कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द
मुसाफ़िर...
Sunday, July 26, 2009
मुझे कुछ कहना है....
दैनिक जागरण में छह साल बिताए...उस दौरान वहां बहुत कुछ लिखा पढ़ा--कुछ रोजी की ज़रूरत, कुछ मन की मजबूरी......लिखा, तो उसमें में ज़रा सा संजोया भी....बहुत कुछ तो पता नहीं कहां चला गया....हां, jagran.com पर कुछ सामग्री छप गई थी, उसमें दो-चार हिस्से आ गई. वो सबकुछ मेरे पुराने ब्लॉग पर सेव थी. आज वही सामग्री चौराहा www.chauraha1.blogspot.com पर सेव की है....संदर्भ, आंकड़े सबकुछ पुराने हैं....पर ये मसाला मेरे एक खास स्तंभ बेबाक बातचीत और सखी पत्रिका के कुछ स्तंभों में शामिल किया गया था. चौराहे पर इस तरह की सामग्री शायद आपको चौंकाए भी....देखिए ना...महापुरुषों से लेकर कंज्यूमर फ़ोरम तक और चैटिंग से चीटिंग के मामले से भोजपुरी गीतों की चर्चा तक है यहां....जो बचा-खुचा बचा रह गया, उसे यहां संजो रहा हूं....रोजी जो ना कराए वो थोड़ा है....क्या लिखने के बारे में सोचा था ज़िंदगी में और क्या-क्या लिख डाला....ख़ैर...कुछ कमेंटियाइए....कुछ कहिए, या धिक्कारिए भी....चलेगा...सबकुछ चलेगा....
देह की आज़ादी नहीं दिलाती हर पीड़ा से मुक्ति---नासिरा शर्मा

अफगानिस्तान की मजलूम औरतों के आंसुओं से लबरेज चेहरों पर उभरी दर्द की लकीरों और उनसे टपकते दुख को जब एक स्त्री ने ही अखबार के पन्नों पर रंगना शुरू किया तो पूरी दुनिया के नारीवादी एकबारगी सिहर उठे, इतना शोषण, ऐसा अत्याचार, अब तक सुना नहीं-देखना तो दूर की बात है। उन्हीं दिनों अफगानिस्तान से एक कल्चरल अटैची जेएनयू पहुंचा और कुछ लोगों से पूछने लगा, कौन है ये नासिरा, जिसने बादशाहों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत की। और जब उसने देखा, नासिरा महज 27 साल की एक साधारण युवती है तो एकबारगी चौंक गया। उसके दिमाग में तस्वीर थी, कद्दावर शख्सियत की मालिक किसी बुजुर्ग महिला की। वही नासिरा अब वय और अनुभव से पकी हुई चर्चित साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी हैं। स्त्री विमर्श के नाम पर अश्लीलता भरे बयानों की दुकानदारी करने वाले साहित्यकारों के खिलाफ कुछ खुलकर वह बोलती नहीं, लेकिन कहती हैं, कीचड़ कहां-कहां है, दुनिया जानती है, मैं क्योंकर कहूं? इन्हीं नासिरा से बेबाक बातचीत की चण्डीदत्त शुक्ल ने।
स्त्री विमर्श के नाम पर देह की जिस स्वच्छंदता की बात मौजूदा दौर की कुछ नारी साहित्यकार कर रही हैं, आप उससे कितना इत्तफाक रखती हैं?
औरत को उसकी पूरी आजादी मिलनी चाहिए। वह चाहे अपना जीवनसाथी चुनने की हो या प्रेमी के रूप में किसी के चयन की आजादी हो। हां, प्राथमिक तौर पर यह गलत है क्योंकि इससे कई घर बिखरते हैं। अपनी देह किसी को दे दें, यह कोई आजादी नहीं है। देह को लेकर तरह-तरह के बंधनों से मुक्ति ही सभी पीड़ाओं का जवाब होती तो यूरोपीय समाज, अमेरिका और लंदन की स्त्रियों की आंखों में आंसू न होते।
लेकिन साहित्य में तो इस स्वच्छंदता की खूब हिमायत हो रही है?
कुछ लोग करते हैं-सिर्फ सनसनी के लिए लेकिन उनका उत्कर्ष बहुत कम देर का होता है। बाद में कोई पूछता भी नहीं। स्त्री विमर्श से हटकर अब संपूर्ण साहित्य की बात करें। मठाधीशी, खेमेबंदी और सियासत, ये सब साहित्य का अंग तो कभी न थे। अब क्योंकर हो गए? जलन और हसरत हर एक के मन में होती है। जब कुछ अच्छा कोई लिखता है, तो एकबारगी होता ही है, काश! मैं इतना अच्छा रच पाता? जलन के भाव में कहते हैं, यह मैं क्यों नहीं कर पाया? उसने कैसे कर लिया? अब यह भाव सकारात्मक हो तब तो रचनात्मकता विकसित होती है। कुछ बेहतर सर्जन हो पाता है। एकदम अलग धरती पर जाकर सोता फूटता है। नकारात्मक चिंतन होने पर चीजें बिगड़ने लगती हैं और यहीं से साहित्य में सियासत का उद्गम होता है। दूसरे, एक बात और है, विज्ञापन युग और लेखन, बाजार व साहित्यकार-दोनों अलग-अलग चीजें हैं। इन्हें जब भी गड्डमड्ड किया जाता है तो तरह-तरह की सियासत जन्म लेने लगती है। मतलब साहित्य में सियासत बाजार के प्रभाव से ही संचालित होती है? बेशक! कई प्रकाशक कुछ बार अपनी जिम्मेदारियां निभाने से चूक जाते हैं। वे लेखक से कहते हैं, अपनी स्थिति का लाभ उठाइए, गोष्ठी कराइए, किताब हाईलाइट होगी। आदि-इत्यादि। यहीं पर सर्जन से इतर सियासत शुरू हो जाती है। किंतु कुछ जगह तो परस्पर निंदा-प्रशंसा का बहुत जोर है? अब जो लोग अपनी प्राइवेट पत्रिकाएं निकाल रहे हैं, उन्हें भी तो पैसा चाहिए? अब वे कुछ पैसा लेकर दो-चार चीजें किसी की छाप दें। इस पर कुछ विवाद खड़ा हो जाए तो यह सामान्य ही है?
किसका नाम लेंगी?
किसी का नहीं। आज का दौर हर तरह की अति के विरुद्ध है। वह चाहे किसी को प्रतिष्ठित करने के लिए की गई अति हो या किसी और तरह की? अब मैं क्योंकर किसी का नाम लूं? सच बोलने का जोखिम तो साहित्यकारों को ही उठाना है? सच किसी से छिपा है क्या? वैसे भी कीचड़ में घुसकर कमल रोपने की कोशिश मैं नहीं करना चाहती। पाठकों को सबकुछ पता है। आप यह तो नहीं कहना चाहतीं कि जो लोग साहित्य में विवाद खड़े करने की कोशिशें कर रहे हैं, वे मीडियाकर्स हैं? मुझसे किसी सनसनी की उम्मीद न कीजिए। कौन औसत प्रतिभा का है और कौन योग्य, इसका मूल्यांकन पाठक ही करेंगे। आपका काम जितना चर्चित है, उसके बरक्स आप वाद-विवाद के केंद्र में क्यों नहीं घिरतीं मैं चाहती हूं कि मेरी कलम को लोग जानें, सराहें और उससे भी ज्यादा समझें। यही वजह है कि मैं साहित्यिक सम्मेलनों में भी कम ही जाती हूं। विवादों से प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं होता।
दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरे स्तंभ--बेबाक बातचीत---की एक कड़ी
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बड़े भ्रम में होते हैं विवाद खड़ा करने वाले - प्रयाग शुक्ल

(इस साक्षात्कार के साथ प्रकाशित चित्र श्री तनवीर फारूक़ी जी का खींचा हुआ है....इस पर उनका कॉपीराइट है...उनके ब्लॉग से ही ये चित्र साभार लिया गया है...)
रोज बदल रही दुनिया में मैं एकांतवासी की भूमिका में हूं.. कहकर सहसा गंभीर हो गए उस शख्स को आप पलायनवादी न समझें। शीरीं जुबान से आप कैसे हैं? पूछ अपनी मृदुता से मुग्ध कर देने वाले प्रयाग शुक्ल चर्चा में रहने के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों से दूर बैठकर भी संतुष्ट हो चुके शख्स हैं..तकरीबन छल-छद्म की दुनिया से अलग-थलग अपने निज के संसार में प्रसन्न सर्जक। दिनमान और नवभारत टाइम्स में महत्वपूर्ण पदों पर कई साल नौकरी कर चुके प्रयाग से रविवार के अलावा हफ्ते भर मंडी हाउस स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में निदेशक के कमरे के ठीक बगल रंग-प्रसंग के दफ्तर में बेझिझक मिला जा सकता है। प्रयाग इन दिनों रानावि की पत्रिका रंग प्रसंग के संपादक हैं और संवेदनशील कवि के रूप में उनकी पहचान तो जग-जाहिर है ही। प्रयाग से हमने जाना साहित्य की दुनिया में हो रही सियासत, युवाओं के मोहभंग और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में : क्या यह क्रूर सत्य नहीं कि साहित्य समाज के लिए की परिभाषा 21वीं सदी की दहलीज तक आते-आते औंधे मुंह गिर गई है? साहित्य तो बराबर समाज के लिए ही लिखा जाता रहा है। कुछ दिक्कतें जरूर हो सकती हैं। हिंदी में हालात कुछ ऐसे हुए हैं कि लेखक का समाज नहीं बचा है। 20 साल पहले तक शहर से बाहर कहीं जाने पर या फिर अपने आस-पास पाठक समाज के दर्शन हो जाते थे। आज वह कहीं नजर नहीं आता। पाठकों के लिहाज से हम दरिद्र कहां हैं? हिंदी अखबार तो करोड़ से भी ज्यादा पाठकों को संजो रहे हैं? यह एक विचित्र बात है कि एक करोड़ से भी ज्यादा हिंदी अखबार बिक रहे हैं लेकिन किताबें उसी रफ्तार से घटती जा रही हैं। अखबारों को सूचना के लिहाज से तो बढ़त मिल गई है लेकिन मुद्रित साहित्य लुप्त होने की स्थिति तक पहुंच रहा है। आपकी मूल चिंता क्या है? किताबों के प्रति मोहभंग या फिर कुछ और..? हम अपनी विरासत को ही भूलते जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो क्या है कि लोग प्रेमचंद, सुभद्राकुमारी चौहान, भगवती चरण वर्मा को भी भूल बैठे हैं। जो पीढ़ी अपनी जड़ें भुला देगी, वह खुद कैसे पनपेगी? अखबारों ने तो साहित्य के संरक्षण के लिए काम किया है? अखबारों को साहित्यिक बनाने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। कुछ जगह साहित्य के पृष्ठ भी निकाले जा रहे हैं लेकिन अव्यवस्थित ढंग से। इससे बेहतर तो यह है कि धरोहर पर केंद्रित करके बिसरे जा रहे साहित्यकारों की रचनाओं, विचारों को प्रकाशित किया जाए। अब साहित्यिक पृष्ठ तो निकल रहे हैं लेकिन कई अवांछित विज्ञापन साहित्य के उसी पन्ने को जबरिया घेर लेते हैं। इस बात का कभी दुख नहीं होता कि लोग मुझे बहुत बार नहीं पहचान पाते। न पहचानें, लेकिन साहित्य के अमर लोगों को क्योंकर भुला दिया जाता है? लिखने के लिए पहचाने जाने वाले साहित्यकार आज स्कैंडलों के लिए ज्यादा मशहूर क्यों हैं? कुछ साहित्यकार आश्वस्त नहीं हैं कि समाज उनके साथ है, शायद इसीलिए ऐसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आम तौर पर हिंदी का लेखक समझ नहीं पा रहा है कि समाज बदल रहा है। शहर में शोर मचाकर खुद को छपवाने में लगे लेखक लोगों के बीच जाकर उनकी दिक्कतें समझें, फिर लिखें तो स्वीकार्यता जरूर मिलेगी। एक खास बात यह भी है कि विवादों से कुछ नहीं होने-जाने वाला। ऐसा करने वाले लोग बहुत बड़े भ्रम में हैं। वे इतनी छोटी दुनिया में रह रहे हैं, जहां से बाहर का नजारा उन्हें नजर नहीं आता। औसत प्रतिभा का संक्रमण सचेत साहित्य संसार को दूषित तो नहीं कर रहा? मैं चीजों को किसी एक औसत परिभाषा में बांधने के विरुद्ध हूं। प्रतिभा भी औसत नहीं हो सकती। प्रतिभा की कहीं कमी नहीं है लेकिन उसका उपयोग सही तरीके से नहीं हो रहा है। साहित्य की दुनिया में त्रुटियां यह हुई हैं कि हम युवाओं की नब्ज नहीं पकड़ सके हैं इसीलिए उन्हें हम अपनी ओर नहीं खींच पा रहे हैं। साहित्यिक कार्यक्रम इतने फीके क्यों पड़ गए हैं? फिल्मों, चित्र प्रदर्शनियों, नाटकों, नृत्य के कार्यक्रमों व संगीत जगत के प्रति तो युवा आकर्षित हो रहे हैं लेकिन साहित्यिक गोष्ठियों में अब भी युवा पीढ़ी की भागीदारी के नाम पर सन्नाटा ही नजर आता है। आज का युवा बौद्धिक तौर पर सजग और संभला हुआ है। असल गड़बड़ कई साहित्यिक संस्थाओं की तरफ से हुई है। उनकी नीतियां अस्पष्ट और भ्रामक हैं। युवाओं के लिए वह ऐसा कुछ नहीं दे पा रही हैं, जो नौजवान पीढ़ी चाहती है। समाज बदला है, पीढ़ी बदली है, उनकी आकांक्षाएं बदली हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पा रहे हैं। पहले तो मुद्रित शब्दों के प्रति लोग आस्थावान थे, अब वह प्रतिबद्धता क्यों नहीं रही? पहले समाज में दूसरी कलाएं इतने प्रभावकारी ढंग से उपस्थित नहीं थीं। अब साहित्य के लिए अन्य कलाओं को औजार बनाकर इस्तेमाल करना होगा। कला को औजार की तरह इस्तेमाल करने के संदर्भ में आपकी पहल तो काफी प्रासंगिक बन सकती है, क्योंकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का मंच तो आपके साथ है ही। श्रुति कार्यक्रम इस कोशिश की गवाही है। कहानी-कविता के मंचन के जरिए ऐसा प्रयास हमने किया है। कई अनचीन्हे साहित्यधर्मियों को मंच देने का उपक्रम भी हुआ है। आगे भी हम ऐसा करते रहेंगे। विष्णु खरे ने कहीं कहा है कि आपकी कविताएं उन्हें कविता जैसी नहीं लगतीं? यह उनकी राय है और वे ऐसी सोच रखने के लिए स्वतंत्र हैं। इस पर मैं क्या कहूं और क्यों कहूं? क्या रंग-प्रसंग बहुत बौद्धिक नहीं होता जा रहा है? सूचना-तकनीक की समृद्धता वाले युग में कार्यक्रमों की सूचनाएं छापना बासी थाली परोसने जैसा है। विचारों की पुष्टता सर्वाधिक आवश्यक है। इन दिनों क्या कर रहे हैं? रवींद्रनाथ ठाकुर की 12 कहानियों का अनुवाद मैंने पूरा कर लिया है। स्कॉलॉस्टिक प्रकाशन इस भावानुवाद को प्रकाशित कर रहा है। वैसे, शोर मचाने वालों की दुनिया में मैं एकांतवासी की भूमिका में हूं। मुझे तत्काल लाभ की चिंता के बगैर काम करना अधिक सुख देता है। भविष्य की नींव ऐसे ही खड़ी होती है।
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इंटरनेट पर सवार भोजपुरी

कुछ दिन पहले तक यह सोचना भी मुश्किल था कि लिट्टी-चोखा का जायका इंटरनेट के जरिए फिजी तक पहुंच सकेगा या फिर मॉरिशस में रहने वाले, 71 वर्षीय सौरव परमानंद वेबसाइट पर भोजपुरी का लेख पढ़ सकेंगे। हालांकि अब माहौल बदल चुका है। गंवई भाषा कही जाने वाली भोजपुरी एबीसीडी, यानी आरा, बलिया, छपरा, देवरिया की सीमा से बाहर निकलकर सिंगापुर, सूरीनाम, वेस्टइंडीज, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, चीन और जापान समेत 49 देशों तक पहुंच रही है। दरअसल, इन दिनों इंटरनेट पर भोजपुरी से संबंधित वेबसाइट्स की भरमार है। यहां न सिर्फ देशी व्यंजन बनाने की विधि उपलब्ध है, बल्कि ऑर्डर देकर सतुआ, पंचांग, चीनिया केला, गमछा और जर्दा भी मंगाया जा सकता है। गौरतलब है कि 23 नवंबर, 2005 को 43 देशों के 11 हजार, 56 लोगों ने बिहार के विधानसभा चुनाव परिणामों की जानकारी हासिल करने के लिए इन साइट्स की मदद ली। कई लोग भोजपुरिया शादी विकल्प से मनपसंद साथी ढूंढने की कोशिश भी कर रहे हैं। गीत-संगीत की बात करें, तो http://madhu90210।tripod।com/id23।html पर लॉग ऑन कर मनोज तिवारी मृदुल के बगलवाली जान मारली और शहर के तितली घूमे होके मोपेड पे सवार का आनंद लिया जा सकता है, जबकि गुड्डू रंगीला के हमरा हऊ चाहीं व ऐ चिंटुआ के दीदी तनी प्यार करै दे गीत भी साइट पर उपलब्ध हैं। en।wikipedia।org/wiki/Bhojpuri_language पर विजिट कर जाना जा सकता है कि इंडो-ईरानियन लैंग्वेज श्रेणी के तहत भोजपुरी किस स्थान पर है। भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका की वेबसाइट की शुरुआत का हो, का हाल बा! के अपनत्व भरे संबोधन के साथ होती है, वहीं http://222।bhojpuri2orld।org/क्लिक करने पर राउर स्वागत बा जैसी इबारत पढ़ने को मिलती है। यहां लागी नाहीं छूटे रामा, गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबौ, बलम परदेसिया और गंगा किनारे मोरा गांव जैसी चर्चित फिल्मों के गीत भी सुने जा सकते हैं। वैसे, पिछले दिनों डिजिटल एंपावरमेंट फाउंडेशन द्वारा मुंबईवासी शशि सिंह और सुधीर कुमार की भोजपुरिया।कॉम वेबसाइट को ई कल्चर श्रेणी में पहला पुरस्कार मिलने के साथ यह बात प्रमाणित हो गई है कि साइबर की दुनिया में भोजपुरी धीरे-धीरे ही सही, धाक जमा रही है।
स्टील को बनाया सोना

विश्व की नंबर दो यूरोपीय इस्पात कंपनी आर्सेलर के रूस की नंबर-एक कंपनी सेवरस्ताल के साथ विलय की घोषणा के बावजूद स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल अपनी परियोजना को ताकतवर बताने में जुटे हैं। नाम और संपदा, दोनों के लिहाज से लक्ष्मी निवास बने मित्तल न केवल विश्व के तीसरे रिचेस्ट व्यक्ति (फोर्ब्स के अनुसार) और पहले नंबर पर कायम धनी भारतीय हैं, बल्कि वे 2006 में 14.8 बिलियन डॉलर की संपदा के साथ ब्रिटेन के सर्वाधिक धनी एशियन की कुर्सी पर कब्जा भी जमाए हुए हैं। भविष्य को राह दिखाने वाली उनकी सोच और शक्ति का लोहा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मानते हैं, तभी तो उन्होंने कुछ अरसा पहले मित्तल से अपील की थी, आप अपने होमलैंड लौट आएं और भारतीय स्टील उद्योग के निर्माण में मदद करें..। हालांकि उपलब्धियों और प्रशंसा से दूर लक्ष्मी मित्तल के कदम थमते नहीं। लक्ष्मी केवल व्यापारी नहीं हैं, वे भारत को प्रोफे लक्ष्मी निवास मित्तल ने स्टील उद्योग को भी सोने की खदान बना दिया। इसके पीछे दूरदृष्टि और कड़ा परिश्रम ही प्रमुख कारक हैं ..
ेशनलिज्म से लैस भी करना चाहते हैं। 360 मिलियन की लागत से राजस्थान सरकार के साथ मिलकर एलएनएम फाउंडेशन के आईटी इंस्टीटयूट की जयपुर में स्थापना से तो यही लगता है। कोलकाता में जन्मे लक्ष्मी रहते भले ही लंदन में हों, लेकिन उनकी जड़ें भारत में गहरे तक हैं। झारखंड में स्टील प्रोडक्शन ग्रीनफील्ड यूनिट की शुरुआत का फैसला इसी बात को साबित करता है। 2002 तक 8.7 बिलियन डॉलर टर्न ओवर का व्यापार करने वाला मित्तल समूह देखते ही देखते यदि कई गुना प्राफिट हासिल करने लगा, तो यह कोई चमत्कार नहीं था। दरअसल, बिना रिस्क के गेम नहीं होता। लक्ष्मी मित्तल जब 26 साल के थे, तभी उन्हें व्यापार संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई थी।
इंडोनेशिया में स्टील कंपनी स्थापित कर लक्ष्मी विश्व के स्टील किंग बने, तो इसके पीछे साफ दृष्टि व कठोर श्रम का ही हाथ है। इस्पात इंटरनेशनल एनवी, इस्पात कारमेट व इंडो इस्पात जैसी 12 कंपनियों के मालिक लक्ष्मी व्यापार में भी सक्रिय हैं। उन्हें एक जुनून भी है-बीमार पड़ी स्टील कंपनियों को खरीदना और चमकते सोने में बदल देना।
कनाडा से त्रिनिदाद व टोबैगो से कजाकिस्तान व इंडोनेशिया तक व्यापार कर रहे मित्तल यह बताने में सफल रहे हैं कि जुनून हो, तो स्टील भी बन सकता है सोना!
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लक्ष्मी मित्तल,
सोना....
योग्यता से पाई ऊंचाई

तेज-तर्रार, लेकिन नम्र हैं। खासे पढ़े-लिखे और नई पीढ़ी को बढ़ावा देने वाले, यानी महिंद्रा एंड महिंद्रा के मैनेजिंग डायरेक्टर आनंद महिंद्रा। हार्वर्ड सरीखे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट और आर्ट्स की डिग्री भी हासिल की है।
1981 में आनंद भारत लौटे। सबसे पहले उन्होंने महिंद्रा युगिन स्टील कंपनी लिमिटेड के साथ बतौर एक्जिक्यूटिव असिस्टेंट काम शुरू किया। बाद में वे कंपनी के फाइनेंस डायरेक्टर बने और 1989 में उन्हें प्रेसिडेंट व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी सौंपी गई। 4 अप्रैल, 1991 को आनंद महिंद्रा एंड महिंद्रा के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठे। कुछ ही साल में कंपनी के शीर्ष पद पर पहुंचे आनंद की शुरुआत को पहले गंभीरता से नहीं लिया गया। आनंद की कोशिशों को ज्यादातर लोगों ने एक व्यावसायिक परिवार के लाडले की शुरुआत का नाम दिया।
हालांकि म बेशक आनंद महिंद्रा सफल उद्योगपति हैं, लेकिन इससे अलग उनकी चर्चा युवा प्रतिभाओं को अवसर प्रदान करने वाले काबिल और संवेदनशील इंसान के रूप में भी होती है..
मुंबई के महिंद्रा टॉवर में तैयार की गई योजनाओं को सफलता के साथ लागू कर आनंद ने साबित कर दिया कि उनकी नियुक्ति महज पारिवारिक उपहार नहीं है, बल्कि वे बिजनेस के जानकार व उपयुक्त व्यक्ति हैं। 1994 में आनंद के अंकल केशब के कंपनी के कामकाज से किनारा कर लेने के बाद आनंद पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई-योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने के साथ-साथ सफलता के साथ कामकाज चलाने की। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया है, पहले हम जीप और ट्रैक्टर की बिक्री भर करते थे, लेकिन 1994 के बाद हमने योजना बनाई कि कारोबार को और विस्तार देना होगा।
2002 में आनंद ने देश की अत्याधुनिक स्पोर्ट्स वेहिकल स्कॉर्पियो लॉन्च की और उसे लोगों के बीच प्रिय बनाने का काम भी किया।
इसके अलावा कोटक महिंद्रा फाइनेंस व हार्वर्ड बिजनेस स्कूल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की स्थापना समेत आनंद ने कई ऐसे काम किए, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना दिया। गौर करने वाली बात यह है कि आर्थिक विषयों पर आनंद लगातार लिखते-पढ़ते भी रहते हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निदेशक के रूप में उनकी सक्रियता भी लोगों को अब तक याद है। वे कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के प्रेसिडेंट बने और एग्रिकल्चर काउंसिल के कामकाज पर खास ध्यान देकर खेतीबाड़ी की दुनिया को स्टैब्लिश करने का अभियान छेड़ दिया। इसी तरह केसी महिंद्रा एजुकेशनल ट्रस्ट के ट्रस्टी और महिंद्रा युनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज ऑफ इंडिया के गवर्नर के रूप में आनंद कुछ रिपोर्ट्स पढ़कर ही संतुष्ट नहीं हो जाते, बल्कि नई प्रतिभाओं को उचित मंच देने की कोशिश में लगातार जुटे रहते हैं। खुशी की बात यह है कि आनंद अब भी न थके हैं, न रुके हैं, बल्कि चेन्नई में एक रिअॅल इस्टेट प्रोजेक्ट को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। पिछले दिनों एक मीडिया प्रतिनिधि से बातचीत में उन्होंने माना कि टीवी कैमरे उनकी गर्दन के पास रहते हैं और उनसे बचने के लिए वे किसी स्टंटमैन की तरह इधर-उधर भागते रहते हैं, लेकिन यह कोशिश मीडिया से अरुचि के कारण नहीं है। सच तो यह है कि स्टार बनने से ज्यादा जरूरी उनके लिए समय पर अपना काम पूरा करना है।
रिअॅल इस्टेट, हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट, ट्रैक्टर-जीप निर्माण, फाइनेंस, समाजसेवा..जाने कितने ही अलग-अलग क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित करने वाले आनंद ने बहुत कम समय में साबित कर दिया है कि उनकी कामयाबी कोई घरेलू उपहार नहीं है, बल्कि यह सफलता उन्होंने काबिलियत के दम पर हासिल की है।
दैनिक जागरण के जोश सप्लिमेंट में प्रकाशित
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आनंद महिंद्रा,
शख्सियत
शस्त्र और शास्त्र के महारथी परशुराम

हमहि तुम्हहि सरिबरि कस नाथा / कहहु न कहां चरन कहं माथा / राम मात्र लघु नाम हमारा / परसु सहित बड़ नाम तोहारा..। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिनका सादर नमन करते हों, उन शस्त्रधारी और शास्त्रज्ञ भगवान परशुराम की महिमा का वर्णन शब्दों की सीमा में संभव नहीं। वे योग, वेद और नीति में निष्णात थे, तंत्रकर्म तथा ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी पारंगत थे, यानी जीवन और अध्यात्म की हर विधा के महारथी।
विष्णु के छठे अवतार परशुराम पशुपति का तप कर 'परशु' धारी बने और उन्होंने शस्त्र का प्रयोग कुप्रवृत्तियों का दमन करने के लिए किया। कुछ लोग कहते हैं, परशुराम ने जाति विशेष का सदैव विरोध किया, लेकिन यह तार्किक सत्य नहीं। तथ्य तो यह है कि संहार और निर्माण, दोनों में कुशल परशुराम जाति नहीं, अपितु अवगुण विरोधी थे। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में 'जो खल दंड करहुं नहिं तोरा/भ्रष्ट होय श्रुति मारग मोरा' की परंपरा का ही उन्होंने भलीभांति पालन किया। परशुराम ने ऋषियों के सम्मान की पुनस्र्थापना के लिए शस्त्र उठाए। उनका उद्देश्य जाति विशेष का विनाश करना नहीं था। यदि ऐसा होता, तो वे केवल हैहय वंश को समूल नष्ट न करते। जनक, दशरथ आदि राजाओं का उन्होंने समुचित सम्मान किया। सीता स्वयंवर में श्रीराम की वास्तविकता जानने के बाद प्रभु का अभिनंदन किया, तो कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन करने में भी परशुराम ने संकोच नहीं किया। कर्ण को श्राप उन्होंने इसलिए नहीं दिया कि कुंतीपुत्र किसी विशिष्ट जाति से संबंध रखते हैं, वरन् असत्य वाचन करने के दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत हो जाने का श्राप दिया था। कौशल्या पुत्र राम और देवकीनंदन कृष्ण से अगाध स्नेह रखने वाले परशुराम ने गंगापुत्र देवव्रत (भीष्म पितामह) को न सिर्फ युद्धकला में प्रशिक्षित किया, बल्कि यह कहकर आशीष भी दी कि संसार में किसी गुरु को ऐसा शिष्य पुन: कभी प्राप्त न होगा!
पौराणिक मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया को ही त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। इसी दिन, यानी वैशाख शुक्ल तृतीया को सरस्वती नदी के तट पर निवास करने वाले ऋषि जमदग्नि तथा माता रेणुका के घर प्रदोषकाल में जन्मे थे परशुराम।
परशुराम के क्रोध की चर्चा बार-बार होती है, लेकिन आक्रोश के कारणों की खोज बहुत कम हुई है। परशुराम ने प्रतिकार स्वरूप हैहयवंश के कार्तवीर्य अर्जुन की वंश-बेल का 21 बार विनाश किया था, क्योंकि कामधेनु गाय का हरण करने के लिए अर्जुनपुत्रों ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी थी। भगवान दत्तात्रेय की कृपा से हजार भुजाएं प्राप्त करने वाला कार्तवीर्य अर्जुन दंभ से लबालब भरा था। उसके लिए विप्रवध जैसे खेल था, जिसका दंड परशुराम ने उसे दिया। ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि सहस्त्रबाहु ने परशुराम के कुल का 21 बार अपमान किया था। परशुराम के लिए पिता की हत्या का समाचार प्रलयातीत था। उनके लिए ऋषि जमदग्नि केवल पिता ही नहीं, ईश्वर भी थे। इतिहास प्रमाण है कि परशुराम ने गंधर्वो के राजा चित्ररथ पर आकर्षित हुई मां रेणुका का पिता का आदेश मिलने पर वध कर दिया था। जमदग्नि ने पितृ आज्ञा का विरोध कर रहे पुत्रों रुक्मवान, सुखेण, वसु तथा विश्वानस को जड़ होने का श्राप दिया, लेकिन बाद में परशुराम के अनुरोध पर उन्होंने दयावश पत्नी और पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया।
पशुपति भक्त परशुराम ने श्रीराम पर भी क्रोध इसलिए व्यक्त किया, क्योंकि अयोध्या नरेश ने शिव धनुष तोड़ दिया था। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में संदर्भ है कि भगवान परशुराम ने वैष्णव धनुष पर शर-संधान करने के लिए श्रीराम को कहा। जब वे इसमें सफल हुए, तब परशुराम ने भी समझ लिया कि विष्णु ने श्रीरामस्वरूप धारण किया है।
परशुराम के क्रोध का सामना तो गणपति को भी करना पड़ा था। मंगलमूर्ति ने परशुराम को शिव दर्शन से रोक लिया था, रुष्ट परशुराम ने उन पर परशु प्रहार किया, जिससे गणेश का एक दांत नष्ट हो गया और वे एकदंत कहलाए।
अश्वत्थामा, हनुमान और विभीषण की भांति प्रभुस्वरूप परशुराम के संबंध में भी यह बात मानी जाती है कि वे चिरजीवी हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है, 'अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:/कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:'।
ऐसे समय में, जब शास्त्र की महिमा को पुन: मान्यता दिलाने की आवश्यकता है और शस्त्र का निरर्थक प्रयोग बढ़ चला है, भगवान परशुराम से प्रेरणा लेकर संतुलन बनाने की आवश्यकता है, ताकि मानव मात्र का कल्याण हो सके और मानवता त्राहि-त्राहि न करे।
दैनिक जागरण में प्रकाशित
गैरेज से शिखर तक

15देश, 100 से ज्यादा कार्यालय, 30 हजार से ज्यादा कर्मचारी-अधिकारी और दुनिया भर के कंप्यूटर व्यवसायियों, उपभोक्ताओं का विश्वास..शिव नाडार अगर सबकी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं, तो इसके केंद्र में उनकी मेहनत, योजना और सूझबूझ ही है।
अगस्त 1976 में एक गैरेज में उन्होंने एचसीएल इंटरप्राइजेज की स्थापना की, तो 1991 में वे एचसीएल टेक्नोलॉजी के साथ बाजार में एक नए रूप में हाजिर हुए। पिछले तीन दशक में भारत में तकनीकी कंपनियों की बाढ़-सी आ गई है, लेकिन एचसीएल को उत्कर्ष तक ले जाने के पीछे शिव नाडार का नेतृत्व ही प्रमुख है। नाडार की कंपनी में बड़े पद तक पहुंचना भी आसान नहीं होता। शिव ने एक बार कहा था, मैं नेतृत्व के अवसर नहीं देता, बल्कि उन लोगों पर निगाह रखता हूं, जो कमान संभाल सकते हैं। एचसीएल में उन्होंने इसका व्यावहारिक परीक्षण भी किया है। उनके कई कर्मचारी एक के बाद एक जिम्मेदारियां सं 60 साल का होने के बावजूद वे युवाओं से भी तेज गति के साथ काम करते हैं। आइए मिलते हैं 16 हजार, 625 करोड़ की कंपनी हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड (एचसीएल) के सीईओ और चिर युवा शिव नाडार से..
ंभालते हुए जब सफल साबित हुए, तो शिव ने उन्हें बड़े पद देने में कभी हिचक नहीं दिखाई। एचसीएल की विभिन्न शाखाओं, मसलन-इन्फोसिस्टम्स, फ्रंटलाइन सॉल्यूशंस, कॉमेट और एचसीएल अमेरिका के लिए उच्चाधिकारी चुनने में नाडार ने इसी रणनीति का इस्तेमाल किया है। कुछ साल पहले फोर्ब्स की सूची में शामिल धनी भारतीयों में से एक, नाडार 1968 तक तमिलनाडु की डीसीएम कंपनी में काम करते थे। उन्होंने अपने साथ के छह लोगों को प्रेरणा दी, क्यों न एक कंपनी खोली जाए, जो ऑफिस इक्विपमेंट्स बनाए। फलत: 1976 में एचसीएल की नींव पड़ी। 1982 में जब आईबीएम ने एचसीएल को कंप्यूटर मुहैया कराना बंद कर दिया, तब नाडार और उनके साथियों ने पहला कंप्यूटर भी बना लिया। फिलहाल, हालत यह है कि एचसीएल की 80 फीसदी आमदनी कंप्यूटर और ऑफिस इक्विपमेंट्स से ही होती है। फरवरी 1987 में चर्चित पत्रिका टाइम ने लिखा था, पूरी दुनिया नाडार की सोच और भविष्य के लिए तैयार किए गए नेटवर्क को देखकर आश्चर्यचकित और मुग्ध है। दरअसल, नाडार का साम्राज्य अर्थशास्त्र और शासन को नई परिभाषा देने वाला है। वैसे, तकरीबन तीन दशक पहले जब नाडार ने कंपनी स्थापित की थी, तो यह एक दांव की तरह ही था। तमिलनाडु में पहले नौकरी छोड़ना और बाद में दिल्ली में क्लॉथ मिल की जमी-जमाई जॉब को भी ठोकर मार देना..ऐसा साहस नाडार ही कर सकते थे, लेकिन वे न सिर्फ कामयाब हुए, बल्कि उन्होंने साथियों और निवेशकों का भरोसा भी जीता। मधुरभाषी नाडार बताते हैं, पिछले तीन-चार दशक में मैंने देखा है कि आईटी इंडस्ट्री का काफी विकास हुआ है। खासकर, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, सर्विसेज, सॉल्यूशंस, नेटवर्किग, कम्युनिकेशन, इंटरनेट और आईटी इन्फ्रॉस्ट्रक्चर की दिशा में काफी संभावनाएं बढ़ी हैं। मैंने समय रहते अवसर पहचान लिया और इसीलिए कामयाब भी हुआ।
उनकी सोच का लोहा माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भी मानते हैं, तभी तो 1996 में जब वे भारत आए, तब उन्होंने कंप्यूटर की दुनिया से जुड़े लोगों में सबसे पहले शिव नाडार से मुलाकात की। नाडार के जीवन में एक और बात राहत देने वाली है..वे कारोबार में कितने ही व्यस्त क्यों न हों, पत्नी किरण और बेटी रोशनी के लिए वक्त निकालना कभी नहीं भूलते।
इन दिनों यूएस बेस्ड एनआरआई बन चुके नाडार ने बेहतर योजना, अनुशासन और टीमवर्क की बदौलत जो सफलता हासिल की है, वह चौंकाती तो है, उस राह पर बढ़ने की प्रेरणा भी देती है।
दैनिक जागरण के जोश सप्लिमेंट में प्रकाशित
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