कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Saturday, April 28, 2012

शुक्रिया वसंत

- चण्डीदत्त शुक्ल

शुक्रिया वसंत
तुम्हारा मिलना इस बार
नहीं लाया कोई बहार।
कहीं, नहीं फूटी, कोई कुहुक
एक भी फूल नहीं खिला
कहां हंसी कोई चिड़िया
पर
तुम, अपने न होने के बावज़ूद
साथ हुईं,
पल भर को सही।
बोलो, मृत्यु भी क्या छीन सकेगी यह सुख?
जानती हो
जी गया मैं।
यूं भी,
बेहद तकलीफ देता है,
छीजते हुए, सांस समेत तिल-तिल मरना।
इससे कितना अच्छा है न,
हंसते हुए, तुम्हारी गोद में प्राण दे देना।
तुम मिलीं
और मैंने ज्यूं एक पल को त्याग दी सारी निराशा!
आज सांस में हिमालय से ठंड आकर पसरी है।
बहुत ज़रूरी है
तुम्हारे अंदर यकीन का ज़िंदा रहना.
मुझ पर न सही,
किसी पर भी बना रहे विश्वास
वह भी न हो
तो खुद में ज़िंदा और आश्वस्त रहो तुम।
आखिरकार,
उपस्थित रहना
एक खूबसूरत इंसान का
इस दुनिया में
कितना आवश्यक है।
यकीन करना
तुम्हारे हंसने से
आज भी सुबह हो जाती है
और लाल।
दोबाला रफ्तार से धड़कता है दिल।
तुम्हारी देह के बिना भी,
मुझमें
तृप्त होती हैं समस्त वासनाएं।
एक शाम,
अपने मरे हुए यकीनों के साथ ही सही,
आना...
कुछ न कहना,
कुछ न सुनना।
तुम्हें अपनी बांह में पिरोकर
छुए बिना ही
मैं भर दूंगा तुम्हारे मन में प्रेम-सरोवर।
कुछ तो है साथी
जो बनाता है
इस रंगहीन-बेस्वाद दुनिया को
सुंदर और लज्जतदार
वह हो तुम
और मेरा कातर प्रेम!

5 comments:

expression said...

तुम, अपने न होने के बावज़ूद
साथ हुईं,
पल भर को सही।
बोलो, मृत्यु भी क्या छीन सकेगी यह सुख?

प्रेम की पराकाष्ठा है ये............

बहुत सुंदर भावनात्मक रचना.....

अनु

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह सुंदर

lokendra singh rajput said...

शुक्ल जी भावपूर्ण रचना... बहुत शानदार....

mridula pradhan said...

sunder.....bhawpoorn.