कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Friday, March 9, 2012

व्यंग्य : बेगुनाह चच्चा ने खेली एक अनूठी होली



- चण्डीदत्त शुक्ल

chandidutt@gmail.com

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कभी महंगाई ने होली खेली, कभी लापरवाह नेताओं के ऊल-जलूल बयानों ने, लेकिन चच्चा के पस्त हौसलों को धूल चटाते हुए चच्ची बोलीं—मुश्किलें तो रहेंगी ही, हौसले से खेलो रंग और बोलो – होली है, है होली!

 
मार्च का पहला हफ्ता भी बीतने को है और मौसम किसी बेवफ़ा माशूका की तरह ऊल-जलूल, दिल तोड़ने वाली हरकतें करने से बाज नहीं आ रहा। पौ फटते ही ठंडे पानी से नहाने की जो आदत मजबूरी में पड़ी थी, उसका निबाह करने का फायदा ये हुआ है कि हवा में बदलाव आते ही जुकाम-बुखार धर दबोचता है। ऊपर से तुर्रा ये कि सुबह सिहरन भरी बयार चलती है और दोपहर में सिर तपने लगता है। ज्यादा गलती ये कर दी कि चचा के घर का रुख कर लिया। पहुंचा तो देखता हूं कि चचा चारपाई उलटी करके रस्सी पर डंडा पटक रहे हैं। फितरतन हंसी आ गई और उनका पारा फटाक कर ऊपर चढ़ गया। वे हिनहिनाए—`का बाबू नंदलाल, हमको ट्रैफिक का कानून समझ लिया है? जब चाहोगे, तोड़ दोगे। ये जो डंडा हम रस्सी पर पटक रहे हैं, वही तुम्हारी पीठ पर धर देंगे।' अल्पमत की सरकार की तरह हमारी हंसी शैंपेन के झाग माफिक तुरंत बैठ गई। हम रिंरियाए – `अमां चचा, आप भी न पूरे डॉली बिंद्रा हो रहे हैं। बे-बात नाराज़, लड़ने को आमादा। हुआ यूं कि हम सोच रहे थे— आप होली की तैयारी में जुटे मिलेंगे।

पकी हुई दाढ़ी-मूंछें खिजाब से रंगने और नई अचकन से लैस होने में मुत्तिला होंगे, लेकिन जो आपको खटमल मारते देखा तो हंसी आ गई। अब इसे लड़कपन की भूल मानकर माफ़ कर दीजिए।' चचा बुझती हुई लालटेन की तरह और भभक पड़े – `कहना क्या चाहते हो। तुम बयालीस की उमर में लड़के हो और हम बुड्ढे हो गए? अभी हमारी उमर ही क्या है?' चचा को सेंटी होते देख हमने जबान के मंझे को ढील दी और पटरी पे आ गए। हमने कहा – `चचा, सच बात है। आपके बाल ही तो सफेद हैं...' उन्होंने बात लपक ली, बोले – `हां, दिल तो काला ही है बेटा। खैर, और सुनाओ। क्या हाल है?' लेकिन ये कहने के साथ ऐसा भी नहीं कि जवाब का इंतज़ार करते, खुद ही बोलते रहे – `ऐसा है नंदलाल, होली तो हमसे साल 2011 ने जमकर खेल ही ली है। अब हम रस्मअदायगी करें तो करें।'

हमने मुंह के किवाड़ फटाक से खोल दिए – `अमां चचा, आप भी न गड़बड़झाला कर रहे हैं। होली तो आज है और आप पता नहीं क्या-क्या कह रहे हैं। सुबह ही भांग चढ़ा ली क्या?' चचा इस बार न फफके, न भभके, बस मुस्कुरा दिए – `नंदू बेटा, आओ बैठो। हम सुनाते हैं, कैसे मनाई हमने साल भर होली!' हम भी इत्मिनान के साथ, खुले कानों और दोपहर तक जमे रहने के इरादे के साथ वहीं जमीन पर पसर लिए। फिर तो चचा बोलते रहे, नॉनस्टॉप, फुल स्पीड।

चचा ने क्या कहा, हम बताएंगे, लेकिन पहले जरा उनका इंट्रोडक्शन हो जाए। इनका असली नाम तो वालिदान को या हेड मास्टर साहब को पता होगा, हम बस इतना जानते हैं कि सूफियाना मिजाज के चचा खुद को बेगुनाह चच्चा कहलाना पसंद करते हैं। आशिकाना दिल के मालिक हैं, सो जवानी में दो-चार हड्डियां तुड़वा चुके और रेलवे स्टेशन के पास पान की छोटी-सी दुकान चलाते हैं।

चचा कहने लगे – `देखो नंदू, होली का हाल हम तुमसे क्या बताएं। अब तुम हमसे कहोगे चाय पिलाओ, सो पहली कहानी तो यहीं से शुरू हो जाती है। एक जमाना था, जब हम कलेवे में, बोले तो मुए ब्रेकफास्ट में, दूध-जलेबी खाते थे। अब गाना सुनते हैं जलेबी बाई, लेकिन दूध को सेंट की तरह इस्तेमाल में लाते हैं। ऐसे में इस साल की सबसे जबर्दस्त होली तो महंगाई ने खेली है।'

धाकड़ मिजाज चच्ची आंगन में आकर चिल्लाईं– `सुनो जी, न काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के। अब भतीजा आया है तो कंजूसी के रिकॉर्ड न बनाओ। ऐसी किल्लत नहीं पड़ी है कि इसे चाय भी न पिला पाऊं।' चच्ची की बात सुनके हमारी हिम्मत जागी, लेकिन उन्होंने भी दिल तोड़ने की ठान रखी थी। बोलीं – `बेटा नंदू, चचा तुम्हारे बात तो सही कह रहे हैं। बेटा साल भर में पांच बार दूध की कीमत बढ़ी है। मैं कहती ही रह गई कि एक भैंस पाल लो, लेकिन ये हैं कि सुनते नहीं।'

चचा फट पड़े - `और आंगन में तेल का कुंआं भी खोद लूं न... वहीं से पेट्रोल और केरोसीन निकलेगा!'

चच्ची ग़ज़ब वाली नाराज़ हुईं और चचा को कोसते हुए अंदर जा सिधारीं। हमने सोचा, ये मियां-बीवी हर मेहमान के आने के साथ ऐसी ही नौटंकी शुरू कर देते हैं, ताकि चाय न पिलानी पड़े। खैर, चाय की उम्मीद छोड़ हमने चचा की आवाज़ की तरफ कान लगा दिए। वे कहते जा रहे थे – `बेटा, दूसरी होली हमारे साथ विद्या बालन ने खेली। अब इस बुढ़ापे में ऐसी-ऐसी हरकतें दिखा गई है कि खुद तो दोजख में जाएगी ही और हमारा रास्ता भी बंद कर दिया…'। उनके खुले मुंह पर यकायक ढक्कन लग गया तो हमने पलटकर देखा। दूध बहुत कम, पानी ढेर सारा वाली चाय एक डिस्पोजल ग्लास में भरकर बाहर निकल रही थीं। उन्होंने चाय हमें पकड़ाई और चचा को घूरा। चचा बेचारे अपनी परमानेंट मनहूस शक्ल पर और भी बारह बजाकर चुप हो गए।

चची बोलीं – `विद्या बालन क्यों, सन्नी लियोन की बात करो।' वे गिड़गिड़ाए – `हम तो नंदू बेटा से पढ़ाई-लिखाई की बात कर रहे थे।' चची वहीं जमकर बैठ गईं – `जरा हम भी तो सुनें तुम्हारी ये स्पेशल बातचीत।'

हम चाय गुड़गुड़ाने लगे और चचा गप का सिरा पकड़कर आगे बढ़ चले – `बेटा, अन्ना आए थे तो सबने सोचा कि अनशन करके मुश्किल सब हल हो जाएगी, लेकिन हम पहले से जानते थे कि इससे कुछ नहीं होगा। तुम्हारी  चच्ची तो महीने में वैसी ही दस-पंद्रह दिन अनशन करवाती हैं, लेकिन हमसे कोई हल कहां निकलवा पाईं।'

चच्ची जनलोकपाल बिल के समर्थन में मुस्तैद कार्यकर्ता की तरह भड़कीं – तुमसे कुछ होगा तो है नहीं, बस बातें बनाते रहो। इसके बाद हमारी ओर मुड़ीं - `नंदू बेटा। हम जब चौदह साल की उम्र में ब्याह के आए थे, तभी कह रहे थे कि सरकारी नौकरी के लिए टिराई करो। अब देखो, पिछले साल सारी छुट्टियां ऐसी पड़ी हैं कि एक दिन छुट्टी लो और तीन दिन आराम करो, लेकिन इनकी तो सारी कोशिश एकदम रामदेव के आंदोलन की तरह साबित हुई।'

चचा बोले – `हमने एक बार में तुम्हें सेलेक्ट किया, उसका शुकराना अदा नहीं करती हो। सैफरीना की तरह बना देते, तब सही होतीं।' उन्होंने हिम्मत करके इतना कह तो दिया, लेकिन चच्ची की घुड़की खाकर फिर साइलेंट हो गए। कुछ देर तो माहौल यूपी चुनाव की तरह रहा, फिर समर्थन जुटाने के लिए आतुर पॉलिटिकल पार्टीज की तरह नॉर्मल हो गया।

चचा ने उस दोपहर पूरे साल की होली की जो-जो घटनाएं सुनाईं, उनका डिटेल में बयान करना ठीक नहीं है, लेकिन मुख्तसर-सा बयान कुछ यूं है – नंदलाल, होली-दीवाली सब दिल में ही होती है। बाहर निकलकर मनाने चलो तो एक-से-एक संकट सामने है। पिक्चर देखनी हो तो मल्टीप्लेक्स में टिकट से ज्यादा पॉपकॉर्न के पैसे दो।

लाइसेंस लेना हो तो पूरे साल की कमाई रिश्वत में दे दो। ज्यादा नारेबाजी करो तो दो पत्ती गांजा रखके हवालात में ठूंस दें।' हमने ज्यादा जोर दिया तो बोले – `हमारे साथ तो बिग होली कृषि मंत्री साहब ने खेली। पूरे साल बताते रहे कि खेती-किसानी का भविष्य ज्योतिषियों के हाथ में है और खुद बेचारे मुकदमेबाजी से लेकर क्रिकेट की गुगलियां सुलझाने में लगे रहे। हमारा बस चले तो हम अलीगढ़ का एक ताला उन्हें गिफ्ट कर दें। दूसरे साहब हैं तो अंग्रेजों के जमाने से अब तक चली आ रही एक पार्टी के नेता, लेकिन उन्हें मच्छर भी काटता है तो आरएसएस की साजिश बता देते हैं। इनसे भी अव्वल नंबर के हुलियारे निकले आतंकवादी, जो जब देखो, तब अपनी जान तो गंवाते ही हैं, हमारा अमन-चैन भी काफूर कर देते हैं।'

चचा सेंटी हो रहे थे और हम मुंह बाए उनकी बात का जवाब तलाश रहे थे। वे एक्सप्रेस ट्रेन की तरह दौड़ते रहे – `अब बताओ नंदू, मेरे जैसे बेगुनाह के पास क्या है, लेकिन गैस सिलेंडर की कीमतें सुनकर मन करता है, खुदा के पास चला जाऊं। हां, याद आया, होली तो मौत ने भी इस बार बहुत तगड़ी खेली, लेकिन वो भी अपने साथ हमारे अजीज जगजीत सिंह, भूपेन हजारिका, देवानंद को ले गई। अब जन्नत में गाना-बजाना हो रहा है और हम तुम्हारी चच्ची की झिन-झिन सुन रहे हैं… खैर, अपनी-अपनी किस्मत। होली तो हर साल आएगी, लेकिन हम एक सवाल पूछते हैं – हमारी सुध सरकार को कब आएगी?'

चच्चा को हम क्या जवाब देते। उनकी उम्मीदें सोने की कीमत की तरह सारी सीमाएं लांघ रही हैं। हम और फेडअप होते, उससे पहले चच्ची ने हमें बचा लिया। वे साबुन का झाग घोलकर लाईं और चच्चा के घुटे सिर पर उड़ेलकर बोलीं – होली है, होली है मनहूस। मेरे प्यारे शौहर, तुम सच में बूढ़े हो गए हो। मुफलिसी और मुसीबतें तो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं। मियां, ये ही न हों तो ज़िंदगी कितनी बेनूर और बेमज़ा हो जाएगी। है कि नहीं...। दूसरों को कोसना छोड़ो और आओ, जितनी भी रूखी-सूखी है, उसमें ही मस्त रहें, होली खेलें।'

मैंने राहत की सांस ली और चच्चा-चच्ची को होली की मुबारकबाद देकर आगे बढ़ा। मेरे मन में चच्ची की बातें अब भी गूंज रही थीं – हालात से समझौता करके चुप बैठ जाना हल नहीं है, हमें आवाज़ तो उठानी होगी, लेकिन दिक्कतों की दुहाई देकर सिर्फ झींकते रहने से भी कुछ नहीं होगा। ज्यादा अच्छा ये होगा कि हम हंसते रहें और लड़ते रहें। हम ऐसा कर पाए तो हर दिन होली होगी।

चच्ची की बात यादकर मुझे हंसी आ गई, तब तक चार-पांच बच्चे दौड़ते हुए आए और टकरा गए। वे चिल्ला रहे थे – होली है, होली है...। दूर, सूरज बादलों के पीछे थोड़ी देर इंटरवल मनाने निकल लिया था और होलियारे हर तरफ हुल्लड़ मचाने निकल पड़े थे।
 


2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

होली है....
बधाईयाँ.