कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Monday, September 28, 2009

मैं और तू...

प्रेम नहीं है 99 साल की लीज

मैं : प्रेम का क्या होगा, जब साथ नहीं रह पाएंगे
तू : चुप कर, चूम ले बस
मैं : पर कब तक
तू : एक ये पल जीवन से बड़ा नहीं है क्या?

या तो यक़ीन, या फिर...

मैं : आज फिर तू उससे मिली
तू : हां! तूने देखा!
हां : कोई बात नहीं, मुझे तुझ पर यक़ीन है
तू : यक़ीन? फिर सवाल कैसे जन्मा?

जीवन से अलग?

मैं : मेरे लिखे डायलॉग सब बोलेंगे
तू : और कहानी का क्या होगा?
मैं : कहानी से ही तो निकलेंगे...
तू : फिर अलग से क्यों लिखने पड़ेंगे?

7 comments:

डॉ .अनुराग said...

हुम्म्म्म्म ...ये अंदाज भी दिलचस्प है जनाब

sushant jha said...

हिला दिया मियां....कहां से लिख लेतो हो भाई...थोड़ा उधार दो न...

मन का पाखी said...

बहुत ही उम्दा रचनाएं ....इन सवालों के जबाब किसी के पास हैं?..

"अर्श" said...

kya baat hai andaaj me alag tarah ka painaapan aur nayapan hai ... chhoti baaton me gambhir vishay ko shabdarth kiyaa hai aapne... sabhi rachanaayen achhi lagi...

badhaayee swikaaren

arsh

चंदन कुमार झा said...

क्या कहे मुग्ध हूँ इन क्षणिकाओं पर । बहुत सुन्दर ।

Digvijay Singh Rathor Azamgarh said...

waha bhai waha jaldi aap ki lekhani par log likhne lagege

संजय भास्कर said...

behtreen.........