कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Friday, September 17, 2010

अयोध्या का दर्द



साभार...फोकस टीवी, प्रवक्ता.कॉम <http://www.pravakta.com/?p=13377>और  हस्तक्षेप.कॉम<http://hastakshep.com/view_info.php?id=87>
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24 सितंबर को अयोध्या की विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ पर ऊंची अदालत का फ़ैसला आएगा...निर्णय क्या होगाकोर्ट ही जानेउससे किसे ख़ुशी मिलेगी और किसका चेहरा लटक जाएगा
ये भी वक़्त बताएगालेकिन अयोध्या की पीर कब कम होगी...
ये एक बड़ा सवाल है...
अयोध्या की पीड़ाउसकी ही ज़ुबानी...




मैं अयोध्या हूं...।




राजा राम की राजधानी अयोध्या...।
यहीं राम के पिता दशरथ ने राज किया...यहीं पर सीता जी राजा जनक के घर से विदा होकर आईं। यहीं श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। यहीं बहती है सरयू, लेकिन अब नदी की मस्ती भी कुछ बदल-सी गई है। कहां तो कल तक वो कल-कल कर बहती थी और आजजैसे धारा भी सहमी-सहमी है...धीरे-धीरे बहती है। पता नहींकिस कदर सरयू प्रदूषित हो गई है...कुछ तो कूड़े-कचरे से और उससे भी कहीं ज्यादा सियासत की गंदगी से। सच कहती हूं...आज से सत्रह साल पहले मेराअयोध्या का कुछ लोगों ने दिल छलनी कर दिया...वो मेरी मिट्टी में अपने-अपने हिस्से का खुदा तलाश करने आए थे...।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ...
सैकड़ों साल से मज़हबों के नाम पर कभी हिंदुओं के नेता आते हैंतो कभी मुसलमानों के अगुआ आ धमकते हैं...
वो ज़ोश से भरी तक़रीरे देते हैं...अपने-अपने लोगों को भड़काते हैं और फिर सब मिलकर मेरे सीने पर घाव बना जाते हैं...। कभी हर-हर महादेव की गूंज होती हैतो कभी अल्ला-हो-अकबर की आवाज़ें आती हैं....
लेकिन ये आवाज़ेंनारा-ए-तकबीर जैसे नारे अपने ईश्वर को याद करने के लिए लगाए जाते हैं...पता नहीं...ये तो ऊंची-ऊंची आवाज़ों में भगवान को याद करने वाले जानेंलेकिन मैंनेअयोध्या ने तो देखा है...अक्सर भगवान का नाम पुकारते हुए आए लोगों ने खून की होलियां खेली हैं...और हमारे घरों से मोहब्बत लूट ले गए हैं। जिन गलियों में रामधुन होती थी...जहां ईद की सेवइयां खाने हर घर से लोग जमा होते थे...वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है...वहां नफ़रतों का कारोबार होता है।
किसी को मंदिर मिलाकिसी को मसज़िद मिली...हमारे पास थी मोहब्बत की दौलतघर को लौटेतो तिज़ोरी खाली मिली। छह दिसंबर1992 को अयोध्या में जो कुछ हुआ...हो गया पर वो सारा मंज़र अब तक याद आता है...और जब याद आता हैतो थर्रा देता है। धर्म के नाम पर जो लोग लड़े-भिड़ेउनकी छातियां चौड़ी हो जाती हैं...कोई शौर्य दिवस मनाता हैकोई कलंक दिवसलेकिन अयोध्या के आम लोगों से पूछो--वो क्या मनाते हैंक्या सोचते हैं बाकी मुल्क के बाशिंदे क्या जानते हैं...क्या चाहते हैंवो तो आज से सत्रह साल पहले का छह दिसंबर याद भी नहीं करना चाहतेजब एक विवादित ढांचे को कुछ लोगों ने धराशायी कर दिया था। हिंदुओं का विश्वास है कि विवादित स्थल पर रामलला का मंदिर था। वहां पर बनेगा तो राम का मंदिर ही बनेगा...। मुसलिमों को यकीन है कि वहां मसज़िद थी।
जिन्हें दंगे करने थेउन्होंने घर जलाएजिन्हें लूटना थावो सड़कों पर हथियार लेकर दौड़े चले आए नफरतों का कारोबार उन्होंने किया...और बदनाम हो गई अयोध्या...मैंने क्या बिगाड़ा था किसी का?
मेरी गलियों में ही बौद्ध और जैन पंथ फला-फूला। पांच जैन तीर्थंकर यहां जन्मे इनके मंदिर भी तो बने हैं यहां. वो लोग भला क्यों नहीं झगड़ते। नहीं...मैं ये नहीं चाहती कि वो भी अपने मज़हब के नाम पर लड़ाइयां लड़ेंलेकिन मंदिर और मसजिद के नाम पर तो कितनी बड़ी लड़ाई छिड़ गई है।
आजइस पहरजैसे फिर वो मंज़र आंख के सामने उभर आया है...एक मां के  सीने में दबे जख्म हरे हो गए हैंकल फिर सारे मुल्क में लोग अयोध्या का नाम लेंगे...कहेंगेइसी जगह मज़हब के नाम पर नफ़रत का तमाशा देखने को मिला था।
हमारे नेता तरह-तरह के बयान देते हैं। मुझे कभी हंसी आती हैतो कई बार मन करता है--अपना ही सिर धुन लूं। एक नेता कहती हैंविवादित स्थल पर  कभी मस्जिद नहीं थीइसीलिए हम चाहते हैं कि वहां भव्य मंदिर बने। वो इसे जनता के आक्रोश का नाम देती हैं। उमा भारती ने साफ़ कहा है कि वो ढांचा गिराने को लेकर माफ़ी नहीं मांगेंगीचाहे उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए।
सियासतदानों की ज़ुबान के क्या मायने हैंवही जानें--वही समझेंना अयोध्या समझ पाती हैना उसके मासूम बच्चे। राम के मंदिर के सामने टोकरियों में  फूल बेचते मुसलमानों के बच्चे नहीं जानते कि दशरथ के बेटे का मज़हब क्या थाना ही सेवइयों का कारोबार करने वाले हिंदू हलवाइयों को मतलब होता है इस बात से कि बाबर के वशंजों से उन्हें कौन-सा रिश्ता रखना है और कौन-सा नहीं। वो तो बस एक ही संबंध जानते हैंमोहब्बत का!
खुदा ही इंसाफ़ करेगा उन सियासतदानों काजो मेरे घरमेरे आंगन में नफ़रत की फसल बोकर चले गएमैं देखती हूं...मेरी बहनें--दिल्लीपटनाकाशीलखनऊ...सबकी छाती ज़ख्मी है।
एक नेता कहती हैंजैसे 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैली थी और कत्ल-ए-आम हुए थेवैसे ही तो छह दिसंबर1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया ....अयोध्या में मौजूद कुछ लोग जनविस्फोट को कैसे रोक पाते?
वो बताएं....सड़कों पर निकले हुए लोग एक-दूसरे को देखकर गले लगाने को क्यों नहीं मचल पड़ते क्यों नहीं उनके मन में आता--सामने वाले को जादू की झप्पी देनी है। क्या नफ़रतों के सैलाब ही उमड़ते हैंबसपा की नेताउप्र की मुख्यमंत्री मायावती कांग्रेस को दोष देती हैं...कांग्रेस वाले बीजेपी पर आरोप मढ़ते हैं बाला साहब ठाकरे कहते हैं...1992 में हिंदुत्ववादी ताकतें एक झंडे के तले नहीं आईं...नहीं तो मैं भी अयोध्या आता।
मुझ परअयोध्या पे शायद ही इतने पन्ने किसी ने रंगे होंलेकिन हाय री मेरी किस्मत...मेरी मिट्टी पर छह दिसंबर1992 को जो खून बरसाउसके छींटों की स्याही से हज़ारों ख़बरें बुन दी गईं। किसने घर जलायाकिसके हाथ में आग थी...मुझको नहीं पता हां! एक बात ज़रूर पता है...मेरे जेहन में है...खयाल में है...विवादित ढांचे की ज़मीन पर कब्जे को लेकर सालों से पांच मुक़दमे चल रहे हैं...।
पहला मुक़दमा तो 52 साल भी ज्यादा समय से लड़ा जा रहा हैयानी तब  सेजब जंग-ए-आज़ादी के जुनून में पूरा मुल्क मतवाला हुआ था। अफ़सोस...मज़हब का जुनून भी देशप्रेम पर भारी पड़ गया। मुझे पता चला है कि कई मामले 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने से जुड़े हैं। क्या कहूं...या कुछ ना कहूं...चुप रहूंतो भी कैसेमां हूं...मुझसे अपनी ऐसी  बेइज़्ज़ती देखी नहीं जाती। कहते हैं23 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे का दरवाज़ा खोलने पर वहां रामलला की मूर्ति रखी मिली थी। मुसलिमों ने आरोप लगाया था--रात में किसी ने चुपचाप ये मूर्ति वहां रख दी थीं
किसे सच कहूं और किसे झूठा बता दूं...दोनों तेरे लाल हैंचाहे हिंदू हों या फिर मुसलमान...मैं बस इतना जानना चाहती हूं कि नफ़रत की ज़मीन पर बने घर में किसका ख़ुदा रहने के लिए आएगा?
23 दिसंबर, 1949 को ढांचे के सामने हज़ारों लोग इकट्ठा हो गए. यहां के डीएम ने यहां ताला लगा दिया। मैंने सोचाकुछ दिन में हालात काबू में आ जाएंगे...लेकिन वो आग जो भड़कीवो फिर शांत नहीं हुई। अब तक सुलगती जा रही है और मेरे सीने में कितने ही छाले बनाती जा रही है...। 16 जनवरी, 1950 को गोपाल सिंह विशारददिगंबर अखाड़ा के महंत और राम जन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास ने अर्ज़ी दी कि रामलला के दर्शन की इजाज़त मिले। अदालत ने उनकी बात मान ली और फिर यहां दर्शन-पूजा का सिलसिला शुरू हो गया। एक फ़रवरी, 1986 को यहां ताले खोल दिए गए और इबादत का सिलसिला ढांचे के अंदर ही शुरू हो गया।
हे राम! क्या कहूं...अयोध्या ने कब सोचा था कि उसकी मिट्टी पर ऐसे-ऐसे कारनामे होंगे। 11 नवंबर1986 को विश्व हिंदू परिषद ने यहीं पास में ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया। अब तक अलग-अलग चल रहे मुक़दमे एक ही जगह जोड़कर हाईकोर्ट में एकसाथ सुने जाएं। किसी और ने मांग कीविवादित ढांचे को मंदिर घोषित कर दिया जाए। 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ और 6 दिसंबर 1992 को वो सबकुछ हो गया...जो मैंने कभी नहीं सोचा था...। कुछ दीवानों ने वो ढांचा ही गिरा दिया...जिसे किसी ने मसज़िद का नाम दियातो किसी ने मंदिर बताया। मैं तो मां हूं...क्या कहूं...वो क्या है...। क्या इबादतगाहों के भी अलग-अलग नाम होते हैंइन सत्रह सालों में क्या-क्या नहीं देखा...क्या-क्या नहीं सुना...क्या-क्या नहीं सहा मैंने। मैं अपनी भीगी आंखें लेकर बस सूनी राह निहार रही हूं...क्या कभी मुझे भी इंसाफ़  मिलेगाक्या कभी मज़हब की लड़ाइयों से अलग एक मां को उसका सुकून लौटाने की कोशिश भी होगी?
1993 में यूपी सरकार ने विवादित ढांचे के पास की 67 एकड़ ज़मीन एक संगठन को सौंप दी..। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला रद कर दिया। अदालत ने ध्यान तो दिया था मेरे दिल का...मेरे जज़्बात का...इंसाफ़ के पुजारियों ने साफ़ कहा था... मालिकाना हक का फ़ैसला होने से पहले इस ज़मीन के अविवादित हिस्सों को भी किसी एक समुदाय को सौंपना `धर्मनिरपेक्षता की भावनाके अनुकूल नहीं होगा। इसी बीच पता चला कि उत्तर प्रदेश सचिवालय से अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 फा़इलें ग़ायब हो गईं। क्या-क्या बताऊं...!  मज़हब को लेकर फैलाई जा रही नफ़रत मैं बरसों-बरस से झेल रही हूं। 1528 में यहां एक मसज़िद बनाई गई। 1853 में पहली बार  यहां सांप्रदायिक दंगे हुए। 
1859 में अंग्रेजों ने बाड़ लगवा दी। मुसलिमों से कहा...वो अंदर इबादत करें और हिंदुओं को बाहरी हिस्से में पूजा करने को कहा। हाय रे...क्यों किए थे अंग्रेजों ने इस क़दर हिस्सेये कैसा बंटवारा था...उन्होंने जो दीवार खींची...वो जैसे दिलों के बीच खिंच गई। 1984 में कहा गया--यहां राम जन्मे थे और इस जगह को मुक्त कराना है।  हिंदुओं ने एक समिति बनाई और मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति गठित कर डाली। 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ कर दिया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव डाल दी। 1990 में भी विवादित ढांचे के पास थोड़ी-बहुत तोड़फोड़ की गई थी। 1992 में छह दिसंबर का दिन...मेरे हमेशा के लिए ख़ामोशियों में डूब जाने का दिन...अपने-अपने ख़ुदा की तलाश में कुछ दीवानों ने मुझे शर्मसार कर दिया। विवादित ढांचे को गिरा दिया गया। अब कुछ लोग वहां मंदिर बनाना चाहते हैं...तो कुछ की तमन्ना है मसज़िद बने...। मैं तो चाहती हूं...कि मेरे घर मेंमेरे आंगन में मोहब्बत लौट आए। 
बीते सत्रह सालों में मैंने बहुत-से ज़ख्म खाए हैं...सारे मुल्क में 2000 लोगों की सांसें हमेशा के लिए बंद हो गईं...कितने ही घरों में खुशियों पर पहरा लग गया। ऐसा भी नहीं था कि दंगों और तोड़फोड़ के बाद भी ज़िंदगी अपनी रफ्तार पकड़ ले। 2001 में भी इसी दिन खूब तनाव बढ़ा...जनवरी 2002 में उस वक्त के पीएम ने अयोध्या समिति गठित की...पर हुआ क्या??? क्या कहूं...!!!  मेरी बहन गोधरा ने भी तो वही घाव झेले हैं...फरवरी2002 में वहां कारसेवकों से भरी रेलगाड़ी में आग लगा दी गई। 58 लोग वहां मारे गए। किसने लगाई ये आग...। अरे!  हलाक़ तो हुए मेरे ज़िगर के टुकड़े ही तो!!  मां के बच्चों का मज़हब क्या होता है?  बस...बच्चा होना!!
अब तक तमाम सियासतदां मेरे साथ खिलवाड़ करते रहे हैं। फरवरी2002 में एक पार्टी ने यकायक अयोध्या मुद्दे से हाथ खींच लिया...। जैसे मैं उनके लिए किसी ख़िलौने की तरह थी। जब तक मन बहलायासाथ रखानहीं चाहातो फेंक दिया। आंकड़ों की क्या बात कहूं...कितनी तस्वीरें याद करूं...जो कुछ याद आता है...दिल में और तक़लीफ़ ताज़ा कर देता है। क्या-क्या धोखा नहीं किया...किस-किस ने दग़ा नहीं दी।
अभी-अभी लिब्राहन आयोग ने रिपोर्ट दी है..कुछ लोगों को दंगों काढांचा गिराने का ज़िम्मेदार बताया है...सुना है...उन्हें सज़ा देने की सिफ़ारिश नहीं की गई है। गुनाह किसने किया...सज़ा किसे मिलेगी...पता नहीं...पर ये अभागी अयोध्या...अब भी उस राम को तलाश कर रही है...जो उसे इंसाफ़ दिलाए।
कोई कहता हैअगर मेरे खानदान का पीएम होतातो ढांचा नहीं गिरता...कोई कहता हैअगर मैं नेता होतीतो मंदिर वहीं बनता...कहां है वो...जो कहे...
मैं होता तो अयोध्या इस क़दर सिसकती ना रहती...
मैं होतीतो मोहब्बत इस तरह रुसवा नहीं होती।




(ये पोस्ट पहले भी चौराहा पर आई थी. सामयिक है, इसलिए रि-पोस्ट कर रहा हूं।)








उस समय की प्रतिक्रियाएं भी यहां दे रहा हूं...आप बहस आगे बढ़ाएं...प्रतिक्रियाएं ये हैं...







Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...





bahtu sundar........ek vastvik dard ke sath bahut jankari bhar di aapne



चंदन कुमार झा said...





बिल्कुल नये अंदाज में लिखी गयी यह पोस्ट बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है । बढ़िया आलेख ।



shama said...





Rhidaysharshi aalekh hai..shat partishat saty...siyasat, aur siyasat karnewalon ke behkave me aanewale log,donohee zimmeadaar hain..

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

http://lalitlekh.blogspot.com



अजित वडनेरकर said...





बेहतरीन है चण्डीबाबू

अयोध्या को लिब्रहान की तो खबर होगी? चंद अल्फाज उनके मुताल्लिक भी कहलवा लेते तो मज़ा आ जाता। सत्रह साल सिर्फ रोजगार में बने रहने की खातिर या किन्ही और वजूहात से चली सुनवाई। हाथ क्या आया?



गिरिजेश राव said...





सौ बात की एक बात - अयोध्या में राम के जन्मस्थल पर भव्य मन्दिर बनना चाहिए। ..
बाकी ये भावुकता भरी बातें और तमाम खयालात बहुत सी सम्स्याओं और मुद्दों पर लागू होते हैं। उन पर मौन धारण करना, सिर्फ अयोध्या और 6 दिसम्बर को इतना तूल देना इंटेलिजेंसिया को कटघरे में खड़ा करते हैं।
..सेफ खेलना इंटेलिजेंसिया का स्वभाव हो गया है।



हिमांशु । Himanshu said...





अयोध्या को लेकर जितनी राजनीति हुई, सच में उससे ऊबन हो गयी है । इस बात से मेरा भी इत्तेफाक -
"..सेफ खेलना इंटेलिजेंसिया का स्वभाव हो गया है।"



Sadhana Vaid said...





बहुत ही मर्मस्पर्शी आलेख है आपका । आज के इंसान ने य्ह सिद्ध कर दिया है कि 'मज़हब ही सिखा रहा है आपस में बैर रखना ' । निजी स्वार्थों के चलते नेता इस आग को बुझाने की जगह भड़का कर अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं । इसका हल कोई नहीं निकालना चाहता । हल निकल गया तो चुनाव में मुद्दा कौन सा उछालेंगे । हृदयस्पर्शी आलेख के लिये शुभकामनायें ।



Kishore Choudhary said...





मित्र अभी आपके ब्लॉग तक पहुंचा हूँ पहली नज़र में अपने मन के अनुकूल ही पाया है थोड़ा समय और चाहिए इसे समझने के लिए. फिर आऊंगा.



Aijaz said...





अच्छा आलेख है, सही किया कि मुझ को भी आमंत्रित किया, किसी मुस्लिम की प्रतिक्रिया जानने के लिए। लेकिन सवाल केवल किसी मुस्लिम का नहीं, केवल हिन्दु का नहीं, देश के सेकुलरिज़्म, धर्म निर्पेक्षता का है। इस विचार से 6 दिसम्बर एक कलंक ही कहा जाना उचित होगा।



luckrees said...





Atyant moulik vichar hain, is "darshan" ki avashykata hamesha hi rahi hai aur rahegi. Jai rakhiye hamari shubhkamnayen apke sath hain.



महाशक्ति said...





मंदिर तो बनना ही चाहिये, यह आस्‍था का प्रश्‍न है। मुस्लिम में मस्जित कोई पूज्‍य स्‍थल नही है वह सिर्फ नमाज अदा करने का स्‍थान भर है, जरूर नही है कि हिन्‍दूओ की छा‍ती पर ही मुस्लिम अपनी नमाज अदा करे।

एक रास्‍ता यदि मुस्लिम दे तो सैकड़ो रास्‍ते हिन्‍दू अपने आप दे देगा। और विवाद का नाम ही नही मिलेगा।



kuhu said...





kitna accha likha hai.........ki ayodhya ki manodasha aur peda par koi dhyan nahi deta .................sab apni apni rotiya sekne me lage hain......................yeh bahut rochak bhi hai kyunki aapne isme kafi sare tathya batayen hai jo aaj tak kafi sare logo ko pata hai nahi the ................sadhuvad



Dr. Purnima said...





चर्चा में सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद | जो लिखा है आपने बिल्कुल ही सटीक लिखा है | जहाँ हिन्दू मुस्लिम सब आपसी भाईचारे के साथ रहा करते थे, सबके अच्छी तरह से काम काज चाल रहे थे, हमारे राजनेताओं ने अपने छोटे छोटे हितों की पूर्ती के लिए सब कुछ तहस नहस कर डाला | हम तो यही कहेंगे कि अयोध्या मसले को हिन्दू मुस्लिम के नज़रिए से ना देखकर मानवता के नज़रिए से देखना चाहिए | लिखने को तो बहुत कुछ है | पर अभी बस इतना ही ......

खेल होगा बंद कब तक, कौन जीतेगा यहाँ ?
हर कोई इससे अपरिचित लडखडाता खेलता |
जबकि सम्मुख हो रहा है खून सबके सुख सपन का |
ओ अरे नादाँ मानव है समय अब भी संभल जा
बंद कर दे आज तो यह खेल जीवन और मरण का |

पूर्णिमा



BrijmohanShrivastava said...





बहुत ही विस्तार से ,सम्पूर्ण हकीकत -जिम्मेदार कौन ?
घरों की राख फ़िर देखेंगे ,पहले देखना ये है /घरों को फ़ूंक देने का इशारा कौन करता है ।
दुष्यन्त जी ने भी कहा है
"मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम/ तू न समझेगा इसे ,तू अभी इन्सान है ।
जिन गलियों मे रामधुन होती हो और ईद की सेवैंयां खाई जाती हो वही आज भय का माहोल हो । एक निवेदन अत्यंत विनम्रता के साथ कि मोहब्बत की दौलत कितनी ही लुटाओ तिजोरी कभी खाली नही होती ।जहां पांच पांच तीर्थंकर जन्मे हो उस भूमि को रक्त रंजित किया जाना मानवता का सबसे बडा अपमान है ।आपको उनके बयानों पर हंसी आती है आना ही चाहिये बहुरूपिये है ।कौन कहे-
जिनकी वजह से == जिनकी महनत से तुम्हे ताज मिला तख्त मिला , उनके सपनों के जनाजों मे तो शामिल होते, तुमको शतरंज की चालों से नही वक्त मिला ।
इनकी फ़ितरत मे नही खून से कपडे रंगना , अपने मतलब के लिये तुमने लडाया तो नही ,कौन पूछे



श्याम कोरी 'उदय' said...





... prabhaavashaali abhivyakti !!!!



Dr. Purnima said...





धन्यवाद्



Dr. Purnima said...





बहुत खूब लिखा बृजमोहन जी



डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...





सारगर्भित लेख प्रकाशित करने के लिए आभार!



chhapas said...





लिखने के इस अंदाज के लिए चंडीदत्त जी को काफी बधाईयां। आपका छपास www.chhapas.com



अशोक कुमार पाण्डेय said...





बाबरी विध्वंस इस देश के क़ानून और संविधान ही नहीं पारस्परिक सद्भाव की परंपरा पर काला धब्बा है।

हज़ारों-लाखों लोगों की लाशों पर बने मंदिर या मस्ज़िद में बस गिद्ध आयेंगे आराधना करने।



संजय भास्कर said...





बहुत खूब लिखा बृजमोहन जी

sanjay



संजय भास्कर said...





बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है । बढ़िया आलेख ।


http://sanjaybhaskar.blogspot.com



प्रेम said...





जबरदस्त चंडीदा। बेहद ही शोधपरक है आपका यह आलेख। अयोध्या के दर्द को आपने बखूबी सबके सामने पेश किया है और इस अयोध्या विवाद की गहरी पड़ताल की है। इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं। हमें उम्मीद है कि आप आगे भी ऐसे ही लेख लिखते रहेंगे।



rashmi ravija said...





पहली बार किसी ने धरती के दर्द को यूँ महसूस करके लिखा है..इस धरती का क्या कसूर जो उसे लहू लुहान किया जा रहा है...उसने तो अपने दोनों बेटों को सामान अनाज,सामान फल-फूल,सामान पर्वत और सामान नदियों से नवाज़ा है पर उन दोनों केबीच के झगड़ों में यह धरती क्षत-विक्षत हो रही है,इस से सब अनजान हैं.....सच लिखा है, आम नागरिक को इन झगड़ों से कोई मतलब नहीं ऐसे ही मुस्लिम बच्चे मंदिर के सामने फूल बेचते रहेंगे और हिन्दू हलवाई सेवइयां बनाते रहेंगे.



sandhyagupta said...





Bahut kuch sochne ko majboor kiya...



लता 'हया' said...





bahut dardnaak manzar pesh kiya hai aapne,mujhe mera qata yaad aa gaya;
aye kaash apne mulk mein aisi faza bane,
mandir jale to ranj musalman ko bhi ho,
pamal hone paye na masjid ki aabroo,
ye fikr mandiron ke nigahbaan ko bhi ho.



आशीष कुमार 'अंशु' said...





चंडी भाई आपका यह अंदाज ए बयान कमाल का है..
ब्लौगिंग में आपकी सक्रियता देखकर खुशी मिलती है,पिछले दिनों मोहल्ला पर भी आपकी रचना देखने का मौक़ा मिला, शुभकामना बड़े भाई



रंजना said...





SAARTHAK AALEKH DWARA SARTHAK PRASH UTHAYE HAIN AAPNE....PAR INKE UTTAR KOUN DEGA.....

IISHWAR SABKO SADBUDDHI DEN AUR LOGON KE BEECH KHADE VAIMANASYTA KE SABHI DEEVAAR DHAAH DEN...



श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...





आज अयोध्या फिर से चौराहे पर खड़ी है ... एक दिन उसने देखा आस्था के उन्माद में सरयू के पुल को पार करते हुये अनेकों लोगों पर बिना पूर्व चेतावनी के अंधाधुंध फायरिंग का नर संहार और उसके कुछ ही वर्षों बाद अयोध्या काम्द का द्वितीय सर्ग ... और लाक्षाग्रह कौंसिल का ... पांडवों ने कर दिया बहिष्कार .... बचाया इस तरह यह नवीन वार .... सब कुछ स्मरण है मित्र .. ५ दिसंबर को मेरी यह कविता असम से निकलने वाले हिंदी दैनिक सेंटिनल में छपी थी. ऐसा आभास उस समय किसी को भी हो सकता था. मात्र एक दिन उपरांत ६ दिसंबर को ऐसा हुआ जिसे मैंने अपनी कविता में महाभारत का द्वितीय सर्ग निरूपित किया था.

राजनीति की विड्म्बना और विद्रूपता ने आज अयोध्या को पीर से उसी चौराहे पर लाकर खड़ा किया है जहां .....

भरोसा अब कांच की उन बंद खिड़की के सहन
’कान्त’ पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा

आलेख के लिये हार्दिक आभार



अविनाश वाचस्पति said...





पहले सरयू बहती थी
अब वो तो रोती है
गरीब की गरीबी में
छिन गई धोती है।

मजहब छील रहा है
मन को, तन को
सब जन को
सिर्फ बचे हुए
नेतागण हैं
वही बचे रहेंगे
जो झूठे हैं।

अद्भुत सत्‍य कथा।



डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...





बहुत मार्मिक और समयानुकूल आलेख है आपका.
मुझे तो लगता है कि हम सबका भला इसी में है कि हम अयोध्या को भूल ही जाएं.



Uday khaware said...





क्या जामा मस्जिद में हुनमान मंदिर बनाने की बात आप लोग कर सकते है..? नहीं ना..तो फिर जो लोग धर्म निर्पेछ्त्ता की बात करते है वो कृपा करके चुप हो जाएँ...शोभा नहीं देता
और आप भी शुक्ला जी....धर्म को मानते है तो फिर ठीक है, नहीं तो आप भी धर्म निरपेछ बन जाएँ, ठीक रहेगा.....भीड़ में जैसे सारे सियार हूँआन हूआं करते है ..आप भी करिए ..



Uday khaware said...





क्या जामा मस्जिद में हुनमान मंदिर बनाने की बात आप लोग कर सकते है..? नहीं ना..तो फिर जो लोग धर्म निर्पेछ्त्ता की बात करते है वो कृपा करके चुप हो जाएँ...शोभा नहीं देता
और आप भी शुक्ला जी....धर्म को मानते है तो फिर ठीक है, नहीं तो आप भी धर्म निरपेछ बन जाएँ, ठीक रहेगा.....भीड़ में जैसे सारे सियार हूँआन हूआं करते है ..आप भी करिए ..



प्रदीप श्रीवास्तव said...





भाई शुक्ल जी
में अयोध्या हूँ...,
क्या लिखा है आप ने ,बधाई के पात्र हैं.
पढ़ने के साथ-साथ ऐसा लगा की अयोध्या की गलियों में घूम रहा हूँ.
आज अयोध्या का यह हल किसने किया ,वहाँ के लोगों ने नहीं,
जिन लोंगों ने किया वे बाहर के ही थे,अयोध्या वासियों से पूछिए ६ दिसंबर ९२
के बारे में चाहे वे मुस्लिम हों या हिन्दू,हर व्यक्ति बाहर वालों कों ही कोसेगा.
कोसे भी क्यों न,आज जो हालत वहाँ के पैदा हुवे हैं उसके लिए वे ही जिम्मेदार जो हैं.
आज से १७ साल पहले तक कितनी संत नगरी थी हमारी अयोध्या ,जहाँ खुली साँस
लेते थे ,लेकिन आज उसी मर्यादा पुरुसोत्तम भगवन की नगरी में प्रवेश करते ही दम घुटने लगता है,
चारों तरफ संगीन के साये,हर आने -जाने वालों कों संदेह की निगाह से देखा जाना.कितना ख़राब
लगता है की आज हम अपने सहर में स्वतंत्र हो कर नहीं घूम सकते ,क्यों?
इसके लिए हम अयोध्या वाले ही दोषी हैं ,जिन्हों ने बाहर वालों कों मौका दिया .
आज भी अयोध्या के लोग (दोनों समुदाय के )अमन सन्ति चाहते हैं.
एक बार फिर बधाई .
प्रदीप श्रीवास्तव
निज़ामाबाद आन्ध्र प्रदेश
09848997327



Dankiya said...





sundar post!! ayodhya ka manvikaran achha laga..!!

kabhi mere blog par bhi aayen..swagat hai..!
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अबयज़ ख़ान said...





बेहतरीन कहूं... बहुत खूब कहूं... या लाजवाब कहूं... अल्फ़ाज़ कम पड़ रहे हैं... इतना खूबसूरत ब्लॉग है, कि मैंने अपने ब्लॉग के साथ लिंक कर लिया है...



रज़िया "राज़" said...





किसे सच कहूं और किसे झूठा बता दूं...दोनों तेरे लाल हैं...चाहे हिंदू हों या फिर मुसलमान...मैं बस इतना जानना चाहती हूं कि नफ़रत की ज़मीन पर बने घर में किसका ख़ुदा रहने के लिए आएगा?
आह! क्या आह है अयोध्या की!!!!


बहेतरीन पोस्ट के लिये आभार। और उसपर भी अशोककुमार पांडेजी की कमेण्ट ने सोने पे सुहागे का काम कर दीया।

Monday, September 13, 2010

सौ रुपये में दस किताबें!


एक सवाल का जवाब देंगे आप? चिप्स के दो बड़े पैकेट ख़रीदने के लिए कितने पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं? चालीस रुपये ना!! और पांच के लिए? जवाब आसान है—सौ रुपये। क्या इतने पैसे में नामी-गिरामी लेखकों की अस्सी से सौ पेज वाली दस किताबें मिलें, तो इन्हें ख़रीदना अच्छा सौदा होगा? कुछ दिन पहले ये सवाल हंसी में उड़ाया जा सकता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है…। जयपुर के एक कम जाने प्रकाशक मायामृग नेबोधि पुस्तक पर्व नाम से ऐसी योजना की शुरुआत की है। इसमें हिंदी के सुपरचित और नए, दोनों तरह के रचनाकार शामिल हैं, मसलन— विजेंद्र, चंद्रकांत देवताले, नंद चतुर्वेदी, हेमंत शेष, महीप सिंह, प्रमोद कुमार शर्मा, सुरेन्द्र सुन्दरम, हेतु भारद्वाज, नासिरा शर्मा और सत्यनारायण। किताबें बाज़ार में आईं और पहले हफ़्ते में ही 925 सेट बिक गए। इससे उत्साहित प्रकाशक ने गिफ्ट पैक लॉन्च करने की योजना बना ली। लगे हाथ ये घोषणा भी कर दी कि हर साल ऐसे दो सेट पेश किए जाएंगे, यानी बीस लेखकों की बीस किताबें।
बहुतेरे लोगों की राय में ये—`दुधारी तलवार पर चलना’ और `घर फूंक कर तमाशा देखना’ था, लेकिन हिंदी का साहित्य जगत ना तो किसी घटना से खुश हो जाने को आतुर है और ना झट-से नाराज़ होने के लिए। 300 से 500 तक के प्रिंट ऑर्डर में सिमटते जा रहे प्रकाशन और विचार जगत में एक अचीन्हे-प्रकाशक की इस कोशिश को चर्चित साहित्यकार विष्णु नागर ने `पुस्तक जगत की नैनो क्रांति’ नाम दिया। उन्होंने व्यंग्य किया—ये क्रांति सिर्फ हिंदी साहित्य संसार में हुई है, इसलिए इसकी खबर शायद हिंदी के अखबार लेना जरूरी नहीं समझें।
नागर का स्वर भले ही प्रशंसा का रहा हो, लेकिन योजना की आलोचना करने वाले भी कम नहीं हैं। असहमति का मूल कारण है—प्रकाशक की ओर से लेखकों को रायल्टी ना देने का निर्णय। रोचक बात ये कि इसका उन रचनाकारों ने विरोध नहीं किया है, जिन्होंने प्रकाशन के लिए अपनी कृतियां दी हैं, बल्कि वाद-विवाद को आगे खासतौर पर राजस्थान के साहित्यकारों और पत्रकारों ने बढ़ाया।
रामकुमार सिंह
हाल में फ़िल्म `चुटकी बजा के’ का निर्माण करने के लिए चर्चा में आए युवा पत्रकार रामकुमार सिंह और संपादक-कवि डॉ. दुष्यंत ने कम्युनिटी साइट `फेसबुक’ पर एक ज़ोरदार बहस छेड़ दी। उनका कहना है—असल में क्रांति पाठक को सस्ती किताबों से नहीं होती। वो तो जमीन पर ही होती है। रामकुमार की चिंता है कि दिल के साथ दिमाग की भी माननी चाहिए, क्योंकि नुक्सान उठाकर प्रकाशक बचा नहीं रह सकेगा।
डॉ. दुष्यंत

संपादक-कवि डॉ. दुष्यंत ने मुफ़्त या सस्ते में साहित्य बेचने की ख़िलाफ़त करते हुए कहा कि जिन लेखकों ने अपने हक़ की बात नहीं की, उन्होंने नए लेखकों के लिए ठीक मिसाल भी नहीं पेश की। आख़िरकार, इस दौर में साहित्य और ज्ञान ही कौड़ियों के मोल क्यों बिके? इस तरह तो हम तकरीबन लुगदी किस्म के साहित्य को बढ़ावा देते हैं और पाठक की प्रतिक्रिया जानने की लेखकीय व्याकुलता का पता भी चलता है।
रामकिशन अडिग
छपास की अनंत भूख के चलते लेखकीय गरिमा ख़त्म करने वाले रचनाकारों से दुष्यंत नाराज़ हैं। वो राजस्थान के बड़े कवि नंदकिशोर आचार्य का हवाला देते हैं, जिनके मुताबिक, लेखक को पैसे के लिए नहीं लिखना चाहिए पर उसके लिखे का पैसा जरूर मिलना चाहिए। 
चित्रकार रामकिशन अडिग ने इस मुद्दे पर ख़ुशी जताई कि दस रुपये में वो अपने प्रिय लेखक को पढ़ पाएंगे, लेकिन रचनाकार के हक़ की बात पर उनका गंभीर हो जाना बताता है कि सौ रुपये में दस किताबों की योजना उन्हें भी पूरी तरह हजम नहीं होती।
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
योजना के पैरोकारों के पास भी ठोस तर्क हैं। विचारक ललित शर्मा मानते हैं कि गुणवत्ता की कसौटी पर तो बड़े प्रकाशकों की किताबें तक खरी नहीं उतरतीं, इसलिए इसको लेकर हो-हल्ला नहीं होना चाहिए। इसी तरह बुजुर्ग लेखक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने सवाल किया कि कितने लेखकों को कितनी रायल्टी मिलती है? इस तरह कम से कम लेखक को पाठक तो मिलेंगे। उन्होंने `अब तक उपेक्षित पाठक की परवाह करने वाले प्रकाशक की प्रशंसा करनी चाही’ वहीं प्रतिलिपि के संचालक ओमप्रकाश कागद ये कहने से नहीं चूके कि लेखक खुद अपनी रचनाएं बगैर रायल्टी के छपवाने को तैयार हैं,
तो ये उनका अपना फ़ैसला है। वैसे भी, लेखक और साहित्यकार में अंतर करना ज़रूरी है। लेखक उपभोक्ता और विक्रेता की शर्तों पर लिखता है।
इंटरनेट की दुनिया में साहित्य और प्रकाशन पर ये गंभीर विमर्श का एक अहम उदाहण है। बहस के दौरान ऑन डिमांड छपने वाली प्रतिलिपि पत्रिका से लेकर, लोकायत प्रकाशन के कर्मठ संचालक शेखर जी की सार्थक सक्रियता और लघु पत्रिकाओं में बिना पारिश्रमिक रचनाएं देने-ना देने तक के मुद्दे उठाए गए।
भीगे डैनों वाला गरुण
वर्चुअल संसार ही नहीं, बाहर की दुनिया में भी साहित्यकारों-प्रकाशकों की राय एक जैसी है। यूं तो, लेखकों ने खुद ही रायल्टी ना लेने का अनुबंध किया, लेकिन चर्चित रंग समीक्षक प्रयाग शुक्ल इसे सही नहीं ठहराते। वो मानते हैं कि शर्त कोई भी क्यों ना हो, लेखक की हक़मारी किसी कीमत पर नहीं होनी चाहिए। प्रयाग बताते हैं कि हाल में ही बच्चों के लिए उन्होंने एक किताब लिखी। जब उसे रॉयल्टी फ्री करने की बात कही गई, तो वो तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी—ऐसा अगले संस्करण से किया जाए।
कमोबेश ऐसी ही राय राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी की है। वो मानते हैं कि कीमत का संतुलन होना चाहिए। मुफ़्त या सस्ते के नाम पर लेखक को रायल्टी ना देना ठीक नहीं है। वो ये सवाल भी करते हैं कि जब कागज से लेकर बाइंडिंग तक का खर्च हम दे सकते हैं, तो रचना के मूल उत्स लेखक को क्यों नहीं?
अरुण माहेश्वरी
वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी की नज़र में लेखक और प्रकाशक, दोनों को अपना हक़ मिलना चाहिए। ऐसी योजनाएं सफल होनी चाहिए, क्योंकि इनकी नाकामयाबी से पाठकों और लेखकों के अलावा, प्रकाशन जगत का भी अपूर्णीय नुक्सान होता है। हिंदी के सुपरचित कवि और संवाद प्रकाशन के संचालक आलोक श्रीवास्तव की राय में, `योजना शुरू कर देना आसान है, उन्हें निभाना मुश्किल, इसलिए इस पर कुछ कहने का समय अभी आना बाकी है।’
प्रभात प्रकाशन के संचालक डॉ. पीयूष ने कहा कि मुनाफ़े की चिंता छोड़ भी दी जाए, तो किसी योजना के संचालन के पीछे तर्क पुख़्ता होने चाहिए। कई योजनाएं उत्साह में शुरू कर दी जाती हैं, लेकिन उनका भविष्य नहीं होता।
प्रकाशक की मंशा क्या है—प्रचार पाना, अति उत्साह, दिल से लिया गया फैसला या तर्क से, सोच-विचार कर की गई व्यापारिक गणना…इस सवाल पर सैकड़ों अंदेशों, उलाहनों और आलोचनाओं से घिरे मायामृग बताते हैं कि टाइपसेटिंग, डिजाइनिंग और प्रकाशन तक की व्यवस्था अपनी है, बहुत पहले से ऐसा काम करने का मन था, इसलिए कोशिश शुरू कर दी है। किताबें उचित मात्रा में बिकेंगी, तो लागत निकल आएगी…। वाद-विवाद और प्रतिवाद के स्वरों के बीच फ़िलहाल, इतना ही कहना ठीक होगा—आगाज़ तो अच्छा है, अंजाम रीडर जाने!
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(चर्चित पोर्टल प्रवक्ता.कॉम  http://www.pravakta.com/?p=13169 और मासिक पत्रिका ‘सोपानस्‍टेप’ से साभार)

Friday, September 10, 2010

दिल्ली हाट में धड़कता है देश का दिल…

नेटवर्क-6 <http://www.network6.in/2010/09/10/दिल्ली-हाट-में-धड़कता-है-द/> से साभार

पूरे भारत की तस्वीर किसी एक आईने में देखनी है…महसूस करनी है देश भर की बहुरंगी संस्कृति की धड़कन..निहारनी है कोलकाता से मुंबई तक, राजस्थान से बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों से लेकर चेन्नई तक की खूबसूरत कलाकृतियां…तो एक ही जगह आना काफ़ी है…ये है दिल्ली हाट…। देश का दिल है दिल्ली और यहां रहते भी हैं दिलवाले…लेकिन खुशदिल दिल्लीवालों का दिल धड़कता है दिल्ली हाट का नाम सुनकर।
वैसे, एक और ज़रूरी बात आपको बता दें…वो ये कि दिल्ली हाट में सिर्फ चीजें बनाई या बेची नहीं जातीं…यहां पर एक तरह से परंपरा को ही संजोकर रखा गया है…वो कला, जो संभाली ना जाती, तो नष्ट हो जाती…रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों में समाकर अब अमर हो गई है… फ़ैशन का हिस्सा बन गई है…
सबसे पहले चलते हैं एक स्टॉल की ओर…जहां आंध्र प्रदेश की तीन सौ साल पुरानी लेदर पपेट्री डिस्प्ले की गई है…यानी चमड़े से बनाई गई कलाकृतियां…। लेदर पपेट्री की कला तकरीबन तीन सौ साल पुरानी है…दादा-परदादाओं के ज़माने के इस आर्ट फॉर्म को लोग एकदम भुला देते…अगर आंध्र के हुनरमंद कलाकार इसे तरह-तरह की चीजों में बदल ना देते…मसलन…अलग-अलग डिज़ाइन और शेप की घड़ियां…जो वक्त भी बताएं और कलाकृति को घर में रखने की खुशी भी दें…। इन रंग-बिरंगी आकर्षक डिज़ाइन वाली घड़ियों को लेदर पपेट्री के फॉर्म का सहारा लेकर ही तैयार किया गया है…लेकिन कलाकारों ने परंपरा भी नहीं छोड़ी है। मसलन–रामायण से जुड़ी कहानियां और उनके पात्र पुराने तरीके से उकेरे ही गए हैं…।
.मधुबनी का नाम तो सारी दुनिया में मशहूर है…ये एक फोक फॉर्म है, जो घरों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनियों तक जा पहुंचा है…मैच स्टिक और बांस की मदद से बनाई जाने वाली मधुबनी पेंटिंग मोटे कागज़ पर तैयार की जाती है…और इसका तरीका भी बहुत ख़ास है…लेकिन इससे भी पहले ये जानकर आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा कि मधुबनी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रंग भी एकदम इको फ्रेंडली होते हैं…यानी सबके सब रंग कुदरत से ही चुनकर लाए जाते हैं…तो हो गया ना कुछ-कुछ शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब जैसा फॉर्मूला…
मधुबनी की चमक-दमक दिल को तरो-ताज़ा कर देती है, लेकिन ऐसा नहीं कि यहां सिर्फ चटख रंग हैं…इन पेंटिंग्स में ग्रेस भी खूब है…ओह…मधुबनी की बात करते-करते हम ये कहां आ गए…यहां  बहुत-से क्ले मग भी रखे दिखाई हैं…वाह सचमुच…मज़ेदार और रोचक अहसास है इन मग को देखना…इस्तेमाल करने में भी ये बेहतरीन हैं…इन क्ले मग की हैंडिल में जूट का उपयोग इन्हें यूनीक बनाता है…सो अलग।
मग ही क्यों…दिल्ली हाट में ऐसा बहुत कुछ है, जिसकी ख़ूबसूरती आंखों से उतरकर सीधे दिल पर असर करती है…जैसे…ये राजस्थानी राखियां…भाई-बहन के प्यार की अमर निशानी…शंख-सीपियों से सजे कलावा…ये सब रंगों का इंद्रधनुष पेश करते हैं…लाख की चूड़ियां पहनकर कौन-सी दुल्हन इतराने नहीं लगेगी…।
चूड़ियों, कलावे और राखियों का खूबसूरत समां हटा नहीं कि दिल लूट लेने के लिए सामने हाज़िर होते हैं लकड़ी से बने बॉक्स…सेरेमिक से तैयार ड्रेसिंग टेबल आइटम इसलिए भी अपनी ओर खींचते हैं, क्योंकि इनमें छोटी-छोटी, लेकिन ज़रूरी चीजें रखी-संभाली जा सकती हैं…और जब चाहा, इनमें से निकालकर देख लिया छोटी-छोटी खुशियों का बड़ा संसार एकदम महफूज है।
लकड़ी के बॉक्स देख लिए, तो मन करने लगा…क्यों ना कुछ ऐसी ही और चीजें देख लें, जो थोड़ी-सी बड़ी भी हों…हूं…पहेली नहीं बुझाते…हम बात कर रहे हैं…झूलों की, और फर्नीचर आइटम्स की…। ख़ैर, यहां तो और भी मस्त नज़ारा है…सावन आ चुका है और कुछ लोग झूला झूलने का आनंद भी उठा रहे हैं…यूं तो ये सजाने वाले आइटम्स हैं, लेकिन जिसे मौका मिलता है, वो यहीं पर झूला भी झूल लेता है…। ये फर्नीचर शॉप भी ग़ज़ब की है…। यहां बांस से बने तमाम आइटम्स डिस्प्ले किए गए हैं। टेबल, चेयर और, और भी बहुत-से ज़रूरी फर्नीचर खरीदने के लिए लोग यहां दूर-दराज से आते हैं…।
वैसे, एक बात पर आपने गौर किया? दिल-ओ-दिमाग को ही क्या, पूरे जिस्म को झुलसा देने वाली गर्मी पड़ रही है…छोटे-छोटे बच्चे प्यास से परेशान हैं, लेकिन दिल्ली हाट आने वालों की संख्या बिल्कुल कम नहीं हो रही है…एक के बाद, कहीं छोटे-छोटे बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ, तो कहीं ग्रुप में निकलीं लड़कियां…। यानी खरीदारी की खरीदारी और पिकनिक भी, साथ-साथ। देशी ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी अकेले और ग्रुप में इस बाज़ार का रुख करना नहीं भूलते।

दिल्ली हाट में सबसे ज्यादा स्टॉल या तो कपड़ों के हैं, या फिर कलाकृतियों के…वैसे, परिधान भी हैं एकदम खास…जिन्हें आम ज़ुबान में हम कहते हैं–ज़रा हटके। गुजराती ड्रेसेज़ की बात करें, तो तारीफ़ के लिए शब्द ढूंढे नहीं मिलते। पैसों के लिए पोटली…तो खुद के लिए लंहगा। यहां घर के लिए बेडशीट भी है, तो बाहर ले जाने के लिए तरह-तरह के झोले भी, जिन्हें साथ रखकर कॉलेज गोइंग गर्ल्स फूली नहीं समातीं। इन कलाकारों की कोशिश यकीनन काबिल-ए-तारीफ़ है…सोचिए तो, कितना बड़ा क़माल इन्होंने किया है। ये झोले पुराने ज़माने में इस्तेमाल किए जाते थे…लेकिन इन्हें ट्रेंडी बनाकर, नया स्टाइलिश लुक देकर इन कलाकारों ने इन झोलों को नए ज़माने के हिसाब से तैयार कर दिया…यानी कला भी बची रही और लोगों को सहूलियत भी मिल गई…नवरात्र के समय गरबा की धूम होती है और इस आयोजन में हर लड़कीचनिया चोली पहनना चाहती है…, तो इसकी खरीदारी का सबसे बेहतरीन ठिकाना है…दिल्ली हाट।
कपड़ों की बात खूब हो गई…थोड़ी-सी नज़र फिरा लेते हैं उड़ीसा की पटचित्र कला पर…लेकिन ये क्या…यहां पर नज़र जो डाली, तो हटाने का मन ही नहीं कर रहा…ये कला है ही इतनी आकर्षक…लुभावनी, आंखों को बांध लेने वाली…। इमली के बीज़ से gum बनाया, पत्थरों की मदद से घिसा, कॉटन शीट ली…दीए में आग जलाकर काला रंग इकट्ठा किया…और फिर बनाई एक लाज़वाब पेंटिंग। ऐसी मेहनत अब कहीं होती है? ऐसी लगन कहीं भी देखने को मिलती है?
ऐसी ही लाजवाब कला है टसर आर्ट। इस पर उकेरी गई राम राज्याभिषेक की तस्वीर दिल-ओ-दिमाग में इस तरह अंकित हो जाती है कि भुलाए नहीं भूलती। टसर आर्ट को बनाना बहुत मुश्किल होता है। ग़ज़ब का बैलेंस बनाकर कलाकार पहले स्केच तैयार करते हैं, फिर छोटे-छोटे ब्रश से उन्हें क़लर किया जाता है। इसी तरह ताड़पत्र पेंटिंग भी परंपरा को सुरक्षित रखने का अनूठा उदाहरण है…।
पुराने ज़माने में काग़ज़ का आविष्कार नहीं हुआ था। तब सभी ग्रंथ ताड़पत्र पर ही लिखे जाते थे…। अब वो ग्रंथ पूजाघरों में या फिर संग्रहालयों में ही नज़र आते हैं, लेकिन उड़ीसा के कलाकारों ने ताड़पत्र पर पेंटिंग बनाकर उस समय की याद को सुरक्षित रखा है…।
सच है, कलाकार की कल्पना की कोई सीमा नहीं होती, ना ही उसके कमाल की…अब इकतारा कलाकार को ही देख लीजिए। एक लकड़ी ली, दीया उठाया…तार लगाया और बन गया इकतारा…फिर क्या…हवा में घुलने लगी संगीत की मिठास…
संगीत की तरह ही मन लुभाती है पपेटरी कला…बोल री कठपुतली…गाना याद है…अगर हां, तो कठपुतलियां भी याद होंगी…तरह-तरह की कहानियां सुनातीं कठपुतलियां…यूं तो अब गांवों-कस्बों में पपेट शोज़ होने बहुत कम हो गए हैं, लेकिन दिल्ली हाट में कठपुतलियां मौजूद हैं। वो भी पुराने स्वरूप में ही नहीं। ये वाल हैंगिंग की शक्ल में भी आपको मिल जाएंगी…। पपेटरी आर्ट देखकर अपना रिच कल्चर तो याद आता ही है, मन खुशी से भर जाता है…ऐसे में बहुत-से लोग भले ही पपेट्स खरीदें नहीं, लेकिन वो इन लम्हों को क़ैमरे में ज़रूर कैद कर लेना चाहते हैं, ताकि जैसे ही मौका मिले…तस्वीर देखी और कठपुतली से मुलाकात कर ली…
सच है…तस्वीरों की भी अपनी अलग ही दुनिया है…तभी तो जो लोग दिल्ली हाट आते हैं…यहां की यादें तुरंत संजो लेना चाहते हैं…इस काम में उनकी मदद करते हैं कुछ नौजवान पेंटर…ऐसे कलाकार, जो पलक-झपकते ही उनकी तस्वीर तैयार कर देते हैं…। बस सामने खड़े हो जाइए, बैठ जाइए और सधे हुए कलाकार की उंगलियों में थमा ब्रश या फिर पेंसिल आपका स्केच काग़ज़ पर उकेर देगी…वैसे, तस्वीर बनवाने के लिए खुद जाना भी ज़रूरी नहीं है…अगर कोई दोस्त या परिवार का सदस्य साथ नहीं आ पाया है, लेकिन उसकी तस्वीर साथ में है, तो कलाकार के लिए उसका स्केच बनाना भी दाएं हाथ का खेल है…
पर…दिल्ली हाट गए और कड़े-ब्रेसलेट नहीं खरीदे, तो समझिए एक खूबसूरत मौका गंवा दिया…यहां बहुत-सी दुकानों पर किस्म-किस्म के कड़े डिस्प्ले किए गए हैं…कुछ अट्रेक्टिव लेदर बैग्स भी मिल जाएंगे।
बार-बार नज़र जाती है तरह-तरह के परिधानों पर। कश्मीर की पश्मीना शॉल से लेकर गुजरात की चनिया चोली तक…दिल्ली हाट में सारे देश की संस्कृति के रंग जैसे बिखरे पड़े हैं…रिंग लेनी हो या फिर इयरिंग तलाशनी हो…धागे से बनी खूबसूरत चूड़ियां पहननी हों…सबका ठिकाना दिल्ली हाट है…
वैसे, खरीदारी करने के लिए हाट-बाज़ार आने वाले मेहंदी लगवाने का मौका नहीं छोड़ते। कोई भी काम करने से पहले मेहंदी लगवाने की परंपरा ही रही है, वहीं दिल्ली हाट में कलाकारों ने इसे खूब अट्रेक्टिव बना दिया है…। वो तरह-तरह की डिज़ाइन बनाते हैं, जिसे लोग अपने हाथ पर चाव के साथ लगवाते हैं…और मेहंदी ही क्यों…बाल गुंथवाने का पुराना शौक भी यहां परवान चढ़ता है…बच्चे-बूढ़े और जवान…सब कलाकारों के हाथों का हुनर पाकर अपनी जुल्फें सजा लेते हैं…
ख़ैर, खरीदारी, फोटोग्राफ़ी और साज-सिंगार सब हो जाए, फिर भी अगर संगीत और नृत्य का आनंद ना लिया जाए, तो सैर अधूरी रहेगी…तो चलते-चलते ज़रूर मिल लीजिएगा राजस्थान के मशहूर कच्छी घोड़ी नृत्य के कलाकार से…
(वैधानिक चेतावनी और संदेश…दूरदर्शन के लिए लिखे गए एक कार्यक्रम की स्क्रिप्ट की अविकल प्रस्तुति…। सरकारी माल है, कृपया टीपिए नहीं…

Tuesday, September 7, 2010

क्यूंकि आज शिक्षक दिवस नहीं है





एक नज़ारा…

- राजस्थान के अजमेर जिले के विजयनगर स्थित बड़ा आसन गांव के निजी स्कूल में छोटी-सी बात पर शिक्षक ने छात्र से ईंटें उठवाईं और फिर जमकर पीटा
- एक कला विद्यालय के छात्र की पेंटिंग्स जला दी गईं, परिणाम–भविष्य का ख़ूबसूरत कलाकार ‍विक्षिप्त हो गया…

और ये राह भी…

- गरीबी से जूझ रहे एक बच्चे की शिक्षक ने मदद की, उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया…आज वही छात्र इंजीनियर है…
- पहली बार क्लास में ना बोल पाने वाले छात्र की हिचक ऐसी दूर की कि वो अब एफएम चैनल में रेडियो जॉकी है…

टीचर-स्टूडेंट के रिश्तों में बदलाव की वज़हें हैं ख़ास, इन्हें समझना भी है ज़रूरी

चौथाई सदी गुज़र गई होगी अब तो…जब मैं तीसरी-चौथी क्लास का स्टूडेंट रहा होऊंगा…जाड़े की एक थराथराती सुबह, कोहरे से दो-दो हाथ करते हुए जैसे ही प्राइमरी स्कूल के भुतहा लगने वाले कमरे में पहुंचा, बिना किसी दुआ-सलाम, हाल-चाल के हाथ पर फटाक से स्केल बज गई…बड़े हीरो बने घूम रहे हो, होमवर्क करके नहीं लाए हो ना…। ये थे घिर्राऊलाल…। नाम तो कुछ और ही होगा, लेकिन बच्चों को घसीट-घसीटकर (अवधी में घिर्राकर) पीटते थे, इसलिए उन्हें अपन सब के सब घिर्राऊलाल ही कहने लगे थे…
और इसके बारह साल बाद…बीए में सचमुच छैलाबाबू बनने के समय, एक दिन जब एक्स्टेंपोर कंप्टीशन में ज़बान लड़खड़ा गई, पांव कांपने लगे, अल्फाज़ दिमाग का साथ छोड़, हाथ छुड़ाकर भाग निकले, तो सामने से बस एक मुस्कान तैरती हुई आई और सारा काम बन गया…ये मुस्कराहट थी शैलेंद्र संभव की…हिंदी टीचर…ख़ैर, जब शील्ड को माशूका की तरह सीने से लगाए हॉल से बाहर निकला, तो मिठास से सना एक ही वाक्य कानों तक पहुंचा…ये हुई ना बात! डरते क्यों हो मेरे मिट्टी के शेर…। मस्त रहा करो।
अब मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं, ना ही मेरे ये दोनों टीचर किसी भी पद्मश्री, श्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित गुरु कम नेता हैं, जो आप ये दास्तान और सुनना चाहें…, लेकिन मेरे जैसे लद्धड़ (बोले तो कमज़ोर) और घिर्राऊ मार्का सख़्त व शैलेंद्र जैसे ममतामयी शिक्षक पूरी हिंदी पट्टी के शैक्षणिक जगत के ज्यादातर चेला-गुरु परंपरा के प्रतीक हैं…, यानी एक नुकीले पत्थर की तरह ज़ोर-ज़बर में यक़ीन करने वाला, तो दूसरा–मिसरी घोलकर शिष्य को सही राह पर ले जाने वाला…।
यूं, ये सवाल उठ सकता है कि गुरु की याद पांच सितंबर को ही क्यों आती है? पूरे साल क्या इनकी ज़रूरत नहीं होती, मन में, दिमाग़ के किसी कोने में मास्टर जी की इमेज क्यों फ्लैश नहीं होती…? सो दिन विशेष पर ही किसी की बात क्यों हो, पूरे समय उनकी महानता-काम की चर्चा क्यों ना की जाए, ये बड़ी बहस का मुद्दा है और फ़िलहाल, इसमें ना फंसते हुए मैं तो यही कहूंगा–गुरु, तभी राह दिखा पाते हैं, जब वो बड़े भाई जैसे भरोसेमंद और मज़बूत हों…ऐसे गुरु अंधकार से बाहर नहीं निकाल पाते, जो गुरु घंटाल होते हैं, ना ही ऐसे मास्टर साहब, कोई राह दिखा पाते हैं, जो बस नाज़ुक दोस्त की तरह हां में हां मिलाते हैं…।
सो आप कहेंगे, मटुक छाप गुरु क्या हैं? और वो शाहरुख की कौन-सी फ़िल्म थी, शायद–‘मैं हूँ ना’, जिसमें वो साहब सुष से लव-लेक्चर सुनना चाहते हैं…तो ऐसों के बारे में फ़िल्मियाना अंदाज़ में ही डॉयलॉग सुना दें–ये सब गुरु जैसे प्रोफेशन पर धब्बा हैं, लेकिन इतने से तो हल निकलने वाला नहीं है…। फिर कहें क्या…समझें क्या…। समझने वाली बात ये है कि जैसी सोसायटी है, लोग हैं, रिश्तों का उलझाव है, वैसे ही आजकल के गुरु भी हो गए हैं।
वैसे भी, मास्टरी सबसे सुविधाजनक प्रोफेशन मान लिया गया है, जहां रहकर कोचिंग, ट्यूशन, छुट्टियां जैसी सौगात आसानी से हासिल की जा सकती है, वहीं जब चाहें तब पॉलिटिक्स करने निकल पड़ें। यक़ीन नहीं होता, तो देश के कई बड़े नेताओं को देख लीजिए…जो टीचर थे, या फिर अब भी हैं…लेकिन आराम से एमएलए, एमपी बन रहे हैं।
…अब उठता है बड़ा सवाल…हमें ऐसे ही गुरु चाहिए थे, जो टीचिंग जैसे नोबेल प्रोफेशन को अपनी कुंठाएं शांत करने, ख्वाहिशें परवान चढ़ाने में इस्तेमाल करें? ऐसे में प्रतिप्रश्न भी खड़ा होगा–क्या ऐसे ही स्टूडेंट होते हैं, जो अपनी टीचर को प्रपोज़ करने का मौका भी नहीं छोड़ते। सवाल बहुत हैं, कन्फ्यूजन भी हज़ार हैं, लेकिन इन सबका जवाब वही है–हर पेशा और पेशेवर सोसायटी के उलझाव से अछूता नहीं है और उसका असर ही टीचिंग जैसे प्रोफेशन पर भी दिख रहा है…। और हल–वही, टीचर बड़े भाई जैसा ही हो।
हिंदी साहित्य में जिन नौजवानों ने धमकदार हस्तक्षेप किया है, उनमें विनीत कुमार का नाम खास है, तो लगे हाथ उनकी बात सुन लेते हैं। चर्चित ब्लॉगर विनीत कुमार किसी एफएम चैनल पर दिन भर चली एक बकवास का हवाला देते हुए अपने ब्लॉग पर निजी स्कूल की टीचर का एक्सपीरिएंस सांझा करते हैं–बच्चे कैसे पहले से कई गुना स्मार्ट हो गए हैं, ऐसे बहाने बनाते हैं कि आप चाहेंगे कि आपको भी ऐसे ही बच्चे मिलें…। बीते बरस के टीचर्स डे पर विनीत को निजी रेडियो ने ऐसा-ऐसा धमाल सुनाया कि उन्हें जान तेरे नाम का गाना…माना कि कॉलेज में पढ़ना चाहिए…रोमांस का भी एक लेक्चर होना चाहिए…याद आ गया…। बात बस विनीत की ही नहीं, जो बताते हैं कि आजकल बच्चे (यानी हर उम्र के छात्र-छात्राएं) कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हो गए हैं। वो टीचर को एक सिम्पैथी बॉक्स की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, हर युवा के दिमाग में ये सवाल पनपने लगा है कि प्राइमरी से स्कूल और फिर कॉलेज तक जाते हुए टीचर का रंग-रूप-चेहरा किस क़दर बदले, कितना बदले और ये रिश्ता कैसे परवान चढ़े…कैसा हो?
गुज़रे साल दस्तक के 41वें अंक में राजेश्वरी की एक कविता छपी थी–शिक्षक! मेरे बच्चे को रट्टू तोता मत बनाना / उसे अक्षर बताना / शिक्षक! मेरे बच्चे को लूट की तरकीब मत बताना… आज वो बहुत याद आ रही है…क्योंकि ये कविता नहीं, चिंता है…हर पिता-मां की, जो स्कूल-कॉलेज में टीचिंग के गिरते स्तर और शिक्षक-स्टूडेंट संबंधों के उलझाव में उलझा है।
आइए, इसी सिलसिले में कुछ ख़बरों पर नज़र डाल लेते हैं…
- मोहाली के नया गांव में 10 साल की एक लड़की के यौन शोषण के आरोप में स्कूल का वाइस प्रिंसिपल गिरफ्तार।
- गुस्साई भीड़ ने भांडुप के किंग जार्ज हिल्स स्कूल के आरोपी अंग्रेजी अध्‍यापक की पिटाई की…शिक्षक ने छात्राओं के अश्लील एमएमएस बनाए थे…
- धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में छात्राओं के साथ शिक्षकों ने छेड़छाड़ की
और हां…कुछ आंकड़े भी देखने की ज़रूत है…
- 19 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में केवल एक टीचर है।
- 10 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।
- 25 फ़ीसदी प्राइमरी स्कूल टीचर अपने काम से ग़ैरहाज़िर रहते हैं।
हो सकता है, पाठक कहें कि बात तो रिश्तों की हो रही थी, जो आमतौर पर स्कूल (यानी हाईस्कूल) और कॉलेज में (ग्रैजुएशन, पीजी) के दौरान पनपते-बढ़ते हैं, फिर प्राइमरी पढ़ाई के समय हुए क्राइम की बात क्यों, उसके आंकड़े क्यों…इन पर नज़र डालना इसलिए ज़रूरी है…क्योंकि शुरुआती स्तर पर जो विचलन शुरू होता है, वही पूरे पारिदृश्य पर असर डालता है।
सरकार की महत्वाकांक्षी योजना शिक्षामित्र पर ग्रहण लग चुका है। गांवों के पंच-सरपंचों के रिश्तेदार इस योजना में ऐसे टीचर बन रहे हैं, जिन्हें स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं, इच्छा नहीं है। ऐसे ही देश के हज़ारों गांवों-कस्बों में अब भी दलित टीचर्स को उचित सम्मान नहीं मिलता। यूपी के बहुतेरे स्कूलों में मुख्यमंत्री मायावती की उस योजना के परखचे उड़ा दिए गए हैं, जिसमें वो दलित महिला के हाथों का पकाया भोजन मिड डे मील में परोसने की ताकीद कर चुकी हैं…।
हमारा मंसूबा, मंतव्य और इरादा ये नहीं कि राजनीतिक-सामाजिक छुआछूत और समीकरणों की व्याख्या करें, लेकिन समस्या की जड़ें तलाशनी तो ज़रूरी हैं। अगर शिक्षक स्वार्थी, अपराधी और आलसी नज़र आ रहे हैं, तो क्या इसकी सारी वज़ह उनका अवसर-पसंद, अवसरवादी होना है? बेशक नहीं!
ढर्रे पर थमी, रटी-रटाई, नोट्स बनाने, पुर्जियां तैयार करने और कॉपी में कट-पेस्ट कर ज्ञान-वमन करने की पद्धति पर चर्चित लेखक महेश पुनेठा एक लेख में सवाल खड़ा करते हैं–स्कूलों को सृजनशीलता की कब्रगाह तो नहीं बना रहे हैं? हालांकि वो भी मानते हैं कि आज के माहौल में ना शिक्षक के लिए सृजनशील होने की परिस्थितियां हैं और ना बच्चों के लिए…पुनेठा का तर्क भी वही है कि बाजारवादी व्यवस्था मनुष्यों के पृथक्करण और अमानुषीकरण के जरिए उनकी सृजनात्मक शक्तियों को कुंठित कर रही है…।
डरा-धमकाकर जिस स्कूली शिक्षा की नींव बच्चे के कोमल मन पर पड़ती है, वो कॉलेज तक पहुंचते हुए अगर शिक्षक को भी काहिल और अवसरवादी या फिर प्रेमी-प्रेमिका समझने, मानने की समझदारी पैदा कर दे, तो इसमें किसका दोष कहेंगे? शिक्षक मटुकनाथ जैसे होने लगें? छात्राओं का एमएमएस बनाने लगें, तो क्या टीचिंग के पेशे पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं? साफ़तौर पर ये बात माननी होगी कि बहुत-से शिक्षक अब गुरु नहीं रहे…लेकिन उन्हें ऐसा बनने-बनाने की प्रेरणा और फ़ोर्स तरक्की-पसंदगी के नाम पर भटके हुए समाज से ही मिल रही है। उन अभिभावकों की भी कम ग़लती नहीं, जो अपने बच्चों को किसी भी क़ीमत पर रट्टू तोता बनाकर, इंजीनियर और डॉक्टर की शक्ल में ढाल देना चाहते हैं। ऐसे ही कुछ पुराने लोगों का भी कम योगदान नहीं, जो शिक्षक रहते हुए बा
की सबकुछ बन गए, भले ही टीचर नहीं रहे…। शिक्षकों को दोष देते हुए हम ये क्यों भुला देते हैं कि हम बच्चों को मास्टर बनने की प्रेरणा नहीं देते।
हिंदी फ़िल्में ही देख लीजिए, शिक्षकों के एक से एक डिब्बामार्का पोट्रेट मिल जाएंगे। यहां या तो गुरु भगवान है या फिर फटीचर। फिल्मी टीचर लाचार-कमज़ोर, आदर्शवादी बातें करते हैं या कुछ आगे बढ़ जाएं, तो हिटलर की छवि लेकर नज़र आएंगे। ‘मोहब्बतें’ और ‘मेजर साब’ में अमिताभ बच्चन कड़क हैं, लेकिन ‘कसमे वादे’ और ‘ब्लैक’ में आत्मीय गुरु का चरित्र है। अब इसमें सिर्फ ब्लैक ऐसी फ़िल्म है, जिसमें देवराज सहाय सरीखा चरित्र ही गुरु के रूप में हर स्टूडेंट चाहेगा…और हां, आमिर खान जैसा ‘तारे जमीं पर’ का टीचर…। फ़िल्मी टीचर की बात करें, तो ‘स्वदेस’ में गायत्री जोशी, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ और थ्री ईडियट्स में बोमन और ‘कल किसने देखा’ में ऋषि कपूर के किरदार भी याद आते हैं…तीनों अलग-अलग तरह के।
ये सबकुछ जानने के बाद समझना मुश्किल नहीं कि टीचर के बारे में सोचते वक्त स्टूडेंट के चेहरे पर मुस्कान कम क्यों उभरती है, खीझ या फिर किसी और किस्म की लालसा ही जगह क्यों पाती है? बच्चे भी जानते हैं, ये गुरु भगवान वाली किस्म के नहीं हैं और अध्यापक भी समझ चुके हैं कि बात उतनी सीधी-सादी और गौरवमयी नहीं रही, जितनी पुराने ज़माने में थी।
इन हालात में शिक्षक दिवस मनाने का भी तभी मतलब निकलेगा, जब टीचर अपने पेशे की ज़िम्मेदारियां समझें, छात्र उनका यथोचित सम्मान करें, समाज भी समझे कि गुरु पेड सरकारी नौकर भर नहीं है…और टीचर बदलते वक्त की ज़रूरत के मद्देनज़र छात्र-छात्राओं के साथ दोस्त जैसा नहीं, पर बड़े भाई जैसा व्यवहार ज़रूर करें।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और एक पत्रकारिता विद्यालय में स्क्रिप्ट राइटिंग विशेषज्ञ के रूप में पढ़ाते भी हैं)


chandidutt

  चण्डीदत्त शुक्ल :  ये आलेख जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की साप्ताहिक परिशिष्ट हमलोग 
   <http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/05092010/Humlog-Article/17836.htmlमें और              पोर्टल... नेटवर्क-6 <http://www.network6.in/2010/09/06/क्यूंकि-आज-शिक्षक-दिवस-नह/> पर भी आ चुका है।



Sunday, September 5, 2010

तुम जन्म लेना बार-बार



जब तक कायम रहे सांवली त्वचा की पृथ्वी, तुम आना बार-बार, ताकि उपज सकें अंकुर
आना, जिससे तपते-नाराज़ सूरज की नज़र बन जाए गुलाबी, हो शीतल
गाना, ताकि संग-संग गुनगुना उठे बचपन
लहराना आंचल, गर्म हवाओं के बीच गुलाबी हो जाए वसंत का मौसम...
तुम जन्म लेना बार-बार, ताकि कवि लिखें कविताएं और गूंजें उनमें छंद..
तुम लौटना  हर बार, ताकि जीवन जी सके खुद को जीवंतता के साथ...
बिछोह के ज्वार में फेनिल सागर बने निर्मल, रहे रूमानी...