कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Monday, June 28, 2010

कामयाबी का जायका : पैट्रिका नारायण




आमतौर पर रेहड़ी-पटरी वाले क्या बेचते हैं? यही—चाय या फिर सिगरेट!  लेकिन 21 जून, 1982 को चेन्नई के मैरीना बीच में पैट्रिका नारायण की रेहड़ी पर सबकुछ हाज़िर था—कटलेट, समोसा, जूस, चाय और कॉफी। वो चाहती थीं—इतनी कमाई हो जाए, जिससे घर चल निकले। दिल में ज़रूर कामयाब होने का इरादा पल रहा था, लेकिन ये ख़्वाब पलकों के तले आंखों में सहमा हुआ, सिमटा ही था। पैट्रिका के पास आसमान छूने जैसे बड़े सपने देखने की हिम्मत नहीं थी…तो पहले दिन महज पचास पैसे का बिज़नेस हुआ। यही वो रकम थी, जिसके एवज में पैट्रिका ने ग्राहक को एक कप कॉफी बेची और छोटा-सा कारोबार शुरू कर दिया। घर लौटकर पैट्रिका रोने लगीं, लेकिन मां ने समझाया—कोई भी शुरुआत ऐसे ही होती है। छोटी, लेकिन भविष्य के लिए बड़ी। पैट्रिका फिर रेहड़ी के साथ मैरिना बीच पर लौट आईं। अगले दिन ही सात सौ रुपये की कमाई हुई। फिर तो ठेले पर आइसक्रीम, सैंडविच, फ्रेंच फ्राई भी आ गया। 2003 तक तो हर दिन पच्चीस हज़ार रुपये की बिक्री होने लगी थी। फिर स्लम क्लियरेंस बोर्ड ने उन्हें कैंटीन चलाने का ऑफर दिया। एक और क़दम फिर...कामयाबी ही कामयाबी।
और अब?  आज सारी बाधाएं पैट्रिका की हिम्मत के आगे सिर झुका चुकी हैं। उन्हें `फिक्की वुमेन एंटरप्रेन्योर’ अवार्ड मिला है और वो `संदीपा’ नाम की रेस्टोरेंट चेन की मालकिन हैं। हालांकि कामयाबी का ये जायका उन्हें आसानी से नहीं हासिल हुआ। तकरीबन तीस साल पहले मैरीना बीच पर जब पैट्रिका ठेला लेकर निकलीं, तो उस पर खाने-पीने का बहुत-सा सामान था। केतली में उबलती हुई चाय उनके मन में धधकती हुई शंकाएं, अविश्वास, दु:ख, डर और परेशानी। शादीशुदा ज़िंदगी वीरान थी।
नशेड़ी पति और दो बच्चों की ज़िम्मेदारी उठा रहीं पैट्रिका ने कारोबारी बनने के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। उन्होंने रेहड़ी लगाने का फैसला भी घर की ज़िम्मेदारियां पूरी करने की वज़ह से ही लिया था। हां, एक और वज़ह ये थी कि पैट्रिका को नए-नए व्यंजन बनाने और लोगों को खिलाने का शौक था।
अब मीडिया से बात करते समय पैट्रिका बीता वक्त धीमी हंसी के साथ जैसे उड़ा देना चाहती हैं, `हमारी शादी ने ही मुझे कामयाब बनाया। पहले पूरी तरह तोड़ दिया और अब आसमान तक पहुंचा दिया है। ना शादी होती, ना मैं इतनी परेशान होती और ना ही व्यवसाय शुरू करती। वो ब्राह्मण थे और मैं क्रिश्चियन। घर के लोग नहीं चाहते थे कि हमारी शादी हो, लेकिन मैं अड़ी रही। आख़िरकार, हम सात फेरों में तो बंध गए, लेकिन विवाह असफल रहा। वो तमाम तरह के नशों से घिरे थे। ड्रग्स, अल्कोहल और पता नहीं क्या-क्या! शुरुआत में मैंने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन फिर हार मान ली। क्या करती, जब कोई समझना ही ना चाहे।‘
पिता ने भी पैट्रिका को कोई मदद नहीं दी। अब वो दो बच्चों के साथ सड़क पर थीं। भूख मिटाने की ज़द्दोज़हद थी, सिर छुपाने के लिए एक अदद छत की तलाश थी। ख़ैर, किसी तरह रहने का ठिकाना मिला और फिर पैट्रिका ने सोच लिया—ग़रीबी को ऐसा जवाब देंगी कि वो लौटकर उनके घर में आने की हिम्मत भी नहीं करेगी। मां से सौ रुपये उधार लेकर उन्होंने अचार, स्क्वैश और जैम बनाने का काम शुरू किया। सारा दिन अचार सप्लाई करने के लिए जातीं और फिर रात भर अचार बनातीं। कुछ पैसा आया, तो हिम्मत भी बढ़ी। इस बीच पैट्रिका के पिता के एक दोस्त ने उन्हें रेहड़ी दिला दी। उनकी शर्त भी लाज़वाब थी—पैट्रिका उनके उस स्कूल के दो बच्चों को काम दें। रेहड़ी लेकर पैट्रिका मैरिना बीच की तरफ निकल पड़ीं और फिर तो उनकी किस्मत की गाड़ी भी चल निकली। पैट्रिका ने एक साल तक ये अनुमति पाने के लिए संघर्ष किया कि मैरिना बीच के सेंटर प्वाइंट में वो रेहड़ी लगा सकें। आख़िरकार, उन्हें इजाज़त मिली और फिर क्या था...उनके व्यंजनों का जायका लोगों की ज़ुबान पर इस तरह चढ़कर बोला कि नोट बरसने लगे, गरीबी भाग गई और अब पैट्रिका बुलंदी के सातवें आसमान पर हैं... तो है ना ग़ज़ब की प्रेरणादायक कहानी। अब कभी किसी रेहड़ी पर चाय पीते समय उसके मालिक-मालकिन को गौर से देखिएगा, हो सकता है—आप भविष्य की किसी और पैट्रिका के पास खड़े हों।

जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/27062010/humlog-article/13012.html में प्रकाशित आलेख

11 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

प्रेरणादायक कहानी, धन्‍यवाद शुक्‍ला जी.

अबयज़ ख़ान said...

इस बार लालबत्ती हुई तो चौराहे पर रुकने का मौका मिला.. बहुत बढ़िया कहानी है.. लोगों को इससे सबक मिलेगा।

Udan Tashtari said...

बढ़िया रही ये कहानी!

डॉ .अनुराग said...

ऐसे ज़ज्बे को सलाम...दरअसल ऐसी महिलाये...ही ये साबित करती है की शारीरिक रूप से भले ही वे कमजोर हो.....पर दुःख सहने ओर हालात से लड़ने की उनमे क्षमता ज्यादा होती है ...उनकी जिजीविषा शायद इन बिल्ट होती है...

गिरीश बिल्लोरे said...

मां तुझे सलाम

अविनाश वाचस्पति said...

इस हकीकत से रूबरू कराने वाले शुक्‍ल जी को जोरदाम सलाम। आखिर पहली प्रेरणा तो आपने ली है। जय हो जो जश्‍न बने।

संगीता पुरी said...

ऐसी ही घटनाओं से तो हमें प्रेरणा मिलती है !!

lokendra singh rajput said...

प्रेरणादायक कहानी.....

Vivek Rastogi said...

सीख लेना चाहिये हमें ऐसे व्यक्तित्व से।

डा.सुभाष राय said...

समीर जी (उडंनतश्तरी जी), यह कहनी नहीं हकीकत है. कहानी तो कल्पना भी हो सकती है मगर हकीकत संघर्षो से निर्मित होती है. यही जीवन की सचाई है, यही संकल्प की विजय की सत्यकथा है.

rashmi ravija said...

इतने जुझारू व्यक्तित्व से परिचय कराने का बहुत बहुत शुक्रिया...सचमुच एक प्रेरणाप्रद प्रसंग...कुछ करने की सच्ची जिजीविषा हो तो मंजिल फिर दूर नहीं रहती...