कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Tuesday, February 17, 2009

आज फिर


आज फिर बहुत उदास हूं
आज फिर तुमसे नाराज हुआ
आज फिर एक शाम आई
आज फिर तुमसे दूर हूं
आज फिर तुमसे ही की तुम्हारी शिकायतें
आज फिर मांगी तुमसे सफाइयां
आज फिर नहीं हुआ तुम पर यक़ीन
आज फिर तुम्हें जता दिया अविश्वास
आज फिर तुम पर ही किया भरोसा
आज फिर तुम्हारे ही सीने से टिका दिया सिर
आज फिर तुमसे ही मांगा सहारा
आज फिर कह रहा हूं
आज जैसा आज फिर कभी न आए

18 comments:

vinodbissa said...

bahut shandar .............

Udan Tashtari said...

आज जैसा आज फिर कभी न आए -क्या बात है!!

राजेंद्र त्‍यागी said...

चलो अच्‍छा हुआ जो भी हुआ ।
आपके िसवा दूजा न हुआ।।
हुआ होता तो क्‍या कर लेते।
िसर पटक कर यूं ही जी लेते।।
चण्‍डी भाई आपकी वेदना से मेरा हृदय वेिदत है। मेरी यही कामना है िक आज जैसा िदन िफर कभी लौट कर न आए।

mehek said...

bahut marmik bhav bahut sundar

seema gupta said...

आज फिर तुम पर ही किया भरोसा
आज फिर तुम्हारे ही सीने से टिका दिया सिर
" सुंदर ख़यालात .......आज फ़िर ये तो होना ही था......क्योंकि .....ये आज "किसी एक" के इर्दगिर्द ही तो घूमता है न.."

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बढ़िया लिखा है

बवाल said...

बढ़िया कविता लिखी शुक्लाजी आपने।

राजीव करूणानिधि said...

बहुत खूब मेरे भाई. आभार.कभी मेरे ब्लॉग पर भी पधारिये.

shelley said...

आज फिर कह रहा हूं
आज जैसा आज फिर कभी न आए
bahut achchha bhai.

अमित द्विवेदी said...

bhai sahab bahut hee adbhut likha dil khush ho gaya. aise hee likhte rahiye chaurahe par phr milenge chalte chalte.

योगेन्द्र मौदगिल said...

बिल्कुल सही.... ऐसे आज की जरूरत ही क्या..?

sakhi with feelings said...
This comment has been removed by the author.
sakhi with feelings said...

aaj hi apka likha pada pahli baar...acha khayaal hai..
kai din hote hai jo bapic hame nahi chahiye mera to aaj hi yaisa ek din tha....jo na aaye to acha hai..
padke acha laga apke khyaaal...

sakhi

shama said...

Pehlee baar aayee hun aapke blogpe..nimantran ke liye shukrguzaar hun..

Naa lekhika hun naa kavi..bas apnee jindagee tukdonme bekher blogpe sametne aayee hun.....baant ne aayee hun..
Itne diggajon ne comments diye hain....ki main adnasi wyakti kya kahun ? mujhme itnee qabiliyat nahee...!
sidhe saade alfazon me sirf itnaa kahungee, bohot achha laga aapkaa likhnekaa dhang...jaise aap apneaapse batiyaate rahe aur paathak usme shamil ho gaye..

तेजेन्द्र शर्मा said...

Bhai Chandidutt jee

I had always thought of you as a bright journalist. Now I know that you are a sensitive poet too. What I like about your poetry is the fact that you have developed new idiom, new words and new symbols for your poetry. This is unique. You do not use oft repeated words of poetry. Your attitude to poetry is young and imaginative.

Best wishes for your future endeavours.

Tejendra Sharma
General Secretary
Katha UK, London

दिगम्बर नासवा said...

आज फिर कह रहा हूं
आज जैसा आज फिर कभी न आए

अनूठे अंदाज़ में लिखा है,क्या बात लिख दी है

गीता पंडित (शमा) said...

अच्छा लगा आपका ब्लोग...
नाम बहुत सुंदर...और अलग सा....

लेखन बहुत भावपूर्ण....
निर्मल अंतःकरण की वकालत करता हुआ....


बधाई आपको और शुभ-कामनायें

स-स्नेह
गीता पंडित

pooji said...

ke ye unche neeche padaav hi to mazedaar hote hain