कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

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Wednesday, June 2, 2010

छलना...कब तक छलती रहोगी तुम...


छलना!
मुझको छलती रही है तू
सदियों से
माना जिसको
सदैव समर्पित हुआ
ठीक उसी से, बता...
अरे! मैं क्यों तिरस्कृत हुआ...?
तिल-तिल, घुट-घुटकर
जिसका दु:ख अब तक अपना समझा...
माना अपना
नहीं परायाबोध रहा जिसको लेकर
उसने सारे भाव दरश, समझा
संज्ञा दी--नाटकीयता की...
क्यों होता है ऐसा?
जान नहीं पाया हूं अब तक.
हूं असामाजिक क्यूं इस जग में?
दुर्गम में या सुंदर मग में...
या फिर किसी बंद कमरे तक
जहां कहीं भी रहा अस्तित्व मेरा...
मेरा! अपना! अपनेपन!! का...
झूठा नेह नहीं बिखेरा मैंने...
फिर भी तिरस्कृत होता हूं...
क्यों होता है ऐसा...
जान नहीं पाया हूं अब तक!

गोंडा, 1997 की कोई रात

Tuesday, June 1, 2010

सयंमी होने का एकांतवास


क्यों झेल रहे तुम
संयमी होने का एकांतवास...
प्रिय,
क्या ना जानूं मैं
तुम्हारे अपनेपन का उद्वेलन?
गुंजित होता है हर पल
तेरे अंतर्मन का ये मंथन...
कैसा यह जटिल चक्र रचने का मोह...
भाव बोध से विरक्ति प्रदर्शन कैसा...
और..
ये दर्शाना कि तरंगित होता तन
उठती नहीं उमंगें मन में...
भावहीन मुख से एक अच्छे अभिनेता का
करा सकते हो आभास...
लेकिन सपाटपन का मेकअप उतारने के बाद
देख लीं हैं मैंने सपने देखतीं पनीली आंखें...
अब ना करो, बहाने बनाओ या खिन्नता का करो प्रदर्शन.
पहले मैं बोलूं, झुकूं...
ये प्रत्यंचा शैली तो जड़ पुरुषों के ही खाते लिखी गई है...
मंगलगायन वाले स्वर क्यों बोल रहे हैं...
परेड का कॉशन!
नारी तो भावुकता का द्रवित संगम है...
इतने मत तानो तार प्रिय
कि टूट जाए झनककर मन का सितार...
कितना रोकोगे खुद को-
कहीं बिखर गए तब...?
इसलिए हो जाओ समर्पित...
और हो जाने दो.
समर्पण के क्रम से ही-
तो होगी एक नव अनुभूति,
हठ और इनकार के अतिरिक्त
खोल सकेंगे भावनेत्र हम...
साकार कर सकेंगे...
प्रेमाकाश में मुक्त पांखी बन बिचरने का
सब से दूर, सबकुछ बिसरने का
स्वप्न


गोंडा, रात के 4.30 बजे, 1997 

Friday, May 28, 2010

एक कुटिल प्रेमी की आदर्श-व्याख्या


वो तुम्हारी निगाह से उतर गए...
माना कि कुछ तो कमज़ोर थे,
दृढ़ नहीं रह सके चरित्र पर
नहीं बनाए रख सके,
अपना वह सात्विक बोध
जो तुम्हारे मन में
उनके लिए रखता था स्थान सुरक्षित
वे तो निर्बल थे, निर्मम भी थे कुछ
पर...
उन्हें चरित्र च्युत कहकर क्यों छिपा रहे स्व-निर्बलता?
जिसे एक बार `माना' तुमने
उसके लिए मन में खिन्नता कैसी?
क्यों विचलन अपने कर्तव्य में
और अगर प्रिय बनकर भी
जो रह गए भ्रमर स्वभावी
तो उनकी ही गलती क्या...ये तो चलन ही बंधु
जांच-परख लेते, फिर बनाते नेह संबंध...
क्या कहा--ऐसा नहीं होता,
तो फिर अब जुड़ाव में वणिक-बुद्धि भी कैसे?
बिच्छू की प्रवृत्ति ही तो है डंक मारना,
साधु वही, जो तब भी फैलाए रहे हथेली...
विषधारी को भी भंवर से निकालने को रहे तत्पर...
अच्छा लगा...तुम्हारा स्मित हास्य देखकर
इस उपदेश का अंतर्वेद समझ गए ना तुम...
हां!
दूसरों की आड़ में
मैं बना रहा हूं...अपनी भूलों से बचने का चक्रव्यूह
जाने-अनजाने अगर,
तुम्हारे मन का अनछुआपन
मेरी कोई अनियंत्रित क़दमताल
तोड़ दे तुम्हारे चिंतन का एकांत
या मेरी आदर्शिता का भ्रम
तो कहीं मैं भी ना हो जाऊं बहिष्कृत
तुम्हारे अंतःस्थल की गहराई से...
इसीलिए तो...
गढ़ ली हैं बहानों की गाथाएं
कभी डगमग हों पग...तो
सपनों की रुनझुन में खोए तुम...
मतवाले हाथी का नर्तन देखकर ना हो व्यथित...
तब किसी भोले बच्चे की तरह
खिलखिलाकर मांग लूं माफ़ी
आश्वासन दो--तब भी रहूंगा तुम्हारे मन में स्थिर
मिलेगा अभयदान

Thursday, May 27, 2010

पनीली आंखों के आगे खुशबूदार शाम


तुमने कहा 
क्या फायदा हुआ-
इस साथ से?
हम नहीं रह पाए पास...
नहीं हो सकी
संवेदना के मुक्तप्रवाही निर्झर में-
भावनाओं की उछलकूद 
मानता हूं मित्र
हमने जाना अपने आपको एक अरसे में
पहचानने में तो और भी वक़्फा लग गया
कुछ उधेड़बुन अब भी हो रही है...
अहसास में.
लेकिन इतना पास होने पर...
भी क्यों हैं उखड़े-उखड़े से...
बिखरेपन को समेटते हुए...
आओ! जी लें...
जीवन के उतने लम्हों को
जो अपने हैं...
जितना जो कुछ नीरस है,
बना लें मधुरिम...
कभी भी...
हृदतंत्री पर बजती वीणा के सुरों को
नापकर नहीं बताया जाता
सुरदार या बेसुरा...
यानी कि 
नहीं आंका जाता, नापा जाता
अपनेपन में सार्थकता या निरर्थकता का बोध...
जितना मिला वक़्त
महसूसने का...
हमने जिया, एक-दूसरे को गर्मजोशी से...
अब दूर रहेगी तो देह...
क्या हुआ, जो माटी के बुत अलग रहे...
हम तो सदैव रहेंगे एक, इकट्ठे
महकते जज़्बात सदैव देते रहेंगे
दस्तक
मन के किवाड़ पर
आहट, ख्वाबों की-पदचापों की...
झिंझोड़ती रहेगी हमारी-तुम्हारी तंद्रा
गर्म सांसों की मलय...
अलकें उड़ाया करेगी तुम्हारी,
क्यों होते हो अधीर प्रिय...
हम हैं जन्मों के साथी..
नहीं होंगे विलग
आओ! बिखेर दो एक स्मित हास्य...
जिससे...
निराशा की दोपहरी में
एक खुशबूदार शाम हो जाए...
और तब तुम्हारी पनीली आंखों के आगे...
शायद उग सके...
हमारे सुखद भविष्य का इंद्रधनुष

रात के 2.54 बजे, गोंडा, सितंबर-1997

Tuesday, May 25, 2010

नहीं बनना महान


मुझे नहीं बनना आदर्श पुरुष,
या फिर देवता...
नहीं चाहिए लेबल
महान होने का
मैं बने रहना चाहता हूं...
सारी दुर्बलताओं से ग्रस्त
एक आम इंसान!
जो बिना झिझक के
आंख को जो अच्छा लगे,
मन को जो शीतल कर दे...
प्राणों को जो झंकृत कर दे...
उसको बिना हिचक-
अपना कह दे!
ऐसी दिव्यता क्या करूं,
कि प्रिय को दर्शनशास्त्र तो पढ़ा लूं,
लेकिन बरबस बन थोथा महान
बांच भी ना सकूं प्यार की इबारत...
क्या मिलेगा उस लेबल से-
इसलिए हे प्रिए!
मुझे बना रहने दो, एक दुर्बल मानव
जिससे मैं, अपनी हर अभिव्यक्ति से पहले...
सारी वर्जनाएं भूल-
हर आम इंसान की तरह गुनगुना सकूं-
मुस्करा सकूं-
और बिना डर तुम्हें निहार सकूं...

गोंडा,  4.40 बजे रात में, 06 सितंबर, 1997

Thursday, May 20, 2010

आत्मज्ञान तक पहुंच / समझा हूं / कि हूं / कन्फ्यूज़्ड

पिछली पोस्ट में कुछ कविताएं आपके लिए हाज़िर की थीं...वही सिलसिला जारी है...


सुंदरता पर / निश्वास / छोड़ता हुआ भी / तन्मय कब तक रहता मैं?
आदमखोर चरित्र को दरकिनार कर / सत्यवसन रहता मैं...
नहीं झेल सकता मैं अब एक भी मुखौटे वाला चेहरा
उतार डाले सभी  आवरण
नग्न यथार्थ की धरा पर हूं खड़ा
हूं तुम्हारे सामने।
सच की सज़ा क्या मिलेगी?
आत्महत्या की तरह फांसी का फंदा /
या कि तुम दोगे अभयदान?
अच्छा होगा तुम फिर लटका दो सलीब पर...
कम से कम हो सकूंगा
ईसा और सुकरात की तरह
वे भी तो हो गए थे अमर...
नहीं जानता,
क्या साबित करना चाहता हूं?
सच बोलने की सज़ा पाना चाहता हूं...
या / कि / झूठ बोलने का लाइसेंस!
आत्मज्ञान जगाना है मुझे,
अपने / आप / अपने में / मुझको / मुझमें
या कि /
महान होने के मुखौटे पहन,
कुछ और विशिष्ट होने की होड़ में,
होना है शामिल
(2001, जालंधर)

बरसों पहले की कबिताई...



कई दिन हुए, चौराहा पर कविता जैसा कुछ नहीं लिखा...। आज कुछ पुराने काग़ज़ मिले...उनमें कबिताई जैसा कुछ दिखा...सोचा आपके लिए यहां उतार दूं...साल 1996-97 से लेकर 2000-01 के बीच  की ये कविताएं हैं संभवतः....लीजिए, एक के बाद एक...

होते हैं कुछ और मायने भी प्यार के

तुम्हारा संवरना और मचलकर मेरे कंधे पर हाथ रखना
किसी कवि के लिए श्रृंगार रस का अनुपम उदाहरण हो सकता है
या फिर / 
सस्ते कथानकों वाली चवन्नी छाप किताबों के थोक भाव राइटर को मिल सकता है,
इससे `आगे क्या होगा' सोचने का आधार?
लेकिन
निश्चिंत रहो तुम
मैं जानता हूं / तुम कुछ और होने से पहले / हो मेरे लिए एक अबोध शिशु सी
और मैं हूं तुम्हारे लिए
घर के सामने लगे
नीम के पेड़ सा...

आत्महंत्रणी प्यास

गधे की पीठ का मुकाबला करते कंधे
ढोते हैं अभी तक
उसी आदिम तृष्णा का भार
नुचे, घायल पांव
रुलते हैं बाधा दौड़ में
रुकते नहीं फिर भी लगातार झुकते घुटने


इसीलिए खुश हैं वो

जिन्हें तरसाती है, जिनको जुटती नहीं
चटनी-रोटी
मिल जाए उन हाथों को डबलरोटी
तो कितना उछाह होता है मन में
है ना मेरे मीत।
माना कि डबलरोटी
नहीं बन सकती विकल्प
रोटी का / पर / कभी-कभी / गलतफ़हमी में जीना भी
कोई ख़ास नुक्सानदेह तो नहीं?
अपनी कमाई से बंसरी खरीदने के बाद
वो भी बहुत खुश हैं / या कि लबादा ओढ़े हैं / खुशी का
लेकिन
हरदम ओंठ बिसूरे / पनियाई आंखें लिए
रमना भी तो नहीं भाता...

(साल 2000-2001)