कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Monday, July 4, 2011

वो तेरे प्यार का गम...

चर्चित संगीतकार दान सिंह को श्रद्धा-सुमन


- चण्डीदत्त शुक्ल
chandiduttshukla@gmail.com

बेदम, निचुड़ी-सूखी धरती ने इधर-उधर छिटके पानी से अपने पपड़ाए होंठ गीले करने की नाकाम कोशिश के बाद हाथ जोड़कर सूरज से कहा--क़हर बरपाना छोड़ो, फिर बादलों से गुहार की--निष्ठुर, कितना इंतज़ार करूं! उलाहना जैसे दिल में तीर की तरह लगा और सब के सब काले बादल जल बन धरती की ओर भाग निकले। देखते ही देखते जलधारा ने धरती का आलिंगन कर लिया। दोनों की प्यास बुझ चुकी थी। इन दिनों जयपुर का हाल ऐसा ही है। सरेशाम बारिश शुरू हो जाती है। बिल्डिंगों, टावर्स, परछत्तियों और बस स्टैंड्स के अंदर या फिर नीचे सिमटते हुए, बूंदों की फुहार चेहरे से होती दिल तक पहुंच जाती है...पर कोई भी मौसम क्या करे, जो मन कतरा-कतरा भरा हुआ हो। दिल भारी है और नसों में विदा का मद्धम शोकगीत बजता ही जा रहा है--वो तेरे प्यार का ग़म…!

दिल्ली की भीड़ से दूर, गुलाबी शहर में आना हरदम खुशी से भरपूर करता है। इस बार तो खैर, और, और ज्यादा खुशी थी। पहली वज़ह तो ज़रा पर्सनल-सी है पर दूसरा कारण था--उस शख्स से मिलने की आरज़ू, जो ज़िंदगी में बड़ी अहमियत रखता है। दान सिंह, खुद्दार और मनमौजी संगीतकार। महज इसलिए मुंबई छोड़ दी, क्योंकि समझौता करना शान के ख़िलाफ़ था। उनकी कितनी ही कृतियां चोरी हो गईं। मायानगरी में ठगे गए दान सिंह संकोची भी थे, लेकिन सिर झुका दें, ऐसी विनम्रता उन्होंने कभी नहीं ओढ़ी।

जि़क्र होता है जब कयामत का तेरे जलवों की बात होती है, तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है'...और वो तेरे प्यार का गम, इक बहाना था सनम, अपनी तो किस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया...ये नग्मे बचपन से जवानी तक हर अहसास के वक्त साथ रहे हैं, उनको रेशा-रेशा अहसास में लपेटकर वज़ूद में लाने वाले दान सिंह से मिलने की खुशी चेहरे से टपक रही थी। कवि मित्र दुष्यंत ने भरोसा दिलाया था कि वो मुझे उस शख्स से मिला देंगे, जिसे बिना देखे ही प्यार कर बैठा था। ठीक वैसे ही तो, जैसे ता-ज़िंदगी कुछ लोगों के साथ रहते हुए भी हम उनके मन का क़तरा भी नहीं छू पाते हैं। पर हम कहां मिल पाए। जयपुर आने के चंद रोज बाद ही पता चला कि वो बहुत बीमार हैं और फिर एक दिन वो चल दिए, ऐसे सफ़र पर, जहां से कोई लौटकर नहीं आता।

ऐसे मौकों पर शोक की महज रस्म-अदायगी नहीं होती। होश में रहा नहीं जाता। हज़म नहीं होती ये बात-हाय, वो चला गया, जो दिल के इतने क़रीब था...यूं, अब भी एक अजीम फ़नकार से ना मिल पाने का ग़म तारी है। ऐसे ही मौकों पर याद आते हैं तीन और चेहरे। ज्यूं, दान सिंह के गानों का ज़िक्र ना हो, तो शायद आम लोग उन्हें पहचान भी ना पाएं, ऐसे ही तो थे वे तीनों भी। महेश सिद्धार्थ, कॉमरेड फागूराम और बिरजू चाचा। नहीं, ये सब के सब ऐसे लोग नहीं, जिन्हें दुनिया-जहान जानता था पर थे सब क़माल के। महेश सिद्धार्थ अपने ज़माने का ऐसा खिलाड़ी, जिस पर लड़कियां जान देतीं। बाद में थिएटर में पूरी ज़िंदगी लगा दी। कॉमरेड फागूराम सिद्धांतों में ऐसे रमे कि सर्वहारा समाजवादी क्रांति की फ़िक्र में कभी दो वक्त की पुरसुकून रोटी की परवाह नहीं की और बिरजू चाचा, यूं तो बुक स्टॉल चलाते थे, लेकिन पढ़ने-लिखने के संस्कार उन्होंने शहर के सैकड़ों लड़कों को ज़बरन ही दिए। बिना पैसे लिए। ये सब भी बीते बरसों में नहीं रहे और अब दान सिंह भी नहीं!

आप सोच सकते हैं कि एक अजीम संगीतकार का ज़िक्र करते हुए तीन तकरीबन अनजाने लोगों की बात क्यों? सो इसका क्या जवाब दें। बस यूं ही समझ लीजिए, हर ज़ुदाई कुछ और खाली कर देती है। इन चारों में एक समानता भी तो थी, ये सब के सब इंसानियत और इंसान को भरपूर बनाने की ख्वाहिश से भरपूर थे। एक के पास बदलाव के लिए संगीत का सपना था, तो बाकियों के लिए क्रांति, रंगमंच और किताबों के हथियार और औजार थे। ये सब अब नहीं हैं, लेकिन उनकी आंखों में देखे सपने तो हम अपनी पुतलियों में सजा सकते हैं। शोक में डूबे रहकर मैं इस बारिश को दरकिनार करता रहा...पर अब उन सबके जाने की उदासियों पर परदा डालने के लिए निकलता हूं। कल ही गांव से ख़बर मिली है, पड़ोस में गाय ने बछिया दी है और चचेरे भाई के घर बेटा जन्मा है। सच, जीवन कभी नहीं थमता। दान सिंह ने भी तो सत्तर की उम्र में गजेंद्र श्रोत्रिय की फ़िल्म भोभर के गीत को संगीत से संवारा। उन्हें सही श्रद्धांजलि तो यही होगी कि हम जमकर भीगें और कोशिश करें...बुन सकें दान सिंह जैसा एक नग्मा, महेश की तरह का कोई नाटक, फागूराम जैसा एक क्रांति गीत गुनगुनाएं और बिरजू चाचा के यहां से उठाकर पढ़ लें एक अच्छी-सी क़िताब। ये सब अकेले नहीं होगा बिरादर। आप साथ आएंगे ना? 

संप्रति : फीचर संपादक, दैनिक भास्कर मैगज़ीन डिवीज़न, जयपुर

Thursday, April 14, 2011

दूसरों की बात छोड़िए, अपनी आत्मा से तो न्याय कीजिए

विचार : समाचार4मीडिया से साभार

- चण्डीदत्त शुक्ल
जिस दौर में पत्रकारिता की मूर्छावस्था और मृत्यु की समीपता तक की बातें कही जा रही हैं, उस समय में नैतिकता के सवाल मायने ही नहीं रखते। सच तो यह है कि ये विधा, जो कभी मिशन थी, फिर प्रोफेशन बनी, अब विश्वसनीयता और जिजीविषा के संकट से घिरी है। हालांकि भयानक नैराश्य के माहौल में भी, इस तथ्य और सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि टीआरपी के विष-बाण से ग्रस्त टेलीविजन पत्रकारिता और पेड न्यूज़ के संक्रमण से ग्रस्त हुई प्रिंट जर्नलिज्म के कर्मचारी लगातार अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे हैं। यही नहीं, अपनी सीमित कोशिशों में वे पत्रकारिता और खुद को बचाने की जद्दोज़हद कर रहे हैं।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि संपादकों के मैनेजर बनते चले जाने की स्थितियां किस हद तक पत्रकारिता को सजीव और सजग बनाए रख सकेंगी। बहुत कम ही हैं, जिनकी भाषा प्रखर हो, इरादा स्पष्ट और जो सचमुच पत्रकार बनने के लिए इस फील्ड में आ रहे हों। वैसे, इस सबको `फ्रस्ट्रेशन’ मानकर आप खारिज़ भी कर सकते हैं, लेकिन फ़िल्म स्टार, आईएएस, नेता या फिर क्लर्क भी ना बन पाने की स्थिति में, चलो पत्रकार ही बन लिया जाए…या कुछ एंकर्स और प्रभावशाली टीवी पत्रकारों की तर्ज पर चुंधियाकर इस फील्ड में आ जाना भी पत्रकारिता को संकट में डाल रहा है।
ठीक इसी तर्ज पर ऐसा करने वाले भी आजीवन अस्तित्व की जद्दोज़हद और इरादा-लक्ष्य ना स्पष्ट होने के भ्रम से जूझते रहते हैं। यूं, आपको यह विषयांतर लगेगा, लेकिन इस पूरी बात के पीछे कारण है। वज़ह यह कि पत्रकारिता के पीछे अगर मन में स्पष्ट तौर पर मिशन जैसी कोई भावना है, तो वह निर्लज्ज और क्रूर समय में संभव नहीं है, वैसे ही पत्रकारिता की आदर्श परिभाषा के मुताबिक, इसे शुद्ध तौर पर प्रोफेशन नहीं बनाया जा सकता। कारण यह भी है कि यदि आप इस पेशे में बिना किसी पूर्व लक्ष्य के आ गए हैं, तो बाकी धंधों की तरह यहां भी कमाई और नाम की दौड़ में लग जाने का ख़तरा भरपूर है।
मुझे लगता है, भले ही पत्रकारिता के आदर्श अब कायम ना रह गए हों और इसे प्रोफेशन की तरह लेते हुए कमाने-खाने की पद्धतियां शुरू हो गई हों, लेकिन यहीं पर स्व-चेतना और यथास्थिति के फ़र्क समझने और स्वयं पर नियंत्रण की ज़रूरत है। सुदामा पांडेय धूमिल की एक कविता को उद्धृत कर रहा हूं… ज़िंदा रहने के पीछे अगर सही तर्क नहीं है तो रामनामी बेचकर या …दलाली करके रोजी कमाने में कोई फ़र्क नहीं है। कविता से दो शब्द हटा दिए गए हैं, क्योंकि वह संसदीय भाषा का बहाना लेकर अश्लील बताए जा सकते हैं। ख़ैर, मुद्दा यही कि पत्रकारिता में अगर हम आए हैं, तो हमारे बहुतेरे उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ इस बात का इलहाम, चेतनता, स्पष्टता और इरादा यही होना चाहिए कि ख़बरची बनने के पीछे बिल्डिंग खड़ी करना हमारा काम नहीं है।
निश्चित तौर पर सारी दुनिया के सामने आदर्शों की दुहाई देने वाले पत्रकारों को अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए। वैसे भी, खबरगोई रियल एस्टेट, बेकरी और मैट्रिमोनियल साइट से अलग कुछ खास किस्म का काम तो है ही। इसकी इज्जत बचानी है, तो हमें भी ईमानदार होना होगा। महज आदर्श होने का अभिनय करते रहने और खुद में झूठ पालते हुए पत्रकार ना किसी का विश्वास अर्जित कर सकेंगे, ना ही अपनी आत्मा से न्याय कर पाएंगे।
(लेखक चौराहा.इन पोर्टल के संस्थापक संपादक और स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक के वरिष्ठ समाचार संपादक हैं

Monday, April 11, 2011

फिर उगते सूरज को सलाम

# चण्डीदत्त शुक्ल
(लेखक चौराहा के केयर टेकर, यानी मॉडरेटर हैं। पेशा है पत्रकारिता। दिल्ली में डेरा-बसेरा।)
चीनी भाषा के जिम्पोज शब्द से मिला है जापान को अपना नाम, यानी “सूर्य का देश”। खुद को सूर्य की संतान कहने वाले जापानी सुबह की शुरूआत सूर्य दर्शन से करते हैं, लेकिन 11 मार्च को कुदरत उनसे नाराज थी, देश दहल उठा…पर उगते सूरज के देश में जीवन का सूरज फिर उगा, आइए हम हमेशा की तरह उगते सूरज को सलाम करें…

आंसू पोंछते, सिसकते हुए, बार-बार चीखने भी लगा जापान, लेकिन इस बार चीख दुख से ज्यादा जोश से भरी थी। मन में कसक तो बाकी है, टूटे हुए घरौंदों के बचे-खुचे निशान झोली में बांध रखे हैं, लेकिन पूरा जापान जुट गया है पुननिर्माण में। यही है उगते हुए सूरज वंशियों का साहस, जो अपनी जिद के बलबूते पर महाविनाश के बाद महज पंद्रह दिन में मुल्क को फिर संवार देने की जद्दोजहद शुरू कर चुके हैं। एक तरफ है सुनामी के प्रलय का आतंक, अपनों से बिछुड़ जाने की अंतहीन पीड़ा।
सामने है ऎसा रास्ता, जिस पर चलना तो दूर, पांव बढ़ाने की भी हिम्मत नहीं होती, वहीं दूसरी ओर लाखों लोग निकल पड़े हैं राष्ट्र को पुरानी सूरत देने। धन्य है जापान और वहां के लोगों की जद्दोजहद। सच है, जापान इकलौता ऎसा देश है, जहां हम बिना किसी धार्मिक भाव के राष्ट्र की विचारधारा ना सिर्फ समझते हैं, बल्कि कार्यान्वित होते हुए भी देखते हैं।
पिछले दिनों एक जापानी लड़की ने टि्वटर पर ट्वीट किया। लिखा–पापा परमाणु संयंत्र में गए हैं और मां इतना रो रही है, जितनी कभी नहीं रोई। लड़की चिंतित थी, गुहार लगा रही थी–पापा! लौट आओ…बस तुम आ जाओ और उसके पिता फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट में रेडिएशन कंट्रोल की मुहिम में लगे हुए थे।
पिता का दिल है, धड़कता होगा बच्ची के लिए…बीवी का प्यार उसे भी खींचता होगा…पर वो जुटा रहा, दिन-रात, क्योंकि उसके सामने अपनों के दर्द से कहीं बड़ा था देश का सम्मान और लोगों की जान बचाने का मिशन। “फुकुशिमा फिफ्टी”और “न्यूक्लियर निंजा” जैसे नामों से पुकारे गए ये शूरवीर खुद की जान जोखिम में डालते हुए रेडिएशन से युद्ध में जुटे रहे। 11 मार्च को सुनामी और भूकंप के बाद फुकुशिमा एटमी प्लांट में विस्फोट हुआ और रेडिएशन का खतरा बढ़ गया, लेकिन असली रणबांकुरे तो वही हैं, जो जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा में तल्लीन रहे। जापान में बहादुरी के किस्से तमाम हैं। इनका कोई अंत नहीं। मृत्यु सामने थी।उसे स्वीकार कर जापानियों ने ठान लिया, जब तक जिएंगे, मृत्यु से जूझते हुए देश को नया जीवन दे देंगे।
ओशो ने कहा था–उन्होंने जापान के एक पर्वत शिखर पर पच्चीस हजार साल पुरानी डोबू मूर्तियों का समूह देखा था। ये मूर्तियां रहस्यमयी थीं, लेकिन जब अंतरिक्ष में यात्री गए, तब इनका रहस्य खुला। यात्रियों ने बताया, मूर्तियों ने वैसे ही वस्त्र पहने थे, जैसे एस्ट्रोनॉट पहनते हैं। यह मिथक कमोबेश पुष्पक विमान जैसा लगेगा, लेकिन एक बात तो मानने वाली है–जापानी दूर की सोचते हैं।
सामने खतरा सुनामी का था, दस्तक थी परमाणु विकिरण की, जो मुंह खोले निगलने को तैयार था और फिजा में हर तरफ थी हाड़ गला देने वाली ठंड। थरथराते जापानी एक तरफ कुदरत के हमले से जूझ रहे थे, दूसरी ओर ठंड से दो-दो हाथ करते हुए मैदान में थे। सड़कें बनाते हुए, घर खड़े करते हुए। पुल जोड़ते हुए और प्रकृति को शांत करने की तकनीक में दिमाग और दिल सब एकसाथ लगाते हुए। 235 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। पूरा विश्व जानता था यह बात कि जापान खतरे में है, इसलिए सबने मदद की।
भारत ने सबसे पहले कंबल भेजे, स्विटजरलैंड ने नौ खोजी कुत्तों और 25 राहतकर्मियों की एक टीम भेज दी, तो ब्रिटेन ने 63 राहतकर्मियों का एक दल रवाना किया। थाईलैंड, चीन, सिंगापुर…हर जगह से राहत के हाथ जापान की ओर बढ़े। धन्य है जापान…वहां के लोग सहायता और राहत की प्रतीक्षा में रूके नहीं। खुद को बचाते हुए, वो दूसरों को भी बचा रहे थे। सुरक्षित जगहों पर पहुंचा रहे थे।
यह महज जज्बा था, जिसने जापान को नया जीवन दिया। जिंदगी ने रफ्तार पकड़ने में वषोंü का समय नहीं लगाया। यहां हफ्ते भर में ही जीवन लौट आया। तीन सौ से ज्यादा झटकों के बाद भी सांसों की गर्माहट बाकी थी। शुरूआती दौर में ही 9,452 लोगों के मरने की की पुष्टि हो गई थी, जबकि 14,715 लोग लापता थे। अकेले मियागी में दस हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे पर बचे-खुचे लोग शहर को पुरानी शक्ल देने में जुट गए थे। हर बार मृत्यु से जूझकर जापान ने जीवन की नई परिभाषा लिखी है, वही इस बार भी हुआ…यह बात प्रशंसा से मुग्ध होकर नहीं कही जा रही।
जापानियों ने इसे साबित कर दिखाया है। जापान में जिंदगी गुजर कर रहे बहुतेरे भारतीयों ने भी अपने दोस्तों की मदद करने के लिए स्वदेश वापसी से इनकार कर जुनून और सहधर्मिता साबित की। आप भूले नहीं होंगे, जापान में मौजूद भारतीय दूत आलोक प्रसाद ने बताया था कि जापान में रह रहे बहुत से भारतीयों ने राष्ट्र छोड़ने से इनकार कर दिया था। समुद्री तूफान में दम नहीं कि जापान को खाक कर दे, क्योंकि वहां के लोग जानते हैं कि किस तरह बरबादी के बाद गुलशन रचा जा सकता है।
ऎसी ही एक सोच जापानी कथाकार साक्यो कोमात्सु के उपन्यास “निप्पॉन चिम्बोत्सु” में नजर आती है, जिसमें उन्होंने धरती की विशाल प्लेटें खिसकने से आए भूकंप के बाद भीषण जल प्रलय का ब्यौरा पेश किया था। साफ तौर पर जापानियों के लिए भूकंप नया नहीं है। वो हरदम इससे जूझते हैं और नई लड़ाई के लिए खड़े हो जाते हैं। वहां आपाधापी नहीं है, आपदा से लड़ने का अभ्यास है, यही वजह है कि सुनामी के बाद जापान के लोग जितने बदहवास थे, उतने ही संयत भी।
त्रासदी गुजर गई, उसके निशान बाकी हैं। तबाह हुए बहुत-से कस्बे और शहर वैसे तो शायद पांच-सात साल में हो पाएं, लेकिन जिंदगी लौट आई है और इसका सारा श्रेय जापानियों की हिम्मत को जाता है। वो जानते हैं-जीवन क्या है और कैसे जिया जाता है। जापानी मृत्यु से लड़ना जानते हैं, वो समूह की शक्ति पहचानते हैं, हरदम कहते हैं-”मदादायो”, यानी अभी नहीं।
जापानी सिनेमा के महान हस्ताक्षर अकीरा कुरासोवा की फिल्म “मदादायो” में इस दृढ़ता की साफ झलक दिखती है, वो मौत के सामने खड़े होकर, दुख भुलाकर अट्टहास करने का साहस रखते हैं। एक वजह तो सदैव संकट से लड़ने का जज्बा है ही, साथ ही है समूह का विश्वास। जापान की संस्कृति में सामूहिकता की भावना अद्भुत ढंग से भरी हुई है।
विडंबनापूर्ण सत्य है कि जापान को वही स्वरूप हासिल करने में तकरीबन 309 अरब डॉलर खर्च करने होंगे। अर्थशास्त्र चौपट हो चुका है, रिश्ते-नातेदार-घर-कारोबार-परिवार। सबका अभाव ज्यादातर लोगों के सामने है, विश्व बैंक के विशेषज्ञ बताते हैं कि बुनियादी ढांचा चरमरा गया है, उसे सही करने में कम से कम पांच साल लगेंगे पर जापानी ना थके हैं, ना पलायन करने को तैयार हैं। वो पूरी दुनिया को बता रहे हैं- हम लड़ेंगे साथी।
(जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के रविवारीय सप्लिमेंट हमलोग में प्रकाशित)

Sunday, March 13, 2011

मौत की गुज़ारिश!


सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक तौर पर इच्छामृत्यु का कानूनी अधिकार दे दिया है...फिर भी, नैतिकतावादियों का मानना है कि जीवन जैसा भी हो, जिस भी परिस्थिति में हो, उसका अंत नहीं होना चाहिए। पाप-पुण्य और जंग-ए-ज़िंदगी की जद्दोज़हद के सवालों से जूझती हुई ये स्टोरी आपके फ़ैसले के लिए पेश है... 


- चण्डीदत्त शुक्ल

हर तरफ अंधेरा है...उसकी आंखों से रोशनी गैरहाज़िर है, इसलिए काले रंग से उसे कोई शिकायत नहीं। दिल धड़कता है, सांसें चलती हैं, जान बाकी है, वो औरत है और आप कह सकते हैं—है तो ज़िंदगी, क्योंकर हो शिकवा...। फिर भी, उसकी सहेली पिंकी वीरानी चाहती थी कि उसे मौत नसीब हो...जल्द से जल्द मिले मर जाने की दुआ। मौत, यहां सज़ा नहीं थी, दवा थी। अरुणा शानबाग के लिए सबसे बड़ी दवा।
1973 की बात है। कोई सैंतीस साल पहले का वाकया, जिसके बाद अरुणा पत्थर बन गई। वो मुंबई के अस्पताल में नर्स थी, दुखियारों के घावों पर मरहम लगाती थी, अब बिस्तर पर पड़ी है। हिल नहीं सकती, सोच नहीं सकती, बोल नहीं पाती। अरुणा मर चुकी है, महज दिमाग ज़िंदा है। तीन दशक से अरुणा कोमा में है। उसके साथ अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वाय ने कुकर्म किया और इस कोशिश में अरुणा के गले में जंजीर डालकर उसे बिस्तर से बांध दिया। आरोपी फरार है और अरुणा कैद रह गई है। इस हादसे में होशोहवाश जाते रहे और वो हमेशा के लिए ज़िंदा लाश में तब्दील हो गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने ताज़ा फैसले में कहा है—अरुणा के साथ नाइंसाफ़ी हुई, पर उसे इच्छामृत्यु की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कारण महज इतना कि अरुणा के लिए ऐसे निर्देश देने की याचिका मित्र पिंकी वीरानी ने दायर की थी। ख़ैर, बात अरुणा की नहीं, इस मुद्दे की है। इस सवाल की है कि इच्छामृत्यु का हक़ मिलना चाहिए या नहीं। या फिर ऐसी इच्छा पलायन है, ज़िंदगी से भागने की कोशिश है, कमज़ोरी की निशानी है।
जवाब में भी एक सवाल ही पैदा होता है—क्या जीवन का नाम महज सांस है...धड़कनें हैं...लाश जैसा ही सही, रक्तसंचार से गर्माया हुआ शरीर भर है।
सवाल यह भी है कि जीवन के लिए ज़रूरी चेतना, खुशी, सुख, उपलब्धियां और माहौल नहीं है, तो ऐसी ज़िंदगी के क्या मायने हैं? माना, अरुणा के अस्पताल की नर्सें उसे जी-जान से प्यार करती हैं, इतनी सेवा करती हैं कि उसके बदन पर कभी घाव तक नहीं होने दिए, लेकिन इन सबका क्या फायदा? अरुणा तो हमेशा के लिए बेहोश हो चुकी है। कभी होश में आएगी भी, तो उसके हाथ वेदना से भरा खाली जीवन ही होगा। ना परिवार, ना खुशी का एक भी क़तरा।
बहुतेरे लोग इस बात से इत्तिफाक़ नहीं रखते। वो कहते हैं—जीवन ईश्वर की देन है। जीवहत्या पाप है। हमें भी इत्तिफाक़ है उनकी बात से...लेकिन अरुणा के जीवन में जीवन जैसा कुछ भी था ही कहां? 
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद इच्छामृत्यु को लेकर बहस फिर गरमा गई है। कुछ अरसा पहले रिलीज़ फ़िल्म गुज़ारिश को लेकर भी विवाद हुआ था। जैसे, अरुणा प्यार भरी छुअन से तन-मन की हर तकलीफ़ दूर कर देती थी, ठीक वैसे ही तो गुज़ारिश का जादूगर अपने करतबों से सबके चेहरे पर मुस्कान खिला देता था। जैसे सबकी ज़िंदगी खुशियों के फूल से हरदम नहीं महकती, उसी तरह हर फ़िल्म सुखांत नहीं होती...सो गुज़ारिश का जादूगर भी लकवे का शिकार हो जाता है। चल नहीं पाता...महज बैठे-सोते-सिसकते हुए घिसटती ज़िंदगी की गाड़ी को रेंगते हुए देखता है। तभी तो कहता है--मुझे मृत्यु चाहिए।
... तब भी नैतिकता-मानवतावादियों ने खूब शोर मचाया था, कहा गया था—गुज़ारिश अनैतिक पाठ पढ़ाती है...लेकिन क्या हमें उस जादूगर के दर्द की परवाह नहीं होनी चाहिए थी? अरुणा भी तो ऐसे ही दर्द से भरपूर है। वो चीख सके, इतनी समझ भी नहीं है उसके पास...क्या मौत के बाद उसका जीवन खत्म हो जाएगा...? पुनर्जन्म जैसी आध्यात्मिक सोच को स्वीकार करें, तब तो कह सकते हैं--एक नया जीवन ही उसे मिलेगा।
  अरुणा पहली इंसान नहीं, जिसके लिए इच्छामृत्यु की गुहार लगाई गई। अपनी मर्जी से दुनिया को अलविदा कह देने की आरज़ू बहुतों की रही है। दो-तीन साल पहले ही उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति ने दस से सोलह साल की उम्र के अपने बच्चों के लिए इच्छामृत्यु मांगी थी। ये बच्चे पैरों पर खड़े नहीं हो सकते थे। 2008 में हिमाचल प्रदेश की एक इंजीनियर सीमा ने भी इसकी इजाज़त चाही थी। वो आर्थराइटिस से परेशान थी और तेरह साल से एक कमरे के अंधेरे में क़ैद रही। शतरंज खिलाड़ी वेंकटेश ने जीवन रक्षक व्यवस्था के तहत ज़िंदगी बिताने की बहुत जद्दोज़हद की। जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, तो उसकी मां ने गुहार लगाई—अब मेरे बेटे को मौत ही मिल जाए।
उत्तर प्रदेश के बांदा के बबेरू कस्बे में हृदय रोग से पीड़ित एक दलित छात्रा ने इच्छामृत्यु की इजाज़त ना मिलने के बाद आमरण अनशन शुरू कर दिया, तो झारखंड का दिलीप मचुआ इच्छामृत्यु की मांग करते-करते मर ही गया। बैतूल में सेवा से बेदखल एक कर्मचारी ने बीवी और पांच बेटियों के साथ इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी, वहीं इलाहाबाद में 14 वर्षो से ज्यादा समय से जेल में बंद उम्रकैद की सजा पाए 97 कैदियों की गुहार भी यही थी। एचआईवी ग्रस्त लोगों, भुखमरी के शिकार किसानों, अत्याचार से पीड़ित लड़कियों ने भी इच्छामृत्यु की आरज़ू बार-बार दोहराई है। पटना के तारकेश्वर सिन्हा की याचिका चर्चा में रही है, जिसमें उन्होंने पांच साल से बेहोश पत्नी कंचनदेवी को इस पीड़ा से मुक्त कराने की गुज़ारिश की थी।
इन याचनाओं और याचिकाओं के हवाले से बात साफ़ है कि फ़िल्म `मदर इंडिया’ में भले ही नायिका गुनगुनाती रहे—जीवन है अगर ज़हर, तो जीना ही पड़ेगा, लेकिन हर इंसान विष पीने वाला शिव नहीं बन पाता। यह बात एकदम सही है कि कंटकों से जूझकर गुलाब तक पहुंचने वाला ही असली योद्धा होता है, लेकिन इसे भी कैसे गलत कहें कि जब सांस-सांस में शीशा घुल जाए, आंख-आंख में यह बात झलकने लगे कि दुनिया अपने काम की नहीं रही, तो कोई कैसे ज़िंदा रहने की ठान पाए।
   मुद्दा मौजूं है...सोचने को मज़बूर करता है। इसे महज भावुक होकर, धार्मिकता के हवाले से हवा में उड़ाया नहीं जा सकता। बहुतेरे डॉक्टर मानते हैं कि वो अपने प्रोफेशन में ऐसे कदम उठा चुके हैं, जब उन्होंने मरीज की तकलीफ़ की इंतिहां देखकर उसके इलाज में ढील बरती और उसे चैन की आखिरी सांस लेकर दुनिया छोड़ने का मौका दे दिया। रायपुर के मेडिकल कॉलेज में इस बारे में ज़बर्दस्त बहस भी हो चुकी है। 2010 में भावी डॉक्टरों ने तर्क दिया था कि देश के अस्पतालों में कुछ निश्चित बेड उपलब्ध हैं। डॉक्टरों की बेहद कमी है। ऐसे में कोई व्यक्ति जीवन की इच्छा और संभावना, दोनों खो चुका है, तो उसे मरने देना चाहिए।
  मुद्दा यह नहीं कि अरुणा या उसके जैसे अनेकों लोगों को इच्छामृत्यु की इजाज़त मिले या नहीं...या फिर इच्छामृत्यु आत्महत्या की ही एक किस्म है और इससे बाज आना चाहिए। चिंतन के बिंदु और हैं, जो खास हैं। अहम बात ये है कि कष्ट, संत्रास और खोखलेपन के अहसास के बीच यदि कोई जीवन की लड़ाई से चले ही जाना चाहे, तो उसे क्यों मज़बूर किया जाए—नहीं जियो, तुम्हें जीना ही होगा। कहा जा रहा है कि इच्छामृत्यु को अनुमति मिल गई, तो लोग अपने छुटकारे के लिए इसका गलत फायदा उठाएंगे, लेकिन इसका भी हल है। सरकार, समाज और परिवार की सतर्क निगाह से ऐसे किसी भी दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सकती है।
यूं भी, देश की संस्कृति में इच्छामृत्यु का इतिहास रचा-बसा है। भीष्म पितामह ने तीरों की शैया पर लेटकर मृत्यु की प्रतीक्षा की। राम-लखन ने जलसमाधि ली। बहुत से साधु-संतों, खासकर जैन धर्मावलंबियों ने जीवन को निस्सार मानकर स्वतः प्राण त्यागे। ध्यान देने की बात ये कि इनमें से किसी ने आत्महत्या नहीं की, विधिवत मृत्यु को ग्रहण किया। उन्हें कष्ट नहीं था, लेकिन वह जान चुके थे कि जीवन संपूर्ण हो चुका है और अब महज निस्सारता शेष है।
इस सबके बावज़ूद यह सवाल अब भी जवाब के इंतज़ार में है—जीवन से तंग आकर इच्छामृत्यु चुनने का अधिकार मिले या फिर ज़िंदगी से जंग जारी रखी जाए...। इसका उत्तर तलाशते हुए मुझे 
`सॉरो ऑफ बेल्जियम’ के रचनाकार ह्यूगो क्लॉस की एक बात याद आती है। उन्होंने कहा था—`मैं एक ऐसा आदमी हूं, जो जैसा चल रहा है, उससे नाखुश है। दुनिया जैसी है, उसे उसी रूप में हम स्वीकार नहीं कर सकते। जिस तरह से अन्याय हो रहे हैं, उसे देखते हुए हमें हर सुबह एक नाराज़ इंसान के तौर पर आंखें खोलनी चाहिए।‘ ह्यूगो की नाराज़गी जब हद से गुज़र गई, तो उन्होंने 78 साल की उम्र में एल्जाइमर्स से मिली तकलीफ़ ना झेलने की ठानी और इच्छामृत्यु चुन ली। वहां निराशा नहीं थी, पलायन नहीं था। वो जान चुके थे—ऐसी ज़िंदगी के कोई मायने नहीं।
  कमोबेश, मैं भी यही सोचता हूं। ज़िंदगी अगर सचमुच ज़िंदा है...जीवन की शर्तों को पूरी करती है, आनंद-उपलब्धि और संतोष के साथ, तब ही उसका मतलब है। हो सकता है, आपको यह बात पलायन से भरी लगे। खिन्नता और कुंठा से सनी हुई नज़र आए, लेकिन ऐसी सोच ना बने, इसकी ज़िम्मेदारी भी तो हमें ही उठानी होगी। क्यों ना हम, फिर किसी अरुणा को बलत्कृत ना होने दें। कोई किसान भूखा ना मरे, इसके लिए रोटी, अनाज और बीज का इंतज़ाम करें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो फिर इच्छामृत्यु की ज़रूरत ही ना होगी। दुनिया खूबसूरत बनेगी और उसमें हमारा योगदान भी होगा। ऐसा होगा ना?



Friday, March 11, 2011

अहा! प्रेम...

प्रेम में बिताए गए समय और उस याद से रची-बसी कविताओं को भास्कर समूह की उल्लेखनीय पत्रिका अहा ज़िंदगी में सेंटर स्प्रेड में, दो पन्नों का विस्तार मिला है...मार्च अंक में सचित्र परिचय और कविताएं छपना अच्छा लगा। पन्नों की ये झलक ज़रा पुरानी है, यानी छपे हुए से काफी अलग है...

ये सब कविताएं चौराहे पर पहले से उपलब्ध हैं। लिंक रहे यहां...

Sunday, February 27, 2011

ट्विंकल है उदास...चले गए अंकल पै

स्मृति-शेष


किस्से-कहानियां सुनाने वाली दादी अब साथ नहीं रहती...घर छोटे हैं...बिल्डिंगें बड़ी हैं...दादी का जी शहर में नहीं लगता...वैसे भी, कार्टून और एनिमेशन का ज़माना है, वो भी डिज़्नी वाले कार्टून्स का। पिछले दिनों `माई फ्रेंड गणेशा’ और `हनुमान’ जैसे कैरेक्टर ज़रूर देखे थे, लेकिन ऐसा कम ही होता है। बहुतायत में तो अब भी अंगरेज़ हावी हैं, पैंट के ऊपर चड्ढी पहनने वाले हीरो! 
यह कोई आज की बात नहीं है। साठ-सत्तर साल पहले से अब तक, कभी बैटमैन, तो कभी स्पाइडरमैन, तो कहीं-कहीं फैंटम जलवा बिखेरते रहे हैं। प्राण के चाचा चौधरी और अंकल पै की ट्विंकल ने ज़रूर धक्का मारकर इनको कई बार भगाया है। बात यह नहीं कि कॉमिक्स के कैरेक्टर स्वदेशी हों। यह राष्ट्रवाद का मामला तो है नहीं, लेकिन इससे भी कौन इनकार करेगा कि अपने बगीचे में फला-पका आम कुछ ज्यादा ही जायका देता है...नहीं क्या? ऐसे ही, रियल इंडियन हीरोज़ के क्रिएटर थे अंकल पै, यानी अनंत पै।
याद आए? हां, अब उनकी याद ही बाकी है। बीते गुरुवार को अनंत पै का निधन हो गया है। उनके परिवार में पत्नी ललिता हैं और हम सबके जेहन में अंकल की यादें...ट्विंकल की बातें और अमर चित्रकथा की तस्वीरें।
बहुत-से साल गुज़र गए, वैसे ही बचपन बीत गया, लेकिन तब मोहल्ले के परचूनिए से ऑरेंज वाली टॉफियां खरीदने के लिए घर से अठन्नी मिलती थी। कई बार मिलती, तो कई दफा हम किसी ना किसी तरीके से झटक लेते। बहुत दफा टॉफी ना आती, उसकी जगह हम कॉमिक्स ले आते। तीन-चार चवन्नियां मिलाकर, या फिर पैसे कम पड़ते तो किराए पर ही सही। सबसे ज्यादा डिमांड इंद्रजाल कॉमिक्स की होती। बाद में यही मांग ट्विंकल और अमर चित्रकथा की हो गई थी। कॉमिक्स इधर हाथ में आई नहीं कि धमाचौकड़ी शुरू...भाई फील्डिंग-वील्डिंग तो सब ठीक है, लेकिन बैटिंग पहले हम ही करेंगे...की तर्ज वाली होड़—कॉमिक्स तो हमें ही पढ़नी है सबसे आगे होकर। 
बहुत बार पैसे ना होते, तो बिरजू चाचा की दुकान पर जाते। कॉमिक्स देखने का बहाना करते और सर्राटे के साथ एक-एक तस्वीर और शब्द ऐसे पी लेते, जैसे—ताज़ा नींबू का शरबत पिया हो। बाद में बिरजू चाचा भी चालाकी समझ गए थे पर वो किस्सा फिर कभी सही। बात अंकल पै की हो रही थी, उनके जादू की, कारनामे की।

दो साल के थे अनंत, जब माता-पिता नहीं रहे। बारह साल के थे, तब मुंबई आ गए। अपना बचपन मां-बाप के बिना गुज़ारा, लेकिन यह ठान ली—दुनिया भर के बच्चों के चेहरे मुस्कान के खजाने से भर देंगे।
रसायन विज्ञान में पढ़ाई करने के साथ-साथ अनंत समझ चुके थे कि बच्चों का दिल लुभाने, यानी उनके दिमाग में केमिकल लोचा करने के लिए क्या-क्या करना होगा? 1967 में उन्होंने अमर चित्रकथा छापनी शुरू की। यह वह दौर था, जब कॉमिक्स ज्यादातर अंगरेज़ी में मिलती। वह भी ऐसी, जिसके हीरो-हीरोइन हमारे कल्चर से एकदम अलग, यानी तकरीबन डरावने होते। हालांकि बच्चों की ऐसी कोई डिमांड नहीं थी कि हीरो हिंदुस्तानी चाहिए, और फिर रामायण-महाभारत की कहानियां तो सबको मुंहज़बानी याद थीं, ऐसे में उनमें कोई खास इंट्रेस्ट नहीं था...लेकिन कमाल थे अंकल पै।
उन्होंने वही पुरानी कहानियां सुनाईं...बस उन्हें पेश करने का अंदाज़ ऐसा था कि वो आदत बन गईं...नस में उतर गईं...। हिम्मतवाले भीम, हरदम सच बोलने वाले युधिष्ठिर, बंशी बजाते कान्हा, माखन चुराते गोपाल...पढ़कर लगता, जैसे हम किसी नए हीरो से मिल रहे हैं।
1929 में कर्नाटक के करकाला में पैदा हुए अंकल पई का 81 साल की उम्र में निधन हुआ है। इस दौरान उन्होंने भरपूर ज़िंदगी जी है। ठीक उसी जोश के साथ, जिस तरह उन्होंने टाइम्स ग्रुप की नौकरी छोड़कर अमर चित्रकथा का प्रकाशन शुरू किया था। क्या कोई सोच सकता है, पुरानी कहानियों की नई पेशकश का उनका अंदाज़ बेस्ट सेलर बन जाएगा। हां, यह रिकॉर्डेड फैक्ट है कि अमर चित्रकथा की कॉपीज़ दस करोड़ से ज्यादा बिक चुकी हैं।
अंकल पै इस मायने में खास हैं कि उन्होंने इतिहास को फिर से रचा (अमर चित्रकथा), फिर 1980 में हिंदी और अंगरेज़ी, दोनों ज़ुबानों में ट्विंकल प्रकाशित करनी शुरू की। कपीश और ट्विंकल जैसे किरदार अब तक घर के मेंबर्स की तरह लगते हैं—यह अंकल पै का ही तो कमाल है। आज तमाम अखबारों में दिखने वाली कॉमिक्स स्ट्रिप्स के पीछे अनंत पै का योगदान कौन भुला सकता है? 1969 में उन्होंने रेखा फीचर्स की शुरुआत की थी और जगह-जगह कार्टून और कॉमिक्स स्ट्रिप्स भेजने का सिलसिला भी।
पिछले दिनों ख़बर सुनी थी कि अमर चित्रकथा अब आईफोन, आईपॉड और सेलफोन पर उपलब्ध होगी। इसके बाद पता चला कि इस लोकप्रिय सीरीज़ पर टेलिविजन सीरियल भी बनने वाला है। यह सबकुछ होगा। बचपन फिर हंसेगा। अपने पुरखों के कारनामे हम याद करेंगे, सबकुछ होगा...बस अंकल पै ना होंगे।

Saturday, February 19, 2011

फिर सुनें स्त्री-मन और जीवन की कहानियां

चर्चा में किताब

कथा में नई दृष्टि और भाषा गढ़ती हैं रीता सिन्हा 


चूल्हे पर रखी पतीली में धीरे-धीरे गर्म होता और फिर उफनकर गिर जाता दूध देखा है कभी? ऐसा ही तो है स्त्री-मन। संवेदनाओं की गर्माहट कितनी देर में और किस कदर कटाक्ष-उपेक्षा की तपन-जलन में तब्दील हो जाएगी, पहले से इसका अंदाज़ा लगाना संभव होता, तो स्त्री-पुरुष संबंधों में आई तल्खी यूं, ऐसे ना होती, ना समाज का मौजूदा अविश्वसनीय रूप बन पाता। सच तो ये है कि स्त्री के चित्त-चाह-आह और नाराज़गी को शब्द कम ही मिले हैं। ज्यादातर समय अहसास या तो चूल्हे से उठते धुएं में गुम हो गए हैं या फिर दौड़ में शामिल होने के लिए लगाई जा रही चटख लिपिस्टिक के रंगों में लिपट बदरंग होते रहते हैं। समझदारी और समझ के बीच की तहें खोलने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जद्दोज़हद में स्त्री कभी भरती है, तो कई बार पूरी तरह खाली हो जाती है। किसी ने सच कहा है—कामयाबी के शीर्ष पर खड़ी स्त्रियां अकेली होती हैं, वहीं घर-परिवार के भरपूर जीवन में भी तो उन्हें तनहा ही होना होता है। वैसे, बात स्त्री के अपने अस्तित्व-जद्दोज़हद की ही नहीं, वह समाज का हिस्सा भी तो है, इसलिए चाहे-अनचाहे उसे वज़ूद के साथ मौजूदगी के ख़तरों-ज़िम्मेदारियों से अनिवार्य तौर पर रूबरू होना होता है। स्त्री की इसी सोच-संवेदना-संत्रास और स्वप्न यात्रा को शब्दों में पिरोने का खूबसूरत काम किया है रीता सिन्हा ने। सामयिक प्रकाशन से आया उनका नया कथा संग्रह—डेस्कटॉप इस काम को बखूबी अंजाम देता है।
बिहार की रीता सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में एडहॉक असिस्टेंट प्रोफेसर एवं इग्नू (दिल्ली) में एकेडेमिक काउंसलर हैं। हिंदी भाषा में एमए, पीएच-डी करने के अलावा, रीता आकाशवाणी से कहानियों और कविताओं तथा दूरदर्शन से कविताओं का पाठ कर चुकी हैं। बीस वर्षों से प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां, कविताएं, समीक्षाएं एवं लेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।
खासी पढ़ी-लिखी रीता के साथ सकारात्मक बात यह है कि वह संतुष्ट हो जाने की जगह सजग हैं। यही सजगता उनकी कहानियों में भी नज़र आती है।
रीता कहती हैं—जब विसंगतियों या विडंबनाओं के कारण भीतर प्रश्नाकुलता की बेचैनी होती है, तब मेरे मस्तिष्क में बिम्बों का सृजन होने लगता है। ये बिम्ब कभी शृंखलाबद्ध होते हैं और कभी टुकड़ों में बनने लगते हैं। इसी के साथ मेरे भीतर की रचनाशीलता भी प्रतिक्रयात्मक संवेगों के साथ सक्रिय होने लगती है। जबतक मैं इन्हें अभिव्यक्त नहीं कर लूँ, मेरे भीतर की बेचैनी खत्म नहीं होती। मैं मानती हूं कि लेखक का समाज के प्रति बहुत बड़ा दायित्व भी होता है। व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को आइने में अपने वास्तविक स्वरूप दिखाने का कार्य भी लेखक ही करता है। मैं अपने लेखन के द्वारा आसपास की उन विडंबनाओं को सामने लाना चाहती हूं, जिन्हें हम देखते तो हर समय हैं, पर उनपर सोचना नहीं चाहते।
तकरीबन पौने दो सौ पृष्ठों के कहानी संग्रह डेस्कटॉप की कीमत ढाई सौ रुपए है, जो कुछ ज्यादा लग सकती है, लेकिन नई सोच और भाषा की जादुई बुनावट के लिए इसे पढ़ा जा सकता है। नए प्रतीकों, मीडिया की अक्षमता-विवशता, मौद्रिक नीतियों के कु-फल, स्त्री की सनातन छटपटाहट और रिश्तों के खोखलेपन को रेखांकित करते इस कथा संग्रह का आमुख प्रख्यात कहानीकार चित्रा मुद्गल ने लिखा है और वह भी मानती हैं कि रीता सिन्हा का कथा-वितान सीमाओं की जकड़बंदी से मुक्त, विस्तृत, गहन और व्यापक है। ठीक ऐसी ही राय हिंदी आलोचना के प्रख्यात पुरुष नामवर सिंह की है, जो रीता की भाषा को आज के दौर के लिए ज़रूरी बताते हैं। तकरीबन चौदह कहानियों से सजे इस संग्रह की खासियत यह भी है कि यहां पुरुष घृणा का पात्र या असभ्य, असमान्य नहीं है (बहुधा स्त्री-विमर्श में रेखांकित किए जाने की तरह), बल्कि वह स्त्री का साथी है और अपनी संपूर्ण छुद्रताओं-स्वाभाविकता के साथ मौजूद है।



रीता सिन्हा से छह सवाल


- लेखन आपके लिए आश्वस्तिकारक है या फिर महज खुद को रिलीज़ करने का माध्यम?
0 लेखन मुझे आश्वस्ति प्रदान करता है। सिर्फ अपनी भावनाओं को बाहर फेंक देने का काम किसी ज़िम्मेदार लेखक का हो ही नहीं सकता, इसलिए मेरा भी नहीं है।
. एक लेखक के कितने आड़े आता है महानगरीय परिवेश?
0 महानगरीय परिवेश में लोगों की गिव एंड टेक की मानसिकता लेखन के आड़े तो आती है, लेकिन यदि लेखक में अनुभूति की ईमानदारी के लिए प्रतिबद्धता और लेखन के प्रति निष्ठा हो, तो यह मानसिकता या प्रवृत्ति अधिक कुप्रभावित नहीं कर सकती।
- स्त्री-विमर्श की आपकी अपनी परिभाषा क्या है?
0 स्त्री विमर्श दृष्टिकोण, विचार या चिन्तन का कोई एक आयाम नहीं है। यह सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्त्री-जीवन का ऐसा मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और बौद्धिक विश्लेषण है, जिसमें किसी तरह का विशेषाग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह नहीं हो सकता।

- भाषा के लिहाज से आप नए प्रतिमान गढ़ सकी हैं। यह उपलब्धि है। इसके लिए बधाई के साथ ही यह सवाल भी कि एक लेखिका के लिए भाषा बड़ा टूल है या विचार?
0 लेखन के लिए भाषा बड़ा टूल है। सशक्त भाषा और शिल्प के द्वारा ही लेखक आज की संश्लिष्ट संवेदनाओं, विडंबनाओं और जटिल यथार्थ को अभिव्यक्ति देने में समर्थ हो सकता है।

- बतौर लेखिका आप ऑब्जर्वेशन और इंप्रोवाइजेशन, में से किसे कथा रचना के लिए ज्यादा ज़रूरी समझती हैं?
0 मैं कथा लेखन में ऑब्जर्वेशन को ज्यादा ज़रूरी मानती हूँ।

Tuesday, February 15, 2011

बिना पते और स्टैंप के एक चिट्ठी

गुज़रा हुआ प्रेम बिसार पाना मुश्किल होता है, तक़रीबन नामुमकिन। कोई जगह, कोई लमहा सबकुछ लेकर आ जाता है सामने। यादों की ऐसी ही एक पोटली…एक चिट्ठी, उसके नाम, जो जिस्म से साथ नहीं है पर यादें अश्क बनकर आंख में मौजूद हैं और धड़कन की शक्ल में दिल के बीच ज़िंदा…। फिज़ाओं में प्यार की खुशबू बिखरी हुई है। फूलों, तोहफ़ों और मुस्कराहटों के मौसम में मिला है यही खत, जो अपने पते तक पहुंच नहीं पाया अब तक…।



सुनो,
तुम्हें जो लिखी थीं, वो चिट्ठियां पुरानी हो चुकी हैं…कुछ ज्यादा ही ज़र्द। पीली पड़ गई हैं चिट्ठियां। इन पर कोई स्टैंप भी तो नहीं है। बस बिना लिफाफे के यहां-वहां रखी हैं। रजिस्टरों में, डायरियों में और हां, एक तो कोट की अंदर वाली जेब में भी रखी है। वहीं सूखे गुलाब के साथ तुमने रख दी थी। मस्त हैं ना यार हम दोनों। और चिट्ठियां भी क्या…कहीं, किसी लाइन में तो आईलवयू नहीं लिखा। कंजूस! कहीं-कहीं तो अनामिका स्याही में डुबाकर लकीर भर खींच दी। पूरा, सादा पन्ना और कोने में खिंची लकीर, लेकिन मैं सबकुछ पढ़ लेता हूं। कितनी ही लालसा, इच्छाएं, इंतज़ार और अब बस…एक ठंडी सांस।
ऐसी ही एक लकीर मैंने भी खींच दी थी तुम्हारे दाएं गाल पर। चिहुंक उठी थीं तुम—धत…ये क्या करते हो। मैं भी तो कितना शैतान था, होली है भाई होली है…और रंग नहीं तो क्या हुआ…स्केच पेन तो थी हाथ में। तुम भी ग़ज़ब…दो दिन तक स्याही धुली ही नहीं। सहेलियां चिढ़ा-चिढ़ाकर पूछतीं—क्या है ये और तुम बस मुस्करा देतीं। मुझे मौसमी चटर्जी अक्सर याद आती है। मुस्कराते हुए हंसी छलका देने वाली। तुम्हारी जुड़वा तो नहीं है ना?
उफ़…अब क्या हुआ। फिर तुनक गईं। दो-चार महीनों का साथ कितना छोटा था। देखो, गुज़र गया। रूठने-मनाने में। कल शाम की बात बताऊं। बस स्टैंड पर खड़ा था। तेज़ हवा चली, लगा जैसे—शॉल उतारकर ढक दोगी। पर कहां हो तुम…। ठिठुरते हुए खड़ा रहा…कानों में गूंज रही थी खनकती हंसी। बिना बात के हंसने की कला कोई तुमसे सीखे। उल्लुओं और पाजियों की तरह…। देखो, मैं भी तो हंस पड़ा हूं तुम्हारे साथ-साथ।
लो…गुज़र गई एक बस। टूटी-फूटी, इसकी खिड़कियों पर कांच नहीं हैं। हवा के साथ कदम मिलाते हुए उड़ी जा रही है। आज तुम होतीं, तो हम दोनों फिर बैठ जाते ना इसमें। ऐसे सफ़र पर चलने के लिए, जिसका कोई ठिकाना ना हो। बस जेब में जितने पैसे होते, उतने कंडक्टर को थमाकर और जब थक जाते, तो बीच राह में उतर जाते। सस्ते से किसी ढाबे में कुछ खाने और उससे ज्यादा बातें करने।
हूं, याद आया उस कॉफी का टेस्ट। कड़वी कॉफी। उसके भी हम सत्रह रुपए चुकाते थे, लेकिन ग़ज़ब की दोस्ती निभाई। हम घंटों उसी सहारे तो जमे रहते थे। और चाय भी तो…किचन में तुम घुसतीं और मैं बुलाता—सुनो, लिपटन की चाह है क्या? तुम तुनकतीं—दादा कोंडके मत बनो, समझे।
कैसी-कैसी तो बेगैरत रातें थीं। जब आतीं, तो सता जातीं। सारी रात मोबाइल पर…पता नहीं कैसी-कैसी बातें। मूवीज़, लिट्रेचर, पोएट्री, मंटो-किशोर कुमार…ग़ज़ब-ग़ज़ब के कॉम्बिनेशन, ना ओर ना छोर…लेकिन तुम भी ना…आई लव यू नहीं बोला बस। लगातार डिस्चार्ज होती बैट्री और सॉकेट में चार्जर लटकाकर बस बातें करते जाना। यार-दोस्त पूछते भी—क्या बातें करते हो तुम दोनों? क्या जवाब देता उन्हें?
हमारी शादी नहीं हुई। चलो, अच्छा ही हुआ। नहीं क्या? हो जाती, तो तुम मेरे ड्रेसिंग सेंस पर खूब चुटकुले सुनाती। कमेंट्स पास करतीं…लेकिन ऐसा क्यों कहूं…तुमने ही तो मुझे बताया था—कपड़े सुंदर नहीं होते, इंसान होता है। मैं खुद को गांव वाला कहता और तुम हंस पड़तीं—बहुत चालू हो। ये सब इमोशनल ब्लैकमेलिंग है बस्स। थैंक्यू बोलूं क्या? सॉरी-सॉरी, यूं ही मुंह से निकल गया। पिटने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
एक कन्फेशन करूं। तुम्हारे जाने के बाद मुझे फिर प्यार हो गया है। नहीं-नहीं, कुछ ऐसा-वैसा मत सोचना। तुम्हारी यादों से प्यार कर बैठा हूं यार। खूब रोया, मिस करता रहा। अक्सर फेसबुक प्रोफाइल पर जाकर देखता हूं तुम्हें। मोबाइल में साल भर पुरानी तुम्हारी मिस्ड कॉल्स पड़ी हैं। उन्हें देखता हूं, तारीख़ वाले कोने पर से झट आंख भर हटा लेता हूं। सोचता हूं—कल ही तो तुमसे बातें हुईं थी रात भर।
तुम नहीं हो। तारीखें गुज़रती जा रही हैं। सच बोलूं, तो ज़िंदगी के बारे में सोचते ही जी कहता है…हूं…कुछ तो है जो अपनी-सी रफ्तार से गुज़र रहा है। कितनी ही प्रेम-पातियां लिखीं तुम्हारे लिए पर कभी पोस्ट नहीं कीं, ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब पता है, तुम्हें भेज सकता हूं, लेकिन कहां…कोई ठिकाना नहीं, जहां कोई रिसीव कर ले ये लेटर्स…। फिलहाल, चिट्ठियां बैरंग हैं, इन पर नेह का टिकट लगाया नहीं जा सका। अब जिसे भी मिलेंगी, वो मेरी नहीं है, कह के लौटा ही तो देगा…।
ऐसे हाल में कुछ तो सलाह दो। शायद फूट-फूटकर रोना चाहिए, लेकिन मैं अक्सर हंस पड़ता हूं। कल ही खूब हंसी आई। तुम्हारी बॉलकनी के नीचे से गुज़रते हुए ऊपर निगाह डाली। तुम नहीं थीं वहां, तभी किसी ने पुकारा। पता है—चाय वाला था। हमने बहुत से कप भर-भरकर चाय पी थी ना वहां। कुल 115 रुपए का हिसाब बना था। ख़ैर, मैंने दे दिए हैं। अब बकाया नहीं है। वैसे ही, तुम पर भी मेरा कुछ शेष नहीं है। हम दोनों चुका चुके हैं, जो कुछ लेन-देन था। हां, प्यार नहीं चुका। उसे चुकने भी ना देना। हर बार प्यार का मतलब साथ तो नहीं होता…और फिर साथ तो हम हैं ही। जिस्म की भला क्या बिसात…दूर है तो दूर सही…।

I-NEXT में प्रकाशित