कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Monday, April 11, 2011

फिर उगते सूरज को सलाम

# चण्डीदत्त शुक्ल
(लेखक चौराहा के केयर टेकर, यानी मॉडरेटर हैं। पेशा है पत्रकारिता। दिल्ली में डेरा-बसेरा।)
चीनी भाषा के जिम्पोज शब्द से मिला है जापान को अपना नाम, यानी “सूर्य का देश”। खुद को सूर्य की संतान कहने वाले जापानी सुबह की शुरूआत सूर्य दर्शन से करते हैं, लेकिन 11 मार्च को कुदरत उनसे नाराज थी, देश दहल उठा…पर उगते सूरज के देश में जीवन का सूरज फिर उगा, आइए हम हमेशा की तरह उगते सूरज को सलाम करें…

आंसू पोंछते, सिसकते हुए, बार-बार चीखने भी लगा जापान, लेकिन इस बार चीख दुख से ज्यादा जोश से भरी थी। मन में कसक तो बाकी है, टूटे हुए घरौंदों के बचे-खुचे निशान झोली में बांध रखे हैं, लेकिन पूरा जापान जुट गया है पुननिर्माण में। यही है उगते हुए सूरज वंशियों का साहस, जो अपनी जिद के बलबूते पर महाविनाश के बाद महज पंद्रह दिन में मुल्क को फिर संवार देने की जद्दोजहद शुरू कर चुके हैं। एक तरफ है सुनामी के प्रलय का आतंक, अपनों से बिछुड़ जाने की अंतहीन पीड़ा।
सामने है ऎसा रास्ता, जिस पर चलना तो दूर, पांव बढ़ाने की भी हिम्मत नहीं होती, वहीं दूसरी ओर लाखों लोग निकल पड़े हैं राष्ट्र को पुरानी सूरत देने। धन्य है जापान और वहां के लोगों की जद्दोजहद। सच है, जापान इकलौता ऎसा देश है, जहां हम बिना किसी धार्मिक भाव के राष्ट्र की विचारधारा ना सिर्फ समझते हैं, बल्कि कार्यान्वित होते हुए भी देखते हैं।
पिछले दिनों एक जापानी लड़की ने टि्वटर पर ट्वीट किया। लिखा–पापा परमाणु संयंत्र में गए हैं और मां इतना रो रही है, जितनी कभी नहीं रोई। लड़की चिंतित थी, गुहार लगा रही थी–पापा! लौट आओ…बस तुम आ जाओ और उसके पिता फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट में रेडिएशन कंट्रोल की मुहिम में लगे हुए थे।
पिता का दिल है, धड़कता होगा बच्ची के लिए…बीवी का प्यार उसे भी खींचता होगा…पर वो जुटा रहा, दिन-रात, क्योंकि उसके सामने अपनों के दर्द से कहीं बड़ा था देश का सम्मान और लोगों की जान बचाने का मिशन। “फुकुशिमा फिफ्टी”और “न्यूक्लियर निंजा” जैसे नामों से पुकारे गए ये शूरवीर खुद की जान जोखिम में डालते हुए रेडिएशन से युद्ध में जुटे रहे। 11 मार्च को सुनामी और भूकंप के बाद फुकुशिमा एटमी प्लांट में विस्फोट हुआ और रेडिएशन का खतरा बढ़ गया, लेकिन असली रणबांकुरे तो वही हैं, जो जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा में तल्लीन रहे। जापान में बहादुरी के किस्से तमाम हैं। इनका कोई अंत नहीं। मृत्यु सामने थी।उसे स्वीकार कर जापानियों ने ठान लिया, जब तक जिएंगे, मृत्यु से जूझते हुए देश को नया जीवन दे देंगे।
ओशो ने कहा था–उन्होंने जापान के एक पर्वत शिखर पर पच्चीस हजार साल पुरानी डोबू मूर्तियों का समूह देखा था। ये मूर्तियां रहस्यमयी थीं, लेकिन जब अंतरिक्ष में यात्री गए, तब इनका रहस्य खुला। यात्रियों ने बताया, मूर्तियों ने वैसे ही वस्त्र पहने थे, जैसे एस्ट्रोनॉट पहनते हैं। यह मिथक कमोबेश पुष्पक विमान जैसा लगेगा, लेकिन एक बात तो मानने वाली है–जापानी दूर की सोचते हैं।
सामने खतरा सुनामी का था, दस्तक थी परमाणु विकिरण की, जो मुंह खोले निगलने को तैयार था और फिजा में हर तरफ थी हाड़ गला देने वाली ठंड। थरथराते जापानी एक तरफ कुदरत के हमले से जूझ रहे थे, दूसरी ओर ठंड से दो-दो हाथ करते हुए मैदान में थे। सड़कें बनाते हुए, घर खड़े करते हुए। पुल जोड़ते हुए और प्रकृति को शांत करने की तकनीक में दिमाग और दिल सब एकसाथ लगाते हुए। 235 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। पूरा विश्व जानता था यह बात कि जापान खतरे में है, इसलिए सबने मदद की।
भारत ने सबसे पहले कंबल भेजे, स्विटजरलैंड ने नौ खोजी कुत्तों और 25 राहतकर्मियों की एक टीम भेज दी, तो ब्रिटेन ने 63 राहतकर्मियों का एक दल रवाना किया। थाईलैंड, चीन, सिंगापुर…हर जगह से राहत के हाथ जापान की ओर बढ़े। धन्य है जापान…वहां के लोग सहायता और राहत की प्रतीक्षा में रूके नहीं। खुद को बचाते हुए, वो दूसरों को भी बचा रहे थे। सुरक्षित जगहों पर पहुंचा रहे थे।
यह महज जज्बा था, जिसने जापान को नया जीवन दिया। जिंदगी ने रफ्तार पकड़ने में वषोंü का समय नहीं लगाया। यहां हफ्ते भर में ही जीवन लौट आया। तीन सौ से ज्यादा झटकों के बाद भी सांसों की गर्माहट बाकी थी। शुरूआती दौर में ही 9,452 लोगों के मरने की की पुष्टि हो गई थी, जबकि 14,715 लोग लापता थे। अकेले मियागी में दस हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे पर बचे-खुचे लोग शहर को पुरानी शक्ल देने में जुट गए थे। हर बार मृत्यु से जूझकर जापान ने जीवन की नई परिभाषा लिखी है, वही इस बार भी हुआ…यह बात प्रशंसा से मुग्ध होकर नहीं कही जा रही।
जापानियों ने इसे साबित कर दिखाया है। जापान में जिंदगी गुजर कर रहे बहुतेरे भारतीयों ने भी अपने दोस्तों की मदद करने के लिए स्वदेश वापसी से इनकार कर जुनून और सहधर्मिता साबित की। आप भूले नहीं होंगे, जापान में मौजूद भारतीय दूत आलोक प्रसाद ने बताया था कि जापान में रह रहे बहुत से भारतीयों ने राष्ट्र छोड़ने से इनकार कर दिया था। समुद्री तूफान में दम नहीं कि जापान को खाक कर दे, क्योंकि वहां के लोग जानते हैं कि किस तरह बरबादी के बाद गुलशन रचा जा सकता है।
ऎसी ही एक सोच जापानी कथाकार साक्यो कोमात्सु के उपन्यास “निप्पॉन चिम्बोत्सु” में नजर आती है, जिसमें उन्होंने धरती की विशाल प्लेटें खिसकने से आए भूकंप के बाद भीषण जल प्रलय का ब्यौरा पेश किया था। साफ तौर पर जापानियों के लिए भूकंप नया नहीं है। वो हरदम इससे जूझते हैं और नई लड़ाई के लिए खड़े हो जाते हैं। वहां आपाधापी नहीं है, आपदा से लड़ने का अभ्यास है, यही वजह है कि सुनामी के बाद जापान के लोग जितने बदहवास थे, उतने ही संयत भी।
त्रासदी गुजर गई, उसके निशान बाकी हैं। तबाह हुए बहुत-से कस्बे और शहर वैसे तो शायद पांच-सात साल में हो पाएं, लेकिन जिंदगी लौट आई है और इसका सारा श्रेय जापानियों की हिम्मत को जाता है। वो जानते हैं-जीवन क्या है और कैसे जिया जाता है। जापानी मृत्यु से लड़ना जानते हैं, वो समूह की शक्ति पहचानते हैं, हरदम कहते हैं-”मदादायो”, यानी अभी नहीं।
जापानी सिनेमा के महान हस्ताक्षर अकीरा कुरासोवा की फिल्म “मदादायो” में इस दृढ़ता की साफ झलक दिखती है, वो मौत के सामने खड़े होकर, दुख भुलाकर अट्टहास करने का साहस रखते हैं। एक वजह तो सदैव संकट से लड़ने का जज्बा है ही, साथ ही है समूह का विश्वास। जापान की संस्कृति में सामूहिकता की भावना अद्भुत ढंग से भरी हुई है।
विडंबनापूर्ण सत्य है कि जापान को वही स्वरूप हासिल करने में तकरीबन 309 अरब डॉलर खर्च करने होंगे। अर्थशास्त्र चौपट हो चुका है, रिश्ते-नातेदार-घर-कारोबार-परिवार। सबका अभाव ज्यादातर लोगों के सामने है, विश्व बैंक के विशेषज्ञ बताते हैं कि बुनियादी ढांचा चरमरा गया है, उसे सही करने में कम से कम पांच साल लगेंगे पर जापानी ना थके हैं, ना पलायन करने को तैयार हैं। वो पूरी दुनिया को बता रहे हैं- हम लड़ेंगे साथी।
(जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के रविवारीय सप्लिमेंट हमलोग में प्रकाशित)

Tuesday, September 7, 2010

क्यूंकि आज शिक्षक दिवस नहीं है





एक नज़ारा…

- राजस्थान के अजमेर जिले के विजयनगर स्थित बड़ा आसन गांव के निजी स्कूल में छोटी-सी बात पर शिक्षक ने छात्र से ईंटें उठवाईं और फिर जमकर पीटा
- एक कला विद्यालय के छात्र की पेंटिंग्स जला दी गईं, परिणाम–भविष्य का ख़ूबसूरत कलाकार ‍विक्षिप्त हो गया…

और ये राह भी…

- गरीबी से जूझ रहे एक बच्चे की शिक्षक ने मदद की, उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया…आज वही छात्र इंजीनियर है…
- पहली बार क्लास में ना बोल पाने वाले छात्र की हिचक ऐसी दूर की कि वो अब एफएम चैनल में रेडियो जॉकी है…

टीचर-स्टूडेंट के रिश्तों में बदलाव की वज़हें हैं ख़ास, इन्हें समझना भी है ज़रूरी

चौथाई सदी गुज़र गई होगी अब तो…जब मैं तीसरी-चौथी क्लास का स्टूडेंट रहा होऊंगा…जाड़े की एक थराथराती सुबह, कोहरे से दो-दो हाथ करते हुए जैसे ही प्राइमरी स्कूल के भुतहा लगने वाले कमरे में पहुंचा, बिना किसी दुआ-सलाम, हाल-चाल के हाथ पर फटाक से स्केल बज गई…बड़े हीरो बने घूम रहे हो, होमवर्क करके नहीं लाए हो ना…। ये थे घिर्राऊलाल…। नाम तो कुछ और ही होगा, लेकिन बच्चों को घसीट-घसीटकर (अवधी में घिर्राकर) पीटते थे, इसलिए उन्हें अपन सब के सब घिर्राऊलाल ही कहने लगे थे…
और इसके बारह साल बाद…बीए में सचमुच छैलाबाबू बनने के समय, एक दिन जब एक्स्टेंपोर कंप्टीशन में ज़बान लड़खड़ा गई, पांव कांपने लगे, अल्फाज़ दिमाग का साथ छोड़, हाथ छुड़ाकर भाग निकले, तो सामने से बस एक मुस्कान तैरती हुई आई और सारा काम बन गया…ये मुस्कराहट थी शैलेंद्र संभव की…हिंदी टीचर…ख़ैर, जब शील्ड को माशूका की तरह सीने से लगाए हॉल से बाहर निकला, तो मिठास से सना एक ही वाक्य कानों तक पहुंचा…ये हुई ना बात! डरते क्यों हो मेरे मिट्टी के शेर…। मस्त रहा करो।
अब मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं, ना ही मेरे ये दोनों टीचर किसी भी पद्मश्री, श्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित गुरु कम नेता हैं, जो आप ये दास्तान और सुनना चाहें…, लेकिन मेरे जैसे लद्धड़ (बोले तो कमज़ोर) और घिर्राऊ मार्का सख़्त व शैलेंद्र जैसे ममतामयी शिक्षक पूरी हिंदी पट्टी के शैक्षणिक जगत के ज्यादातर चेला-गुरु परंपरा के प्रतीक हैं…, यानी एक नुकीले पत्थर की तरह ज़ोर-ज़बर में यक़ीन करने वाला, तो दूसरा–मिसरी घोलकर शिष्य को सही राह पर ले जाने वाला…।
यूं, ये सवाल उठ सकता है कि गुरु की याद पांच सितंबर को ही क्यों आती है? पूरे साल क्या इनकी ज़रूरत नहीं होती, मन में, दिमाग़ के किसी कोने में मास्टर जी की इमेज क्यों फ्लैश नहीं होती…? सो दिन विशेष पर ही किसी की बात क्यों हो, पूरे समय उनकी महानता-काम की चर्चा क्यों ना की जाए, ये बड़ी बहस का मुद्दा है और फ़िलहाल, इसमें ना फंसते हुए मैं तो यही कहूंगा–गुरु, तभी राह दिखा पाते हैं, जब वो बड़े भाई जैसे भरोसेमंद और मज़बूत हों…ऐसे गुरु अंधकार से बाहर नहीं निकाल पाते, जो गुरु घंटाल होते हैं, ना ही ऐसे मास्टर साहब, कोई राह दिखा पाते हैं, जो बस नाज़ुक दोस्त की तरह हां में हां मिलाते हैं…।
सो आप कहेंगे, मटुक छाप गुरु क्या हैं? और वो शाहरुख की कौन-सी फ़िल्म थी, शायद–‘मैं हूँ ना’, जिसमें वो साहब सुष से लव-लेक्चर सुनना चाहते हैं…तो ऐसों के बारे में फ़िल्मियाना अंदाज़ में ही डॉयलॉग सुना दें–ये सब गुरु जैसे प्रोफेशन पर धब्बा हैं, लेकिन इतने से तो हल निकलने वाला नहीं है…। फिर कहें क्या…समझें क्या…। समझने वाली बात ये है कि जैसी सोसायटी है, लोग हैं, रिश्तों का उलझाव है, वैसे ही आजकल के गुरु भी हो गए हैं।
वैसे भी, मास्टरी सबसे सुविधाजनक प्रोफेशन मान लिया गया है, जहां रहकर कोचिंग, ट्यूशन, छुट्टियां जैसी सौगात आसानी से हासिल की जा सकती है, वहीं जब चाहें तब पॉलिटिक्स करने निकल पड़ें। यक़ीन नहीं होता, तो देश के कई बड़े नेताओं को देख लीजिए…जो टीचर थे, या फिर अब भी हैं…लेकिन आराम से एमएलए, एमपी बन रहे हैं।
…अब उठता है बड़ा सवाल…हमें ऐसे ही गुरु चाहिए थे, जो टीचिंग जैसे नोबेल प्रोफेशन को अपनी कुंठाएं शांत करने, ख्वाहिशें परवान चढ़ाने में इस्तेमाल करें? ऐसे में प्रतिप्रश्न भी खड़ा होगा–क्या ऐसे ही स्टूडेंट होते हैं, जो अपनी टीचर को प्रपोज़ करने का मौका भी नहीं छोड़ते। सवाल बहुत हैं, कन्फ्यूजन भी हज़ार हैं, लेकिन इन सबका जवाब वही है–हर पेशा और पेशेवर सोसायटी के उलझाव से अछूता नहीं है और उसका असर ही टीचिंग जैसे प्रोफेशन पर भी दिख रहा है…। और हल–वही, टीचर बड़े भाई जैसा ही हो।
हिंदी साहित्य में जिन नौजवानों ने धमकदार हस्तक्षेप किया है, उनमें विनीत कुमार का नाम खास है, तो लगे हाथ उनकी बात सुन लेते हैं। चर्चित ब्लॉगर विनीत कुमार किसी एफएम चैनल पर दिन भर चली एक बकवास का हवाला देते हुए अपने ब्लॉग पर निजी स्कूल की टीचर का एक्सपीरिएंस सांझा करते हैं–बच्चे कैसे पहले से कई गुना स्मार्ट हो गए हैं, ऐसे बहाने बनाते हैं कि आप चाहेंगे कि आपको भी ऐसे ही बच्चे मिलें…। बीते बरस के टीचर्स डे पर विनीत को निजी रेडियो ने ऐसा-ऐसा धमाल सुनाया कि उन्हें जान तेरे नाम का गाना…माना कि कॉलेज में पढ़ना चाहिए…रोमांस का भी एक लेक्चर होना चाहिए…याद आ गया…। बात बस विनीत की ही नहीं, जो बताते हैं कि आजकल बच्चे (यानी हर उम्र के छात्र-छात्राएं) कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हो गए हैं। वो टीचर को एक सिम्पैथी बॉक्स की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, हर युवा के दिमाग में ये सवाल पनपने लगा है कि प्राइमरी से स्कूल और फिर कॉलेज तक जाते हुए टीचर का रंग-रूप-चेहरा किस क़दर बदले, कितना बदले और ये रिश्ता कैसे परवान चढ़े…कैसा हो?
गुज़रे साल दस्तक के 41वें अंक में राजेश्वरी की एक कविता छपी थी–शिक्षक! मेरे बच्चे को रट्टू तोता मत बनाना / उसे अक्षर बताना / शिक्षक! मेरे बच्चे को लूट की तरकीब मत बताना… आज वो बहुत याद आ रही है…क्योंकि ये कविता नहीं, चिंता है…हर पिता-मां की, जो स्कूल-कॉलेज में टीचिंग के गिरते स्तर और शिक्षक-स्टूडेंट संबंधों के उलझाव में उलझा है।
आइए, इसी सिलसिले में कुछ ख़बरों पर नज़र डाल लेते हैं…
- मोहाली के नया गांव में 10 साल की एक लड़की के यौन शोषण के आरोप में स्कूल का वाइस प्रिंसिपल गिरफ्तार।
- गुस्साई भीड़ ने भांडुप के किंग जार्ज हिल्स स्कूल के आरोपी अंग्रेजी अध्‍यापक की पिटाई की…शिक्षक ने छात्राओं के अश्लील एमएमएस बनाए थे…
- धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में छात्राओं के साथ शिक्षकों ने छेड़छाड़ की
और हां…कुछ आंकड़े भी देखने की ज़रूत है…
- 19 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में केवल एक टीचर है।
- 10 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।
- 25 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूल टीचर अपने काम से ग़ैरहाज़िर रहते हैं।
हो सकता है, पाठक कहें कि बात तो रिश्तों की हो रही थी, जो आमतौर पर स्कूल (यानी हाईस्कूल) और कॉलेज में (ग्रैजुएशन, पीजी) के दौरान पनपते-बढ़ते हैं, फिर प्राइमरी पढ़ाई के समय हुए क्राइम की बात क्यों, उसके आंकड़े क्यों…इन पर नज़र डालना इसलिए ज़रूरी है…क्योंकि शुरुआती स्तर पर जो विचलन शुरू होता है, वही पूरे पारिदृश्य पर असर डालता है।
सरकार की महत्वाकांक्षी योजना शिक्षामित्र पर ग्रहण लग चुका है। गांवों के पंच-सरपंचों के रिश्तेदार इस योजना में ऐसे टीचर बन रहे हैं, जिन्हें स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं, इच्छा नहीं है। ऐसे ही देश के हज़ारों गांवों-कस्बों में अब भी दलित टीचर्स को उचित सम्मान नहीं मिलता। यूपी के बहुतेरे स्कूलों में मुख्यमंत्री मायावती की उस योजना के परखचे उड़ा दिए गए हैं, जिसमें वो दलित महिला के हाथों का पकाया भोजन मिड डे मील में परोसने की ताकीद कर चुकी हैं…।
हमारा मंसूबा, मंतव्य और इरादा ये नहीं कि राजनीतिक-सामाजिक छुआछूत और समीकरणों की व्याख्या करें, लेकिन समस्या की जड़ें तलाशनी तो ज़रूरी हैं। अगर शिक्षक स्वार्थी, अपराधी और आलसी नज़र आ रहे हैं, तो क्या इसकी सारी वज़ह उनका अवसर-पसंद, अवसरवादी होना है? बेशक नहीं!
ढर्रे पर थमी, रटी-रटाई, नोट्स बनाने, पुर्जियां तैयार करने और कॉपी में कट-पेस्ट कर ज्ञान-वमन करने की पद्धति पर चर्चित लेखक महेश पुनेठा एक लेख में सवाल खड़ा करते हैं–स्कूलों को सृजनशीलता की कब्रगाह तो नहीं बना रहे हैं? हालांकि वो भी मानते हैं कि आज के माहौल में ना शिक्षक के लिए सृजनशील होने की परिस्थितियां हैं और ना बच्चों के लिए…पुनेठा का तर्क भी वही है कि बाजारवादी व्यवस्था मनुष्यों के पृथक्करण और अमानुषीकरण के जरिए उनकी सृजनात्मक शक्तियों को कुंठित कर रही है…।
डरा-धमकाकर जिस स्कूली शिक्षा की नींव बच्चे के कोमल मन पर पड़ती है, वो कॉलेज तक पहुंचते हुए अगर शिक्षक को भी काहिल और अवसरवादी या फिर प्रेमी-प्रेमिका समझने, मानने की समझदारी पैदा कर दे, तो इसमें किसका दोष कहेंगे? शिक्षक मटुकनाथ जैसे होने लगें? छात्राओं का एमएमएस बनाने लगें, तो क्या टीचिंग के पेशे पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं? साफ़तौर पर ये बात माननी होगी कि बहुत-से शिक्षक अब गुरु नहीं रहे…लेकिन उन्हें ऐसा बनने-बनाने की प्रेरणा और फ़ोर्स तरक्की-पसंदगी के नाम पर भटके हुए समाज से ही मिल रही है। उन अभिभावकों की भी कम ग़लती नहीं, जो अपने बच्चों को किसी भी क़ीमत पर रट्टू तोता बनाकर, इंजीनियर और डॉक्टर की शक्ल में ढाल देना चाहते हैं। ऐसे ही कुछ पुराने लोगों का भी कम योगदान नहीं, जो शिक्षक रहते हुए बा
की सबकुछ बन गए, भले ही टीचर नहीं रहे…। शिक्षकों को दोष देते हुए हम ये क्यों भुला देते हैं कि हम बच्चों को मास्टर बनने की प्रेरणा नहीं देते।
हिंदी फ़िल्में ही देख लीजिए, शिक्षकों के एक से एक डिब्बामार्का पोट्रेट मिल जाएंगे। यहां या तो गुरु भगवान है या फिर फटीचर। फिल्मी टीचर लाचार-कमज़ोर, आदर्शवादी बातें करते हैं या कुछ आगे बढ़ जाएं, तो हिटलर की छवि लेकर नज़र आएंगे। ‘मोहब्बतें’ और ‘मेजर साब’ में अमिताभ बच्चन कड़क हैं, लेकिन ‘कसमे वादे’ और ‘ब्लैक’ में आत्मीय गुरु का चरित्र है। अब इसमें सिर्फ ब्लैक ऐसी फ़िल्म है, जिसमें देवराज सहाय सरीखा चरित्र ही गुरु के रूप में हर स्टूडेंट चाहेगा…और हां, आमिर खान जैसा ‘तारे जमीं पर’ का टीचर…। फ़िल्मी टीचर की बात करें, तो ‘स्वदेस’ में गायत्री जोशी, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ और थ्री ईडियट्स में बोमन और ‘कल किसने देखा’ में ऋषि कपूर के किरदार भी याद आते हैं…तीनों अलग-अलग तरह के।
ये सबकुछ जानने के बाद समझना मुश्किल नहीं कि टीचर के बारे में सोचते वक्त स्टूडेंट के चेहरे पर मुस्कान कम क्यों उभरती है, खीझ या फिर किसी और किस्म की लालसा ही जगह क्यों पाती है? बच्चे भी जानते हैं, ये गुरु भगवान वाली किस्म के नहीं हैं और अध्यापक भी समझ चुके हैं कि बात उतनी सीधी-सादी और गौरवमयी नहीं रही, जितनी पुराने ज़माने में थी।
इन हालात में शिक्षक दिवस मनाने का भी तभी मतलब निकलेगा, जब टीचर अपने पेशे की ज़िम्मेदारियां समझें, छात्र उनका यथोचित सम्मान करें, समाज भी समझे कि गुरु पेड सरकारी नौकर भर नहीं है…और टीचर बदलते वक्त की ज़रूरत के मद्देनज़र छात्र-छात्राओं के साथ दोस्त जैसा नहीं, पर बड़े भाई जैसा व्यवहार ज़रूर करें।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और एक पत्रकारिता विद्यालय में स्क्रिप्ट राइटिंग विशेषज्ञ के रूप में पढ़ाते भी हैं)


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  चण्डीदत्त शुक्ल :  ये आलेख जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की साप्ताहिक परिशिष्ट हमलोग 
   <http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/05092010/Humlog-Article/17836.htmlमें और              पोर्टल... नेटवर्क-6 <http://www.network6.in/2010/09/06/क्यूंकि-आज-शिक्षक-दिवस-नह/> पर भी आ चुका है।



Monday, June 28, 2010

कामयाबी का जायका : पैट्रिका नारायण




आमतौर पर रेहड़ी-पटरी वाले क्या बेचते हैं? यही—चाय या फिर सिगरेट!  लेकिन 21 जून, 1982 को चेन्नई के मैरीना बीच में पैट्रिका नारायण की रेहड़ी पर सबकुछ हाज़िर था—कटलेट, समोसा, जूस, चाय और कॉफी। वो चाहती थीं—इतनी कमाई हो जाए, जिससे घर चल निकले। दिल में ज़रूर कामयाब होने का इरादा पल रहा था, लेकिन ये ख़्वाब पलकों के तले आंखों में सहमा हुआ, सिमटा ही था। पैट्रिका के पास आसमान छूने जैसे बड़े सपने देखने की हिम्मत नहीं थी…तो पहले दिन महज पचास पैसे का बिज़नेस हुआ। यही वो रकम थी, जिसके एवज में पैट्रिका ने ग्राहक को एक कप कॉफी बेची और छोटा-सा कारोबार शुरू कर दिया। घर लौटकर पैट्रिका रोने लगीं, लेकिन मां ने समझाया—कोई भी शुरुआत ऐसे ही होती है। छोटी, लेकिन भविष्य के लिए बड़ी। पैट्रिका फिर रेहड़ी के साथ मैरिना बीच पर लौट आईं। अगले दिन ही सात सौ रुपये की कमाई हुई। फिर तो ठेले पर आइसक्रीम, सैंडविच, फ्रेंच फ्राई भी आ गया। 2003 तक तो हर दिन पच्चीस हज़ार रुपये की बिक्री होने लगी थी। फिर स्लम क्लियरेंस बोर्ड ने उन्हें कैंटीन चलाने का ऑफर दिया। एक और क़दम फिर...कामयाबी ही कामयाबी।
और अब?  आज सारी बाधाएं पैट्रिका की हिम्मत के आगे सिर झुका चुकी हैं। उन्हें `फिक्की वुमेन एंटरप्रेन्योर’ अवार्ड मिला है और वो `संदीपा’ नाम की रेस्टोरेंट चेन की मालकिन हैं। हालांकि कामयाबी का ये जायका उन्हें आसानी से नहीं हासिल हुआ। तकरीबन तीस साल पहले मैरीना बीच पर जब पैट्रिका ठेला लेकर निकलीं, तो उस पर खाने-पीने का बहुत-सा सामान था। केतली में उबलती हुई चाय उनके मन में धधकती हुई शंकाएं, अविश्वास, दु:ख, डर और परेशानी। शादीशुदा ज़िंदगी वीरान थी।
नशेड़ी पति और दो बच्चों की ज़िम्मेदारी उठा रहीं पैट्रिका ने कारोबारी बनने के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। उन्होंने रेहड़ी लगाने का फैसला भी घर की ज़िम्मेदारियां पूरी करने की वज़ह से ही लिया था। हां, एक और वज़ह ये थी कि पैट्रिका को नए-नए व्यंजन बनाने और लोगों को खिलाने का शौक था।
अब मीडिया से बात करते समय पैट्रिका बीता वक्त धीमी हंसी के साथ जैसे उड़ा देना चाहती हैं, `हमारी शादी ने ही मुझे कामयाब बनाया। पहले पूरी तरह तोड़ दिया और अब आसमान तक पहुंचा दिया है। ना शादी होती, ना मैं इतनी परेशान होती और ना ही व्यवसाय शुरू करती। वो ब्राह्मण थे और मैं क्रिश्चियन। घर के लोग नहीं चाहते थे कि हमारी शादी हो, लेकिन मैं अड़ी रही। आख़िरकार, हम सात फेरों में तो बंध गए, लेकिन विवाह असफल रहा। वो तमाम तरह के नशों से घिरे थे। ड्रग्स, अल्कोहल और पता नहीं क्या-क्या! शुरुआत में मैंने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन फिर हार मान ली। क्या करती, जब कोई समझना ही ना चाहे।‘
पिता ने भी पैट्रिका को कोई मदद नहीं दी। अब वो दो बच्चों के साथ सड़क पर थीं। भूख मिटाने की ज़द्दोज़हद थी, सिर छुपाने के लिए एक अदद छत की तलाश थी। ख़ैर, किसी तरह रहने का ठिकाना मिला और फिर पैट्रिका ने सोच लिया—ग़रीबी को ऐसा जवाब देंगी कि वो लौटकर उनके घर में आने की हिम्मत भी नहीं करेगी। मां से सौ रुपये उधार लेकर उन्होंने अचार, स्क्वैश और जैम बनाने का काम शुरू किया। सारा दिन अचार सप्लाई करने के लिए जातीं और फिर रात भर अचार बनातीं। कुछ पैसा आया, तो हिम्मत भी बढ़ी। इस बीच पैट्रिका के पिता के एक दोस्त ने उन्हें रेहड़ी दिला दी। उनकी शर्त भी लाज़वाब थी—पैट्रिका उनके उस स्कूल के दो बच्चों को काम दें। रेहड़ी लेकर पैट्रिका मैरिना बीच की तरफ निकल पड़ीं और फिर तो उनकी किस्मत की गाड़ी भी चल निकली। पैट्रिका ने एक साल तक ये अनुमति पाने के लिए संघर्ष किया कि मैरिना बीच के सेंटर प्वाइंट में वो रेहड़ी लगा सकें। आख़िरकार, उन्हें इजाज़त मिली और फिर क्या था...उनके व्यंजनों का जायका लोगों की ज़ुबान पर इस तरह चढ़कर बोला कि नोट बरसने लगे, गरीबी भाग गई और अब पैट्रिका बुलंदी के सातवें आसमान पर हैं... तो है ना ग़ज़ब की प्रेरणादायक कहानी। अब कभी किसी रेहड़ी पर चाय पीते समय उसके मालिक-मालकिन को गौर से देखिएगा, हो सकता है—आप भविष्य की किसी और पैट्रिका के पास खड़े हों।

जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/27062010/humlog-article/13012.html में प्रकाशित आलेख

Wednesday, June 23, 2010

हंसकर गुज़ारी तनहा ज़िंदगी : गैरी कोलमैन

कहते हैं-जिंदगी क्या-क्या रंग दिखाती है हमें...और गैरी कोलमैन ने तो ये बात ता-जिंदगी महसूस की। कभी शोहरत की बुलंदी पर पहुंचे तो कभी अपनो से ही जूझते रहे। बचपन में स्टारडम का मजा मिला तो बड़े होकर अकेलापन और उदासी। हाल ही हुई उनकी मौत के बाद भी उनकी संपत्ति को लेकर खासा विवाद गहराया हुआ है...

फरवरी, 1968 को गैरी कोलमैन जिओनअमेरिका में जन्मे। 42 साल की उम्र में ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली। एक बीमारीजिसने उन्हें कभी बड़ा नहीं होने दिया और आखिरकारमस्तिष्क आघातजो उनकी सांसें ही निगल गया। 1978 से लेकर 2010 तक गैरी दर्शकों के दिलों पर छाए रहेलेकिन उनका दिल हरदम वीरान रहा। 


पेशे से नर्स एडमोनिया स्यू और लिफ्ट ऑपरेटर डब्ल्यूजी कोलमैन के दत्तक पुत्र गैरी की शादीशुदा जिंदगी अच्छी नहीं रही। 2006 में कॉमेडी फिल्म चर्च बेल के सेट पर वो शैनन प्राइस से मिले। दोनों की आंखें चार हुई। पांच महीने तक एक-दूसरे को परखने के बाद 2007 में शादी कर ली। हालांकि ये रिश्ता महज दो साल चला। साथ छूटने का दर्द तो और बात हैगैरी की सेहत भी अक्सर खराब रही।
1978 से 1986 तक उन्होंने अमेरिकी टेलिविजन धारावाहिक "डिफरेंट स्ट्रोक्स" में बाल कलाकार के रूप में जादुई अभिनय किया। अर्नोल्ड जैक्सन के किरदार में गैरी ने अपनी अदाकारी से सभी को दीवाना बना दिया। कई फिल्मों में काम कियाकुछ टेलीफिल्में बनाईएनिमेटेड सीरीज़ में किरदार निभाए। 1982 में उनके नाम से तैयार किया गया कार्यक्रम गैरी कोलमैन शो भी खूब मशहूर हुआ। और तो औरवीडियो गेम द क्रूज ऑफ मंकी आइसलैंड और पोस्टल में भी गैरी ने बच्चों को खूब लुभाया। लेकिन खुशियां उनके खाते में कम ही थीं। 1989 में गैरी को अभिभावकों और व्यापार सलाहकार से लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। ये बात दीगर है कि मुश्किल दौर में भी गैरी हारे नहीं। आखिरकारउन्होंने अपने हक की जंग जीत ली। अफसोस की बात यही है कि पैसों के लिए लड़ी गई लड़ाई में तो वो जीत गएलेकिन सेहत की जंग में थके हुए सैनिक की तरह ही नजर आए। किडनी से जुड़ी एक बीमारी से गैरी लगातार जूझते रहे।
जिंदगी की जंग में वो कई बार डगमगाए। 1993 में एक टेलिविजन शो में गैरी ने कबूल किया कि उन्होंने दो बार ढेर सारी दवाइयां खाकर जान देने की कोशिश की थीलेकिन ऎन मौके पर जीने की तमन्ना जाग गई या फिर लोगों ने उन्हें बचा लिया। ये जीवन को जैसा हैवैसे ही कबूल करने की जिद थी। गैरी का रोग इतना बढ़ा कि उनका विकास ही अवरूद्ध हो गया। जवान होने के बाद भी वो एक छोटे-से बच्चे की तरह दिखते थे। जीवन में घटी इस त्रासदी से गैरी को एक कलाकार के रूप में लाभ मिला और वो डिफरेंट स्ट्रोक्स में प्रभावी भूमिका निभा सकेलेकिन हर दिन डायलिसिस कराने पर मजबूर गैरी की हर सांस बोझ से दबी होगी...इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। गैरी को दो बारपहले 1973 में और फिर 1984 में किडनी ट्रांसप्लांट भी करानी पड़ी। हां! मुश्किलें क्या करेंजो हौसला बुलंद हो। यही वजह है कि वीएच-ने जब टेलीविजन के 100 महानतम सितारों की सूची तैयार कीतो गैरी का नाम काफी ऊपर था। इसे कहते हैंकुदरत के सितम का हंसकर जवाब देना!
डिफरेंट स्ट्रोक्स की कामयाबी ने गैरी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। इसके हर एपिसोड के लिए उन्हें लाखों रूपये मिलते थे। अभिभावकोंवकीलोंसलाहकारों का हिस्सा और वेतन बांटने के बाद गैरी कर चुकाते थेफिर भी उनके दोनों हाथ पैसों से भरे रहते थे और दिल एकदम खाली! बीमारीअपनों से मिला धोखा और अकेलापन...ये सब गैरी के दुश्मन थेलेकिन महज चार फिटआठ इंच के इस शख्स के अंदर पहाड़ जैसा हौसला पलता था। हर परेशानी को मुंहतोड़ जवाब देते हुए गैरी ने तय कर लिया कि सियासत में कदम रखेंगे। 2003 में वो कैलिफोर्निया के गर्वनर के चुनाव में उम्मीदवार भी बने। वैसेसमीकरण कुछ ऎसे बदले कि गैरी को राजनीति से अरूचि हो गई। उन्होंने चुनाव में खास दिलचस्पी नहीं दिखाईइसके बावजूद हर दिल अजीज गैरी को 135 उम्मीदवारों में आठवीं जगह मिली और कुल चौदह हजार दो सौ बयालिस वोट हिस्से में आए। 2005 में कोलमैन उताह चले गए और आखिरी सांस तक वहीं रहे।
खैरगैरी अब इस दुनिया में नहीं हैंलेकिन जब भी वो धरती की ओर देखते होंगेतो आठ-आठ आंसू बहाते होंगे। कोलमैन की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के अधिकार को लेकर भी विवाद गहराया रहा। इस सवाल का जवाब गैरी जरूर जानना चाहते होंगेसितारों की जिंदगी इतनी रंगीन नजर आती है तो ऎसी वीरान क्यों होती है भला?

(जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ के रविवारीय सप्लिमेंट हम लोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/20062010/Humlog-Article/12549.html में प्रकाशित)