कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Wednesday, June 23, 2010

हंसकर गुज़ारी तनहा ज़िंदगी : गैरी कोलमैन

कहते हैं-जिंदगी क्या-क्या रंग दिखाती है हमें...और गैरी कोलमैन ने तो ये बात ता-जिंदगी महसूस की। कभी शोहरत की बुलंदी पर पहुंचे तो कभी अपनो से ही जूझते रहे। बचपन में स्टारडम का मजा मिला तो बड़े होकर अकेलापन और उदासी। हाल ही हुई उनकी मौत के बाद भी उनकी संपत्ति को लेकर खासा विवाद गहराया हुआ है...

फरवरी, 1968 को गैरी कोलमैन जिओनअमेरिका में जन्मे। 42 साल की उम्र में ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली। एक बीमारीजिसने उन्हें कभी बड़ा नहीं होने दिया और आखिरकारमस्तिष्क आघातजो उनकी सांसें ही निगल गया। 1978 से लेकर 2010 तक गैरी दर्शकों के दिलों पर छाए रहेलेकिन उनका दिल हरदम वीरान रहा। 


पेशे से नर्स एडमोनिया स्यू और लिफ्ट ऑपरेटर डब्ल्यूजी कोलमैन के दत्तक पुत्र गैरी की शादीशुदा जिंदगी अच्छी नहीं रही। 2006 में कॉमेडी फिल्म चर्च बेल के सेट पर वो शैनन प्राइस से मिले। दोनों की आंखें चार हुई। पांच महीने तक एक-दूसरे को परखने के बाद 2007 में शादी कर ली। हालांकि ये रिश्ता महज दो साल चला। साथ छूटने का दर्द तो और बात हैगैरी की सेहत भी अक्सर खराब रही।
1978 से 1986 तक उन्होंने अमेरिकी टेलिविजन धारावाहिक "डिफरेंट स्ट्रोक्स" में बाल कलाकार के रूप में जादुई अभिनय किया। अर्नोल्ड जैक्सन के किरदार में गैरी ने अपनी अदाकारी से सभी को दीवाना बना दिया। कई फिल्मों में काम कियाकुछ टेलीफिल्में बनाईएनिमेटेड सीरीज़ में किरदार निभाए। 1982 में उनके नाम से तैयार किया गया कार्यक्रम गैरी कोलमैन शो भी खूब मशहूर हुआ। और तो औरवीडियो गेम द क्रूज ऑफ मंकी आइसलैंड और पोस्टल में भी गैरी ने बच्चों को खूब लुभाया। लेकिन खुशियां उनके खाते में कम ही थीं। 1989 में गैरी को अभिभावकों और व्यापार सलाहकार से लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। ये बात दीगर है कि मुश्किल दौर में भी गैरी हारे नहीं। आखिरकारउन्होंने अपने हक की जंग जीत ली। अफसोस की बात यही है कि पैसों के लिए लड़ी गई लड़ाई में तो वो जीत गएलेकिन सेहत की जंग में थके हुए सैनिक की तरह ही नजर आए। किडनी से जुड़ी एक बीमारी से गैरी लगातार जूझते रहे।
जिंदगी की जंग में वो कई बार डगमगाए। 1993 में एक टेलिविजन शो में गैरी ने कबूल किया कि उन्होंने दो बार ढेर सारी दवाइयां खाकर जान देने की कोशिश की थीलेकिन ऎन मौके पर जीने की तमन्ना जाग गई या फिर लोगों ने उन्हें बचा लिया। ये जीवन को जैसा हैवैसे ही कबूल करने की जिद थी। गैरी का रोग इतना बढ़ा कि उनका विकास ही अवरूद्ध हो गया। जवान होने के बाद भी वो एक छोटे-से बच्चे की तरह दिखते थे। जीवन में घटी इस त्रासदी से गैरी को एक कलाकार के रूप में लाभ मिला और वो डिफरेंट स्ट्रोक्स में प्रभावी भूमिका निभा सकेलेकिन हर दिन डायलिसिस कराने पर मजबूर गैरी की हर सांस बोझ से दबी होगी...इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। गैरी को दो बारपहले 1973 में और फिर 1984 में किडनी ट्रांसप्लांट भी करानी पड़ी। हां! मुश्किलें क्या करेंजो हौसला बुलंद हो। यही वजह है कि वीएच-ने जब टेलीविजन के 100 महानतम सितारों की सूची तैयार कीतो गैरी का नाम काफी ऊपर था। इसे कहते हैंकुदरत के सितम का हंसकर जवाब देना!
डिफरेंट स्ट्रोक्स की कामयाबी ने गैरी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। इसके हर एपिसोड के लिए उन्हें लाखों रूपये मिलते थे। अभिभावकोंवकीलोंसलाहकारों का हिस्सा और वेतन बांटने के बाद गैरी कर चुकाते थेफिर भी उनके दोनों हाथ पैसों से भरे रहते थे और दिल एकदम खाली! बीमारीअपनों से मिला धोखा और अकेलापन...ये सब गैरी के दुश्मन थेलेकिन महज चार फिटआठ इंच के इस शख्स के अंदर पहाड़ जैसा हौसला पलता था। हर परेशानी को मुंहतोड़ जवाब देते हुए गैरी ने तय कर लिया कि सियासत में कदम रखेंगे। 2003 में वो कैलिफोर्निया के गर्वनर के चुनाव में उम्मीदवार भी बने। वैसेसमीकरण कुछ ऎसे बदले कि गैरी को राजनीति से अरूचि हो गई। उन्होंने चुनाव में खास दिलचस्पी नहीं दिखाईइसके बावजूद हर दिल अजीज गैरी को 135 उम्मीदवारों में आठवीं जगह मिली और कुल चौदह हजार दो सौ बयालिस वोट हिस्से में आए। 2005 में कोलमैन उताह चले गए और आखिरी सांस तक वहीं रहे।
खैरगैरी अब इस दुनिया में नहीं हैंलेकिन जब भी वो धरती की ओर देखते होंगेतो आठ-आठ आंसू बहाते होंगे। कोलमैन की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के अधिकार को लेकर भी विवाद गहराया रहा। इस सवाल का जवाब गैरी जरूर जानना चाहते होंगेसितारों की जिंदगी इतनी रंगीन नजर आती है तो ऎसी वीरान क्यों होती है भला?

(जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ के रविवारीय सप्लिमेंट हम लोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/20062010/Humlog-Article/12549.html में प्रकाशित)