कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, April 9, 2009

डायरेक्ट दिल-से

मेरा दिल है तू, ज़िगर भी तू...तू ही ज़िंदगी की सुबो-शाम है
तू यकीं जो कर तो कहूं ये मैं, मेरे लब पे तेरा ही नाम है
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वो जानते हैं नहीं कि ये आशिकी भी क्या चीज है...
जो दिल मिले, तो तख्त क्या, सारी दुनिया ही नाचीज़ है
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अब आ भी जा, न बन संगदिल...
बग़ैर तिरे सूनी है दिल की महफ़िल
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पत्थर हैं, उनकी हिम्मत है क्या जो आशिकी की राह में रोड़ा बनें...
तू देख हमारी चाहतों की आग के आगे दम उनका निकल जाएगा
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शब-ए-ग़म का बोझ उठाके भी यारों हम जिए जाते हैं ...
जो अश्क मोहब्बत में मिले हैं, उन्हें हंसके पिए जाते हैं
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जो पागल हुए, तो तू कहा...बस तेरी रहगुज़र की आरज़ू
होश आने का सबब नहीं, मन में है इंतज़ार की जुस्तजू
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दीवानगी मुझ पे यूं कहर ढाएगी ये सोचा ना था,
तू मेरी राह से होके गुज़र जाएगी ये सोचा ना था

6 comments:

Nirmla Kapila said...

aji itani divangi bhi achhi nahi vese bahut khoobsurat rachna hai bdhai

shubhAM mangla said...

Maar hi daaloge..!! :-)

दिगम्बर नासवा said...

वो जानते हैं नहीं कि ये आशिकी भी क्या चीज है...
जो दिल मिले, तो तख्त क्या, सारी दुनिया ही नाचीज़ है

अच्छे है सब शेर.....ये कुछ ख़ास लगा ....शुक्रिया

आशीष कुमार 'अंशु' said...

कमाल कर दिया आपने ...

महाबीर सेठ said...

आपने तो वाकई दिल से लिखा है
और बताएं क्या हो रहा है

Dileepraaj Nagpal said...

gajhab sir jee...shayri kmaal hai