कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Saturday, December 8, 2012

हे आमिर! उल्लू नहीं है पब्लिक

ज़रूरी सलाह बनाम खीझ

- चण्डीदत्त शुक्ल

आमिर खान साहेब नहीं आए। बुड़बक पब्लिक उन्हें `तलाश' करती रही। सिर्फ पब्लिक नहीं, बांग्ला मिजाज़ में कहें तो भद्रजन भी। पुलिसवाले और लौंडे-लपाड़ियों के अलावा, शॉर्ट सर्विस कमीशन टाइप पत्रकार, रिक्शा-साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड वाले भी। चौंकिएगा नहीं, शॉर्ट सर्विस बोले तो कभी-कभार ये धंधा कर लेने वाले। एक यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले तमाम सत्रह-अठारह साल के छोरे-छोरियां पूरा का पूरा विश्वविद्यालय बंक करके उस भुतहा बस्ती में बिचर रहे थे। पहले उछलते-कूदते, फिर एक ग्लास पानी के लिए छुछुआते हुए। जयपुर से कुल जमा सौ किलोमीटर के इर्द-गिर्द ही पड़ता है भानगढ़। इंटरनेट पर सर्च को रिसर्च नाम देने वाले जानते ही होंगे कि इस कसबे को लेकर तरह-तरह की अफवाहें जोर-शोर से सामने आई हैं, इतनी ज्यादा, जितने `भूत' न रामसे ब्रदर्स की फिल्मों में होंगे, न कहानियों में। चुनांचे, बात बस इतनी भानगढ़ को लेकर दो बातें सबसे ज्यादा चलन में हैं, पहली – एक तांत्रिक की बद्दुआ से भानगढ़ उजड़ गया और दूसरी ये कि सांझ ढलते ही यहां भूतों का बसेरा हो जाता है, इसलिए उजड़े हुए कसबे के गेट बंद कर दिए जाते हैं। परिंदा और जानवर भले हाथ-पैर-मुंह मारें, पर जीता-जागता आदमी चौहद्दी में कदम नहीं रख सकता।

ख़ैर, आप भी सोच रहे होंगे, ये आदमी अक्ल से पैदल है क्या, बात शुरू की थी आमिर खान साहेब से और लौंडे-लपाड़ियों का जिक्र करते हुए भूतों तक जा पहुंचा, तो साहबान सिरा यहीं जुड़ता है, वह इसलिए कि इसी भानगढ़ की `विजिट' करने का दावा आमिर, या कि उनके प्रचारकों ने किया था और ये बात पब्लिसिस्टों से होती हुई ख़बरचियों और फिर अख़बारों तक जा पहुंची, सो भानगढ़ में पब्लिक जुटनी लाजिम थी, लेकिन न आना था उन्हें और न आए वो, यानी अपने आमिर! अब ख़बर पढ़कर आमिर का इंटरव्यू करने की ख़्वाहिश से जो हम सब दल-बल समेत भुतहा बस्ती में हाजिर हुए तो आमिर न मिले पर मिले केवड़े के पेड़, काले मुंह वाले बंदर और कई ऐसे किस्से, जो बता रहे थे कि भानगढ़ में कुछ और हो न हो, भूत तो एक भी नहीं हैं। हां, जितनी ज़ुबान, उतने अफसाने भी, सो यह समझाने वाले भी कई निकले कि उनने भूत तो देखा है, लेकिन लेडीज़, यानी चुड़ैल।

हालांकि भूत और भानगढ़ और वहां की घुमाई-टहलाई के यात्रा वृत्तांत, संस्मरण और यादनामा तो फिर कभी लिखा जाएगा, आज का सवाल ज्यादा इंप्वार्टेंट है, जिसे हल करने पर केबीसी की ईनामी राशि भले न मिले पर एक बात तो जोर-शोर से समझ में आएगी ही कि आमिर ज्यादा सयाने हैं, या पब्लिक (जिसमें हम भी शामिल हैं) अधिक बुड़बक है? सब जानते हैं कि आमिर अपनी फ़िल्मों के प्रमोशन-पब्लिसिटी के लिए सारे करम कर डालते हैं। हमारे इलाके की भाषा में कहें तो ... से घोड़ा खोल देते हैं (इस ट्रिपल डॉट ... में देह के एक विशेष अंग का नाम नहीं भरा गया है। सयाने लोग खुदै बूझ लें)। जितनी बार, जिस-जिस किस्म की फ़िल्म बना ली, उसे रिलीज़ करने से पहले और बाद में तरह-तरह के भेष बनाकर घूमे। हर बार चैलेंज किया -- है किसी में दम तो पकड़ के दिखावे। नकद ईनाम देंगे। फोटू-शोटू साथ में खिंचवाएंगे और, और भी किसिम-किसिम की बात, पर कोई पकड़ न पाया। भांप न पाया कि दाढ़ी बढ़ाए, अचकन संभालते बगल से जो फट्ट से निकले, वो मुल्ला जी और कउनो नहीं, अपने आमिर खान हैं। आमिर न हुए, डॉन हो गए, जिसे पता नहीं कितने तो मुल्कों की पुलिस भी पकड़ नहीं पाती। अब वही खान साहेब जब हो-हल्ला करके, ख़बर छपवाके भी भानगढ़ नहीं आए तो फिर से समझ में आया कि कहीं हाजिर होके तो कहीं गैर-हाज़िर रहके उल्लू बनाना खान साहेब का शौक नहीं, एक और पब्लिसिटी स्टंट है।

आमिर साहेब, आपसे बस कहनी एक बात है कि पुलिस-पत्रकार-पब्लिक – सबसे आपने अपनी तलाश तो करवा ली, लेकिन ये सब ज्यादा काम आता नहीं है। हो सके तो कहानी सेलेक्शन, एक्टिंग और डायरेक्शन – जिसके लिए बेसिक तौर पर आपकी पहचान होती रही है – पर ही ज्यादा ज़ोर लगाइए, मैनुपुलेट करके मार्केटिंग के चक्कर में अगर आप पब्लिक को ऐसे उल्लू बनाते रहे तो देखिएगा – एक दिन आप सनीमा हाल में बैठे रह जाएंगे और पब्लिक आपकी ही तरह फुर्र हो जाएगी, फिर बजाते रहिएगा हरमुनिया।


5 comments:

कौशलेन्द्र said...

शहज़ादे हुज़ूर! यूँ मायूस न हों। सुना है कि गन्धर्व प्रजाति के प्राणियों का भी ऐसा ही चरित्र होता है। ये सब इश्कियाना लटके-झटके हैं हुज़ूर!

आनंद कुमार द्विवेदी said...

सब जानते हैं कि आमिर अपनी फ़िल्मों के प्रमोशन-पब्लिसिटी के लिए सारे करम कर डालते हैं। हमारे इलाके की भाषा में कहें तो ... से घोड़ा खोल देते हैं (इस ट्रिपल डॉट ... में देह के एक विशेष अंग का नाम नहीं भरा गया है। सयाने लोग खुदै बूझ लें)।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-12-2012) के चर्चा मंच-१०८८ (आइए कुछ बातें करें!) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मानगढ़ के भूतों को सत्‍यमेव जयते दि‍खा देते तो वो भी रो देते और साहेब का रास्‍ता साफ हो जाता

रश्मि said...

आमि‍र ने बनाया उल्‍लू...मगर हमें तो भूतों के जि‍क्र से मजा आ गया....जरा वि‍स्‍तार से बताइएगा