कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Saturday, December 8, 2012

हे आमिर! उल्लू नहीं है पब्लिक

ज़रूरी सलाह बनाम खीझ

- चण्डीदत्त शुक्ल

आमिर खान साहेब नहीं आए। बुड़बक पब्लिक उन्हें `तलाश' करती रही। सिर्फ पब्लिक नहीं, बांग्ला मिजाज़ में कहें तो भद्रजन भी। पुलिसवाले और लौंडे-लपाड़ियों के अलावा, शॉर्ट सर्विस कमीशन टाइप पत्रकार, रिक्शा-साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड वाले भी। चौंकिएगा नहीं, शॉर्ट सर्विस बोले तो कभी-कभार ये धंधा कर लेने वाले। एक यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले तमाम सत्रह-अठारह साल के छोरे-छोरियां पूरा का पूरा विश्वविद्यालय बंक करके उस भुतहा बस्ती में बिचर रहे थे। पहले उछलते-कूदते, फिर एक ग्लास पानी के लिए छुछुआते हुए। जयपुर से कुल जमा सौ किलोमीटर के इर्द-गिर्द ही पड़ता है भानगढ़। इंटरनेट पर सर्च को रिसर्च नाम देने वाले जानते ही होंगे कि इस कसबे को लेकर तरह-तरह की अफवाहें जोर-शोर से सामने आई हैं, इतनी ज्यादा, जितने `भूत' न रामसे ब्रदर्स की फिल्मों में होंगे, न कहानियों में। चुनांचे, बात बस इतनी भानगढ़ को लेकर दो बातें सबसे ज्यादा चलन में हैं, पहली – एक तांत्रिक की बद्दुआ से भानगढ़ उजड़ गया और दूसरी ये कि सांझ ढलते ही यहां भूतों का बसेरा हो जाता है, इसलिए उजड़े हुए कसबे के गेट बंद कर दिए जाते हैं। परिंदा और जानवर भले हाथ-पैर-मुंह मारें, पर जीता-जागता आदमी चौहद्दी में कदम नहीं रख सकता।

ख़ैर, आप भी सोच रहे होंगे, ये आदमी अक्ल से पैदल है क्या, बात शुरू की थी आमिर खान साहेब से और लौंडे-लपाड़ियों का जिक्र करते हुए भूतों तक जा पहुंचा, तो साहबान सिरा यहीं जुड़ता है, वह इसलिए कि इसी भानगढ़ की `विजिट' करने का दावा आमिर, या कि उनके प्रचारकों ने किया था और ये बात पब्लिसिस्टों से होती हुई ख़बरचियों और फिर अख़बारों तक जा पहुंची, सो भानगढ़ में पब्लिक जुटनी लाजिम थी, लेकिन न आना था उन्हें और न आए वो, यानी अपने आमिर! अब ख़बर पढ़कर आमिर का इंटरव्यू करने की ख़्वाहिश से जो हम सब दल-बल समेत भुतहा बस्ती में हाजिर हुए तो आमिर न मिले पर मिले केवड़े के पेड़, काले मुंह वाले बंदर और कई ऐसे किस्से, जो बता रहे थे कि भानगढ़ में कुछ और हो न हो, भूत तो एक भी नहीं हैं। हां, जितनी ज़ुबान, उतने अफसाने भी, सो यह समझाने वाले भी कई निकले कि उनने भूत तो देखा है, लेकिन लेडीज़, यानी चुड़ैल।

हालांकि भूत और भानगढ़ और वहां की घुमाई-टहलाई के यात्रा वृत्तांत, संस्मरण और यादनामा तो फिर कभी लिखा जाएगा, आज का सवाल ज्यादा इंप्वार्टेंट है, जिसे हल करने पर केबीसी की ईनामी राशि भले न मिले पर एक बात तो जोर-शोर से समझ में आएगी ही कि आमिर ज्यादा सयाने हैं, या पब्लिक (जिसमें हम भी शामिल हैं) अधिक बुड़बक है? सब जानते हैं कि आमिर अपनी फ़िल्मों के प्रमोशन-पब्लिसिटी के लिए सारे करम कर डालते हैं। हमारे इलाके की भाषा में कहें तो ... से घोड़ा खोल देते हैं (इस ट्रिपल डॉट ... में देह के एक विशेष अंग का नाम नहीं भरा गया है। सयाने लोग खुदै बूझ लें)। जितनी बार, जिस-जिस किस्म की फ़िल्म बना ली, उसे रिलीज़ करने से पहले और बाद में तरह-तरह के भेष बनाकर घूमे। हर बार चैलेंज किया -- है किसी में दम तो पकड़ के दिखावे। नकद ईनाम देंगे। फोटू-शोटू साथ में खिंचवाएंगे और, और भी किसिम-किसिम की बात, पर कोई पकड़ न पाया। भांप न पाया कि दाढ़ी बढ़ाए, अचकन संभालते बगल से जो फट्ट से निकले, वो मुल्ला जी और कउनो नहीं, अपने आमिर खान हैं। आमिर न हुए, डॉन हो गए, जिसे पता नहीं कितने तो मुल्कों की पुलिस भी पकड़ नहीं पाती। अब वही खान साहेब जब हो-हल्ला करके, ख़बर छपवाके भी भानगढ़ नहीं आए तो फिर से समझ में आया कि कहीं हाजिर होके तो कहीं गैर-हाज़िर रहके उल्लू बनाना खान साहेब का शौक नहीं, एक और पब्लिसिटी स्टंट है।

आमिर साहेब, आपसे बस कहनी एक बात है कि पुलिस-पत्रकार-पब्लिक – सबसे आपने अपनी तलाश तो करवा ली, लेकिन ये सब ज्यादा काम आता नहीं है। हो सके तो कहानी सेलेक्शन, एक्टिंग और डायरेक्शन – जिसके लिए बेसिक तौर पर आपकी पहचान होती रही है – पर ही ज्यादा ज़ोर लगाइए, मैनुपुलेट करके मार्केटिंग के चक्कर में अगर आप पब्लिक को ऐसे उल्लू बनाते रहे तो देखिएगा – एक दिन आप सनीमा हाल में बैठे रह जाएंगे और पब्लिक आपकी ही तरह फुर्र हो जाएगी, फिर बजाते रहिएगा हरमुनिया।


Monday, April 16, 2012

म्यां, नाराज़ क्यूं हो?

- चण्डीदत्त शुक्ल
 
नाराज़ हो,
मेरे से.
म्यां,
कोई नई बात कही होती.
ये क्या,
भूत भगाने को,
इबादत की खातिर
लोहबान जलाना.
कभी
गुड नाइट छोड़के
मच्छर-मक्खी भगाने कू लोहबान  जलाओ न.
अमां.
दिल के जले से मूं फुल्लाने वाले तुम कोन-से नए आदमी हो
किसी टकीला वाले अंबानी से गुस्सा के देखो.
आशिक को तो गली का कुत्ता भी भूंकता है
पूरा पंचम राग में
तार सप्तक छेड़ते हुए
ऊं-ऊं-उआं करके रोता है,
किसी रात साला किसी दरोगा पे रोके दिखाए
नाराज़ मती होओ
हम इश्क के मारे हैं,
तुम्हारी नाराज़गी बेकार जाएगी।
किब्ला.
इश्क ही कल्लो
नाराज़गी फरज़ी लगैगी
फिर तो,
एक ही कंबल में मूं लपेटे हमारे साथ पड़े रहोगे.
ये रोग किसी छूत से नहीं होता
हां, इस रोग की छूत बड़ी बुरी होवे है...

Monday, January 30, 2012

चण्डीदत्त शुक्ल की दो नई कविताएं

चण्डीदत्त शुक्ल

सो जाओ कि रात बहुत गहरी है, काली है
सो जाओ कि अब कोई उम्मीद नहीं जगाएगा तुम्हारे मन के लिए
सो जाओ कि बंगाल से लेकर मद्रास तक, समुद्र का जल नाराज़ है तुमसे।
दिशाएं पूछती हैं, सनसनाकर हरदम, क्यों हारे तुम, इतना प्रेम किया था क्यों?
सो जाओ कि देश की किसी नायिका की आंख तुम्हारे लिए गीली नहीं होने वाली।
सो जाओ कि प्रेम एक घिसा-पिटा, दोहराए जाने को मज़बूर शब्द भर है।
सो जाओ कि गीली लकड़ी की तरह निरर्थक जलावन है प्रेम,
निहायत दुख के वक्त सिर्फ घुटन भरा धुआं पैदा करेगा।
सो जाओ कि एक और उदास दिन तुम्हारी प्रतीक्षा में है।
एक सुबह, जिसमें मशीन की तरह काम और निष्फल इच्छाएं तुम्हारा रास्ता ताकती होंगी।
सो जाओ कि किसी और को न सही, तुम्हें खुद से एक झीना-सा लगाव तो है।
तुम अब भी प्रेम करते हो न उस लड़के को,
जो प्रेम करते वक्त रोता था, हंसता था, खिलखिलाता था और नंगे पैरों चूमता था हरी-हरी घास को।
सो जाओ कि कुछ और कविताएं लिखना।
उन्हें पढ़कर कुछ लोग रोएंगे। टूटेंगे...। कोई-कोई सिर भी धुनेगा, फिर कुछ तो राहत मिलेगी तुम्हें और उन्हें।
सो जाओ कि निराशा से लबालब इस काव्य के बाद,
सकारात्मक जीवन के लिए कुछ भाषण तुम्हें तैयार करने होंगे।
सो जाओ, कि अब तुम प्रेम में होते हुए भी, प्रेम में नहीं हो।
सो जाओ, क्योंकि खुदकुशियों से भी कुछ भला नहीं होता।
सो जाओ, क्योंकि ज्यादा जागने और बहुत रोने से,
दिन भर आंख रहेगी लाल।
करीब चालीस की उम्र में, लोग कहते हैं, उदास दिखना, उदास होने से ज्यादा खराब समझा जाता है।


एक और कविता
एक दोस्त ने पूछा...कल रात,
तुम्हें, आखिर नींद क्यों नहीं आती...
जागते रहते हो उल्लुओं की तरह...
सो क्यों नहीं जाते...
मैं क्या कहता,
फिर एक बार ओढ़ ली, शब्दों की चादर.
कहने लगा...
वसंत ने आज ही द्वार खटखटाया है
रात ने ब्रश किए हैं शायद
हवा ठंडी है कुछ ज्यादा ही
चांद भी आंख-मुंह धोकर आया है
चांदनी मतवाली-सी फिर रही है...
पत्तियां नए कपड़े पहनकर इतराती हुईं।
फूल और महकते,
परिंदे और चहकते हुए
सब पूछते- तुम उदास क्यों हो?
मैंने भी घर की सब खिड़कियां खुली छोड़ी हैं...
शायद, हवा, खुशबू और चांदनी के साथ वसंत भी आकर ठहर जाए
पुराने अखबार पर जमी धूल खिसकाकर, जमके बैठे जाए।
मुझे सोता देखकर लौट गया फिर... फिर क्या करूंगा...?

Wednesday, January 18, 2012

सपनों को यादों की गुल्लक से निकालें

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख--भास्कर ब्लॉग...
- चण्डीदत्त शुक्ल

सोंधी महक से सराबोर जाड़े की सुबहों में कंबल से हाथ बाहर निकालने की हिम्मत नहीं पड़ती। कोहरे का झुरमुट जैसे लपककर मुट्ठी में हथेली जकड़ लेता है। उसकी गर्मजोशी के बावज़ूद ठिठुरा मन-तन लिए हम फिर छुपने के रास्ते तलाशने लगते हैं। हां, सूरज के चेहरे पर ज्यूं गुनगुनी धूप थिरकती है, उसी पल यादों के कई दरीचे ख्यालों में खुल जाते हैं।

यादें हैं भी क्या.. गुजरे वक्त की मासूम-सी गवाही। मौसमों का असर मन पर इस कदर होता है कि याद-कैलेंडर के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। कुछ बीते हुए लम्हे अलग-अलग मौसमों की दास्तान बयां करते हैं। कभी कोई धड़कन कानों में आकर गुनगुनाती है - क्यों, जीभ पर तैरने लगा न पहली बार चबाए गए भुट्टे का स्वाद और फिर उभरता है अफसोस..। हाय! भुट्टे, तुम पॉपकॉर्न क्योंकर हुए? इस सोच से उबर भी न पाए कि ‘छपाक’ कर स्मृतियों की बौछार नहला जाती है और रूबरू करा देती है उस नजारे से, जब हम सारा लोक व्यवहार भूल, मर्यादा का बंधन तोड़के, जमकर भीगे थे, पहली बारिश में।

और महज मौसम ही क्यों.. कुछ पुरानी, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें, चंद जर्द पड़ी चिट्ठियां और कई सूखे हुए गुलाब भी तो याद दिला देते हैं बीते हुए जमाने की।

जमाना, जब जिम्मेदारियों से ज्यादा जोर मस्तानेपन का था। भाग-दौड़ तब भी होती थी, लेकिन लोकल ट्रेन, बस या ऑटो पकड़ने के लिए नहीं। टारगेट तब भी होता था, लेकिन कारोबार का नहीं - हर दौड़धूप, हर लक्ष्य के पीछे वजह बस एक थी - आज का दिन मस्ती में जी लें। कल की कल देखेंगे।

ख्वाबों की दुनिया भी कितनी सतरंगी होती है। आंखों के कैनवास पर इंद्रधनुषी रंग कभी धुंधले ही नहीं होते। वक्त गुजरता गया। आप, हम और हमारे संगी-साथी, सब के सब ‘जिम्मेदार’ हुए और भूल गए पहली-पहली बारिश में नहाने का, दिन भर बिना काम के भटकने का सुख, यानी खुद के लिए जीने के मायने।

वक्त नहीं थमता, लेकिन कभी तो कुछ होता है, जो सब कुछ याद दिला देता है। चंद रोज पहले की ही बात है। जयपुर के जवाहर कला केंद्र में युवा कलाकार निधि सक्सेना की पेंटिंग एक्जीबिशन देखने गया था, एक तस्वीर पर नजर ठहर गई। यादों के आसमान और चाहतों के समंदर का नीला रंग। चिड़ियाएं चांद को साथ ले जाने को मचल रही हैं। एक लड़की कैमरे के पीछे खड़ी उनकी चलती-फिरती तस्वीरें कैद करने में लगी है।

कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में बना चुकी निधि के लिए अपने सपनों को संजोए रखने का जरिया चित्रकारी है। उनके कैनवास पर चिड़िया है, सिनेमा है, चाहत है, सपने हैं.. लेकिन ये तस्वीर देखकर मैं ठिठक गया, सोचने को मजबूर — हमारे पास क्या है?

बीता वक्त तो है नहीं, यादों को सीलन लग रही है। अब खुलकर झूमने, बेइरादा कहीं चल देने के मौके और शगल नहीं हैं..। फिर करें क्या, कैसे लौटाएं बीते वक्त को? क्यों न हम भी चिड़िया बनकर चांद को साथ ले जाने की कोशिश करें। खयाल कुछ ज्यादा पोएटिक हो गया शायद, सो इसका मुकम्मल बयान कुछ यूं कर लेते हैं - आओ, चलो, सपनों को यादों की गुल्लक से बाहर निकालें। अपने लिए भी कुछ देर जी लें। कुछ अच्छा करें, कुछ सुंदर सुनें, चंद अच्छे लोगों से दोस्तियां करें। खुशी के बहाने तलाशें। आप कहेंगे - न! मुस्कराने की बात करते हो/किस जमाने की बात करते हो..? माना साहब, मुश्किल है खुशी के चांद को साथ ला पाना, लेकिन छोटी-छोटी कोशिशें करके हम खुश रह सकते हैं। तो करेंगे न आप कोशिश..?

Tuesday, January 10, 2012

क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती



 - चण्डीदत्त शुक्ल@08824696345
तुम्हारा दोस्त दुखी है...
उससे न पूछना, उसकी कातरता की वज़ह,
दुख की गंध सूखी हुई आंख में पड़ी लाल लकीरों में होती है।
ये सवाल न करना, तुम क्यों रोए?
कोई, कभी, ठीक-ठीक नहीं बता सकता अपनी पीड़ा का कारण।
कहानियों के ब्योरों में नहीं बयान होते हताशा के अध्याय,
न ही दिल के जख्मों को बार-बार, ताज़ा चमड़ी उधेड़कर दिखाना मुमकिन होता है साथी।
कोई कैसे बताएगा कि वह क्यों रोया?
इतना ही क्यों, इस बार ही क्यों, इतनी छोटी-सी वज़ह पर?
ऐसे सवाल उसे चुभते हैं।
रो भी न पड़ना उसे हताश देखकर,
वह घिर जाएगा ग्लानि में और उम्र भर के लिए।
नैराश्य होगा ही उसकी ज़ुबान पर और लड़खड़ा जाएगी जीभ,
बहुत उदास और अधीर होगा, अगर उसे सुनानी पड़ी अपनी पीड़ा की कथा।
तब भी यकीन करो, शब्दों में नहीं बांध पाएगा वह अपनी कमज़ोरी।
हो सके तो उसे छूना भी नहीं।
तुम्हारी निगाह में एक भरोसे का भाव है उसका सबसे कारगर मरहम,
उसमें बस लिखा रहे ये कहना – तुम अकेले नहीं हो।
उसकी भीगी पलकों को सूखने का वक्त देना
और ये कभी संभव नहीं होगा, उसे यह समझाते हुए –
गलतियां ये की थीं, इसलिए ऐसा हुआ!
हर दुखी आदमी मन में बांचता है अपने अपराध।
वह जड़ नहीं होता, नहीं तो रोया ही न होता।
दुख नए फैशन का छींटदार बुशर्ट नहीं है कि वह बता सके उसे ओढ़ने की वज़ह,
कोई मौसम भी नहीं आता रुला देने में जो हो कारगर।
हर बार आंख भी नहीं भीग जाती दुख में।
जब कोई खिलखिलाता हुआ चुप हो जाए यकायक,
तब समझना, कहीं गहरे तक गड़ी है एक कील,
जिसे छूने से भी चटख जाएंगी दिल की नसें।
उसके चेहरे पर पीड़ा दिखनी भी जरूरी नहीं है।
एक आहत चुप्पी, रुदन और क्षोभ की त्रासदी की गवाही है।
उसे समझना और मौजूद रहना,
बिना कुछ कहे,
क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती।

Wednesday, January 4, 2012

चण्डीदत्त की कुछ ताज़ा कविताएं

इस ठूंठ पर वसंत की तरह लहलहाना...! 
एक झटके के साथ रुकती है तुम्हारे शहर से आ रही बस,
उतरता है मुसाफ़िरों का रेला
और
टिक जाती हैं नज़रें फिसलती हुई
आगत से गंतव्य तक की सूचना से
गाड़ी की नंबर प्लेट पर।
महज, ये सोचकर रोमांचित हो उठता हूं मैं,
यहीं कभी तुमने भी देखा होगा।
तुम्हारी पसंद के रंगों की बुशर्ट-पतलून पहनने लगा हूं मैं,
अब, जब भी तुम कभी मिलोगी,
खुशी से लहालोट हो कहोगी न, अरे! मेरा फेवरिट कलर!
ज्यूं,
मैंने पतझड़ के इस मौसम में अपने सब के सब पत्ते त्याग दिए हैं।
ज़िंदें अपनी, मुगालते भी सभी और वहम की खाल...
केंचुलें उतारकर निरीह केंचुए की तरह सर्प बैठा है नई त्वचा की प्रतीक्षा में,
तुम भी इस ठूंठ पर वसंत की तरह लहलहाओ न...!

***
तुम, आ गए प्रेम!


प्रेम,
तुम्हारा पीछे छूटना तय ही था
शायद
तुम्हारे आने से पहले से
तुम फिसल ही जाते हो
दिल की गिरह से जब-तब
बल्कि,
जब, तब तुममें डूबे होते हैं हम।
तब, जब तुम्हारी होती है सबसे ज्यादा ज़रूरत,
तुम होते हो गैरहाज़िर
हमारी ज़िंदगी से।
और,
एक के बाद एक कर गुज़रते दिनों में
तुम हो जाते हो गुजरे दिनों को एक गैरज़रूरी-सा एहसास।
फिर,
ज्यूं ही हम निश्चिंत होकर,
कुछ दर्दभरे गीत सुनते हुए
चंद कविताएं लिखकर
कुछ ज़र्द चिट्ठियां उलटते हुए,
निपटाते रहते हैं घर के ज़रूरी कामकाज,
ऐन उन्हीं के बीच,
गहरी टीस बनकर तुम सिर उठा खड़े हो जाते हो...
क्या, यही याद दिलाने के लिए
हां, तुम मौजूद हो.
कभी नहीं गुजरे,
न ही तुम गैरज़रूरी थे।
सच है, तुम्हारा पीछे छूटना,
छूटना है बचपन की तरह ही,
जो न होकर भी हाज़िर होता है हमारे मन में सदैव।
यूं ही,
तुम भी तो अपनी छायाओं में,
हमारे होंठों और आंखों पर हरदम अट्टहास करते रहते हो,
कभी मुस्कान और आंसू बनकर,
तो कभी कटाक्ष की शक्ल में कहते हुए,
बिना प्रेम के जियोगे? जीकर दिखाओ तो जानें!

***
लम्हा एक, हंसूंगा भरपूर

उदासियों के रंग मेरे दामन पे खूब खिलते हैं.
तुम खिलखिलाना बेहिसाब
एक लम्हा, ही हंस लूंगा मैं भी
मुकम्मल हंसी
बिना किसी टीस की
बगैर रत्ती भर याद के
बस सहज होकर
जैसे, प्रेम से पहले था
अर्थहीन ही सही....

***

दुख में तुम्हारे संग की याद

एक विदा
संकेत है किसी आगमन का
हर बार कोई लौटे ही,
ये ज़रूरी है...
तुम नहीं
तो दुख ही सही।
यूं भी,
दुख में तुम कुछ ज्यादा ही याद आते हो
और तुम्हारे संग बिताया गया सुख भी
लगता है अनमोल।
वसंत,
तुम आना...
भ्रम का पतझड़ गुजरने को है...!
एक विदा
संकेत है किसी आगमन का
हर बार कोई लौटे ही,
ये ज़रूरी है...
तुम नहीं
तो दुख ही सही।
यूं भी,
दुख में तुम कुछ ज्यादा ही याद आते हो
और तुम्हारे संग बिताया गया सुख भी
लगता है अनमोल।
वसंत,
तुम आना...
भ्रम का पतझड़ गुजरने को है...!

***

चलते-चलते
मैं खूब मिलता रहा, हर दिन जोर-शोर से
वो चुपचाप मेरी रगों से होके गुज़र गया...
...
तू आया, बोला भी कुछ नहीं, चलता गया
यूं, मेरे साथ था, फिर भी सफर खाली रहा...
....
गर्मजोशियां उसकी बांह में थीं समंदर की तरह
पर दिल किसी सहरा-सा लिए दामन में वो बाकी रहा

Monday, November 28, 2011

तुम्हें खोकर, खो दिया सब कुछ!


- चण्डीदत्त शुक्ल

एक डूबता हुआ सूरज
फिर खिल उठा
खुल गए कई बंद रास्ते
न, तुम कहां आए
आई बस ज़रा-सी याद तुम्हारी
और दिन थम गया
रात रुक गई
सांस चलने लगी तेज़, और तेज़
एक तुम्हारी याद इतनी कारसाज़
तो सोचो मुकम्मल तुम,
हो कितनी अपूर्व
अतुलनीय प्रेम की बेमिसाल तस्वीर पूरी की पूरी तुम
इसीलिए इतनी दृढ़?
जानती हो,
ईश का अभिशाप मिला है मुझको
न हो सकूंगा खुश निमिश भर को
इसीलिए,
नहीं आती हो मेरे जीवन में तुम क्षण भर के लिए भी...
है न?
दुनिया के सारे वसंत अपने रुमाल में बांधकर
ओझल हो तुम वसंतलता
मेरे संसार से,
तभी तो,
हर दिन सूरज निकलता है,
रात ढलती है
सांझ होती है
उम्र के कैलेंडर में एक-एक दिन जुड़ता जाता है
और
साथ-साथ घटती जाती है ज़िंदगी मेरी
पर
स्थगित रहता है सावन...
झुंझलाते होंठों और खिन्न आंखों के साथ
बस, कभी-कभार
बहुत दम लगाकर आ जाती है तुम्हारी याद
यह एहसास दिलाने के लिए
हां, मैंने सब कुछ खो दिया है
तुम्हें खोकर
मेरे प्रेम!


<दिल की वीरान बस्ती का एक उदास टापू...>

Tuesday, October 18, 2011

चांद, स्त्री और तुम्हारे खोने की रपट : तीन कविताएं

# चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345 #

बिना तुम्हारे वसंत ने किया नामंजूर

राम की तो राम जानें /
खग-मृग से उन्होंने क्या पूछा,
क्या सुना जवाब
पर व्याकुल, एकाकी मैं…
तलाशता रहा तमाम ठीहे,
जहां, कोई खग दिखे,
चोंच में तिनका या चिट्ठियां दबाए…
पर, नदारद सब के सब
पक्षिशास्त्र की किताबों में शामिल ब्योरों बीच कहीं गुटरगूं करते होंगे।
मृग,
`जू’ में तालियां बचाते बच्चों के कंकड़ों और व्यर्थ के कुरकुरे संग कन्फ्यूज़ हैं…
सो, खग-मृग के बिना,
मृ़गनयनी तुम्हारे न होने की रपट मैं कहां दर्ज कराता,
किससे पूछता सवाल
बिरला मंदिर के ऐन सामने, कौन-सा है असली पंडित पावभाजी वाला…
यह जरूर तलाशता था…, तभी चिल्लाया कानों के ठीक बगल कोई…
कहो कहां है तुम्हारी वसंतलता…
कहां गई वो मृगनयनी!
मैं निस्तब्ध, अवाक्…
निरुत्तर हूं,
उन शहरों के सभी रास्ते,
जहां हम-तुम साथ-साथ हमेशा `रंगे हृदय’ पकड़े गए थे,
मुझसे सवाल करते हैं,
अकेले, तुम अकेले, कहां गई वह…
जिसके साथ तुम ज़िंदा थे भरपूर।
अब उदास मुंह लिए कैसे फिर सकते हो?
राहों ने मेरे तनहा क़दम संभालने से इनकार कर दिया है।
अल्बर्ट हॉल में संरक्षित ममी ने पूछा–
तुम वहां, बाहर, क्या करते हो…
बिना प्रेम का लेप लगाए,
वक्त की दीमक तुम्हें खा लेगी, बेतरह!
शाम के तारे,
दोपहर का ताप
और सुबह का गुलाल…
नहीं सहा जाता कुछ भी मुझसे
न ही मुझे स्वीकार करता है कोई बगैर तुम्हारे…
वसंत,
तुम्हारे न होने को मंजूर कर लिया है मैंने.
इन दिशाओं से, रास्तों और राहगीरों से भी कह दो
मान लें,
हम-तुम कभी साथ नहीं चले,
नहीं रहे!


तुम रहना स्त्री, बचा रहे जीवन

हे सुनो न स्त्री
तुम, हां बस तुम ही तो हो
जीने का ज़रिया,
गुनगुनाने की वज़ह.
बहती हो कैसे?
साझा करो हमसे सजनी…
होंठ पर गीत बनकर,
ढलकर आंख में आंसू,
छलकती हो दंतपंक्तियों पर उजास भरी हंसी-सी!
उफ़…
तुम इतनी अगाध, असीम, अछोर
बस…एक गुलाबी भोर!
चांद को छलनी से जब झांकती हो तुम,
देखा है कभी ठीक उसी दौरान उसे?
कितना शरमाया रहता है, मुग्ध, बस आंखें मींचे
हां, कभी-कभी पलक उठाकर…
इश्श! वो देखो, मुए ने झांक लिया तुम्हारा गुलाबी चेहरा…
वसंतलता, जलता है वो मुझसे,
तुमसे,
हम दोनों की गुदगुदाती दोस्ती से…
स्त्री…
तुम न होतीं,
तो सच कहो…
होते क्या ये सब पर्व, त्योहार, हंसी-खुशी के मौके?
उत्सव के ज्वार…
मौसम सब के सब, और ये बहारें?
कहां से लाते हम यूं किसी पर, इस कदर मर-मिटने का जज़्बा?
बेढंगे जीवन के बीच, कभी हम यूं दीवाने हो पाते क्या?
कहो न सखी…
जब कभी औचक तुम्हें कमर से थामकर ढुलक गया हूं संपूर्ण,
तुमने कभी-कहीं नहीं धिक्कारा…
सीने से लगाकर माथा मेरा झुककर चूम ही तो लिया…
स्त्री, सच कहता हूं.
तुम हो, तो जीवन के होने का मतलब है…
है एक भरोसा…
कोई सन्नाटा छीन नहीं सकेगा हमारे प्रेम की तुमुल ध्वनि का मधुर कोलाहल
हमारे चुंबनों की मिठास संसार की सारी कड़वाहटों को यूं ही अमृत-रस में तब्दील करती रहेगी.
तुम रहना स्त्री,
हममें बची रहेगी जीवन की अभिलाषा…
उफ़… तुम्हारे न होने पर हो जाते हैं कैसे शब्दकोश बेमानी
आ जाओ, तुम ठीक अभी…
आज खुलकर, पागलों की तरह, लोटपोट होकर हंसने का मन है




हट पाजी चांद
चल हट पाजी,
तू क्या इतराए है
बादलों की मुंडेर पर
जुल्फ खोले हुए…
चांद कहता है खुद को…
देखा है कभी,
मेरी आंख में बसा `टिकुली’ जैसा चांद?
वो न वसंत-नयन की चमक है प्यारे…
कभी मद्धम नहीं होती /
मेरी ज़िंदगी की रोशनी!
तुम्हारी तो राह घेरता राहु
डराता है सूरज।
वसंतलता सम्मुख नत सब मौसम…
बनना हो तो चांद बनो उसकी तरह…
भरी दोपहर में है वो शीतल
और ममता की उष्णता से लबालब हर समय…
बोलो…तुम हो पाओगे ऐसे?
नहीं, तो जाओ चांद…
छुप जाओ…! 


चण्डीदत्त शुक्ल। पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, दैनिक जागरण, फोकस टीवी, स्वाभिमान टाइम्स में विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर नौकरी के बाद अब दैनिक भास्कर की मैगज़ीन डिवीज़न में फीचर संपादक। चौराहा के मॉडरेटर।

Tuesday, October 4, 2011

चण्डीदत्त शुक्ल की तीन कविताएँ

 

अलसाई तुम्हारी पलकों के ठीक बीच में बड़ी-सी, इला अरुणा मानिंद बिंदी

उम्मीदों से लबालब भरी इस सुबह के वक्त
ऐन ललमुंहे सूरज के चेहरे से भरकर एक चुटकी अबीर
लगा रहा हूं ख्वाब देखती, अलसाई तुम्हारी पलकों के ठीक बीच में
बड़ी-सी, इला अरुण मानिंद बिंदी।
बहुत सुलग रहा है आज का दिन
तापमान फिर उछाल मार रहा है…
उंह! कहकर, चिंहुकती हुई तुम खोल दो रतनार आंखें
बड़ी-बड़ी, सफेद पुतलियों से होती हुई बर्फीली चमक
ठंडे कर दे सूर्य के कपोल
और तुम्हारी सांसों की खुशबू से महक उठे हवा भरपूर।
वसंतलता…
तुम्हारे देखने भर से, जब संवर जाता हूं पूरा का पूरा मैं
तो…
क्यों भरपूर नींद के मोह में तुम मूंदे रखती हो नयन?
टिकटिकी भर निहारा करो न…

जीभ पर आकर झट-से घुली कुल्फी सा तुम्हारा ढुलक जाना मुझ पर

कुल्फी,
मिट्टी के बर्तन में धरी,
सिमटी, सकुचाती
खुलने और परोसे जाने के इंतज़ार में
नमक के आलिंगन में शरमाती हुई
जीभ पर आकर घुल जाती है, झट-से
जैसे,
तुम विरह के बाद ढुलक गईं हर बार
मेरे हृदय के सारे पैरहन खोलकर
और अंग-अंग में
व्याप्त कर गईं ठिठुरन
जलन भरी, दहकाती शीत बनकर…

महज तुम्हारी अनुपस्थिति से

तुम्हें भूलना
अगर होता महज खुद को नियति के हवाले छोड़ देना
यकीन मानो
कब का बिसरा चुका होता अपना प्रेम
पर
जब-जब चाहा मान लेना नियति का सत्य
तुम्हारे न होने ने मुझे यूं कुरेदा
ज्यूं,
दुनिया से गायब हो गया हो पूरा का पूरा जीवन
नदियों से कलकल
मौसमों से उल्लास
फूलों की महक
चिड़ियों का कलरव
बच्चों की खिलखिल और हिक्क करके मुंह चिढ़ाना
शहर से दूर /
गांव में / मनीऑर्डर का इंतज़ार करते / बूढ़े पिता की निगाह के सामने /
ढह जाना नदी पर बना जर्जर पुल…
तेरह साल के किशोर की हांक न सुनकर भैंसों का खेत में उमड़कर घुस जाना
और फिर भ्रष्ट होना किसी आदर्श का
नष्ट हो रहा हो जैसे कोई और रिश्ता.
महज तुम्हारी अनुपस्थिति से गड़बड़ा जाएं सारे अकादमिक सत्र जैसे
व्याकरण अपने अनुशासन भूल जाएं
और मन बेताल हो, नाचने की जगह दौड़ने को उद्यत हो
एक तुम्हारी गुमशुदगी कैसे गैरहाज़िर कर देती है
मुझसे मेरा ही जीवन…
तुम्हें भूलना,
भूल जाना है सारी दुनिया को
दुनिया में रहते हुए,
इंसानों के साथ
इंसानियत के बगैर

chandidutt shukla
(चंडीदत्त शुक्‍ल। यूपी के गोंडा ज़िले में जन्म। दिल्ली में निवास। लखनऊ और जालंधर में पंच परमेश्वर और अमर उजाला जैसे अखबारों व मैगजीन में नौकरी-चाकरी करने, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद दैनिक जागरण, नोएडा में चीफ सब एडिटर रहे। अब फोकस टीवी के प्रोग्रामिंग सेक्शन में स्क्रिप्टिंग की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद आजकल अहा ज़िन्दगी/ भास्कर लक्ष्य में फीचर संपादक हैं । ब्लॉग … chauraha)
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Wednesday, August 10, 2011

चंडीदत्त शुक्ल की कविताएँ

काश…हम होते…उंगलियां एक हाथ की!

काश! तुम होते
गर्म चाय से लबालब कप
हर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप…
दिल होता मिठास से भरा
काश!
मैं होती
तुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..
सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़र
काश! मैं होती रुमाल…
और तुम पोंछते उससे आंख…
हौले-से ठहर जाती पलक के पास कहीं
झुंझलाते तुम…
काश, होती जीभ मैं तुम्हारी
गोल होकर फूंक देती…आंख में…।
काश,
हम दोनों होते एक ही हाथ में
उंगलियां बनकर साथ-साथ
रहते हरदम संग,
वही
गर्म चाय से लबालब कप पकड़ते हुए
छू लेते एक-दूसरे को, सहला लेते…
काश, मैं होती तेज़ हवा,
उड़ाती अपने संग धूल
बंद हो जाती सबकी नज़र, पल भर को ही सही
जब तुम छूते मुझे
कोई देख भी ना पाता..

प्यार का प्रूफ पढ़ते हुए…

अक्सर,
प्रूफ पढ़ने वालों की
आंखों में होता है
धुंध का बसेरा
एक अक्षर से दूसरे अक्षर की ओर बढ़ते हुए
वर्तनी की गलतियों को टांकते
अर्धविराम और पूर्णविराम को आंकते
वे झुंझलाते नहीं
मूल से नया पाठ मिलाते हुए
प्रूफ पढ़ने वाले
रेखांकित करते हैं त्रुटियां
और भर लेते हैं
अपने चेहरे की झुर्रियों में
कितने ही थके, छूटे शब्द
यूं ही मैं
तु्म्हारी यादों के निशान टटोलता हूं
पढ़ने की कोशिश करता हूं
कि मूल में क्या होगा
और नए पाठ से उसका ताल्लुक कैसे बिठाऊं
सहज नहीं होता हर बार
सही-सही थाम पाना गलत और सही शब्द का छोर
तभी तो
तुम्हारी मुस्कान में प्रेम के चिह्न ढूंढता हूं
और बाद में पता चलता है
यहां वितृष्णा और व्यंग्य की हंसी थी
अब, जब तुम भी नहीं साथ हो
गुज़रे वक्त और आज के दिन में
कुछ वीक सिग्नल्स की तरह
गुजरे प्रेम के बिंदु जोड़ पाना
नहीं रह गया है आसान
माफ़ करना, मैं ठीक नहीं हूं
प्रेम की प्रूफ रीडिंग के मामले में

प्रेम के रफू–बीच

उंगलियों के पोरों बीच
एक पतली सुई की पूंछ थामे
चुभन को नसों में बहते देखकर भी
एक बार को सी नहीं करता रफूगर
धागा-दर-धागा
फटी-ख़राब-वीभत्स आकृतियों को
एकरंग करता जाता है
उस की तर्ज पर जब-जब मैंने सोचा
उधड़े हुए प्रेम को भी सिल लूंगा
सुई यकायक चुभ गई
और छलछला उठा पोरों में खून
रंग लाल ही था इस खून का
तुम्हारे प्रेम की तरह
पर कहां वह उन्माद
वैसा लगाव
वहां के घाव मरहम की मानिंद थे
और अब ये जख्म
चुभता है
तुम, घायल उंगलियों को जीभ से गर्म तो करोगी नहीं?
मैं जानता हूं
जीवन भर रहूंगा प्रेम के रफूकार की प्रतीक्षा में
और वो कभी नहीं आएगा
मेरे जख्म सिलने के लिए

सब हो गए बेवफ़ा

आज गायब है गंध
किवाम से
modern_art_gallery_-contemporary_galleries_of_modern_art_paintings_merello__mujer_caobaज़र्द है ज़र्दा
चूना भी नहीं काटता जीभ
देखो… सब हो गए बेवफा- बेअसर
तुम भी तो सी-सी करती
नहीं काटती अपने ही दांतों से अपनी जीभ
ना ही पोंछ देती हो
कथियाई उँगलियों को रुमाल समझकर
मेरी शर्ट की बांह से
उफनाता नहीं है कल्पना में कोई झरना
सूखते सब स्रोत
तुमने भी तो छोड़ दिया रियाज़ करने से पहले
गला तर करके कुल्ली करना
और कहीं, रुक गयी है बयार
अब तुम ही कहाँ भरती हो
संसार की दशा पर `उफ़’ कहती हुई निश्वास
नहीं हो तुम
तो रुकी है
पूरी पृथ्वी
तुम हंस दो अब खिलखिलाकर
ताकि खिल जाएँ सब फूल
और लौट आये जीवन भरपूर-भरापूरा

- साभार, परिकल्पना...

Thursday, April 14, 2011

दूसरों की बात छोड़िए, अपनी आत्मा से तो न्याय कीजिए

विचार : समाचार4मीडिया से साभार

- चण्डीदत्त शुक्ल
जिस दौर में पत्रकारिता की मूर्छावस्था और मृत्यु की समीपता तक की बातें कही जा रही हैं, उस समय में नैतिकता के सवाल मायने ही नहीं रखते। सच तो यह है कि ये विधा, जो कभी मिशन थी, फिर प्रोफेशन बनी, अब विश्वसनीयता और जिजीविषा के संकट से घिरी है। हालांकि भयानक नैराश्य के माहौल में भी, इस तथ्य और सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि टीआरपी के विष-बाण से ग्रस्त टेलीविजन पत्रकारिता और पेड न्यूज़ के संक्रमण से ग्रस्त हुई प्रिंट जर्नलिज्म के कर्मचारी लगातार अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे हैं। यही नहीं, अपनी सीमित कोशिशों में वे पत्रकारिता और खुद को बचाने की जद्दोज़हद कर रहे हैं।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि संपादकों के मैनेजर बनते चले जाने की स्थितियां किस हद तक पत्रकारिता को सजीव और सजग बनाए रख सकेंगी। बहुत कम ही हैं, जिनकी भाषा प्रखर हो, इरादा स्पष्ट और जो सचमुच पत्रकार बनने के लिए इस फील्ड में आ रहे हों। वैसे, इस सबको `फ्रस्ट्रेशन’ मानकर आप खारिज़ भी कर सकते हैं, लेकिन फ़िल्म स्टार, आईएएस, नेता या फिर क्लर्क भी ना बन पाने की स्थिति में, चलो पत्रकार ही बन लिया जाए…या कुछ एंकर्स और प्रभावशाली टीवी पत्रकारों की तर्ज पर चुंधियाकर इस फील्ड में आ जाना भी पत्रकारिता को संकट में डाल रहा है।
ठीक इसी तर्ज पर ऐसा करने वाले भी आजीवन अस्तित्व की जद्दोज़हद और इरादा-लक्ष्य ना स्पष्ट होने के भ्रम से जूझते रहते हैं। यूं, आपको यह विषयांतर लगेगा, लेकिन इस पूरी बात के पीछे कारण है। वज़ह यह कि पत्रकारिता के पीछे अगर मन में स्पष्ट तौर पर मिशन जैसी कोई भावना है, तो वह निर्लज्ज और क्रूर समय में संभव नहीं है, वैसे ही पत्रकारिता की आदर्श परिभाषा के मुताबिक, इसे शुद्ध तौर पर प्रोफेशन नहीं बनाया जा सकता। कारण यह भी है कि यदि आप इस पेशे में बिना किसी पूर्व लक्ष्य के आ गए हैं, तो बाकी धंधों की तरह यहां भी कमाई और नाम की दौड़ में लग जाने का ख़तरा भरपूर है।
मुझे लगता है, भले ही पत्रकारिता के आदर्श अब कायम ना रह गए हों और इसे प्रोफेशन की तरह लेते हुए कमाने-खाने की पद्धतियां शुरू हो गई हों, लेकिन यहीं पर स्व-चेतना और यथास्थिति के फ़र्क समझने और स्वयं पर नियंत्रण की ज़रूरत है। सुदामा पांडेय धूमिल की एक कविता को उद्धृत कर रहा हूं… ज़िंदा रहने के पीछे अगर सही तर्क नहीं है तो रामनामी बेचकर या …दलाली करके रोजी कमाने में कोई फ़र्क नहीं है। कविता से दो शब्द हटा दिए गए हैं, क्योंकि वह संसदीय भाषा का बहाना लेकर अश्लील बताए जा सकते हैं। ख़ैर, मुद्दा यही कि पत्रकारिता में अगर हम आए हैं, तो हमारे बहुतेरे उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ इस बात का इलहाम, चेतनता, स्पष्टता और इरादा यही होना चाहिए कि ख़बरची बनने के पीछे बिल्डिंग खड़ी करना हमारा काम नहीं है।
निश्चित तौर पर सारी दुनिया के सामने आदर्शों की दुहाई देने वाले पत्रकारों को अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए। वैसे भी, खबरगोई रियल एस्टेट, बेकरी और मैट्रिमोनियल साइट से अलग कुछ खास किस्म का काम तो है ही। इसकी इज्जत बचानी है, तो हमें भी ईमानदार होना होगा। महज आदर्श होने का अभिनय करते रहने और खुद में झूठ पालते हुए पत्रकार ना किसी का विश्वास अर्जित कर सकेंगे, ना ही अपनी आत्मा से न्याय कर पाएंगे।
(लेखक चौराहा.इन पोर्टल के संस्थापक संपादक और स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक के वरिष्ठ समाचार संपादक हैं