कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Friday, February 12, 2010

अपने ही गर्भ में छिपा लो…सिखा दो…अभेद्य मंत्र


अनजाने चेहरों वाली / सीमाओं से पार / भाषाओं से इतर / कई तस्वीरें / देखीं / सुनीं / पहली-पहली बार / तुम्हारे ही संग / उनमें बसा प्रेम / उभरा तब तुम्हारी आंख से / छलका हमारे होंठों तक / आज फिर / गया उसी दौर में / पर अबूझ रह गए / वो चित्र / जड़ हैं नायक / स्थिर नायिकाएं / ना वहां युद्ध था / ना प्रेम / था तो बस / एक अटूट एकांत / सन्नाटा / जिसे चीर पाना / नहीं मुमकिन / मेरे लिए / बिना तुम्हारे / अब अपने ही गर्भ में / छिपा लो / जन्म देने से पहले / सिखा देना / अवाक् हो जाने के / चक्रव्यूह से निकलने का / अभेद्य मंत्र

6 comments:

Suman said...

जन्म देने से पहले / सिखा देना / अवाक् हो जाने के / चक्रव्यूह से निकलने का / अभेद्य मंत्र.nice

sangeeta swarup said...

आपने जो ब्लॉग में लिखा है वो पढ़ा नहीं जा रहा..text का कलर बदल दीजिए...

ना वहां युद्ध था / ना प्रेम / था तो बस / एक अटूट एकांत / सन्नाटा

खूबसूरत अभिव्यक्ति

rashmi ravija said...

बड़ी गहन अभिव्यक्ति है...सोचने को विवश करती हुई....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

संजय भास्कर said...

महा-शिवरात्रि पर्व की बहुत बहुत बधाई .......

गीता पंडित (शमा) said...

मैं पढ नहीं पा रही हूँ
लेकिन पढना चाहती हूँ...

text का कलर बदल दीजिए..