखरेपन को समेटते हुए...
आओ! जी लें...
जीवन के उतने लम्हों को
जो अपने हैं...
जितना जो कुछ नीरस है,
बना लें मधुरिम...
कभी भी...
हृदतंत्री पर बजती वीणा के सुरों को
नापकर नहीं बताया जाता
सुरदार या बेसुरा...
यानी कि 
नहीं आंका जाता, नापा जाता
अपनेपन में सार्थकता या निरर्थकता का बोध...
जितना मिला वक़्त
महसूसने का...
हमने जिया, एक-दूसरे को गर्मजोशी से...
अब दूर रहेगी तो देह...
क्या हुआ, जो माटी के बुत अलग रहे...
हम तो सदैव रहेंगे एक, इकट्ठे
महकते जज़्बात सदैव देते रहेंगे
दस्तक
मन के किवाड़ पर
आहट, ख्वाबों की-पदचापों की...
झिंझोड़ती रहेगी हमारी-तुम्हारी तंद्रा
गर्म सांसों की मलय...
अलकें उड़ाया करेगी तुम्हारी,
क्यों होते हो अधीर प्रिय...
हम हैं जन्मों के साथी..
नहीं होंगे विलग
आओ! बिखेर दो एक स्मित हास्य...
जिससे...
निराशा की दोपहरी में
एक खुशबूदार शाम हो जाए...
और तब तुम्हारी पनीली आंखों के आगे...
शायद उग सके...
हमारे सुखद भविष्य का इंद्रधनुष

रात के 2.54 बजे, गोंडा, सितंबर-1997

Tuesday, May 25, 2010

नहीं बनना महान


मुझे नहीं बनना आदर्श पुरुष,
या फिर देवता...
नहीं चाहिए लेबल
महान होने का
मैं बने रहना चाहता हूं...
सारी दुर्बलताओं से ग्रस्त
एक आम इंसान!
जो बिना झिझक के
आंख को जो अच्छा लगे,
मन को जो शीतल कर दे...
प्राणों को जो झंकृत कर दे...
उसको बिना हिचक-
अपना कह दे!
ऐसी दिव्यता क्या करूं,
कि प्रिय को दर्शनशास्त्र तो पढ़ा लूं,
लेकिन बरबस बन थोथा महान
बांच भी ना सकूं प्यार की इबारत...
क्या मिलेगा उस लेबल से-
इसलिए हे प्रिए!
मुझे बना रहने दो, एक दुर्बल मानव
जिससे मैं, अपनी हर अभिव्यक्ति से पहले...
सारी वर्जनाएं भूल-
हर आम इंसान की तरह गुनगुना सकूं-
मुस्करा सकूं-
और बिना डर तुम्हें निहार सकूं...

गोंडा,  4.40 बजे रात में, 06 सितंबर, 1997

Monday, May 24, 2010

क्रूर ये समय

प्रिय,
आज हूं मैं  हिंस्र
आक्रामक...उत्तेजित
किसी आदमखोर पशु सा उन्मत्त!
ढूंढ रहा हूं घड़ी के आविष्कारक को...
मिल जाए / तो / तोड़ दूं उसका सर...
जब तुम अपने हाथ पर बंधी कलाई घड़ी देखते हो
मन करता है
जला दूं संसार की सारी घड़ियों को
जिन्होंने बांध रखी है विवशता समय की,
काश!
जब तुम मिलो-
रुक जाए ये संसार
मैं पागल-सा
बस सुनूं
तो शांति का संगीत...
या तो तुम
अगली बार मिलना...
हरदोई में
जहां का घंटाघर बंद है,
एक दशक से...
कम से कम
वहां तो ये शत्रु समय पीछा नहीं करता....!

गोंडा, रात के 2.40 बजे, सितंबर, 1997

Thursday, May 20, 2010

आत्मज्ञान तक पहुंच / समझा हूं / कि हूं / कन्फ्यूज़्ड

पिछली पोस्ट में कुछ कविताएं आपके लिए हाज़िर की थीं...वही सिलसिला जारी है...


सुंदरता पर / निश्वास / छोड़ता हुआ भी / तन्मय कब तक रहता मैं?
आदमखोर चरित्र को दरकिनार कर / सत्यवसन रहता मैं...
नहीं झेल सकता मैं अब एक भी मुखौटे वाला चेहरा
उतार डाले सभी  आवरण
नग्न यथार्थ की धरा पर हूं खड़ा
हूं तुम्हारे सामने।
सच की सज़ा क्या मिलेगी?
आत्महत्या की तरह फांसी का फंदा /
या कि तुम दोगे अभयदान?
अच्छा होगा तुम फिर लटका दो सलीब पर...
कम से कम हो सकूंगा
ईसा और सुकरात की तरह
वे भी तो हो गए थे अमर...
नहीं जानता,
क्या साबित करना चाहता हूं?
सच बोलने की सज़ा पाना चाहता हूं...
या / कि / झूठ बोलने का लाइसेंस!
आत्मज्ञान जगाना है मुझे,
अपने / आप / अपने में / मुझको / मुझमें
या कि /
महान होने के मुखौटे पहन,
कुछ और विशिष्ट होने की होड़ में,
होना है शामिल
(2001, जालंधर)

Tuesday, May 4, 2010

मजदूर और मजबूर....मीडिया





दोस्तों,

फोकस टेलिविजन में मेरे वरिष्ठ, हिंदी आउटपुट डेस्क के प्रमुख प्रमोद कुमार प्रवीण ने मज़दूर दिवस पर एक कविता लिखी। अभिव्यक्ति और प्रतीकों के लिहाज से अनूठी ये कविता इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि मीडिया के मज़दूरों पर सधी हुई टिप्पणी भी यहां पढ़ने-समझने को मिलती है...







हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।

एक मई, यानी मजदूर दिवस पर, मीडिया के मजदूरों की मज़बूर-गाथा के दो शब्द....

Sunday, April 25, 2010

फिर गूंजे चाहत संगीत


तुम मेरे लिए नहीं थे पड़ाव भर
ना ही किसी तृष्णा की तुष्टि का साध्य
फिर क्यों
कुंठाओं की धरती पर बलिदान हुआ हमारा प्रेम
पूछता है मेरे प्रेम का ज़िद्दी राग, मुझसे ही जोर-जोर से
हृदय अब भी चाहता है...
बना रहे राग
पर
रात भर, मंद-मंद कर रिसता है
कानों में
कुहुक नहीं,
कसक बन
काश!
थम जाए ये कोलाहल
और फिर गूंजे
चाहत-संगीत

Thursday, November 26, 2009

मुंबई हमला...थोड़ा-सा गुस्सा


कितनी मुश्किल, कितने कंटक खड़े करेगा दुश्मन
हर बाधा हम दूर करेंगे, जीतेगा ये जीवन
माटी अपनी फौलादी है, जज्बा अपना इस्पाती
मिट जाएंगे पर नहीं झुकेंगे, देश है अपनी थाती

उजड़ी कोखें, सूनी मांगें, बहनों के पसरे हाथ
करें सवाल यही वो हरदम, कब होगा इंसाफ़
नापाक पड़ोसी होश में आए, आंखें अपनी खुली हुईं

रक्षा की खातिर न्योछावर कर देंगे ये तन-मन...

Monday, September 28, 2009

मैं और तू...

प्रेम नहीं है 99 साल की लीज

मैं : प्रेम का क्या होगा, जब साथ नहीं रह पाएंगे
तू : चुप कर, चूम ले बस
मैं : पर कब तक
तू : एक ये पल जीवन से बड़ा नहीं है क्या?

या तो यक़ीन, या फिर...

मैं : आज फिर तू उससे मिली
तू : हां! तूने देखा!
हां : कोई बात नहीं, मुझे तुझ पर यक़ीन है
तू : यक़ीन? फिर सवाल कैसे जन्मा?

जीवन से अलग?

मैं : मेरे लिखे डायलॉग सब बोलेंगे
तू : और कहानी का क्या होगा?
मैं : कहानी से ही तो निकलेंगे...
तू : फिर अलग से क्यों लिखने पड़ेंगे?

Wednesday, September 23, 2009

चार-चार पंक्तियां

माफ़ कीजिएगा...अरसा हुआ, कुछ लिखे हुए। आज कुछ पंक्तियां उभरी हैं...लिखा नहीं है इन्हें...नकली लेखन जैसे करता रहा हूं, वैसा नहीं है, इसलिए ना तो लालित्य दिखेगा ना शब्द चमत्कार। हो सके, तो मान लीजिए, ये सचमुच दिल से निकली हैं...!


आंसू

तुम्हारी आंख से टपका
पलक में अटका मेरी
नहा गया रोम-रोम
जन्म-जन्म को



निवेदन

सांस भर हूक
यक़ीन भर सब्र
खाली झोली
भर डालो अब

अप्रत्याशित

तुम जीवन हो
कहा हरदम
घृणा के ज्वार तुमसे
अब सहे जाते नहीं

अहसास

हृदय-तार झनझनाते हैं
वधिक के भी
जब छू लेता है वो
कोई मासूम आंसू

अनाकांक्षा

नहीं चाहिए दिशा
न मंज़िल
तुम्हीं तुम सबकुछ
ना चाहो तो ना मानो

मैकेनिक!

सूखे आलू, जली दाल
पंक्चर साइकिल
संभालो सबकुछ
जीवन के जादूगर

Sunday, July 26, 2009

बड़े भ्रम में होते हैं विवाद खड़ा करने वाले - प्रयाग शुक्ल




(इस साक्षात्कार के साथ प्रकाशित चित्र श्री तनवीर फारूक़ी जी का खींचा हुआ है....इस पर उनका कॉपीराइट है...उनके ब्लॉग से ही ये चित्र साभार लिया गया है...)

रोज बदल रही दुनिया में मैं एकांतवासी की भूमिका में हूं.. कहकर सहसा गंभीर हो गए उस शख्स को आप पलायनवादी न समझें। शीरीं जुबान से आप कैसे हैं? पूछ अपनी मृदुता से मुग्ध कर देने वाले प्रयाग शुक्ल चर्चा में रहने के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों से दूर बैठकर भी संतुष्ट हो चुके शख्स हैं..तकरीबन छल-छद्म की दुनिया से अलग-थलग अपने निज के संसार में प्रसन्न सर्जक। दिनमान और नवभारत टाइम्स में महत्वपूर्ण पदों पर कई साल नौकरी कर चुके प्रयाग से रविवार के अलावा हफ्ते भर मंडी हाउस स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में निदेशक के कमरे के ठीक बगल रंग-प्रसंग के दफ्तर में बेझिझक मिला जा सकता है। प्रयाग इन दिनों रानावि की पत्रिका रंग प्रसंग के संपादक हैं और संवेदनशील कवि के रूप में उनकी पहचान तो जग-जाहिर है ही। प्रयाग से हमने जाना साहित्य की दुनिया में हो रही सियासत, युवाओं के मोहभंग और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में : क्या यह क्रूर सत्य नहीं कि साहित्य समाज के लिए की परिभाषा 21वीं सदी की दहलीज तक आते-आते औंधे मुंह गिर गई है? साहित्य तो बराबर समाज के लिए ही लिखा जाता रहा है। कुछ दिक्कतें जरूर हो सकती हैं। हिंदी में हालात कुछ ऐसे हुए हैं कि लेखक का समाज नहीं बचा है। 20 साल पहले तक शहर से बाहर कहीं जाने पर या फिर अपने आस-पास पाठक समाज के दर्शन हो जाते थे। आज वह कहीं नजर नहीं आता। पाठकों के लिहाज से हम दरिद्र कहां हैं? हिंदी अखबार तो करोड़ से भी ज्यादा पाठकों को संजो रहे हैं? यह एक विचित्र बात है कि एक करोड़ से भी ज्यादा हिंदी अखबार बिक रहे हैं लेकिन किताबें उसी रफ्तार से घटती जा रही हैं। अखबारों को सूचना के लिहाज से तो बढ़त मिल गई है लेकिन मुद्रित साहित्य लुप्त होने की स्थिति तक पहुंच रहा है। आपकी मूल चिंता क्या है? किताबों के प्रति मोहभंग या फिर कुछ और..? हम अपनी विरासत को ही भूलते जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो क्या है कि लोग प्रेमचंद, सुभद्राकुमारी चौहान, भगवती चरण वर्मा को भी भूल बैठे हैं। जो पीढ़ी अपनी जड़ें भुला देगी, वह खुद कैसे पनपेगी? अखबारों ने तो साहित्य के संरक्षण के लिए काम किया है? अखबारों को साहित्यिक बनाने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। कुछ जगह साहित्य के पृष्ठ भी निकाले जा रहे हैं लेकिन अव्यवस्थित ढंग से। इससे बेहतर तो यह है कि धरोहर पर केंद्रित करके बिसरे जा रहे साहित्यकारों की रचनाओं, विचारों को प्रकाशित किया जाए। अब साहित्यिक पृष्ठ तो निकल रहे हैं लेकिन कई अवांछित विज्ञापन साहित्य के उसी पन्ने को जबरिया घेर लेते हैं। इस बात का कभी दुख नहीं होता कि लोग मुझे बहुत बार नहीं पहचान पाते। न पहचानें, लेकिन साहित्य के अमर लोगों को क्योंकर भुला दिया जाता है? लिखने के लिए पहचाने जाने वाले साहित्यकार आज स्कैंडलों के लिए ज्यादा मशहूर क्यों हैं? कुछ साहित्यकार आश्वस्त नहीं हैं कि समाज उनके साथ है, शायद इसीलिए ऐसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आम तौर पर हिंदी का लेखक समझ नहीं पा रहा है कि समाज बदल रहा है। शहर में शोर मचाकर खुद को छपवाने में लगे लेखक लोगों के बीच जाकर उनकी दिक्कतें समझें, फिर लिखें तो स्वीकार्यता जरूर मिलेगी। एक खास बात यह भी है कि विवादों से कुछ नहीं होने-जाने वाला। ऐसा करने वाले लोग बहुत बड़े भ्रम में हैं। वे इतनी छोटी दुनिया में रह रहे हैं, जहां से बाहर का नजारा उन्हें नजर नहीं आता। औसत प्रतिभा का संक्रमण सचेत साहित्य संसार को दूषित तो नहीं कर रहा? मैं चीजों को किसी एक औसत परिभाषा में बांधने के विरुद्ध हूं। प्रतिभा भी औसत नहीं हो सकती। प्रतिभा की कहीं कमी नहीं है लेकिन उसका उपयोग सही तरीके से नहीं हो रहा है। साहित्य की दुनिया में त्रुटियां यह हुई हैं कि हम युवाओं की नब्ज नहीं पकड़ सके हैं इसीलिए उन्हें हम अपनी ओर नहीं खींच पा रहे हैं। साहित्यिक कार्यक्रम इतने फीके क्यों पड़ गए हैं? फिल्मों, चित्र प्रदर्शनियों, नाटकों, नृत्य के कार्यक्रमों व संगीत जगत के प्रति तो युवा आकर्षित हो रहे हैं लेकिन साहित्यिक गोष्ठियों में अब भी युवा पीढ़ी की भागीदारी के नाम पर सन्नाटा ही नजर आता है। आज का युवा बौद्धिक तौर पर सजग और संभला हुआ है। असल गड़बड़ कई साहित्यिक संस्थाओं की तरफ से हुई है। उनकी नीतियां अस्पष्ट और भ्रामक हैं। युवाओं के लिए वह ऐसा कुछ नहीं दे पा रही हैं, जो नौजवान पीढ़ी चाहती है। समाज बदला है, पीढ़ी बदली है, उनकी आकांक्षाएं बदली हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पा रहे हैं। पहले तो मुद्रित शब्दों के प्रति लोग आस्थावान थे, अब वह प्रतिबद्धता क्यों नहीं रही? पहले समाज में दूसरी कलाएं इतने प्रभावकारी ढंग से उपस्थित नहीं थीं। अब साहित्य के लिए अन्य कलाओं को औजार बनाकर इस्तेमाल करना होगा। कला को औजार की तरह इस्तेमाल करने के संदर्भ में आपकी पहल तो काफी प्रासंगिक बन सकती है, क्योंकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का मंच तो आपके साथ है ही। श्रुति कार्यक्रम इस कोशिश की गवाही है। कहानी-कविता के मंचन के जरिए ऐसा प्रयास हमने किया है। कई अनचीन्हे साहित्यधर्मियों को मंच देने का उपक्रम भी हुआ है। आगे भी हम ऐसा करते रहेंगे। विष्णु खरे ने कहीं कहा है कि आपकी कविताएं उन्हें कविता जैसी नहीं लगतीं? यह उनकी राय है और वे ऐसी सोच रखने के लिए स्वतंत्र हैं। इस पर मैं क्या कहूं और क्यों कहूं? क्या रंग-प्रसंग बहुत बौद्धिक नहीं होता जा रहा है? सूचना-तकनीक की समृद्धता वाले युग में कार्यक्रमों की सूचनाएं छापना बासी थाली परोसने जैसा है। विचारों की पुष्टता सर्वाधिक आवश्यक है। इन दिनों क्या कर रहे हैं? रवींद्रनाथ ठाकुर की 12 कहानियों का अनुवाद मैंने पूरा कर लिया है। स्कॉलॉस्टिक प्रकाशन इस भावानुवाद को प्रकाशित कर रहा है। वैसे, शोर मचाने वालों की दुनिया में मैं एकांतवासी की भूमिका में हूं। मुझे तत्काल लाभ की चिंता के बगैर काम करना अधिक सुख देता है। भविष्य की नींव ऐसे ही खड़ी होती है।

Wednesday, July 8, 2009

चंद लम्हे, कुछ अहसास और ढेर सारा प्यार


क्या करूं? कुछ ठोस. देर तक असर करने वाला लिखा ही नहीं जा रहा बहुत दिन से...उश्च्छृंखलता स्वभाव और सृजन पर कितना गहरा असर डाल रही है...कहना मुश्किल है...ख़ैर...इस बीच कुछ-कुछ दो-चार पंक्तियों से ज्यादा नहीं लिख पाया...तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...की तर्ज पर वही सबकुछ आपके लिए...



ये मुझे है पसंद

बचा इक इरादा है तो बस ये...तुम्हारी राह में हम फूल बनके बिछ जाएं.../ ये इंसान की सूरत भला लेके करेंगे क्या, भला हो काजल बनें और तुम्हारी आंख में रच जाएं...


एक और पसंदीदा पंक्ति
इक बात मेरी तीर सी उतर जाती है ज़िगर में... जान-ए-जां कभी प्यार का मुकम्मल फ़लसफ़ा भी याद करो / सुलगती रात के बाद सुबहा में उलझे गेसू याद करो / करो जो याद तो मेरी इरादा-ए-वफ़ा याद करो / राह-ए-मोहब्बत में कांटों की उलझनें भुला दो साथी / अब मौक़ा है जो हमारे प्यार की ज़ुबां याद करो


कभी गुजरते हुए उम्र के बागबां से....

कभी गुज़रते हुए उम्र के बागबां से, जो यादों का कोई दरख़्त टकरा जाए बांह से, तू रुकना, कुछ हंसना फिर छू लेना उसकी पत्तियां....तुझे कहां है पता, वो तो मैं ही हूं, जो उगा हूं तेरी राह में....यकीं रख, लम्हा भर की उस छुअन के लिए, मैं जीना चाहूंगा हज़ार सदियां...लेना चाहूंगा सौ-सौ जनम...आना...मेरे सुगना...आना.


नगमा और सपना

नींद भर सो लेने के बाद, जाग जाने से पहले मैंने देखा है कई बार सपना... तू गुनगुनाती रही, मैं सुनता रहा, देखते-देखते बन गया नगमा अपना....ज़िंदगी भर क्यों हम बेज़ार होते रहें, आ बढ़ें, संग चलें, देखते-देखते दुश्मन भी हो जाएगा...हां, अपना.


चेहरे-कपड़े-मुखौटे
तुम्हें चेहरे से क्या मतलब / तुम्हें कपड़ों से क्या मतलब / हमें मालूम है तुम्हारे लिए हैं ये सब बहाने भर.../ भला कहते रहो तुम औरतों को मूरख / हमें भी नज़र आता है तुम्हारी नज़र का मतलब....

सांस, दूध और पानी
पानी की बूंदों में घुला दूध का स्वाद, सांसों से फूटी इलायची जैसी ख़ुशबू...तू मिला साथी, गर्म हो गई अहसास की चाय..



इश्क..मर्ज...दवा

इश्क हो मर्ज, तो लब हैं दवा / ग़मों की क्या बिसात, न हो जाएं वो हवा!


तुम्हीं कहो....
कभी कहते हो हमारी ज़िंदगी से रुखसत हो जाओ, कभी इकरार करते हो फर्ज-ए-मोहब्बत का...तुम्हीं में अक्स देखा है हमने सांसों की बुलंदी का, भला अख्तियार क्यों करते हो ये रास्ता अदावत का


बांकपन...
ये माना कि ख़फ़ा है तू, बिना मेरे तेरी रहगुज़र भी तो नहीं....ये ना सोचो कि ग़ुरूर में हूं मैं, मेरी जां तेरे साथ के बिन मेरा भी बसर तो नहीं...


जाम और नाम
हर सांस में तेरा नाम था, धड़कनों में सलाम था.../ जिस डगर पे तेरे पग चले, उसी राह पे पयाम था / हमें मयनशी की आदत कहां, तेरी आंख में ही जाम था / अब तू कहां और हम कहां पर इतनी तो है ज़िद बाकी बची / जब तक जिए, हम संग रहे, प्यार ही अपना काम था


अवधी में प्यार
वही ठइयां ठाड़े रहिबै बालम, जहवां तू हमइं छोड़ि गयेव है....मनवां मां उठत हइ हूक बहुत अब, सोचेव भी नाईं तू हमइं कहां छो़ड़ि गयेव है...देहियां के पीरा कइ नाहीं कउनउ इलाज भवा, करेजवा मां अगिया तू झोंकि गयेव है...अबहिंव तू फिकिर करौ, हमसे तू धाइ मिलव...अंखिया ना मूंदब, खाइब ना पीयब, नाहीं हम जीबै, नाहिन मरबै, वहीं ठइयां ठाड़े रहिबै बालम, जहवां तू हमइं छोड़ि गयेव है...


एक और अवधी रचना...ब-स्टाइल-लोकगीत
हमरे मन की चिरइया उड़ी जाय रे...फगुआ ना गावै, कजरी ना गावै, बहियां से छूटै हमैं तरसावै...यही ठइयां दगाबाज़ी किहां जाय रे...गोदिया बैठाइके भुइयां मां पटकै, मुहंवा लगाइके नैना झटके...नाहीं देखइ की जियरा झरसाइ रे...हमरे मन की चिरइया उड़ी जाय रे...

प्यार बुरा है?
माना ये संसार बुरा है...हम सबका व्यवहार बुरा है...धीरज धर के इतना सोचो...कहां हमारा प्यार बुरा है..


तुझे है वास्ता
तुझे हमसे प्यार का है वास्ता...न खुद से खुद की रक़ीब बन, जो खुद से मोहब्बत ना होगी आपको, तो कहां मिलेगा हमें भी रास्ता


जो अश्क कर पाते...
अश्क बयां कर पाते हाल-ए-दिल, तो चेहरे पे मिरे तेरी तस्वीर बनी होती / यूं न बह-बह के सूख जाने पर मज़बूर रहते, हाथों में मिलन की लकीर बनी होती


गुमां छोड़कर...
उजले जिस्म का ग़ुमां छोड़कर, स्याह आंख का अश्क बनना बेहतर....जो ज़ुदा हों, तो जाएं जान से...राह-ए-गलतफहमी पे भटकने से पेश्तर


ये भी है...अभी बाकी....

मुख़्तसर से तो मिले थे तुम, फौलाद-से जु़ड़ गए / चले थे मंदिर को जानम, क़दम तेरे दर को मुड़ गए


शेर---1
रहमत-ए-इश्क की बारिश जो कर जाओ तुम / यकीं मानों हमें हीरे भी खैरात लगने लगेंगे / और ये कहना ही क्या कि हम इश्क के ग़ुलाम हैं / तमाम सल्तनतों के ताज़ भी हमें आग लगने लगेंगे


शेर---2
सुलगती रही धूप, दिल से धुआं उठने लगा / दूरी ने यूं गाफ़िल किया-रस्ता ज़ुदा लगने लगा / यूं जाया न करो दूर तुम / हमारा आज देखो कल लगने लगा


शेर---3
बारिश हुई, नहाए रास्ते, ओस के संग मैं हूं... / बहुत झुलसा कई दिन तक, आज नशे में हूं.../ रफ़्ता-रफ़्ता दिल पे काबिज़ हुईं थी तनहाइयां / तुम मिलीं, खुशबू खिली और मैं मज़े में हूं..


शेर-4
तुम्हारी याद के नाते...तुम्हारे साथ के किस्से, न होते जो ये, तो हम भी कहां होते...


शेर-5
कहां से आते हैं उदासियों के हवाले, पता हमको नहीं सनम... इतना भर जान लो तुम, जो बिछड़े तो बाकी बचेगा ग़म

शेर-6
सोचते थे ज़ुदा होके भी जी लेंगे हम, आलम ये है कि सांसों में इक क़तरा हवा तक ना बची / जो बिछड़े दो घड़ी के लिए बस यूं ही बेसबब, ज़िंदगी के लिए देखो कोई आरज़ू ही ना बची


शेर-7
हम इतनी मुद्दत बाद मिले...फिर भी क्यों बने मन में गिले...हंसी की खनक से भर जाते सारे जख़्म...पर तू तो साथी अब तक होंठ सिले...


शेर-8
तुझे खुद से ज्यादा ही चाहा है हरदम...कैसे उपजे फिर भी बोलो मन में भरम


शेर-9
खूबसूरत हो तुम, तुम हो नादां बहुत / उड़ती रहो पर संभलकर उड़ो/ ज़िंदगी है कहां आसां बहुत




फ़िलहाल इतना भर....थैंक्स फेसबुक का...जो ये कह-कहकर `क्या है आपके मन' में पूछ-पूछकर कुछ ना कुछ लिखवा ही लेता है...

Monday, February 2, 2009

लौट आओ, ताकि लौट जाए उदास शाम


आज फिर बस स्टैंड पर उतर आई उदास शाम
मूंगफली के छिलकों का ढेर किसी के पांवों तले चरमराया नहीं
पांच रुपये की 100 ग्राम जलेबियां इंतज़ार करती रहीं अपने ग्राहक का
मच्छर भिनभिनाते रहे
ताज़ा-ताज़ा पटाई गई गर्लफ्रेंड्स के साथ टाइपास ब्वायफ्रेंड एमएमएस देखते-दिखाते रहे
कुछ गे, बेरोजगार, भिखारी और घर से भगाए बूढ़े भी थे बस स्टैंड पर
और थी गहरी खीझ, दुख और प्यार
पर तुम न थे
लौट आओ, ताकि बदल जाए बस स्टैंड
वो गंदगी न दिखेगी
न आसपास का बिखरापन
मूंगफली के छिलकों का चरमराना रहमान सा संगीत लगेगा
जलेबियां छप्पन भोग-सी
गे-ब्वाय-गर्लफ्रेंड अमर प्रेमी, बेरोजगार-भिखारी और निराश्रित बूढ़े करुणा जगाएंगे
आवारा-हांफते कुत्तों को भी पुचकारने का मन करेगा
यक़ीन मानो, धूल भरे बस स्टैंड पर भी लगेगी हवा
सावन को छूकर आई युवती के स्पर्श की तरह।