कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Tuesday, February 17, 2009

आज फिर


आज फिर बहुत उदास हूं
आज फिर तुमसे नाराज हुआ
आज फिर एक शाम आई
आज फिर तुमसे दूर हूं
आज फिर तुमसे ही की तुम्हारी शिकायतें
आज फिर मांगी तुमसे सफाइयां
आज फिर नहीं हुआ तुम पर यक़ीन
आज फिर तुम्हें जता दिया अविश्वास
आज फिर तुम पर ही किया भरोसा
आज फिर तुम्हारे ही सीने से टिका दिया सिर
आज फिर तुमसे ही मांगा सहारा
आज फिर कह रहा हूं
आज जैसा आज फिर कभी न आए

Monday, February 2, 2009

लौट आओ, ताकि लौट जाए उदास शाम


आज फिर बस स्टैंड पर उतर आई उदास शाम
मूंगफली के छिलकों का ढेर किसी के पांवों तले चरमराया नहीं
पांच रुपये की 100 ग्राम जलेबियां इंतज़ार करती रहीं अपने ग्राहक का
मच्छर भिनभिनाते रहे
ताज़ा-ताज़ा पटाई गई गर्लफ्रेंड्स के साथ टाइपास ब्वायफ्रेंड एमएमएस देखते-दिखाते रहे
कुछ गे, बेरोजगार, भिखारी और घर से भगाए बूढ़े भी थे बस स्टैंड पर
और थी गहरी खीझ, दुख और प्यार
पर तुम न थे
लौट आओ, ताकि बदल जाए बस स्टैंड
वो गंदगी न दिखेगी
न आसपास का बिखरापन
मूंगफली के छिलकों का चरमराना रहमान सा संगीत लगेगा
जलेबियां छप्पन भोग-सी
गे-ब्वाय-गर्लफ्रेंड अमर प्रेमी, बेरोजगार-भिखारी और निराश्रित बूढ़े करुणा जगाएंगे
आवारा-हांफते कुत्तों को भी पुचकारने का मन करेगा
यक़ीन मानो, धूल भरे बस स्टैंड पर भी लगेगी हवा
सावन को छूकर आई युवती के स्पर्श की तरह।

साथी...कहां हैं वो चित्र


साथी
कहां हैं वो चित्र
जो बुनने थे तुम्हें
भरने थे जिन रेखाओं में रंग
देखता हूं वो उंगलियों से छनकर काग़ज़ों तक उतर नहीं पाईं
मन के काले गड्ढों में गहरी हो रही और कालिख
क्या यही थी रेखाओं की नियति
उलझनों में तब्दील हो जाना
अलमारी पर तह किया रखा रह गया है कैनवॉस
फ्रेम की लकड़ियों पर लग रही दीमक
साथी
मन को तो नहीं लगा घुन
बचाकर रखना ज्वार
उफान मारे तो संजोना
उलटने, छलकने न देना
आंसू बनकर
पता है ना
तुम्हारे रंग छंद बनकर उतरेंगे कविताओं में
शब्द बन बुनेंगे कहानियां
उम्मीद फिर जन्म लेगी
मारेगी किलकारियां
खूब ख़ूबसूरत होगा कल
बस, संभालो अपने आपको
छोटी तुनकमिज़ाजी से कहीं बड़ा है प्यार

फिर चलना उस ओर, जिसका नहीं है पता...


वसंत की वो उदास शाम
रफ़्ता-रफ़्ता रफ़्तार भरती बस पर
ओस से भीगी सड़क देखते हुए
अश्कों से नहाया चेहरा
ज़मीन की ओर झुकाए
यूं चल देना
तय मंज़िल की ओर
पीले चावलों की चाह भर नहीं
कहीं न कहीं पीली पड़ गई हैं
गुलाबी मन की अंखुआई चाहतें
इस भटकन से
नहीं मिलेगी राह, न मंजिल
अच्छा हो
फिर कटाएं उस बस का टिकट
जिसके बोर्ड पर नहीं पढ़े
गंतव्य के निशाँ
नहीं जानते
कहां रुकना, कहां है उतरना
बस में न हो जब राह
तभी तो है चलने का मतलब
तब नहीं पड़ता पीला मन
बच पाता है मन का अंखुआयापन
खिला रहता है
दिल का गुलाब

बस इतना ही
बाकी उस बस में
जो अब तक राह से दूर है
चलेंगे फिर उसमें
कालीबंगा, या फिर ऋषिकेश की अधूरी यात्राओं पर
नहीं...
तय कैसे हो सकती है
उस प्रेम की मंज़िल
जिसकी सचमुच कोई नियति नहीं होती
न अधूरा रहना, न पूरा

फिर चलेंगे
एक अनजाने सफर पर
इसलिए
लौट आओ
वही अकुलाता मन लेकर
जिसमें उसकी तलाश है
जिसका पता नहीं

Tuesday, January 13, 2009

मंटो के कंधे पर बंदूक रखकर महबूबा के दिल पर गोली


पता नहीं, ये जगत को दीवाना बना देने वाले सुपर-दीवाने मंटो को श्रद्धांजलि है, या मेरे ऊपरी तले के एकदम खाली हो जाने का सुबूत...पर जो है हाज़िर है। ख़ासे पढ़े-लिखे लोगों के राइटअप्स से मार-मूरकर (नकल करके) इधर-उधर की बकवास लिख डाली है। अब महबूबा के दिल पर गोली चले या न चले, मंटो को --- न--- चाहने वाले तिलमिला भर जाएं, यही मक़सद है...जैसा भी लगे, बताएं ज़रूर...


मियां मंटो, सलाम...अश्क की ज़ुबानी तुम्हें दी गई पहचान—मेरा दोस्त, मेरा दुश्मन की तर्ज पर मैं भी तुम्हें एक संबोधन दे रहा हूं—मेरे महबूब, मेरे रक़ीब। महबूब इसलिए, क्योंकि तुम्हारी क़लम, और हां यार, तुम्हारी शख्सियत से मुझे मोहब्बत है। पहले कम थी पर जैसे-जैसे मेरी समझदारी पक्की हुई (ऐसी ग़लतफ़हमी मुझे है, तो है सही) तुम और, और ज़्यादा प्यारे लगने लगे हो। (तुमसे चिढ़ता भी जबर्दस्त हूं यार) रक़ीब इसलिए, क्योंकि जिससे मुझे पक्की और ज़ोरदार मोहब्बत है, उसके सपनों में तुम आते हो...उस पर भी तौबा ये कि तुम्हें लेकर देखे गए उसके ज़बर्दस्त गर्मागर्म सपनों पर कोई सरकार, हुकूमत या रियासत मुक़दमे भी नहीं चलाती। मेरा फ़ेवर कोई नहीं करता मियां। तुम्हें ज़रूर जेल की चक्की पिसवाने के ख़्वाब तमाम हुकूमतों, अफ़सरों और रिसालों के एडीटरों ने दिखाए, तुम डरे भी थे ना एक-आधबार। तुम्हारी मौत के बाद थोकभाव में लिखे गए संस्मरणों से तो यही ख़ुलासा होता है। पर क्या करूं, मेरा महबूब, तुम्हें अपने ख़्वाबों का एक ज़बर्दस्त हिस्सा बनाए बैठा है। तुम्हीं क्यों...गुरुदत्त भी मरने के बावज़ूद उसके ख़्वाबों में आता है...। और भी न जाने कितने, पर तुम शायद सबसे ज़्यादा क़रीबी फैंटेसी-पुरुष हो। इस बारे में मैं ही नहीं जानता, बाक़ियों को भी इन वाकयात की मालुमात है, तभी तो उसे कुछ लोग तुम्हारी क़िताबें गिफ़्ट करते हैं और उस पर लिखते हैं—उस लड़की को, जो मंटो की दीवानी है। (हालांकि मोहतरमा किसी ऊल-जुलूल सपने से नाइत्तफाकी जताती हैं, वो अलग बात है...)
ख़ैर, पढ़े-लिखे समझदार लोग इस विस्तार को विषय से भटकना भले कहें पर मैं जानता हूं कि तुम न कहोगे। भला कहोगे भी क्यों, खुद भी तो शान से हमेशा भटकते रहे (समाज की निगाह में, जिसे तुमने कुछ भी तवज्जो न दी)।
नाराज़ न होना, मैं तुम्हारी पुण्यतिथि (पता नहीं, पुण्य नाम की किसी चीज़ पर तुम्हारा यक़ीन था भी या नहीं और तारीख़ों और वक़्त को तुम अपने हिसाब-क़िताब (जो तुम करते ही नहीं थे, इससे तो तुम दूर थे ही) में शामिल रखते थे या नहीं) से कदरन एक हफ़्ता पहले ही तुम्हें याद कर रहा हूं. इसमें भी ग़लती तुम्हारी महबूब (एकतरफ़ा) की है, जिसने मुझे बताया था कि मेरा रक़ीब, यानी तुम 11 जनवरी 2009 को ही अल्ला को प्यारे हुए थे. अल्ला को प्यारे होने वाली बात तो तुम्हें कुबूल ही होगी, क्यूंकि तुम भी मज़हब में न सही, आस्तिकता में यक़ीन रखने वाले थे और हां—क़माल की बात, कॉमरेड भी थे।
सो अब बात पहले तुम्हें मेरी श्रद्धांजलि की हो जाए। मैं हिंदी के दो बड़े इलाक़ाई अख़बारों में लंबे अरसे तक नौकरियां कर चुका हूं, इसलिए एडवांस में श्रद्धांजलियां लिख लेने में मुझे कोई गुरेज़ नहीं है। हमारे पुराने अख़बारों में तो नहीं, लेकिन सुना है कि हिंदी-अंग्रेजी के कई मीडिया हाउसेज़ में तो जैसे ही कोई आला दरज़े का सिनेमा वाला, सियासत वाला या फिर कोई भी अव्वल नंबर वीवीआईपी बीमार होता है, उसके स्मृतिशेष तैयार करा लिए जाते हैं। एक-आधी बार गड़बड़ियां भी हो चुकी हैं। पता चला कि फलां श्री मरे भी नहीं और उन्हें छापेवालों ने श्रद्धांजलि दे दी। खैर, तुम तो तब के मर चुके हो, जब न हमारी महबूब पैदा हुई थी, न हम ही जन्मे थे, इसलिए तुम्हें श्रद्धांजलि लिख देने में कोई प्रॉब्लम नहीं है, न किसी मुक़दमे वगैरह के चलने का ख़तरा।
वैसे भी मियां, ये कोई प्रोफेशनल राइटअप नहीं है, इसलिए न तो मेरे मौजूदा मीडिया हाउस को कोई दिक्कत या शिकायत होगी, न तुम्हें। तुम्हें हो भी तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम वैसे भी फुल प्रोफेशनल आदमी थे। मेहनताने पहले, अफ़साने बाद में। मियां सच कहूं, तो तुम्हारी लिखी कहानियां पढ़कर ग़ज़ब की खीझ, फ्रस्ट्रेशन और चिढ़ होती है। अरे, कहां से ले आए थे इतना जादू...य़हां तो साला कुछ लिखते हैं, पढ़ते हैं और मंत्रमुग्ध होने की कोशिश करते हैं कि गधी महबूबा तुम्हारी एक छोटी-सी कहानी सुनाकर जैसे सारे कपड़े उतार देती है, असलियत बता देती है, औक़ात याद दिला देती है। तुम्हें मुकदमे मिले और हमें कई ज़िला-मोहल्ला लेबल के ईनाम पर तुम्हारी एक-एक लाइन यार हमारे और हमारे जैसे तमाम दो-कौड़ी के राइटरों के सैकड़ों पन्नों पर भारी है। लगता है, जैसे पन्नों पर हमने अलफाजों की उलटी कर दी हो और तुम्हारे शब्द ऐसे महक़ते हैं, मानों तुमने क़लम में स्याही नहीं, इत्र भर रखी हो।
तुम कहोगे कि तुमने तो बू और मुतरी जैसी सड़ांध भरी कहानियां लिखी हैं, अरे यार, इतराओ नहीं...हम जैसों और हमसे बहुत ऊंचे-ऊंचे दरजे वाले पुरस्कृत पत्रकारों का महकउआ लेखन तुम्हारी साफ़तौर पर की गई शैतानियों के आगे बहुत बचकाना है...देखो, हमारे सच की दाद दो मियां मंटो।
वैसे, मियां सच तो तुम भी जबरदस्त बोलते थे, लिखते थे। इतना कड़वा सच कि जैसे मुंह में किसी ने मिर्च का पाउडर घोल दिया हो। अमां कबीर बनने को किसने कहा था। अच्छा हुआ, जल्दी चले गए, नहीं तो सारे पढ़े-लिखे क़िताबी समझदारों को नंगा करके छोड़ते। माना कि मुल्क में तवायफ़ों की बहुतायत है और वहां जाकर सब अपने कपड़े उतार देते हैं, लेकिन इस सबको सामने लाना ज़रूरी था क्या...। एक लेखक साहब से साभार----गुण्डों-मवालियों, शराबियों, कोठेवालियों, वेश्याओं, दलालों और उन्मादियों----का महिमामंडन करके क्या पा लिया तुमने...सभ्य समाज को परेशान ही किया ना...।
हिंदुस्तान के दो टुकड़े करने वालों को टोबा टेक सिंह पढ़वाओगे, तो वो तुम्हें मुल्क में रहने देंगे क्या। अब तुम्हीं बताओ, घाटन की तुलना एक आईएएस की बेटी से कर डाली। खोल दो में बेटी के कपड़े उतरवा दिए. जिसने सच्ची मोहब्बत की, उसे चुगद बता दिया। ये भी कोई बात हुई क्या। क्या पंडित, क्या मौलवी, जिसे पाया, उसकी पगड़ी झटक दी।
दंगाई लुटेरे को भी करामात कहानी में कुएं का पानी मीठा कराने वाला पुण्यात्मा बना दिया। यार, हमारी कब्र पर तो कोई दीए नहीं जलाएगा, पक्का यक़ीन है।
यार तुम्हारी ज़ुबान बहुत तुर्श थी। अब घाटे का सौदा को ही लो..."उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया हैं हमारे ही मज़हब की लड्की थमा दी। चलो, वापस कर आएं।...जैसी कहानी लिखने का क्या मतलब है, अब दंगाई भी तो हमारे भाई हैं, वो पाकिस्तान से थोड़े ही आए हैं।
अच्छा करती थीं मम्मियां, जो बच्चों के हाथ में ''सआदत हसन मंटो'' की कहानियों की क़िताब देखकर दो टुकड़ों में बाँटतीं और फेंक देतीं कूड़े में पर चाहने वाले भी ऐसे-ऐसे, जो क़िताब चिपकाकर पढ़ने बैठे जाते। बहुत बुरा किया मंटो...एक पूरी की पूरी पीढ़ी बिगाड़कर रख दी...जो टी-टोटलर होती, दिन भर पूजा करती, लोगों का गला काटती राम-राम कहकर, उसे सुधरने....से पहले ही सारी सच्चाई बता दी। ऐसा भी करते हैं कहीं। अब तुमने तो अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी ली, लेकिन बाकी तो 10 से पांच वाली नौकरी वाले थे, उनका भी ख़याल किया होता। अरे, घर चलाना ही मुश्किल होता है, सच की तलाश करने कौन जाए।
तुमने जब मुंह खोला, क़लम चलाई, सब आस्थावानों के दिल पर छुरियां चल गईं...अब बताओ, ये क्या हुई लिखने की वज़ह---तुम्हारे शब्दों में...मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है.
किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा. इस बज़ाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा.
मतलब साफ़ है, दूसरों की सुकून भरी ज़िंदगी (चाहे कितने ही पाप करके उन्हें सुकून मिला हो) तुम्हें हज़्म नहीं होती थी। ख़ैर, अब मेरी महबूबा के सपनों में आना छोड़ो, चाहे जहां जाओ पर उसके ख़्वाबों में न आओ...रहम करो। मुझे भी चैन से सोने दो और बाकियों को भी।

Saturday, January 10, 2009

Friday, November 21, 2008

पूर्वोत्तर की परवाज (वृत्तचित्र स्क्रिप्ट)

एक बार फिर चौराहा के पाठकों, सहयोगियों के लिए पुराना माल पर नई बोतल में हाज़िर है...ये एक डॉक्यूमेंट्री के लिए बहुत साल पहले लिखी गई एक स्क्रिप्ट है लेकिन नए कंटेंट और तथ्य जरूर शामिल किए गए हैं...आपकी अदालत में, आपकी प्रतिक्रियाएं जानने के लिए। एक वैधानिक सूचना जरूर...बहुत पहले ही ये स्क्रिप्ट रजिस्टर्ड है, इसलिए इसकी कॉपी-पेस्ट या किसी भी तरह का प्रयोग बिना पूर्व अनुमति के प्रतिबंधित है...

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पूर्वोत्तर की परवाज


Ext / sunrise / आकाश में गोल घूमता परिंदों का झुंड, बांसुरी और जलतरंग

नील गगन के सीने पर अठखेलियां करते मतवाले पंछी जब भरते हैं उड़ान, तो उन्हें कोई सरहद नहीं रोक पाती. एक देश से दूसरे देश वे भरते हैं परवाज और लोग मंत्रमुग्ध हो उन्हें देखते रह जाते हैं.

Cu / आकाश में देखता कोई लड़का / bansuri
काश...पंख होते तो हम भी उड़ पाते. यूं तो, पंछी परदेसी नहीं होते, लेकिन परदेस से भारत का रुख जरूर करते हैं.

पूर्वोत्तर की वादियों का Low angle shot / jaltarang
भारत में भी खासतौर पर पूर्वोत्तर का. पूर्वोत्तर में बहुत ज्यादा एंडेमिक स्पीसेज पाए जाते हैं, बल्कि दुनिया में सबसे ज्यादा यहीं.

Ext / shot of activities in nest / sehnaee
एडेमिक स्पीसेज, यानी ऐसे परिंदे, जो जन्मते यही हैं, दम बाकी रहने तक रहते भी यहीं हैं. यही वजह है कि परदेस से आए पंछी तो यहां जमा होते हैं पर पूर्वोत्तर के परिंदे कहीं का रुख नहीं करते. यहीं पर तो दो साल पहले पंछियों की दो नई प्रजातियों का पता चला है. पक्षी विज्ञानी मानते हैं कि पूर्वोत्तर में अब भी कई अनजाने, अजनबी परिंदे छिपे--राह भटके होंगे, जिन्हें पक्षिविज्ञान की किताबों में फिलहाल तक दर्ज नहीं किया जा सका है.

दूरबीन से देखता कोई बर्ड वाचर
शेष देश की तुलना करें, तो पूर्वोत्तर में पंछी निहारन वाले यानी बर्ड वाचर्स बहुत ज्यादा नहीं आते.


Camera track in वादियां, जंगल, वाटर बॉडीज

ये भारत का ऐसा इलाका है, जहां दुर्लभ परिंदे मिल जाते हैं मोड़-मोड़ पर, डगर-डगर पर. वाइड विंग्ड डक, बेंगाल फ्लोरिकन, डार्क रम्प्ड स्विफ्ट और मार्स बेबलर से मुलाकात करनी हो, तो पूर्वोत्तर को ही मुकाम बना लें. तरह-तरह के परिंदे इन इलाकों में रचे-बसे रहते हैं, तो इसकी वजह है . पूर्वोत्तर इन चिड़ियों का चंबा है. यहां की फिज़ाओं में रोमांच है, घर का घरेलूपन है और हैं उनके ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी हर चीज, जो कुदरत ने उन्हें बख्शी है.

Low angle shot of a rain forest
घने जंगल के दरख्तों की डालियां सूरज को अंदर झांकने भी नहीं देतीं, ऐसे में चिड़े-चिड़ी और उसके बच्चों के लिए इससे अधिक प्राकृतिक वास स्थान और कहां मिले?

Zoom out shot of himalay and birds
हिमालय का पूर्वी किनारा और ब्रह्मपुत्र की कल-कल धारा, नदी की तलछट में है वो सबकुछ, जो जीने के लिए जरूरी है, फिर चिड़िया अपना चंबा छोड़ यहां से कहां और क्यों जाए? पूर्वोत्तर में ही वे सब जगहें हैं, जहां सबसे ज्यादा बारिश होती है. हर दिन भीगा हुआ पर यही वो जगह है, जहां धरती सूरज की किरणों से नहाई भी रहती है, यानी बारिश और धूप का साथ, साथ-साथ. अगर आप परिंदों को निहारने के शौकीन हैं, तो इससे बेहतर जगह सारी दुनिया में शायद ही मिले. हर तरफ फैले पंछियों का कुनबा आपको अपने पास बुला ही लेगा और आप थम जाएंगे उनके नजदीक.

Cu of adjujent and various shot of adjujant
एक तरह के सारस एड्ज्युटेंट को भी एकदम क़रीब से देखना हो, तो ये दुनिया की सबसे अच्छी जगह है.

Milestones to kaaziranga, welcome board of kaaziranga and track in kaaziranga

गोहाटी में दो राष्ट्रीय अभयारण्य हैं-काजीरंगा और मनास. राजधानी गोहाटी से २१७ किलोमीटर दूर असम का सबसे पुराना अभयारण्य काजीरंगा ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी किनारे 430 स्क्वायर किलोमीटर इलाके में बना है. यहां मिलने वाले गैंडों के लिए काजीरंगा मशहूर है, जो बड़ी-बड़ी हाथीघास के बीच मस्त होकर घूमते हैं.लेकिन इन जंतुओं के बीच, जगह बना इनके साथ कुछ परिंदे भी रहते हैं. ये कहते हैं, हमें भी देखिए, बहुत छोटे हैं हम, आसानी से दिखते भी नहीं, लेकिन ३५० प्रकार के हैं और रंग तो करोड़ों हैं हमारे.
पंछियों के पीछे दौड़ते-भागते, कुलेल करते जानवर...एक-दूसरे के साथ दिल-लगी का इससे खूबसूरत और मौजूं उदाहरण और क्या होगा. वैसे तो, बेंगाल फ्लोरिकन बहुतायत में मिलती हैं पर आसानी से दिखती नहीं. अब आपको उन्हें तलाशना ही है, तो हाथी की सवारी करनी होगी...उनके पीछे-पीछे जाने, उनके मुकाम तलाशने के लिए. कई बार एक बार की हाथी-सवारी से भी काम नहीं चलता. वैसे, ये तरीका और भी कई किस्म के परिंदों से आपकी मुलाकात करा सकता है,


Cam track in grass like searchin some habitate
तरह-तरह के बेबलर. इस तरह लंबी-लंबी घास में छिपी चिड़ियों का परिवार अपना ठिकाना छोड़कर उड़ जाता है, इसलिए हमें दिख जाता है उनका कारवां, नई मंजिल की तरफ रफ्ता-रफ्ता बढ़ते हुए.

Pan on woodland
पूर्वी छोर वुडलैंड से घिरा है, यानी ऐसे जंगल, जिनके दरख्तों में पत्तियां कम और लकड़ियां होती हैं ज्यादा. इस वुडलैंड में दरख्तों की टहनियों पर अपना और बच्चों का पेट भरने के लिए कीड़े ढूंढ़ते कठफोड़वे मिल जाएंगे जगह-जगह.

Mor / ext / In kaaziranga एलिफैंट सफारी पर चढ़ते लोग और घूमते

यूनेस्को ने काजीरंगा को १९८५ में विश्व धरोहर साइट घोषित किया. इससे एक दशक पहले १९७४ में काजीरंगा को वन्यजीव अभयारण्य बनाया गया. इस अंडाकार पार्क में कोई चारदीवारी नहीं है. एक तरफ है ब्रह्मपुत्र का दक्खिनी किनारा तो दूसरी ओर मोरी डिफ्लालू रिवर.कई साल पहले इसे संरक्षित वन बताते हुए यहां शिकार पर रोक लगा दी गई थी. दलदली इलाका, एलिफैंट घास, उष्णस्थल पर गहन वन...हाथियों के लिए ये सबसे मुफीद जगह थी और साथ-साथ परिंदों के लिए भी.

W shot of yuhina, चोंच cut to eye zoom out various activities, smiles view shot of yuhina

काज़ीरंगा में एक दिलचस्प और खूबसूरत चिड़िया यूहीना से आप मिल सकते हैं. ये वही पंछी है, जिसे हम फार्मसन यूहीना के नाम से जानते रहे हैं। छोटी-सी, गीत गुनगुनाने वाली चिड़िया। मूलत: ताईवानी, ये चिड़िया बहुत खूबसूरत है. यूहीना का बदन रंगों से भरपूर है और काली-भूरी छटा इसकी खूबियां बढ़ा देती है। चिड़िया का पिछला हिस्सा और पूंछ आलिव ब्राउन रंगों से सजा है। बाकी यूहीना की तरह ये चिड़िया भी उजली आंखों वाली है, ठीक बैबलर परिवार की सदस्य की तरह.
ये प्रजाति कम घने जंगलों में पाई जाती है. यूहीना काफी फुर्तीले, आकर्षक और थोड़े शर्मीले परिंदे के रूप में सामने आते हैं. इनकी आवाज, इनकी पुकार भी है खासी सुरीली-लगता है, वे त्वी-मी-चिउ कह रहे हों, जिसका मतलब है-वी मीट यू. ताईवान यूहीना को आप कई बार चेरी के पेड़ों से लटके देख सकते हैं पर ज्यादातर समय ये चाइनीज ट्यूलिप के फूलों से लिपटे पाए जाते हैं. बात इनके खानपान की करें, तो जान लीजिए कि इनका भोजन है कीड़-मकोड़े और फूल. इनका प्रजनन समय है मई से जून के बीच.

Cu of legs lift up and full shot of parrot bill
Cu of viewer eyes. Cut to florican

ऐसा ही पंछी है पैरेट बिल. छोटे-छोटे पंछी पर पूंछ बड़ी. झुंड में रहते हैं पैरेट बिल. अधिकतर घास का बीज ही इनका भोजन है, जैसा कि इनके नाम से भी जाहिर है.
यहां आपका साथ देने के लिए हाजिर होगा एक और मस्त परिंदा, बेंगाल फ्लोरिकन. ओटिडेड परिवार के इस सदस्य की धमक आप उत्तर प्रदेश से असम तक महसूस कर सकते हैं. असम में इन जनाब का नाम है--उल्लू मोरा. पुरुष बेंगाल फ्लोरिकन के सिर से गर्दन के बीच काले रंग के बाल होते हैं और पेट के पास भी. परों पर सफेद धब्बे इसकी खूबसूरती पर ग्रहण नहीं लगाते, बल्कि और बढ़ा देते हैं. मादा फ्लोरिकन पुरुष पंछी से बड़ी होती है और उसका रंग धुंधली भूरी आभा लिए हुए. गले के किनारे तथा निचले शरीर में पतली, गाढ़ी लकीर होती है। आमतौर पर बंगाल फ्लोरिकन चुप ही रहते हैं पर कोई इन्हें छेड़ दे, तो धातु टकराने जैसी आवाज के साथ शोर मचा देते हैं.



Cam tracking on grass and flying florican

अधिकतर सुबह-शाम या फिर देर शाम तक दिखाई देने वाले फ्लोरिकन लंबी-लंबी बड़ी-बड़ी घास या फिर छुपी हुई झाड़ियों में रहते हैं.

Track in दलदली इलाका / various shots of adjunct
ऐसा ही एक और परिंदा है--तकरीबन १२२ सेंटीमीटर का लेसर एडजेंट. गाढ़े काले रंग के इस सारस की गर्दन और सिर पर धब्बों के निशान मिलते हैं. कुदरती या इंसान के बनाए दलदली इलाकों में ये सारस बहुतायत में मिल जाएगा. अपने, बच्चों और परिवार के साथ. बड़े दरख्तों पर ये घोंसले बनाते हैं पर रहने के लिए इन्हें दलदल ही भाता है. जंगलों के खत्म होने, पेड़ों की जगह कालोनियां बन जाने की वजह से धीरे-धीरे ये सारस भी हमारा साथ छोड़ रहे हैं और इनकी तादाद लगातार कम हो रही है.

2bird watchers एकसाथ दूरबीन से देखते / various shots pid
अब एक और साथी की बात, ये है ग्रेट पिड. अपनी तरह के पंछियों में सबसे ज्यादा संख्या में भारत में ही मिलते हैं ये साहब.ये एक बड़ी चिड़िया है, जो सौ से एक सौ बीस सेंटीमीटर लंबी है. इसकी पूंछ भी है खासी लंबी, यानी छत्तीस इंच तक.आमतौर पर इनका वजन साढ़े छह पौंड के आसपास होता है.

Shots of keede-makaude
इनका प्रारंभिक भोजन फल ही है.यूं कीड़े-मकोड़े खाकर भी ये पेट की आग बुझा लेते हैं.वैसे, ग्रेट पिड कभी अकेले नहीं घूमते. जब ये चलते हैं, तो दो से चालीस पंछियों का समूह इनके साथ कदम से कदम मिलाता है. सलाम इन्हें, इनके प्यार के लिए भी. ये जो जोड़ा बनाते हैं, उसमें कई साल तक साथ रहता है.

Nest of pid
मादा ग्रेट पिड एक बार में एक से दो अंडे देती है, यानी परिवार नियोजन का खयाल भी.घर बनाते वक्त मादा पेड़ पर ही रहती है और मिट्टी संजोती है, जबकि नर पिड घर बनाने की बाकी सामग्री संजोता है.छह से सात हफ्ते में इनका घर हो जाता है तैयार. अफसोस की बात कि घर बनने के बाद थकान से नर पिड मर जाता है. वैसे, बहुत-से बाकी परिंदों की तरह ग्रेट पिड की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है.
इनके रहने की जगहों पर इंसानी नजर पड़ गई. खानपान की दिक्कत भी बढ़ी, सो ग्रेट पिड भी कम होते जा रहे हैं...

Low angle shot of उड़ान भरकर कहीं बैठते हुए ईगल
काजीरंगा में पल्लास फिश ईगल भी अपनी ओर खींच लेता है.बड़ा, भूरा परिंदा, जिसका खानदान कजाकिस्तान और मंगोलिया से लेकर हिमालय और उत्तरी भारत तक फैला है.इसमें दोनों तरह के पंछी शामिल हैं. बाहर से आए हुए और यहां बड़े-बूढ़े हुए भी. सफेद रंग से सजा चेहरा, हल्का भूरा शरीर और बगलें गाढ़ी भूरी.पूंछ का रंग ज़ुदा...यानी काला. आमतौर पर इनकी लंबाई ७२ से ८४ सेमी के आसपास है.

मछलियों के shots
साफ पानी की मछलियां खाकर चटखारे मारते किसी परिंदे को देखें, तो हो सकता है कि वो पल्लास फिश ईगल ही हो.

नाव पर बड़े-बड़े बैगों के साथ आते हैं सैलानी
मस्त-मस्त सर्द मौसम से गरमी की अगुवाई के महीनों, यानी नवंबर से अप्रैल के बीच काज़ीरंगा आने का सबसे मुफीद समय है. वैसे भी, अप्रैल मध्य से अक्टूबर मध्य तक अभयारण्य बंद कर दिया जाता है. बारिश के मौसम में ब्रह्मपुत्र अपने किनारे छोड़ उफन पड़ती है. घास-फूस, खानपान सबकुछ बाढ़ के हवाले हो जाते हैं और पशु-पंछी अपना आशियां छोड़कर चले जाते हैं छह महीने की छुट्टी मनाने.

Ext / mor / Focus on Migratory birds / jaltarang

ओरिएंटल हनी, बज़ार्ड, ब्लैक शोल्डर्ड काइट, ब्लैक काइट, ब्राह्मणी काइट, ईगल, ग्रे-हेडेड फिशिंग ईगल, हूलॉक गिज्बॉन, इबिस, हेरोन, हिमालयन ग्रेफान...ये कुछ परदेसी पंछी हैं, जो अपना जाड़ा हिंदुस्तान में ही बिताते हैं। हां, कई यहीं बहुत अरसे तक भी रह जाते हैं। कई साइबेरियन क्रेन आती तो समूह में हैं पर उन्हें चोट लग जाए या फिर वे बीमार हो जाएं, तो रुककर सुस्ताने भी लगती हैं। कई दफा ऐसा भी होता है कि पंछी आया तो हौसले के साथ पर इतना वक्त बीत गया कि वो लौटने की हि मत नहीं जुटा सका.


गांव में सैलानियों के गीत गाते अलग-अलग शॉट्स
गोहाटी से सड़क मार्ग के जरिए काजीरंगा आया जा सकता है, चाहें तो ब्रह्मपुत्रा की लहरों से अठखेलियां करते नइया और खेवइया का सहारा लेते, `हो मेरे मांझी...´ गुनगुनाते हुए भी तय किया जा सकता है अभयारण्य तक सफर. कुदरत की इस सौगात का मु य द्वार असम पर स्थित कोहोरा में है. यहां के लिए गोहाटी, जोरहाट, तेजपुर और ऊपरी असम से हर दिन बसें चलती हैं. रेल से आना हो, तो निकटवर्ती स्टेशन 75 किलोमीटर दूर है, नाम है-- फुर्केटिंग. और अगर हवाई जहाज से पानी हो मंजिल, तो गोहाटी तक आ सकते हैं. अभयारण्य से 97 किलोमीटर दूर नजदीकी हवाई अड्डे जोरहाट तक भी आया जा सकता है।

रेस्ट हाउस में आते सैलानी
अभयारण्य के एकदम पास बड़े होटल नहीं हैं। यहां ठहरना हो, तो जंगलात महकमे या पर्यटन निगम के रेस्ट हाउस ही मिल सकेंगे. वैसे, वाइल्ड ग्रास लॉज, बोनहाबी रेजॉर्ट, लैंडमार्क वुड्स,लोरा रेजॉर्ट,अरण्या रिजॉर्ट, काजीरंगा रिजॉर्ट तथा कालीबॉर रिजॉर्ट में भी आप रुक सकते हैं.

हाथी सफारी पर घूमते सैलानी / pan to Arial view of kaaziranga

आमतौर पर गैंडों व हाथियों के लिए मशहूर काजीरंगा पार्क में कभी छिपे,कई बार फुदकते और बहुत दफा सामने आकर मन मोह लेते इन परिंदों की सूची लंबी है और इनसे मिलने का सुख भी मस्ती से सराबोर कर देता है. मन में गूंज सी उठती है...काश, पंख होते हमारे भी, तो हम हर सरहद को तोड़कर नील गगन में उड़ते. कोई बात नहीं...नहीं हैं पंख पर पंछी तो हैं हमारे पास...जो जब आते हैं खुशियां लाते हैं...आइए, हम भी खुशियों के इस डाकिए को प्यार करें, उसे संजोए रखें, संभाले रहें.

Monday, November 10, 2008

नमकीन फिल्में

नमक
मुंह में भर देता है नमकीन स्वाद
और हाथों में?
फालतू बात नहीं है यह
नमक बनाने वाले हाथों में हो जायें ज़ख्म
तो फिर?, जलेंगे ना वो पोर-पोर?
नहीं, उनके ज़ख्म नहीं जलते
घावों में नमक असर नहीं कर पाता
सुना है
नमक बनने वाले अब अपने ज़ख्म सी चुके हैं
देर रात उन्हें सीडी पर दिखाई जाती हैं
नमकीन फिल्में