कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Sunday, July 4, 2010

आते हैं तुम्हें मौत के बहाने बहुत, ज़िंदगी से जरा-सी मोहब्बत कर लो!



प्यार में पागल जोड़े जब गुनगुनाते हैं—चैन से जीना अगर है,  मुझ पे ज़रा मर ले / आ खुशी से खुदकुशी कर ले…तब बात समझ में आती है, लेकिन कोई सबकुछ छोड़, ज़िंदगी को पीठ दिखा, जान देने पर उतारू हो जाए, तो उसकी झुंझलाहट गले नहीं उतरती। यूं भी, बहुत मुश्किल से मिलती है ज़िंदगी, हज़ार नियामतें लेकर आती है...फिर भला क्यों कोई अपने ही हाथों अपनी सांसें बंद कर देना चाहे? इससे बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती, ये हर कोई जानता है। सभी मज़हब आत्महत्या के ख़िलाफ़ हैं...फिर भी ये तथ्य निरी कल्पना नहीं...ये परेशान करने वाला सच है। दरअसल, बहुत-से लोगों को लगता है—ज़िंदगी से भाग जाना मुश्किलों का हल है!  वज़हें अपनी-अपनी हैं, बहाने अपने-अपने हैं  और खुदकुशियों के बढ़ते आंकड़े भी सामने हैं। कोई दिल हारकर जान देता है, तो कोई भूख से जूझते हुए।
किसी को रिश्तों की उलझन ले डूबती है, तो किसी को काम-कारोबार और प्यार में नाकामयाबी। हैरत तो तब होती है, जब ग्लैमर वर्ल्ड की कोई चर्चित हस्ती ज़हर खाकर, नींद की गोलियां निगलकर, फंदे से लटककर जान दे देती है। जहां हर राह में सितारे जड़े कालीन हैं, शोहरत है, दौलत है, दोस्त हैं, भीड़ है, कैमरों की फ्लैशलाइट्स हैं, वहां मौत और मातम क्या काम? फिर भला कोई क्यों जान देता है? 
हाल में ही कामसूत्र विज्ञापन से फ़ेमस हुईं विवेका बालाजी की आत्महत्या ने ये सवाल फिर गर्मा दिया है। कहते हैं—विवेका अकेली थीं, रिश्तों में धोखे से टूटी हुई थीं, इसलिए दुनिया से जाने में ही उन्होंने बेहतरी समझी। 
यूं, विवेका चमक-दमक से भरी मॉडलिंग, फैशन, टीवी और सिनेमा की दुनिया की इकलौती स्टार नहीं हैं, जिन्होंने आत्महत्या कर ली। कई सितारे असमय ही अपनी चमक खोकर खो गए। वज़ह—वही अकेलापन! धोखा, असुरक्षा का डर और खोखले होते जाने का अहसास। माना कि दिल टूटने की आवाज़ सुनाई देती है ताज़िंदगी, फिर भी जीने का हुनर सीख लेते तो अच्छा होता...। वैसे, ये बात उन सितारों की समझ में नहीं आई, जिन्होंने आत्महत्या कर लेने को ही हर मुसीबत का हल समझा।
9 जुलाई, 1925 को जन्मे गुरुदत्त ने भी जान दे दी थी। लड़की पसंद की थी, फिर शादी बनाई, लेकिन दिल नहीं लगा, सो घुटते रहे। मोहब्बत की कोशिश की, वहां साथ नहीं मिला...फिर भी जिए और क्या खूब जिए। ऐसा काम किया, जिसे अब तक सराहा जाता है। चौदहवीं का चांद, प्यासा, साहब बीवी और गुलाम, काग़ज़ के फूल...एक से एक नायाब नगीने। एक शाम, दिल डूबा। निराशा उभर आई। पता नहीं, प्यार में हार जाने की खीझ बड़ी लगी या कारोबारी झटके...10 अक्टूबर, 1964 की सुबह पता चला—गुरु की बेज़ान देह बिस्तर पर पड़ी है। बाद में लोगों ने बताया, उस रात गुरु ने बहुतों को फ़ोन कर अपने पास बुलाया था, लेकिन कोई नहीं आया, जो उनका दुख बांट ले, उनसे हंस ले, बतिया ले। 
•   ग़ज़ल सिंगर चित्रा सिंह की बेटी मोनिका चौधरी ने जान दे दी, तो इसकी वज़ह भी था—तनाव, बेचैनी और अवसाद।
•  जुलाई, 2004 में कामयाब मॉडल, एक्ट्रेस, वीजे और पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स नफीसा जोसेफ ने आत्महत्या कर ली, वजह—मंगेतर से रिश्ता टूट जाना।



•  टीवी धारावाहिक कैट्स की एक्ट्रेस कुलजीत रंधावा ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि बतौर मॉडल उन्हें अपना कैरियर डूबता हुआ लग रहा था।


•   अप्रैल, 1993 में एक दिन सारा देश स्तब्ध रह गया था, जब पांच मंज़िला इमारत से छलांग लगाकर एक्ट्रेस दिव्या भारती ने जान दे दी थी। कहते हैं—माफिया की धमकी से परेशान होकर दिव्या ने ये क़दम उठाया था।




• 1996 का सितबंर महीना। भारत की मर्लिन मुनरो कहलाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री 
सिल्क स्मिता ने चेन्नई स्थित अपार्टमेंट में फांसी लगा ली। कारण बनीं आर्थिक दिक्कतें और प्यार में मिला धोखा...। पहले स्मिता ने शराब में डूबकर हर गम भुलाने की कोशिश की और जब कहीं राहत नहीं मिली, तो जान दे दी।
•  फरवरी, 2002 में तमिल अभिनेत्री प्रत्यूषा ने ज़हर खा लिया। प्रेमी से वादा किया था, तुम्हारे बिना संसार में नहीं रहूंगी और बस इसलिए खुद को खत्म कर लिया।
•   नवीन निश्चल सबके पसंदीदा अभिनेता हैं, लेकिन उनकी अपनी ज़िंदगी उलझावों से घिरी है। अप्रैल, 2006 में पत्नी गीतांजलि निश्चल ने खुदकुशी की, तो इसका ज़िम्मेदार नवीन को ही बताया।
•  2009 में ब्यूटिशियन शहनाज हुसैन के पुत्र और फ़ेमस रैप सिंगर समीर हुसैन ने आत्महत्या कर ली। ख़राब आर्थिक हालात ही इसका कारण थे।
•  शारान्या भारद्वाज, एक्टर कुणाल सिंह, आशा भोंसले की पत्रकार बेटी वर्षा…ऐसे सैकड़ों नाम हैं, जिन्होंने असमय ही संसार का साथ छोड़ दिया। 
जन्म-जन्म तक साथ निभाने की लिए की गई शादी का टूट जाना, दोस्तों से मिले कारोबारी और भावनात्मक धोखे, कैरियर बरबाद होने का वहम और कई बार ऐसी परिस्थितियों का बनना...यही वो वज़हें हैं, जिनसे जूझते हुए ग्लैमर इंडस्ट्री के लोग जान दे देने का फ़ैसला कर लेते हैं। लेकिन क्या कोई भी नाकामयाबी इतनी बड़ी हो सकती है, क्या कोई धोखा इतना तोड़ सकता है कि सांसों की सौगात को सुलगा देने का फैसला कर लिया जाए?


सिनेमा के संसार की 
सुपर सितारा मीनाकुमारी के हवाले से एक बात...मीना के लिए भी ज़िंदगी बहुत मुश्किल थी। अपनी डायरी में एक जगह वो लिखती हैं—तारीखों ने बदलना छोड़ दिया है, क्या कहूं अब?...मीना के लिए समय ठहर गया था। अरमान झुलस चुके थे। वो मानती थीं—`अचानक आ गई हो वक्त को मौत जैसे / मुझे ज़िंदगी से हमेशा झूठ ही क्यों मिला? क्या मैं किसी सच के काबिल नहीं थी!’ बहुत-से सवाल जहन में थे। कोई आस ना थी, फिर भी मीना जीती रहीं। संसार से तब गईं, जब आखिरी बुलावा आया। 
जीना इसी का नाम है। आखिरी सांस तक लड़ना। मोहब्बत में धोखा मिला, तो क्या? उसकी याद ही सही...और फिर प्रेम का इंतज़ार भी क्या कम है? कैरियर डूब रहा है फिर भी हौसला तो यही होना चाहिए ना कि लड़ेंगे, फिर से सूरज की तरफ बढ़ेंगे। जीना इसी का नाम है। 
बनावट भरी ज़िंदगी जीते समय अगर कुछ वक़्त रिश्तों को संजोए रखने के लिए निकाल पाएं, तो फिर हमारे प्यारे सितारे हमें छोड़कर खुदकुशी की राह नहीं चुनेंगे। ऐसा होगा ना? आमीन!
  
पलायनवादी नायक...
सारे संसार में साहित्य, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में दिग्गज माने जाने वाले बहुत-से नायकों ने आत्महत्या की राह पकड़कर पलायनवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। दुनिया भर को बदलाव के लिए उत्साहित करने वाले कानू सान्याल ने हाल में ही व्यवस्था से परेशान होकर जान दे दी। खूबसूरत, प्रेरणादायक कविताएं लिखने वाले गोरख पांडेय ने नौजवानों को दिशा दिखाई पर खुद ऐसे टूटे कि 1989 में आत्महत्या कर ली। मलयालम की युवा लेखिका टीए राजलक्ष्मी 35 साल की थीं, तो दुनिया छोड़कर चली गईं। 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे को 1954 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और सात साल बाद 1961 में उन्होंने खुदकुशी कर ली। विंसेंट वान गॉग ने सैकड़ों चित्र और ड्राइंग बनाईं, लेकिन 37 साल के थे, तभी खुद को गोली मार ली। अमेरिकी रचनाकार जॉन बेरीमैन ने ‘ द ड्रीम सांग्स’ सरीखी कालजयी कविता लिखी, फिर ये संसार अपनी मर्जी से छोड़ दिया। स में येजनीन ने तीस साल तक ही जीना पसंद किया। और तो और, सारे संसार की मानसिक उलझन का हल तलाशने वाले मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने भी खुदकुशी की कोशिश की थी।
उलझाव, दुख, हताशा...कारण चाहे जो भी हो, इन नायकों ने युवाओं को पलायन का रास्ता दिखाकर सही नहीं किया। यक़ीनन वो भी जब आसमां से इस जहां की ओर देखते होंगे, तो कहते होंगे...हमने हिम्मत छोड़ दी थी, तुम सब लड़ते रहना।


जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ की रविवारीय परिशिष्ट हमलोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/humlog/04072010/humlog-article/13432.html  में प्रकाशित आलेख

6 comments:

निर्मला कपिला said...

"आते हैं तुम्हें मौत के बहाने बहुत, ज़िंदगी से जरा-सी मोहब्बत कर लो!" बहुत अच्छा सन्देश दिया इस आलेख से। ागर कोई समझे तो जीने के तो बहुत बहाने हैं बस मरने के लिये एक ही बहाना है कि दुख सहा नही जाता। जब कि दुख का नाम ही जिन्दगी है। अच्छा लगा आलेख। धन्यवाद।

pratibha said...

bahut hi achcha likha aapne. jindgi se bharpoor!

डॉ .अनुराग said...

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के क्रेस्ट एडिशन में अच्छी पड़ताल है ....निचोड़ सिर्फ यही है ...के इस दुनिया में उम्र कम है .....ओर लोग अकेले ....अपनी दुनिया में ...इसलिए संवांद ओर रिश्ते भी जिंदगी में जरूरी है .ये समझते समझते देर हो जाती है

भूतनाथ said...

मेरा दिल तो हिल ही गया इस आलेख पर....कुछ कहते ही नहीं बन रहा....सच....!!

@ngel ~ said...

A very great article...
The imp thing is message should be clear n positive.. n dat it gives.. :)

अंतर्मन said...

भाई साहब,
कलम की नोक से ज़िन्दगी और मौत का सफ़र शायद आसान लगता है, ज़िन्दगी से रूठने के बहाने तो हज़ार होते हैं लेकिन फिर भी जीने का एक बहाना काफी होता है, बस वही एक बहाना पहले खोजना चाहिए फिर शायद ज़िन्दगी से रूठने का वक़्त हे न मिले............