कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Monday, July 28, 2008

एक चिड़िया है सिक्ता


एक चिड़िया है सिक्ता. छोटी-सी...इन दिनों, बारिश से भीगते हुए वो अपना घर बनाने में जुटी है...बूंदों से नहाती हुई, अपनी भाषा में कुछ गुनगुनाती हुई सिक्ता चोंच में घास के कई टुकड़े समेटे इधर से उधर फुदकती, इस डगर से उस डगर तक भटक रही है...हो सकता है, बारिश उसका घर बनने न दे, बन जाए, तो बहा दे पर सिक्ता यह सब नहीं सोचती...वो बस घर बनाने में जुटी है...उसका घर तो बन जाएगा न?

4 comments:

शैलेश भारतवासी said...

बहुत बढ़िया कोशिश है आपकी चंडीदत्त जी। बहुत खूब।

आपका-
शैलेश भारतवासी

हिन्द-युग्म, कविताएँ, कहानियाँ, गीत-संगीत, बाल-उद्यान, चित्रावली

बातो-बातों में said...

बहुत खूब चंडी जी। सिक्ता का घर बनेगा और उसकी कोशिश कामयाब भी होगी, क्योंकि मेहनत कभी जाया नहीं जाती। फिर मेहनत के मामले में आदमी आलसी हो सकता है, पक्षी नहीं। प्रकृति ने यही तो खूबी इन पंछियों को बख्शी है।...........बारिश से पहले ही इन्हें अपनी जरूरतों का बखूबी अहसास हो जाता है। इसी का कमाल है कि आशियाना बनाने से लेकर भोजन जुटाने तक में ये तय समय पर जुटे जाते हैं। आपने भी बेघर आदमी को असहाय हालत में बारिश में भीगते देखा होगा, लेकिन कोई पंछी आपको बेघर नहीं मिला होगा।

आशीष कुमार 'अंशु' said...

... क्या कहूं?

महाबीर सेठ said...

apna purana gyan khol hi dijiye..
college ki magazene me aapki kavitayaen khob padha. ab blogs par intjar hai...