कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Wednesday, February 15, 2012

मैं माटी का गुड्डा...

- चण्डीदत्त शुक्ल # 8824696345

मिट्टी...! क्या है मिट्टी?
धूल, बालू, पानी का मेल, कुदरत की एक अंगड़ाई... या महज खेल... या फिर करिश्मा है मिट्टी? क्या है इस मिट्टी में, जो इसका नाम सुनने भर से हम झूम उठते हैं। आंखों के सामने उतराने लगते हैं कितने ही खूबसूरत नज़ारे... मिट्टी से खेलना, मिट्टी से बने घरों में रहना, मिट्टी की खुशबू, मिट्टी में रमना और आखिरकार, मिट्टी में मिल जाना... कुछ तो है...। जानना चाहेंगे, क्या है मिट्टी का जादू... मिट्टी और कुछ नहीं... दरअसल, हम खुद हैं मिट्टी। ये तो सब जानते हैं, कोई नई बात नहीं है, बस एक बार फिर दोहरा दूं... पांच तत्वों से बना है हमारा शरीर और इसमें मिट्टी है एक अहम तत्व। तभी तो कहते हैं, मिट्टी का शरीर था, मिट्टी में मिल गया।

हमारे लोक जीवन का एक-एक जर्रा इसी मिट्टी से बना है, बंधा है। मिट्टी की ज़िंदगी से रिश्तेदारी भी अनूठी है, तभी तो एक तरफ पानी बरसता है... मिट्टी गीली होती है... हर तरफ सोंधी महक बिखरती है। एक ओर सूखी धरती की प्यास बुझती है, तो दूसरे किनारे होता है हमारा मन और जैसे सांस के ज़रिए, नस-नस में इसी मिट्टी की खुशबू समा जाती है। मिट्टी की खुशबू कुदरती है। सुबह-सबेरे ओस पड़ते समय कभी मिट्टी से बातें करके देखिएगा। तन-मन और निगाह... सब खिल उठेंगे। सारी दुनिया की सब खुशियां मिट्टी से ही तो जुड़ी हैं। मिट्टी के घर, मिट्टी के चूल्हे, मिट्टी के दीए और मिट्टी वाले खेत... है न मज़ेदार बात।

बचपन के सुनहरे दिन याद आते हैं... आँगन, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले घर में हर जगह मिट्टी नज़र आती थी। तब सीमेंट के फर्श नहीं होते थे। बड़ी-बड़ी टाइल्स वाले छोटे-छोटे, कबूतरों के दड़बों वाले घर... वो दिन कुछ और ही थे, घर भी बड़े-बड़े और आंगन तो कई बार उससे भी बड़ा। पूरे आंगन को मिट्टी से ही लीपते थे सब। बच्चे मिट्टी से सारा बदन रंग लेते। सूखी मिट्टी, गीली मिट्टी। हाथों में और चेहरे पर। कपड़ों में और एक-दूसरे पर मिट्टी का छिड़काव... खेलकूद कर घर लौटते तो मौसम चाहे जाड़े का हो या गरमी का, नहाना ही पड़ता... लेकिन बदन में मिट्टी के निशान और इसकी खुशबू बची ही रह जाती।

दूर तालाब से गीली मिट्टी लाकर कई बार चूल्हा बनाया और घर-गृहस्थी के खेल खेले थे। आंगन के पास कई पौधे रोपे थे। उनमें से कई अब दरख्त बन गए। फल उगा रहे हैं। पीढ़ियों का मुंह मीठा कर रहे हैं। आज मिट्टी की बात करते हुए लोक जीवन के तमाम रंग याद आ रहे हैं। तब कोई संस्कार मिट्टी को मेहमान बनाए बिना पूरा नहीं होता था। शादी-ब्याह में गीली मिट्टी से बनाई गई वेदी और हंसी-ठिठोली के मौके से लेकर होली तक मिट्टी का मेल इतना गहरा था कि उसके रंग अब भी जहन में बाकी हैं। यही दौर था, जब सावन में झूले झूलते हुए हवा से होड़ होती थी और मिट्टी से मिलकर मौसम का हालचाल बताती हुई गांव की मिट्टी बालों में सन जाती थी।

खैर, अब दिन बदल गए हैं। सिनेमा में भी गांव बाकी नहीं बचा है। अब मदर इंडिया के "गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे…" जैसे गीत भी सुनने को कहां मिलते हैं। दीवाली में भी मिट्टी के दीए नहीं जलते। मिट्टी में खेलना, उसकी बातें करना असभ्यता की निशानी समझा जाने लगा है। इस सबके बावजूद एक अच्छी खबर है। सुना है, मध्य प्रदेश के खंडवा में मिट्टी से इत्र बनाया जा रहा है। अच्छी खबर है। चलिए, सेंट की बोतल में ही सही, मिट्टी बाकी तो बचेगी। कैसा हो, जो हम अपनी ज़िंदगी मिट्टी की ये महक बनाए रखें। आप करेंगे न ऐसा?

Sunday, February 5, 2012

एक आंसू गुनगुनाता रहा उम्र भर...

कहानी...

-    चण्डीदत्त शुक्ल


मुस्कान ही हमेशा सब कुछ नहीं कहती। आवाज़ में हर बात बंधी नहीं रहती। एहसास आंसुओं के जरिए भी बयां होते हैं। उनकी भी होती है जुबान। बेहद असरदार। मन को गुदगुदाती खुशी हो या हताशा के पल, आशा की आहट हो या फिर आशंका की धमक – आंखें अक्सर छलक उठने को बेकरार रहती हैं। ऐसी ही है निहारिका, जिसे प्रेम मिला, साथी मिला और फिर सब छूट गया। उसके साथ हर वक्त रहे आंसू, जीवन संगी बनकर और जब वह सबसे ज्यादा निराश थी, भीगी आंखों ने ही समझाया – आने वाला कल होगा बहुत खूबसूरत... बस, आस न छोड़ो... ये एहसास एक बार फिर से उसकी आंखें नम कर गया। हो भी क्यों न, आंसुओं की जुबान बे-आवाज़ बहुत जोर से सुनाई देती है...



रात का दामन ठिठुरा हुआ था। लगातार गूंजने वाली, जागते रहो की आवाज़ कोहरे से डरकर कंबल में कहीं गुम हो गई। दिशाओं ने मुंह पर चुप्पी की पट्टी बांध ली। कड़वाहट भरी नज़रें पलकों में ढकने की कोशिश करते परिंदे अलसाते रहे। हाथों की पहुंच से बहुत दूर, निगाह के नजदीक, माथे के ऊपर तारों की बारात उमड़ने लगी। एक के बाद एक कर, इठलाते तारे आते और फिर छुपन-छुपाई खेलने लगते, मद्धम-सी चमक बिखेरकर। कढ़ाई से सजे किनारे वाली एक सफेद चादर नील में डुबाकर किसी ने आसमान पर उछाल दी। ब्लैक कॉफी से भरे मग की खाली होती सतह देख निहारिका बुदबुदाई – सो जाओ कि रात बहुत गहरी है, काली है... पर नींद का नाम-ओ-निशान तक नहीं था। मॉनिटर भले बंद था, लेकिन सीडी चल रही थी। एसडी बर्मन टीस बिखेरते हुए – मोरे साजन हैं उस पार...मैं इस पार...। तभी मोबाइल चहका – सोईं नहीं अब तक? तुम्हारे कमरे में खुदकुशी के सारे सामान मौजूद हैं न!
मल्हार का संदेश पढ़ निहारिका को गुदगुदी सी हुई। अगरबत्ती सुलगने के आखिरी कगार तक पहुंचकर थम चुकी थी, लेकिन महक ऐसी, ज्यूं बहार ने दरवाजे पर ताजा-ताजा दस्तक दी हो। निहारिका नए-नए प्रेम में थी, अंखुआ ही रहा था उसका और मल्हार का प्रेम। दूसरे दिन की शुरुआत के ऐन पहले, इस पहर, उसके घर से आठ सौ किलोमीटर दूर, किसी और ही शहर में मौजूद है इस वक्त मल्हार, पर दोनों कितने जुड़े हुए हैं — यही सोचते हुए, हंसते-हंसते जाने कैसे छलक उठे निहारिका के नयन। बिना कुछ कहे, भीगी आंखों ने बयां कर दिया सब हाल!

प्यार सबको होता है न कभी-कभार। जब-जब ये आता है, दुनिया में कुछ और बाकी नहीं बचता। दिल की लगी से निकलने के बाद भी कहां कुछ शेष रहता है, लेकिन निहारिका को कहां होश था। रात यूं ही गुजरती रही। मल्हार के संदेश पढ़ते और जवाब में बार-बार कुछ लिखते-मिटाते हुए। कॉफी खत्म हो चुकी थी, लेकिन यादें अंतहीन हैं। एक सिरा टूटता तो दूसरा उभर आता।
`बहुत ब्लैक कॉफी पीती हो तुम, देखना काली हो जाओगी', कभी मल्हार ये कहता तो अगले ही पल ये – `थोड़ी चीनी डाल लो, मुझसे नहीं पी जाती तुम्हारी बदसूरत कॉफी'। निहारिका नाराज होती, इससे पहले ही खिलखिलाहट की घंटियां बजाने लगता – `अच्छा, अच्छा! अब रंगभेद की नीति पर लेक्चर मत शुरू कर देना। सॉरी-सॉरी। याद आ गया, गोरा-काला कुछ नहीं होता... और ये भी कि तुम्हारे प्रिय भगवान कृष्ण श्याम रंग के हैं। चीनी नहीं तो अपनी लंबी अंगुलियां ही कॉफी में घोल दो, मीठी हो जाएंगी।' निहारिका बेसाख्ता हंस पड़ती और साथ ही उंगलियों से पलकों की कोर टटोलने लगती — गीली जो हो गई होतीं तब तक, निगाहें उसकी। मल्हार बोलता – `अपने आंसू जमीन पर मत गिरने देना, ये मोती टूट जाएंगे।' क्या कहती निहारिका, बस इतना सा ही तो – `धत! एकदम फिल्मी!'

ऐसा हरदम ही होता। निहारिका के बैग में दो जोड़ी रुमाल हमेशा मौजूद रहते। पर्मानेंट जुकाम की पेशेंट है वो। आंखें और नाक पोंछती हुई, न...न, रोती नहीं थी, पर मल्हार हंस देता – `इनसे मिलिए, एकता कपूर के सीरियल्स की बड़ी बहू। इनका हंसना-गाना, खाना-पीना, सब आंसुओं के साथ होता है।'
बस, ऐसी ही है निहारिका। जिसकी जो मर्जी, सोच ले। उसको शर्म नहीं आती। बुक्का फाड़कर, मजलिस के बीच भी, क्लास रूम में, जब चाहे, जहां जी करे, रो देने वाली। उसकी समझ में नहीं आता कि हंसना-रोना कौन-सी अभद्रता की बात है, जो उसके लिए `एक्सक्यूज मी, एक्सक्यूज मी' का रट्टा लगाती फिरे, इसलिए `मिस इमोशनल' का तमगा लग जाने से भी वो नहीं डरती।
दिन गुजरते रहे, साल-दर-साल, मल्हार और निहारिका का प्रेम मजबूत होता गया। प्यार में कंट्रोल की स्टियरिंग अपने हाथ में कहां होती है। मेहंदी हसन की आवाज़ में अक्सरहा सुनते हुए ग़ज़ल — प्यार जब हद से बढ़ा सारे तक़ल्लुफ़ मिट गए, आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गए,  दोनों नजदीक-दर-नजदीक आते गए।

***
निहारिका ने सीने में दम भर सांस कैद कर ली
और फिर फूंक बाहर निकाली। डायरी पर जमा धूल पूरी तरह बेदखल होकर मेजपोश के कोनों में सिमट गई। कितने ही दिन गुजर गए। निहारिका और मल्हार अब पति-पत्नी हैं, लेकिन दोनों का साथ रहना अब भी मुमकिन नहीं हो पाया है। अलग-अलग शहरों में नौकरियों में ज़िंदगी खर्च करते हुए, बस तनहा रातें हैं और ब्लैक कॉफी के भरते-खाली होते कप। डायरी के पहले ही पन्ने पर मल्हार ने लिख दी थी एक इबारत ...

रोना नहीं, कभी न रोना

यादों की पछुआ हवा निहारिका का तन-मन सिहरा गई। याद आए, वे पल, जब प्रेम पर पढ़ाई-लिखाई का बोझ भारी पड़ने लगा था। रात-रात भर मल्हार संदेश पर संदेश भेजता रहता और उसकी अंगुलियां टेक्स्ट बुक के पन्ने पलटने में मुस्तैद रहतीं। एक्जाम के बाद, बहुत अरसा गुजरने पर जब दोनों मिले तो मल्हार चीखने वाले अंदाज में शिकायतें सुनाता रहा। वो खोई रही, गुमसुम और फिर वही हुआ... उसकी आंखों में पानी ठहरा हुआ था। छलछलाया हुआ... टपक पड़ने को बेकरार। ये देखकर मल्हार हंस दिया – `मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का / उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले'। निहारिका क्या कहती। बोली – `शब्दों में प्रेम करना तो कोई तुम से सीखे मल्हार।'

***
प्रेम के दिन भी कितने गिने-चुने होते हैं। कोटे से मिले राशन की तरह,
खर्च होने की उतावली में। उनकी शादी तो हो गई, लेकिन कितनी ही मुश्किलों से जूझते हुए। मां बचपन में ही रूठकर दुनिया से चली गई थीं। पिता ने नन्ही नीहू को बहुत-से अरमानों के साथ बड़ा किया था। विजातीय लड़के से शादी की बात सुनकर उन्होंने धैर्य की पूंजी खो दी थी। वे गुस्से की कैद में थे। मां के फोटो की रंगत तांबई हो चुकी थी। उदास निहारिका एक बार फिर, आसमान से बिना कुछ कहे, बातें करती चुपचाप लेटी थी, तभी एक तारा टूटा, बेआवाज़। निहारिका ने दुआ के लिए हाथ जोड़ लिए। पलकें बंद थीं और आंखों के आंचल में सिमटा था, वही सदा का साथी – आंसू।

भोर में सबसे पहले पिता का ही स्वर सुनाई दिया। उन्होंने पुकारा – नीहू! उनकी पुकार में गुस्सा न था, बस आशंका और दुख के कुछ निशान थे। आंखों में पूरे बदन का लहू इकट्ठा था, पर मुंह से आवाज़ का कतरा भी न निकला, टपका सिर्फ एक आंसू। निहारिका ने हिम्मत कर उन्हें फिर से मल्हार के बारे में बताया। उसने पिता की हथेलियां कसकर थाम ली थीं। पिता ने सारी बात सुनी और फिर उसके थरथराते हाथों पर एक बूंद आंसू टप से गिरा। निहारिका ने पलकें बंदकर बदले में भी आंसू ही लौटा दिए।

***

डायरी के पन्ने पर एक और रात टंकी थी, लेकिन तारों से भरी नहीं। नहाकर ताजादम हुई एक धुली रात। मल्हार के साथ ज़िंदगी शुरू करने की गवाही देती हुई। बड़ी-बड़ी आंखें खोलकर मल्हार को देखते हुए निहारिका बोली – `ये ख्वाब है या मेरी ख्वाबगाह, जहां मैं आ गई हूं?'  मल्हार ने कहा – `न्यू पिंच' और उसके कंधे पर चुटकी भर ली। ततैया ने डंक मारा हो, ऐसे चिंहुक पड़ी निहारिका और आंख में फिर लहलहा उठी एक नदी।
`गीजर के पानी से नहाकर आई हो क्या, तुम्हारे आंसू बहुत गुनगुने हैं?'
अपने पोरों पर मल्हार की आंख से रिसा हुआ एक आंसू थामती हुई निहारिका गुनगुनाई – `और तुम्हारे आंसू इतने नमकीन क्यों हैं? अरब महासागर का सारा नमक एक ही में सिमट गया लगता है। इसमें ज़िंदगी के सब दुख घोल लिए हैं क्या?
दूर कहीं एक दीवाना रेडियो पर भूले-बिसरे गीत सुन रहा था।

***

बस, इतनी-सी थी उनकी कहानी? नहीं... ज़िंदगी बहुत लंबी होती है, सो उन दोनों की भी थी।
कभी साथ रहते हुए, कहीं बरसों तक, बस मिलने की चाह में गुजरती हुई। एक दिन, मल्हार ने हमेशा के लिए निहारिका का साथ छोड़ दिया। किसी तरह की बीमारी का संकेत भी नहीं दिया था उसने। छुट्टियों में घर आया था, तब एक दिन बुखार से बदन तपने लगा। निहारिका अस्पताल ले गई तो पता चला – कैंसर की आखिरी स्टेज है और फिर दोनों बिछड़ गए। वायलिन का उदास सुर अब निहारिका के कानों में अक्सर बजता है और उसे वह अकेले सुनती है। पुरानी डायरी के पन्ने पलटती हुई। दूसरे कमरे में सो रही है गुलाब की पंखुरी-सी बेटी – कोमल!

***
`मम्मा! मैंने कल रात ही कहा था कि सुबह कढ़ी-चावल खाऊंगी। बनाया क्या?'
निहारिका बुदबुदाई— `नहीं ! बेसन लाना भूल गई।' कोमल रूठ गई, लेकिन निहारिका को सुध नहीं थी। उसके कानों में कुछ संवाद उभर रहे थे –
मल्हार से वह लड़ रही थी – ` तुम खटाई नहीं लाए। अब कढ़ी कैसे बनाऊं?'
वह बोला – `कढ़ी में खटाई थोड़े ही पड़ती है। इसमें तो तुम अपना गुस्सा ही घोल देना।'
` हां, और की जगह आंसू, है न...!'
और दोनों ठठाकर हंस दिए थे। उनके खिलखिलाते चेहरों पर होली के सब रंग जवान हो गए थे।
निहारिका ने खिड़की के पार देखा। सुबह अब दोपहर से मिलने चल पड़ी थी। एक गड्ढे में जमा पानी में कमर तक डूबी हुई कोमल कुछ ढूंढ रही थी।
निहारिका ने आवाज़ लगाई – `क्या कर रही हो? पानी से बाहर निकलो, ठंड लग जाएगी।'
कोमल घर के अंदर आई। उसके हाथ में एक भीगा हुआ खरगोश था। कांपता हुआ। निहारिका ने कोमल के गुलाब जैसे हाथ अपनी हथेली पर फैला लिए और उसकी लकीरों में कुछ तलाशने लगी। दुख के समुद्र के पार, उम्मीद का एक कल उन सबको पुकार रहा था। निहारिका की आंख में कुछ कांप रहा था, खरगोश की पलकें भी भीगी थीं।



Saturday, February 4, 2012

कहिए डर को अलविदा...

अहा! ज़िंदगी में प्रकाशित, दैनिक भास्कर से साभार

- लेखक - श्री अमिताभ

ज़िन्दगी क्या है और इसके अर्थ क्या हैं? इस सवाल का जवाब तलाशने के क्रम में बहुत से लोगों की ज़िन्दगियां बीत गई हैं। हर बार कोई न कोई नया और अनूठा अर्थ सामने आया है। जिस तरह हाथ की हर अंगुली जुदा होती है, आकार और उपयोग में, वैसे ही हर शख्स के लिए ज़िन्दगी के मायने अलग होते हैं, लेकिन एक बात पर ज्यादातर लोग सहमत हैं कि जिस जीवन का कोई सार न हो, उसका कोई अर्थ नहीं।

अर्थवान जीवन के लिए जरूरी है कि हम वृहद मानव समाज की बेहतरी के लिए काम करें। बेहतर काम के लिए सुंदर सोच होनी चाहिए, लेकिन बात यहीं मुकममल नहीं होती। हममें लाख गुण हों, हौसला हो, राह सामने हो, फिर भी अच्छाई के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ पाते। जरूरी है साहस का होना। जो सोचा है, उस पर खरा साबित होने के लिए हिममत का सहारा पास में होना।

यह सही है कि इरादे नेक हों, मानसिकता स्वस्थ हो, फिर भी साहस नहीं है तो कदम हमेशा डगमगाते रहेंगे। साहस के न होने भर से धैर्य जवाब देने लगेगा, हम अपने बचाव के लिए नए-नए रास्ते चुनते रहेंगे और आखिरकार, बेहतरी का इरादा एक खोखले स्वह्रश्वन में बदलकर रह जाएगा।

प्रश्न उठता है — साहस क्या है? क्या इसे संजोने के लिए बाहरी तत्वों से कोई मदद मिलती है? किताबों ग्रंथों महापुरुषों से जो सीख मिलती है, वह पर्याह्रश्वत है या नहीं? जवाब है — साहस बाहर से आने वाली चीज नहीं। यह वह एहसास नहीं, जिसके लिए बाह्य जगत का सहारा लिया जाए या इसे कहीं से आयातित किया जाए। हिम्मत का जज्बा हमारे अंदर है, जरूरत है उसे पहचानने की।

साहस का भाव दरअसल, भय से मुक्ति है। भय भी हरदम किसी अनदेखे, अनजाने संकट का नहीं होता। अगर हम अपनी 'जो जैसा है, वो ठीक है' की मानसिकता में रमे रहना चाहते हैं और एक लीक से हटने की कोशिश नहीं करते तो वह एक किस्म का भय ही है। 'मैं यह करूंगा तो लोग क्या कहेंगे' और 'ऐसा करने से वैसा हो जाएगा' जैसी सोच डर से उपजती है। जैसे ही हम कुछ नया, बेहतर करने का दृढ़ संकल्प लेते हैं और फिर किसी भी सोच या परिस्थिति में उससे अलग नहीं हटते, तत्क्षण भय से मुक्त हो जाते हैं। मृत्यु का भय, धन हानि का डर, अपयश का संकट जटिल भय हैं। इनका सामना करने के लिए बड़े साहस की जरूरत है, लेकिन इनसे भिड़ने से पहले छोटे-छोटे डरों से मुक्ति हासिल करनी होगी। एक बार साहस जाग गया तो दुनिया का बड़े से बड़ा खतरा भी व्यक्तित्व में शामिल भय को पुन: सिर नहीं उठाने देगा। हर संकट से बड़ा होगा तब हमारा साहस।

 कई बार हम अपने किए कराए पर पानी फेरते नज़र आते हैं, क्योंकि उस समय बड़े लक्ष्य की तरफ ध्यान देने की जगह खुद से लड़ाई लड़ रहे होते हैं। अक्सर अंतर्द्वद्व की यह स्थिति किसी बड़े गोल को हासिल करने के लिए नहीं होती। हम उस समय महज यह आकलन कर रहे होते हैं कि करने से कितना लाभ होगा और उसके बरक्स नुकसान की मात्रा कितनी होगी। कुछ भी नया करते समय सबसे पहले मन के अंदर से डर की आवाज उभरती है। यही मौका है कि उस पर काबिज होना सीख लें। याद कीजिए — बचपन में साइकिल चलाना सीखते समय आप एक-दो बार सीट से जरूर गिरे होंगे। अगर उसी समय आप साइकिल चलाना सीखने से तौबा कर लेते तो अब तक साइकिल की सवारी महज स्वह्रश्वन होती। गिरना और चोट खाना क्या है? बहुत छोटा सा भय.. एक बार इससे मुक्ति पा ली तो इसके आगे आप बाइक और फिर कार की ड्राइविंग सीखना चाहेंगे।

 यकीनन, जिन लोगों ने बड़े लक्ष्यों को साधा है और आप जिन्हें मंत्रमुग्ध भाव से सराहते हैं, देखते हैं, वे सब के सब कभी न कभी अपने-अपने अभयास में असफल हुए होंगे, चोटिल हुए होंगे। वे हारे नहीं, डरे नहीं, इसलिए शीर्ष तक पहुंचे।

साइकिल से गिरना महज एक प्रतीक है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि शारीरिक चोटों सेन घबराना साहस को जगा लेना है। सच तो यह है कि किसी भी तरह की चोट से न डरना ही साहस का आह्वान करना है। जिस्म का जन्म बहुत जल्दी भर जाता है। मन की चोट भरने में वक्त लगता है। एक छोटे भय से दो-दो हाथ करने के बाद मन पर लगी चोटों का सामना करने का अवसर आता है। किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से पहले यह सोचकर बैठ गए कि असफलता की स्थिति में क्या होगा तो यकीन कीजिए — आप सफल हो ही नहीं सकेंगे। फिर तो हरदम डर की गठरी में दुबके बैठे रहना होगा। हां, आपने यह सोच लिया कि परीक्षा और प्रतियोगिता में कुछ लोग सफल होंगे और कुछ असफल तो प्रयास करने की हिममत बढ़ जाएगी। इस मोड़ पर साहस का जो जज्बा आपके साथ होगा, वही मंजिल तक ले जाएगा। जिस्म की चोट से आप उबर गए हैं।

असफलता का डर आपने मन से निकाल दिया है। बारी है अगले चरण की। अब पूरे व्यक्तित्व को डर से मुक्त कीजिए। सोचिए — जो होगा, वह अच्छा होगा और अच्छा न भी हुआ तो फिर प्रयास करेंगे। निश्चित तौर पर तब आपका व्यक्तित्व इस्पात जैसा होगा। आप भयमुक्त बनेंगे और बड़े संकल्प भी साकार हो सकेंगे। राहें खुली खुली, डर से अलग, मंजिल की तरफ साफ देखने वाली बनेंगी.. तो बताइए जरा.. आप कह रहे हैं न डर को अलविदा? एक बार ऐसा कर सके आप तो जीवन को और नजदीक से समझ सकेंगे और ज़िन्दगी का अर्थ भी तलाश कर पाना सुगम हो जाए।

Monday, January 30, 2012

चण्डीदत्त शुक्ल की दो नई कविताएं

चण्डीदत्त शुक्ल

सो जाओ कि रात बहुत गहरी है, काली है
सो जाओ कि अब कोई उम्मीद नहीं जगाएगा तुम्हारे मन के लिए
सो जाओ कि बंगाल से लेकर मद्रास तक, समुद्र का जल नाराज़ है तुमसे।
दिशाएं पूछती हैं, सनसनाकर हरदम, क्यों हारे तुम, इतना प्रेम किया था क्यों?
सो जाओ कि देश की किसी नायिका की आंख तुम्हारे लिए गीली नहीं होने वाली।
सो जाओ कि प्रेम एक घिसा-पिटा, दोहराए जाने को मज़बूर शब्द भर है।
सो जाओ कि गीली लकड़ी की तरह निरर्थक जलावन है प्रेम,
निहायत दुख के वक्त सिर्फ घुटन भरा धुआं पैदा करेगा।
सो जाओ कि एक और उदास दिन तुम्हारी प्रतीक्षा में है।
एक सुबह, जिसमें मशीन की तरह काम और निष्फल इच्छाएं तुम्हारा रास्ता ताकती होंगी।
सो जाओ कि किसी और को न सही, तुम्हें खुद से एक झीना-सा लगाव तो है।
तुम अब भी प्रेम करते हो न उस लड़के को,
जो प्रेम करते वक्त रोता था, हंसता था, खिलखिलाता था और नंगे पैरों चूमता था हरी-हरी घास को।
सो जाओ कि कुछ और कविताएं लिखना।
उन्हें पढ़कर कुछ लोग रोएंगे। टूटेंगे...। कोई-कोई सिर भी धुनेगा, फिर कुछ तो राहत मिलेगी तुम्हें और उन्हें।
सो जाओ कि निराशा से लबालब इस काव्य के बाद,
सकारात्मक जीवन के लिए कुछ भाषण तुम्हें तैयार करने होंगे।
सो जाओ, कि अब तुम प्रेम में होते हुए भी, प्रेम में नहीं हो।
सो जाओ, क्योंकि खुदकुशियों से भी कुछ भला नहीं होता।
सो जाओ, क्योंकि ज्यादा जागने और बहुत रोने से,
दिन भर आंख रहेगी लाल।
करीब चालीस की उम्र में, लोग कहते हैं, उदास दिखना, उदास होने से ज्यादा खराब समझा जाता है।


एक और कविता
एक दोस्त ने पूछा...कल रात,
तुम्हें, आखिर नींद क्यों नहीं आती...
जागते रहते हो उल्लुओं की तरह...
सो क्यों नहीं जाते...
मैं क्या कहता,
फिर एक बार ओढ़ ली, शब्दों की चादर.
कहने लगा...
वसंत ने आज ही द्वार खटखटाया है
रात ने ब्रश किए हैं शायद
हवा ठंडी है कुछ ज्यादा ही
चांद भी आंख-मुंह धोकर आया है
चांदनी मतवाली-सी फिर रही है...
पत्तियां नए कपड़े पहनकर इतराती हुईं।
फूल और महकते,
परिंदे और चहकते हुए
सब पूछते- तुम उदास क्यों हो?
मैंने भी घर की सब खिड़कियां खुली छोड़ी हैं...
शायद, हवा, खुशबू और चांदनी के साथ वसंत भी आकर ठहर जाए
पुराने अखबार पर जमी धूल खिसकाकर, जमके बैठे जाए।
मुझे सोता देखकर लौट गया फिर... फिर क्या करूंगा...?

Wednesday, January 25, 2012

बहुत मेले देखे, लेकिन ये मेला कुछ खास है!

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख

भास्कर ब्लॉग. .अदाएं दिखा रही है जालिम सर्दी। कभी कहर बरपाती है तो अगले ही पल गुलाबी हो जाती है। हम भी कभी ठिठुरते, कहीं सूरज की गुनगुनाहट के संग संवरते हुए, मेले में जाने को तैयार हो रहे हैं। आज जयपुर में साहित्य के मेले का आखिरी दिन है..।

और दिमाग की सिल्वर स्क्रीन पर बीते वक्त की यादों की रील चलने लगी है। कैसे-कैसे तो होते थे बचपन के मेले। डरते-डरते हुए भी, चिल्ला-चिल्लाकर हवाई झूले की सैर। टॉकीज और आर्केस्ट्रा में घुसने का रोमांच, जादूगर के हैरतअंगेज करतब। नींबू, धनिया, पुदीना, टमाटर से सजा चना मसाला खाना, गुब्बारों पे निशाना लगाना, गोलगप्पे का जायका, धार्मिक गीत, आरती, चालीसा और फिल्मी गानों की किताबें खरीदना, बीच-बीच में खूब शोर-शराबा और फिर एकाएक किसी बच्चे का गुम हो जाना..!

कभी सोचा नहीं था कि लिखने-पढ़ने-कहानी-किताबों-कविता का भी मेला लगेगा। जयपुर में लगता है हर साल। दुनिया भर से लिखने-पढ़ने वाले आते हैं और उनकी फैन-फॉलोइंग जुटती है। इस साल मेले के चार दिन बीत चुके हैं। देश-दुनिया के हजारों लोगों की भीड़ डिग्गी पैलेस का रुख कर चुकी है। बाहर चाय सात रुपए में बिक रही है और अंदर के तो भाव ही न पूछिए। लंदन से आईं कैरिना कुल्हड़ की चाय पीने के लिए पंद्रह मिनट तक जद्दोजहद करती हैं, लेकिन जैसे ही ओप्रा विन्फ्रे मंच पर आती हैं, वे सब भूल-भालकर कुल्हड़ और ब्रोशर संभालतीं स्टेज की तरफ बढ़ चलती हैं।

कल की ही तो बात है। शानदार हवेली जैसे होटल डिग्गी पैलेस में दीवारें गुलाबी रंग से रंगी थीं। संतरी-लाल, पीली-हरी झालरों से आसमान ढंका था। हर तरफ बड़े-बड़े कैमरे घूर रहे थे, लेकिन फ्रंट लॉन के बाहर, झरोखे में बैठी एक गोरी-चिट्टी अंगरेज लड़की एक किताब पढ़ने में ऐसी मशगूल थी, ज्यूं ध्यान लगा रही हो। उसे देखते ही जैसे कानों में गूंजने लगा — एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. ए लो, तभी बगल से इस गीत के गीतकार जावेद अख्तर निकल लिए।

गुलजार की झलक भर ही मिली। भीड़ उन्हें छू लेने को बेताब थी, पर शेखर कपूर, दीप्ति नवल, अशोक चक्रधर और अशोक वाजपेयी बगल की कुर्सियों पर बैठे थे। अपनी मशहूरियत, ऊंचे कद के बोध से एकदम अलग। खुशी तब भी होती है, जब आप देखते हैं, दरबार हॉल में घुसने के लिए जितनी मशक्कत आपको करनी पड़ रही है, केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल भी उतनी ही कोशिश में जुटे हैं। अगर आप सिब्बल से पहले अंदर घुस गए तो ‘हुर्रा’ करेंगे ही।

साल-दर-साल लिटरेचर फेस्टिवल में भीड़ बढ़ रही है। कहने वाले कहते हैं, लिटरेचर मिसिंग है, बस फेस्टिवल बचा है, लेकिन ये महज बातें हैं। क्या खुशी की बात ये नहीं है कि जिस साहित्य को लेकर दैन्यता, मुफलिसी की बातें होती हैं, उसके आकर्षण में सारी दुनिया की सेलिब्रिटीज खिंची चली आती हैं। हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी होते हैं, सो अक्षरों के उत्सव में भी शामिल हो रहे हैं, जोर-शोर से। आदतन खाते-पीते-बतियाते, तारीफें कर रहे हैं और जरूरत के हिसाब से आलोचना भी।

वैसे, मुझे तो जेएलएफ में शामिल होकर बचपन में सुनी, कवि कैलाश गौतम की कविता अमौसा का मेला की ये पंक्तियां याद हो आईं - एही में चंपा-चमेली भेंटइली/बचपन के दुनो सहेली भेंटइली/ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें/दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें..

शादी के दस साल बाद कहीं मिली सहेलियां जैसे बतिया रही हों, वैसे ही मेले में कितने ही पुराने परिचित मिले और गपियाने लगे। आए तो थे सब के सब किताबों की महक को दिमाग में बसा लेने, लेकिन जब मिले तो सारे काम भूलकर एक-दूसरे को खुद में समेटने लगे। ऐसे में कहें तो बड़े काम की चीज है ये मेला.. विचारों का मेला और यारों का मेला।

 
 

Wednesday, January 18, 2012

सपनों को यादों की गुल्लक से निकालें

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख--भास्कर ब्लॉग...
- चण्डीदत्त शुक्ल

सोंधी महक से सराबोर जाड़े की सुबहों में कंबल से हाथ बाहर निकालने की हिम्मत नहीं पड़ती। कोहरे का झुरमुट जैसे लपककर मुट्ठी में हथेली जकड़ लेता है। उसकी गर्मजोशी के बावज़ूद ठिठुरा मन-तन लिए हम फिर छुपने के रास्ते तलाशने लगते हैं। हां, सूरज के चेहरे पर ज्यूं गुनगुनी धूप थिरकती है, उसी पल यादों के कई दरीचे ख्यालों में खुल जाते हैं।

यादें हैं भी क्या.. गुजरे वक्त की मासूम-सी गवाही। मौसमों का असर मन पर इस कदर होता है कि याद-कैलेंडर के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। कुछ बीते हुए लम्हे अलग-अलग मौसमों की दास्तान बयां करते हैं। कभी कोई धड़कन कानों में आकर गुनगुनाती है - क्यों, जीभ पर तैरने लगा न पहली बार चबाए गए भुट्टे का स्वाद और फिर उभरता है अफसोस..। हाय! भुट्टे, तुम पॉपकॉर्न क्योंकर हुए? इस सोच से उबर भी न पाए कि ‘छपाक’ कर स्मृतियों की बौछार नहला जाती है और रूबरू करा देती है उस नजारे से, जब हम सारा लोक व्यवहार भूल, मर्यादा का बंधन तोड़के, जमकर भीगे थे, पहली बारिश में।

और महज मौसम ही क्यों.. कुछ पुरानी, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें, चंद जर्द पड़ी चिट्ठियां और कई सूखे हुए गुलाब भी तो याद दिला देते हैं बीते हुए जमाने की।

जमाना, जब जिम्मेदारियों से ज्यादा जोर मस्तानेपन का था। भाग-दौड़ तब भी होती थी, लेकिन लोकल ट्रेन, बस या ऑटो पकड़ने के लिए नहीं। टारगेट तब भी होता था, लेकिन कारोबार का नहीं - हर दौड़धूप, हर लक्ष्य के पीछे वजह बस एक थी - आज का दिन मस्ती में जी लें। कल की कल देखेंगे।

ख्वाबों की दुनिया भी कितनी सतरंगी होती है। आंखों के कैनवास पर इंद्रधनुषी रंग कभी धुंधले ही नहीं होते। वक्त गुजरता गया। आप, हम और हमारे संगी-साथी, सब के सब ‘जिम्मेदार’ हुए और भूल गए पहली-पहली बारिश में नहाने का, दिन भर बिना काम के भटकने का सुख, यानी खुद के लिए जीने के मायने।

वक्त नहीं थमता, लेकिन कभी तो कुछ होता है, जो सब कुछ याद दिला देता है। चंद रोज पहले की ही बात है। जयपुर के जवाहर कला केंद्र में युवा कलाकार निधि सक्सेना की पेंटिंग एक्जीबिशन देखने गया था, एक तस्वीर पर नजर ठहर गई। यादों के आसमान और चाहतों के समंदर का नीला रंग। चिड़ियाएं चांद को साथ ले जाने को मचल रही हैं। एक लड़की कैमरे के पीछे खड़ी उनकी चलती-फिरती तस्वीरें कैद करने में लगी है।

कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में बना चुकी निधि के लिए अपने सपनों को संजोए रखने का जरिया चित्रकारी है। उनके कैनवास पर चिड़िया है, सिनेमा है, चाहत है, सपने हैं.. लेकिन ये तस्वीर देखकर मैं ठिठक गया, सोचने को मजबूर — हमारे पास क्या है?

बीता वक्त तो है नहीं, यादों को सीलन लग रही है। अब खुलकर झूमने, बेइरादा कहीं चल देने के मौके और शगल नहीं हैं..। फिर करें क्या, कैसे लौटाएं बीते वक्त को? क्यों न हम भी चिड़िया बनकर चांद को साथ ले जाने की कोशिश करें। खयाल कुछ ज्यादा पोएटिक हो गया शायद, सो इसका मुकम्मल बयान कुछ यूं कर लेते हैं - आओ, चलो, सपनों को यादों की गुल्लक से बाहर निकालें। अपने लिए भी कुछ देर जी लें। कुछ अच्छा करें, कुछ सुंदर सुनें, चंद अच्छे लोगों से दोस्तियां करें। खुशी के बहाने तलाशें। आप कहेंगे - न! मुस्कराने की बात करते हो/किस जमाने की बात करते हो..? माना साहब, मुश्किल है खुशी के चांद को साथ ला पाना, लेकिन छोटी-छोटी कोशिशें करके हम खुश रह सकते हैं। तो करेंगे न आप कोशिश..?

Tuesday, January 10, 2012

क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती



 - चण्डीदत्त शुक्ल@08824696345
तुम्हारा दोस्त दुखी है...
उससे न पूछना, उसकी कातरता की वज़ह,
दुख की गंध सूखी हुई आंख में पड़ी लाल लकीरों में होती है।
ये सवाल न करना, तुम क्यों रोए?
कोई, कभी, ठीक-ठीक नहीं बता सकता अपनी पीड़ा का कारण।
कहानियों के ब्योरों में नहीं बयान होते हताशा के अध्याय,
न ही दिल के जख्मों को बार-बार, ताज़ा चमड़ी उधेड़कर दिखाना मुमकिन होता है साथी।
कोई कैसे बताएगा कि वह क्यों रोया?
इतना ही क्यों, इस बार ही क्यों, इतनी छोटी-सी वज़ह पर?
ऐसे सवाल उसे चुभते हैं।
रो भी न पड़ना उसे हताश देखकर,
वह घिर जाएगा ग्लानि में और उम्र भर के लिए।
नैराश्य होगा ही उसकी ज़ुबान पर और लड़खड़ा जाएगी जीभ,
बहुत उदास और अधीर होगा, अगर उसे सुनानी पड़ी अपनी पीड़ा की कथा।
तब भी यकीन करो, शब्दों में नहीं बांध पाएगा वह अपनी कमज़ोरी।
हो सके तो उसे छूना भी नहीं।
तुम्हारी निगाह में एक भरोसे का भाव है उसका सबसे कारगर मरहम,
उसमें बस लिखा रहे ये कहना – तुम अकेले नहीं हो।
उसकी भीगी पलकों को सूखने का वक्त देना
और ये कभी संभव नहीं होगा, उसे यह समझाते हुए –
गलतियां ये की थीं, इसलिए ऐसा हुआ!
हर दुखी आदमी मन में बांचता है अपने अपराध।
वह जड़ नहीं होता, नहीं तो रोया ही न होता।
दुख नए फैशन का छींटदार बुशर्ट नहीं है कि वह बता सके उसे ओढ़ने की वज़ह,
कोई मौसम भी नहीं आता रुला देने में जो हो कारगर।
हर बार आंख भी नहीं भीग जाती दुख में।
जब कोई खिलखिलाता हुआ चुप हो जाए यकायक,
तब समझना, कहीं गहरे तक गड़ी है एक कील,
जिसे छूने से भी चटख जाएंगी दिल की नसें।
उसके चेहरे पर पीड़ा दिखनी भी जरूरी नहीं है।
एक आहत चुप्पी, रुदन और क्षोभ की त्रासदी की गवाही है।
उसे समझना और मौजूद रहना,
बिना कुछ कहे,
क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती।

Wednesday, January 4, 2012

चण्डीदत्त की कुछ ताज़ा कविताएं

इस ठूंठ पर वसंत की तरह लहलहाना...! 
एक झटके के साथ रुकती है तुम्हारे शहर से आ रही बस,
उतरता है मुसाफ़िरों का रेला
और
टिक जाती हैं नज़रें फिसलती हुई
आगत से गंतव्य तक की सूचना से
गाड़ी की नंबर प्लेट पर।
महज, ये सोचकर रोमांचित हो उठता हूं मैं,
यहीं कभी तुमने भी देखा होगा।
तुम्हारी पसंद के रंगों की बुशर्ट-पतलून पहनने लगा हूं मैं,
अब, जब भी तुम कभी मिलोगी,
खुशी से लहालोट हो कहोगी न, अरे! मेरा फेवरिट कलर!
ज्यूं,
मैंने पतझड़ के इस मौसम में अपने सब के सब पत्ते त्याग दिए हैं।
ज़िंदें अपनी, मुगालते भी सभी और वहम की खाल...
केंचुलें उतारकर निरीह केंचुए की तरह सर्प बैठा है नई त्वचा की प्रतीक्षा में,
तुम भी इस ठूंठ पर वसंत की तरह लहलहाओ न...!

***
तुम, आ गए प्रेम!


प्रेम,
तुम्हारा पीछे छूटना तय ही था
शायद
तुम्हारे आने से पहले से
तुम फिसल ही जाते हो
दिल की गिरह से जब-तब
बल्कि,
जब, तब तुममें डूबे होते हैं हम।
तब, जब तुम्हारी होती है सबसे ज्यादा ज़रूरत,
तुम होते हो गैरहाज़िर
हमारी ज़िंदगी से।
और,
एक के बाद एक कर गुज़रते दिनों में
तुम हो जाते हो गुजरे दिनों को एक गैरज़रूरी-सा एहसास।
फिर,
ज्यूं ही हम निश्चिंत होकर,
कुछ दर्दभरे गीत सुनते हुए
चंद कविताएं लिखकर
कुछ ज़र्द चिट्ठियां उलटते हुए,
निपटाते रहते हैं घर के ज़रूरी कामकाज,
ऐन उन्हीं के बीच,
गहरी टीस बनकर तुम सिर उठा खड़े हो जाते हो...
क्या, यही याद दिलाने के लिए
हां, तुम मौजूद हो.
कभी नहीं गुजरे,
न ही तुम गैरज़रूरी थे।
सच है, तुम्हारा पीछे छूटना,
छूटना है बचपन की तरह ही,
जो न होकर भी हाज़िर होता है हमारे मन में सदैव।
यूं ही,
तुम भी तो अपनी छायाओं में,
हमारे होंठों और आंखों पर हरदम अट्टहास करते रहते हो,
कभी मुस्कान और आंसू बनकर,
तो कभी कटाक्ष की शक्ल में कहते हुए,
बिना प्रेम के जियोगे? जीकर दिखाओ तो जानें!

***
लम्हा एक, हंसूंगा भरपूर

उदासियों के रंग मेरे दामन पे खूब खिलते हैं.
तुम खिलखिलाना बेहिसाब
एक लम्हा, ही हंस लूंगा मैं भी
मुकम्मल हंसी
बिना किसी टीस की
बगैर रत्ती भर याद के
बस सहज होकर
जैसे, प्रेम से पहले था
अर्थहीन ही सही....

***

दुख में तुम्हारे संग की याद

एक विदा
संकेत है किसी आगमन का
हर बार कोई लौटे ही,
ये ज़रूरी है...
तुम नहीं
तो दुख ही सही।
यूं भी,
दुख में तुम कुछ ज्यादा ही याद आते हो
और तुम्हारे संग बिताया गया सुख भी
लगता है अनमोल।
वसंत,
तुम आना...
भ्रम का पतझड़ गुजरने को है...!
एक विदा
संकेत है किसी आगमन का
हर बार कोई लौटे ही,
ये ज़रूरी है...
तुम नहीं
तो दुख ही सही।
यूं भी,
दुख में तुम कुछ ज्यादा ही याद आते हो
और तुम्हारे संग बिताया गया सुख भी
लगता है अनमोल।
वसंत,
तुम आना...
भ्रम का पतझड़ गुजरने को है...!

***

चलते-चलते
मैं खूब मिलता रहा, हर दिन जोर-शोर से
वो चुपचाप मेरी रगों से होके गुज़र गया...
...
तू आया, बोला भी कुछ नहीं, चलता गया
यूं, मेरे साथ था, फिर भी सफर खाली रहा...
....
गर्मजोशियां उसकी बांह में थीं समंदर की तरह
पर दिल किसी सहरा-सा लिए दामन में वो बाकी रहा