कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Sunday, September 5, 2010

तुम जन्म लेना बार-बार



जब तक कायम रहे सांवली त्वचा की पृथ्वी, तुम आना बार-बार, ताकि उपज सकें अंकुर
आना, जिससे तपते-नाराज़ सूरज की नज़र बन जाए गुलाबी, हो शीतल
गाना, ताकि संग-संग गुनगुना उठे बचपन
लहराना आंचल, गर्म हवाओं के बीच गुलाबी हो जाए वसंत का मौसम...
तुम जन्म लेना बार-बार, ताकि कवि लिखें कविताएं और गूंजें उनमें छंद..
तुम लौटना  हर बार, ताकि जीवन जी सके खुद को जीवंतता के साथ...
बिछोह के ज्वार में फेनिल सागर बने निर्मल, रहे रूमानी...

2 comments:

मैं ही तो... said...

हां...जन्म लूंगी ज़रूर

Shawbhik said...

इतनी खूबसूरत रचना को मेरा मन चाहता है पढना बार बार...