कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, February 4, 2010

सूख गया गुलाब…अब और भी महकता है





तमाम गीत चुनकर मैंने रख लिए हैं/ उस गुलदस्ते में / जिसमें पहली-पहली बार / तुम्हारे जूड़े से निकालकर / लगा लिया था / लाल गुलाब / अब वो सूख गया है / पर महक़ अब तक है / वैसी की वैसी / जैसी थी नए-नकोर फूल में / और देखो / महकता ही जा रहा है / बिना मिलन के खाद-पानी के भी / वो गुलाब अब बंद रहता है / दिल की किताब के / दो मुड़े हुए पन्नों के बीच / जिन पर दर्ज है तारीखें / हमारे संयोग की / आओ पलट दें / पन्ने / पढ़ लें, रच लें नई गजल

10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस मखमली रचना के लिए साधुवाद!

Kulwant Happy said...

चौराहे पर आना अच्छा रहा, लेकिन इंटर पर इंटर मारकर लिखें तो और भी बेहतर हो।

राजू बन गया 'दी एंग्री यंग मैन'

बाजारवाद में ढलता सदी का महानायक

सर्वेश दुबे said...

Bahut Achhi hai ye Aap ki kavita ,lekin formatin kar diya kare to Dur se bhi padha ja sakta hai janta hu wakt ki kami hogi .Agar formating ki jaroorat ho to hame sewa ka mauka de .....

Udan Tashtari said...

एक कोमल रचना के लिए बधाई.

निर्मला कपिला said...

सुन्दर रचना के लिये बधाई

M VERMA said...

सुन्दर रूमानी रचना के लिये साधुवाद

संजय भास्कर said...

सुन्दर रचना के लिये बधाई

shikha varshney said...

sundar rachna...jara kavita ki tarah likh den to maja aa jaye...matlab ek -ek line alag alag.

अबयज़ ख़ान said...

पूरी कविता बहुत अच्छी है, क्योंकि भाव ही इतना बढ़िया है.. लेकिन मुझे तो नए-नकोर शब्द बहुत अच्छा लगा...

संजय भास्कर said...

एक कोमल रचना के लिए बधाई.