कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Sunday, December 2, 2012

इस सदी की निहायत अश्लील कविता


- चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345

*

जरूरी नहीं है कि,
आप पढ़ें
इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता
और एकदम संस्कारित होते हुए भी,
देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां।
आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए,
वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय,
तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना?
यूं भी,
जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए,
वैसे ही,
आपका इसका पाठक होना
और फिर
लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है,
साहित्य के किसी संविधान में।
यह दीगर बात है कि,
हमेशा यौनोत्तेजना के समय नहीं लिखी जातीं
अश्लील कविताएं!
न ही पोर्न साइट्स के पेजेज़ डाउनलोड करते हैं,
स्खलित पुरुषों के थके हाथ।
कई बार,
भूख से बोझिल लोग,
पीते हैं एक अदद सिगरेट
और दुख से हारे मन,
खोजते हैं शराब में शांति।
ऐसे ही,
बहुत पहले बताया था,
धर्म के एक पुराने जादूगर ने,
संभोग में छिपे हैं
शांति और समाधि के मंत्र।
उन तपते होंठों में,
फंसाकर अपने प्यासे लब,
`वह' भी तो हर बार नहीं तलाशता,
काम का करतब।
कभी-कभी कुछ नम, कुछ उदास,
थके हुए थोड़े से वे होंठ,
ले जाते हैं मेडिटेशन-मुद्रा में।
मंथर, बस मुंह से मुंह जोड़े
कुछ चलते, कुछ फिरते अधर...।
कोई प्रेमी क्यों चूमता है अपनी प्रेयसी को?
प्रेयसियां आंखें मूंद उस मीठे हमले की क्यों करती हैं प्रतीक्षा?
इन कौतूहलों के बीच, सत्य है निष्ठुर --
पुरुष का सहज अभयारण्य है स्त्री की देह
और
मैथुन स्वर्गिक,
तब तक,
जिस वक्त से पहले मादा न कह दे,
तुम अब नर नहीं रहे
या कि
मुझे और कोई पुरुष अच्छा लगता है!
एक पहेली हल करने के लिए ज़िलाबदर हो गए हैं विक्रमादित्य
और तड़ीपार है बेताल,
जिसे दुत्कारते हैं तमाम पंडित
नर्क का द्वार कहकर,
उसमें प्रवेश की खातिर,
किसलिए लगा देते हैं,
सब हुनर-करतब और यत्न?
औरत की देह जब आनंदखोह है
तब
वह क्यों हैं इस कदर आपकी आंख में अश्लील?


*

कलाकृति - Jose Rivas

7 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
दो दिनों से नेट नहीं चल रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। आज नेट की स्पीड ठीक आ गई और रविवार के लिए चर्चा भी शैड्यूल हो गई।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (2-12-2012) के चर्चा मंच-1060 (प्रथा की व्यथा) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

Anonymous said...

अच्छी कविता है. कहीं ये पलक ने तो नहीं लिखी जिसके तुम कभी मुरीद थे.

संदीप पवाँर (Jatdevta) said...

क्या बात है लगता है पाठक बिना कमेन्ट किये निकल रहे है।

vandana gupta said...

तब
वह क्यों हैं इस कदर आपकी आंख में अश्लील?

वाज़िब प्रश्न

रविकर said...

सोना हेडेन के टिसू-पेपरों से अश्लील नहीं है-

सोना सोना बबकना, पेपर टिसू मरोड़ ।
बना नाम आदर्श अब, अहं पुरुष का तोड़ ।

अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा ।
भजते भक्त करोड़, भिगोकर कैसा मारा ।

हैडन कर हर भजन, भरो परसाद भगोना ।
पेपर टिसू अनेक, मांगते मंहगा सोना ।।

Amrita Tanmay said...

सच कहो तो कोई भी अलग लेबल लगा देता है..

anil artani said...

हिलाते युवाओं का वो हाथ नही दीखता
खटिये पर हसीनाओं का साथ नही दीखता
अरमान दबाये रखे है सब अंतः वस्त्रों में
आज कल जांघो के बीच वो आघात नही दीखता।।