कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Wednesday, January 18, 2012

सपनों को यादों की गुल्लक से निकालें

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख--भास्कर ब्लॉग...
- चण्डीदत्त शुक्ल

सोंधी महक से सराबोर जाड़े की सुबहों में कंबल से हाथ बाहर निकालने की हिम्मत नहीं पड़ती। कोहरे का झुरमुट जैसे लपककर मुट्ठी में हथेली जकड़ लेता है। उसकी गर्मजोशी के बावज़ूद ठिठुरा मन-तन लिए हम फिर छुपने के रास्ते तलाशने लगते हैं। हां, सूरज के चेहरे पर ज्यूं गुनगुनी धूप थिरकती है, उसी पल यादों के कई दरीचे ख्यालों में खुल जाते हैं।

यादें हैं भी क्या.. गुजरे वक्त की मासूम-सी गवाही। मौसमों का असर मन पर इस कदर होता है कि याद-कैलेंडर के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। कुछ बीते हुए लम्हे अलग-अलग मौसमों की दास्तान बयां करते हैं। कभी कोई धड़कन कानों में आकर गुनगुनाती है - क्यों, जीभ पर तैरने लगा न पहली बार चबाए गए भुट्टे का स्वाद और फिर उभरता है अफसोस..। हाय! भुट्टे, तुम पॉपकॉर्न क्योंकर हुए? इस सोच से उबर भी न पाए कि ‘छपाक’ कर स्मृतियों की बौछार नहला जाती है और रूबरू करा देती है उस नजारे से, जब हम सारा लोक व्यवहार भूल, मर्यादा का बंधन तोड़के, जमकर भीगे थे, पहली बारिश में।

और महज मौसम ही क्यों.. कुछ पुरानी, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें, चंद जर्द पड़ी चिट्ठियां और कई सूखे हुए गुलाब भी तो याद दिला देते हैं बीते हुए जमाने की।

जमाना, जब जिम्मेदारियों से ज्यादा जोर मस्तानेपन का था। भाग-दौड़ तब भी होती थी, लेकिन लोकल ट्रेन, बस या ऑटो पकड़ने के लिए नहीं। टारगेट तब भी होता था, लेकिन कारोबार का नहीं - हर दौड़धूप, हर लक्ष्य के पीछे वजह बस एक थी - आज का दिन मस्ती में जी लें। कल की कल देखेंगे।

ख्वाबों की दुनिया भी कितनी सतरंगी होती है। आंखों के कैनवास पर इंद्रधनुषी रंग कभी धुंधले ही नहीं होते। वक्त गुजरता गया। आप, हम और हमारे संगी-साथी, सब के सब ‘जिम्मेदार’ हुए और भूल गए पहली-पहली बारिश में नहाने का, दिन भर बिना काम के भटकने का सुख, यानी खुद के लिए जीने के मायने।

वक्त नहीं थमता, लेकिन कभी तो कुछ होता है, जो सब कुछ याद दिला देता है। चंद रोज पहले की ही बात है। जयपुर के जवाहर कला केंद्र में युवा कलाकार निधि सक्सेना की पेंटिंग एक्जीबिशन देखने गया था, एक तस्वीर पर नजर ठहर गई। यादों के आसमान और चाहतों के समंदर का नीला रंग। चिड़ियाएं चांद को साथ ले जाने को मचल रही हैं। एक लड़की कैमरे के पीछे खड़ी उनकी चलती-फिरती तस्वीरें कैद करने में लगी है।

कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में बना चुकी निधि के लिए अपने सपनों को संजोए रखने का जरिया चित्रकारी है। उनके कैनवास पर चिड़िया है, सिनेमा है, चाहत है, सपने हैं.. लेकिन ये तस्वीर देखकर मैं ठिठक गया, सोचने को मजबूर — हमारे पास क्या है?

बीता वक्त तो है नहीं, यादों को सीलन लग रही है। अब खुलकर झूमने, बेइरादा कहीं चल देने के मौके और शगल नहीं हैं..। फिर करें क्या, कैसे लौटाएं बीते वक्त को? क्यों न हम भी चिड़िया बनकर चांद को साथ ले जाने की कोशिश करें। खयाल कुछ ज्यादा पोएटिक हो गया शायद, सो इसका मुकम्मल बयान कुछ यूं कर लेते हैं - आओ, चलो, सपनों को यादों की गुल्लक से बाहर निकालें। अपने लिए भी कुछ देर जी लें। कुछ अच्छा करें, कुछ सुंदर सुनें, चंद अच्छे लोगों से दोस्तियां करें। खुशी के बहाने तलाशें। आप कहेंगे - न! मुस्कराने की बात करते हो/किस जमाने की बात करते हो..? माना साहब, मुश्किल है खुशी के चांद को साथ ला पाना, लेकिन छोटी-छोटी कोशिशें करके हम खुश रह सकते हैं। तो करेंगे न आप कोशिश..?