कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Tuesday, December 6, 2011

हौसले का जादू-मंतर

राजस्थान के उत्साही युवाओं ने आपसी प्रयास से फिल्म ही बना डाली तो अयोध्या के नौजवान हर साल करते हैं फिल्म समारोह का आयोजन। हौसला इतना बड़ा है कि पैसे की किल्लत कुछ नहीं कर पाती। ये कोशिशें बताती हैं, लोक के रंग सुरक्षित रहेंगे। फिरकापरस्ती की हार होगी और सद्भावना का राज कायम होगा।

- चण्डीदत्त शुक्ल
छह दिसंबर के दिन, यानी आज यूनान में राजस्थानी लोकसंगीत की धुन गूंजने वाली है। वहां गजेंद्र एस. श्रोत्रिय निर्मित-निर्देशित फिल्म भोभर की स्क्रीनिंग हो रही है। हो सकता है, ये पंक्तियां जब आप पढ़ रहे हों, तब यूनान के शहर कोरिन्‍थ में आयोजित दूसरे कोरि‍न्थियन फिल्‍म फेस्टिवल में रामकुमार सिंह रचित गीत `उग म्हारा सूरज' की धुन और बोलों पर लोग झूम रहे हों। भोभर पहली राजस्थानी फिल्म है, जिसे किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन किया जा रहा है। इस फिल्म के बारे में और भी कई दिलचस्प बातें साझा करने लायक हैं। मसलन- जयपुर निवासी, पेशे से पत्रकार रामकुमार सिंह और रियल एस्टेट व्यवसायी गजेंद्र एस. श्रोत्रिय व उनकी मित्र मंडली का यह शौक और जुनून ही था कि वे जब भी आपस में मिलते, केवल सिनेमा की बातें करते और ख्वाब बुनते। ये `जब भी मिलने' का सिलसिला जल्द ही नियत मुलाकातों के कार्यक्रम में बदला और फिर वे सब हर हफ्ते सिनेमा विमर्श में जुटने लगे। ऐसी ही किसी मुलाकात के दौरान रामकुमार ने अपनी एक कहानी सुनाई, जिस पर दोस्तों ने तय किया कि फिल्म बनाई जाएगी।
फिल्म बनाने का आइडिया अच्छा था, रोमांचक भी, लेकिन आगे की लड़ाई जैसा कि सब जानते हैं कि मुश्किल ही होनी थी। पहले तो पैसे जुटाने के लिए दोस्तों से लेकर फाइनेंसर्स तक की दौड़ हुई, फिर जब अधिकतर जगह से मनाही हुई, तो राम और गज्जी (गजेंद्र) ने तय कर लिया, जुनून अपना है तो पैसा भी अपना ही लगे! `जो होगा, देखा जाएगा' की तर्ज पर भोभर का काम शुरू हुआ। किसानों की व्यक्तिगत ज़िंदगी के उतार-चढ़ावों पर आधारित भोभर की मेकिंग की कहानी कम रोचक नहीं है। जिस लड़के को हीरो चुना गया, चार दिन बाद वो चलता बना। आखिरकार, एक दोस्त की सलाह पर तकरीबन पच्चीस लाख रुपए के बजट वाली भोभर का हीरो अमित सक्सेना को बनाया गया। इसके बाद हीरोइन ढूंढना भी मुश्किल काम था। पंद्रह लड़कियों से बातचीत हुई। सबने किसी न किसी वज़ह से इनकार कर दिया। अंततः थिएटर में काम करने वाली परिचित लड़की को मान-मनौव्वल और अधिकार बोध के हवाले से हीरोइन बनाया गया। डायरेक्टर गजेंद्र ने दाढ़ी बढ़ा ली थी कि और कोई हीरो बनने को तैयार न होगा, तो खुद ही अभिनय करेंगे। रामकुमार ने कलाकार न मिलने और लागत कम रहे, इन्हीं वजहों से फिल्म में अभिनय किया। उनके ही गांव बीरानिया में शूटिंग हुई। खैर, अंत भला तो सब भला। अब भोभर तैयार हो चुकी है और देश के हर कोने से तारीफें बटोर रही है। `वो तेरे प्यार का गम' जैसे मशहूर गीत के संगीत सर्जक दान सिंह ने जिस आखिरी फिल्म में संगीत दिया, वो भोभर ही है।
ये सफलता किसी एक फिल्म की नहीं है, न ही कुछ लोगों की। ऐसी कोशिशों को सलाम इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि ये सामूहिक प्रयास की जीत को उल्लिखित करती हैं। बताती हैं कि हिम्मत हो, जुनून हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। इस सिलसिले में अयोध्या में होने वाले फिल्म फेस्टिवल का जिक्र करना ज़रूरी है। यहां पर 2006 से फिल्म प्रेमियों का एक समूह, (जिसकी अगुवाई शाह आलम, शहनवाज, महताब जैसे नौजवान कर रहे हैं), अनूठे फिल्म समारोह का आयोजन करता है। बिस्मिल की शहादत की याद में आयोजित इस महोत्सव का उद्देश्य है -- प्रतिरोध की संस्कृति और अपनी साझी विरासत का जश्न मनाना। 
जैसे भोभर बनाने वालों के दिल-ओ-दिमाग में जुनून था-- किसी भी तरह राजस्थान के किसान की असल आवाज़ को रुपहले परदे पर पोट्रे किया जाए, वैसे ही अयोध्या फिल्म समारोह के आयोजकों की मंशा होती है -- फिरकापरस्ती को चोट पहुंचाई जाए। तरीका दोनों का एक है -- अपना जुनून और अपना ही पैसा। जरूरत हुई तो दोस्तो से मदद ले लेते हैं। पैसों की किल्लत उनके हौसलों पर भारी नहीं पड़ती। ये ही तो है असल मायने में हौसलों की जीत। एक तरफ लोक का रंग है, दूसरी तरफ समाज के लिए भावना। आइए, दुआ करें, ये सिलसिला कायम रहे, ताकि राजस्थान से लेकर अयोध्या तक, खुशी ज़िंदा रहे। सरयू का पानी खुशी से उफनता रहे और रेत के ढोरे गुनगुनाते रहें...सूरत पीर फकीर सी लागे / जाणैं जादू मंतर है / जिंदगानी नाचे ज्यूं बांदरी / मुलके मस्त कलंदर है...।


4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जाएगी!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो हमारा भी प्रयास सफल होगा!

राजेश उत्‍साही said...

हौसला बना रहे।

santosh pandey said...

आइए, दुआ करें, ये सिलसिला कायम रहे, ताकि राजस्थान से लेकर अयोध्या तक, खुशी ज़िंदा रहे। सरयू का पानी खुशी से उफनता रहे और रेत के ढोरे गुनगुनाते रहें...सूरत पीर फकीर सी लागे / जाणैं जादू मंतर है / जिंदगानी नाचे ज्यूं बांदरी / मुलके मस्त कलंदर है...।

क्या बात है शुक्लाजी. इनमे हमारी दुआएं भी मिला लीजिये.

संतोष पाण्डेय said...

आइए, दुआ करें, ये सिलसिला कायम रहे, ताकि राजस्थान से लेकर अयोध्या तक, खुशी ज़िंदा रहे। सरयू का पानी खुशी से उफनता रहे और रेत के ढोरे गुनगुनाते रहें...सूरत पीर फकीर सी लागे / जाणैं जादू मंतर है / जिंदगानी नाचे ज्यूं बांदरी / मुलके मस्त कलंदर है...।

क्या बात है शुक्लाजी. इनमे हमारी दुआएं भी मिला लीजिये.