कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Saturday, December 31, 2011

कभी तनहाइयों में ‘मुबारक’ याद आएंगी?

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर भास्कर ब्लॉग में प्रकाशित एक लेख...



-    चण्डीदत्त शुक्ल
 chandiduttshukla@gmail.com

महबूब के लबों ने चूमीं अंगुलियां। पलकें मीचीं, आंखों से छलके आंसू और थरथराने लगे होंठ... यही तो है मोहब्बत। फिर एक पल ऐसा भी आया, जब जिसे चाहा, वही ज़ुदा हो गया। ऐसी हालत में दूर कहीं से किसी बिरहन की तान आकर कानों में समाई। ये सुर लहरी है मुबारक बेगम की, जिसे सुनकर पिछले साठ साल से आशिकी में गिरफ्तार दिल आंसू बहाते रहे हैं, पर अफसोस,  `कभी तनहाइयों में भी हमारी याद आएगी’ जैसे नग्मे को मौसिकी का पैरहन देने वाली मुबारक बेगम का पुरसाहाल कोई नहीं है।

क्या आप मिलना चाहेंगे मुबारक बेगम से? मुंबई के एक भीड़भाड़ भरे इलाके—जोगेश्वरी के ग्रांट रोड में कबूतरखाने जैसे छोटे-से घर में सुरों की ये मलिका ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन काटने को मज़बूर है। कभी रेड कारपेट पर कदम रखने वाली मुबारक को कहीं जाना होता है तो अपने कमजोर पांव घसीटती हुई सड़क तक जाती हैं और भीड़ का एक गुमनाम हिस्सा बनकर चुपचाप किसी वाहन के गुजरने का इंतज़ार करने लगती हैं। उनकी आंखों में बुढ़ापे की धुंध नहीं, शिकायत भरी पुकार है। मुबारक ज्यादा नहीं बोलतीं, लेकिन उनकी रग-रग चीख-चीखकर कहती है – आप मानें या न मानें, मेरे कातिल आप हैं!

एक-एक गीत की शूटिंग, म्यूजिक कंपोजिशन और रिकॉर्डिंग पर करोड़ों खर्च करने और `कोलावेरी डी’ के शोर में डूबी फिल्म इंडस्ट्री ने बेगम को भुला दिया है। `मुझको अपने गले लगा लो ऐ मेरे हमराही...’ और `कुछ अजनबी से आप हैं...’ जैसे गीत जीवंत करने वाली मुबारक बेगम को महाराष्ट्र सरकार की ओर से डेढ़ हज़ार रुपए की पेंशन मिलती है। कई बार बिजली का बिल भरने के पैसे तक पास में नहीं होते। महाराष्ट्र सरकार ने एक लाख रुपए की सहायता राशि देने की बात कही थी, लेकिन दो महीने बाद भी इस घोषणा पर कोई अमल नहीं हुआ है।

मुबारक ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं। उनकी दोस्ती अक्षरों से नहीं हो सकी, पर इल्म से नाता ऐसा जुड़ा कि दरकती सांसों के बीच भी बरकरार है। दादा अहमदाबाद में चाय की दुकान करते थे। अब्बा फलों की ठेली लगाते थे, लेकिन उस्ताद थिरकवा खान साहब के शागिर्द भी बन गए थे। कुछ दिन बाद वे मुंबई आ गईं। किराना घराने के उस्ताद रियाजुद्दीन खान और उस्ताद समद खान साहब ने उन्हें विधिवत शिक्षा दी। फिल्म `आइए’ के लिए मुबारक ने पहला गीत `मोहे आने लगी अंगड़ाई...’ रिकॉर्ड कराया और फिर पारंपरिक तरीके से कहें तो – पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मुबारक ने फिल्म `फूलों के हार’, `मेरा भोला बलम’ (फिल्म-कुंदन),  `देवता तुम मेरा सहारा’ (दायरा), `जल जल के मरूं’ (शीशा),  `हम हाले दिल सुनाएंगे’ (मधुमती),  `क्या खबर थी यूं तमन्ना’ (रिश्ता) जैसे कई गीत गाए, जिनकी तान के साथ हिंदुस्तानी मन उफान भरता रहा है, तड़पता-सिसकता, लरजता और खुशगवार होता रहा है।

कहते हैं, बॉलीवुड की एक बड़ी गायिका मुबारक की लोकप्रियता से इस कदर खौफज़दा हुईं कि उन्होंने संगीतकारों को ताकीद की – मुबारक को अब और मौके न मिलने चाहिए। ऐसा ही हुआ भी। हमराही, जुआरी, ये दिल किसको दूं, सुशीला, मोरे मन मितवा, मार्वल मैन, शगुन, खूनी खजाना, सरस्वतीचंद्र सरीखी कामयाब फिल्मों में गायन करने के बावज़ूद मुबारक को नए अनुबंध मिलने बंद हो गए। गुमनामी के भंवर में घिरी मुबारक जब-जब बीता वक्त याद करती हैं, तब उनकी आंखों से आंसओं की बारिश होने लगती है। विविध भारती में कार्यरत यूनुस खान कहते हैं – ये दुर्भाग्य ही है कि ऐसे नगीने को अंधेरों में ही घुटना पड़ रहा है।‘

अधेड़ उम्र की, पर्किंसन जैसी बीमारी झेल रही बेटी और पोतियों के साथ मुबारक सीलन भरे एक छोटे-से कमरे में रहती हैं। उनका बेटा टैक्सी चलाता है। रोज बच्चों को स्कूल छोड़ने ले जाता है। काश! हमारे सरकारी नुमाइंदे भी कभी उस टैक्सी में लिफ्ट लेते, किसी स्कूल तक जाते तो इल्म की थोड़ी-सी रोशनी उनकी भी निगाह में भर जाती और वे बीमारी और गरीबी से जूझ रही मुबारक बेगम का हाल ले पाते।

Tuesday, December 6, 2011

हौसले का जादू-मंतर

राजस्थान के उत्साही युवाओं ने आपसी प्रयास से फिल्म ही बना डाली तो अयोध्या के नौजवान हर साल करते हैं फिल्म समारोह का आयोजन। हौसला इतना बड़ा है कि पैसे की किल्लत कुछ नहीं कर पाती। ये कोशिशें बताती हैं, लोक के रंग सुरक्षित रहेंगे। फिरकापरस्ती की हार होगी और सद्भावना का राज कायम होगा।

- चण्डीदत्त शुक्ल
छह दिसंबर के दिन, यानी आज यूनान में राजस्थानी लोकसंगीत की धुन गूंजने वाली है। वहां गजेंद्र एस. श्रोत्रिय निर्मित-निर्देशित फिल्म भोभर की स्क्रीनिंग हो रही है। हो सकता है, ये पंक्तियां जब आप पढ़ रहे हों, तब यूनान के शहर कोरिन्‍थ में आयोजित दूसरे कोरि‍न्थियन फिल्‍म फेस्टिवल में रामकुमार सिंह रचित गीत `उग म्हारा सूरज' की धुन और बोलों पर लोग झूम रहे हों। भोभर पहली राजस्थानी फिल्म है, जिसे किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन किया जा रहा है। इस फिल्म के बारे में और भी कई दिलचस्प बातें साझा करने लायक हैं। मसलन- जयपुर निवासी, पेशे से पत्रकार रामकुमार सिंह और रियल एस्टेट व्यवसायी गजेंद्र एस. श्रोत्रिय व उनकी मित्र मंडली का यह शौक और जुनून ही था कि वे जब भी आपस में मिलते, केवल सिनेमा की बातें करते और ख्वाब बुनते। ये `जब भी मिलने' का सिलसिला जल्द ही नियत मुलाकातों के कार्यक्रम में बदला और फिर वे सब हर हफ्ते सिनेमा विमर्श में जुटने लगे। ऐसी ही किसी मुलाकात के दौरान रामकुमार ने अपनी एक कहानी सुनाई, जिस पर दोस्तों ने तय किया कि फिल्म बनाई जाएगी।
फिल्म बनाने का आइडिया अच्छा था, रोमांचक भी, लेकिन आगे की लड़ाई जैसा कि सब जानते हैं कि मुश्किल ही होनी थी। पहले तो पैसे जुटाने के लिए दोस्तों से लेकर फाइनेंसर्स तक की दौड़ हुई, फिर जब अधिकतर जगह से मनाही हुई, तो राम और गज्जी (गजेंद्र) ने तय कर लिया, जुनून अपना है तो पैसा भी अपना ही लगे! `जो होगा, देखा जाएगा' की तर्ज पर भोभर का काम शुरू हुआ। किसानों की व्यक्तिगत ज़िंदगी के उतार-चढ़ावों पर आधारित भोभर की मेकिंग की कहानी कम रोचक नहीं है। जिस लड़के को हीरो चुना गया, चार दिन बाद वो चलता बना। आखिरकार, एक दोस्त की सलाह पर तकरीबन पच्चीस लाख रुपए के बजट वाली भोभर का हीरो अमित सक्सेना को बनाया गया। इसके बाद हीरोइन ढूंढना भी मुश्किल काम था। पंद्रह लड़कियों से बातचीत हुई। सबने किसी न किसी वज़ह से इनकार कर दिया। अंततः थिएटर में काम करने वाली परिचित लड़की को मान-मनौव्वल और अधिकार बोध के हवाले से हीरोइन बनाया गया। डायरेक्टर गजेंद्र ने दाढ़ी बढ़ा ली थी कि और कोई हीरो बनने को तैयार न होगा, तो खुद ही अभिनय करेंगे। रामकुमार ने कलाकार न मिलने और लागत कम रहे, इन्हीं वजहों से फिल्म में अभिनय किया। उनके ही गांव बीरानिया में शूटिंग हुई। खैर, अंत भला तो सब भला। अब भोभर तैयार हो चुकी है और देश के हर कोने से तारीफें बटोर रही है। `वो तेरे प्यार का गम' जैसे मशहूर गीत के संगीत सर्जक दान सिंह ने जिस आखिरी फिल्म में संगीत दिया, वो भोभर ही है।
ये सफलता किसी एक फिल्म की नहीं है, न ही कुछ लोगों की। ऐसी कोशिशों को सलाम इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि ये सामूहिक प्रयास की जीत को उल्लिखित करती हैं। बताती हैं कि हिम्मत हो, जुनून हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। इस सिलसिले में अयोध्या में होने वाले फिल्म फेस्टिवल का जिक्र करना ज़रूरी है। यहां पर 2006 से फिल्म प्रेमियों का एक समूह, (जिसकी अगुवाई शाह आलम, शहनवाज, महताब जैसे नौजवान कर रहे हैं), अनूठे फिल्म समारोह का आयोजन करता है। बिस्मिल की शहादत की याद में आयोजित इस महोत्सव का उद्देश्य है -- प्रतिरोध की संस्कृति और अपनी साझी विरासत का जश्न मनाना। 
जैसे भोभर बनाने वालों के दिल-ओ-दिमाग में जुनून था-- किसी भी तरह राजस्थान के किसान की असल आवाज़ को रुपहले परदे पर पोट्रे किया जाए, वैसे ही अयोध्या फिल्म समारोह के आयोजकों की मंशा होती है -- फिरकापरस्ती को चोट पहुंचाई जाए। तरीका दोनों का एक है -- अपना जुनून और अपना ही पैसा। जरूरत हुई तो दोस्तो से मदद ले लेते हैं। पैसों की किल्लत उनके हौसलों पर भारी नहीं पड़ती। ये ही तो है असल मायने में हौसलों की जीत। एक तरफ लोक का रंग है, दूसरी तरफ समाज के लिए भावना। आइए, दुआ करें, ये सिलसिला कायम रहे, ताकि राजस्थान से लेकर अयोध्या तक, खुशी ज़िंदा रहे। सरयू का पानी खुशी से उफनता रहे और रेत के ढोरे गुनगुनाते रहें...सूरत पीर फकीर सी लागे / जाणैं जादू मंतर है / जिंदगानी नाचे ज्यूं बांदरी / मुलके मस्त कलंदर है...।


Thursday, December 1, 2011

क्या ‘अदम’ को भी तब ही याद करेंगे?

बचपन में सुना था — खेलोगे, कूदोगे तो बनोगे नवाब, लिखोगे-पढ़ोगे तो होगे खराब…। क्या ये कहावत सही है? क्या वज़ह है कि हिंदुस्तान में लेखकों को सांस रहते सम्मान और सहयोग नहीं मिलता? हिंदी ग़ज़ल के सबसे बड़े हस्ताक्षरों में से एक — रामनाथ सिंह अदम गोंडवी साहब की तबियत खासी ना़ज़ुक है, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। आज के दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर अदम जी को समर्पित आलेख…
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- चण्डीदत्त शुक्ल
वे सब के सब, जो दिल के करीब थे, एक-एक कर जाते रहे और इस वक्त के पन्नों पर दर्ज होती रहीं बस जुदाई की इबारतें। चंद महीनों में कुछ नाम महज किताबों, वेबसाइट्स और पुराने अखबारों के जर्द पन्नों में ही बचे रह जाएंगे। अपनी संपूर्ण क्रूरता केसाथ ये सत्य है कि गुजर गए लोगों के साथ कुछ भी नहीं ठहरता, पर इससे ज्यादा अफसोसनाक एक सच और भी है। हमें तब तक किसी को याद करने की फुरसत नहीं मिलती, जब तक वह दुनिया में होता है।
यह हालत हमारी ही नहीं, अदब के चौबारों की है और सरकारों की भी! इस साल कई अजीज चले गए। किसका कद कितना बड़ा था, यह बयां की बात नहीं है। सोचने लायक मुद्दा ये है कि जब तक वे हमारे आसपास थे, हमने उन्हें कितना सोचा-समझा, जाना-पहचाना और सराहा? आखिरकार, राजसत्ता ने कवियों-लेखकों-फिल्मकारों का हाल जानने की फुरसत क्यों नहीं जुटाई? क्या सरकारें भी इसी बात पर यकीन करती हैं कि मृत्यु के बाद ही व्यक्ति महान होता है!
यूं, किसी भी सृजनधर्मी को प्रसिद्धि, सम्मान और धन की प्रतीक्षा और परवाह नहीं होती। साहित्य के नोबेल पुरस्कार से अलंकृत लैटिन अमेरिकी लेखक गैब्रियल गार्सीया मार्केज कह भी चुके हैं कि प्रसिद्धि उन्हें डराती है, लेकिन यह तो रचनाकार का दृष्टिकोण है। हमारा फर्ज क्या है, यह एक दीगर सवाल है..।
उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में रहते हैं रामनाथ सिंह। बुजुर्ग हैं। खांटी गंवई इंसान हैं। जिस्म पर मैली धोती, खुरदुरी-बिना बनावट वाली जबान उनकी पहचान है। सीधे-सपाट, साफगो इंसान हैं, उतने ही खुद्दार भी। इन दिनों वहां के एक प्राइवेट अस्पताल में बेहद नाजुक हालत में इलाज करा रहे हैं।
रामनाथ सिंह यानी ‘अदम गोंडवी’ हिंदी गजल के जीवित शायरों में सबसे बड़े हस्ताक्षरों में से एक हैं। अदम ने अपना जीवन सामंतवादी ताकतों, भ्रष्टाचारियों, कालाबाजारियों और पाखंडियों के खिलाफ लिखते हुए बिताया है, लेकिन एक भी बड़ा, सरकारी सम्मान उनके खाते में नहीं है।
सम्मान तो दूर की बात, इलाज के लिए कोई सरकारी मदद भी उनके हिस्से में नहीं आई है। ये हालत एक ऐसे शायर की है, जिसका रचनाकर्म झिंझोड़ देने वाला है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है। ‘काजू भुनी प्लेट में, व्हिस्की गिलास में/उतरा है रामराज्य, विधायक निवास में’, ‘आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को’ सरीखी कविताएं उन्होंने ही लिखी हैं।
भारत से लेकर सुदूर रूस तक वे पढ़े जाते हैं, लेकिन प्रकाशन के नाम पर दो किताबें और कवि सम्मेलनों के सिवा उनके हिस्से में कोई राष्ट्रीय-प्रादेशिक सम्मान नहीं है, न ही अब जीवन बचा लेने के लिए सरकार से उन्हें कोई मदद मिल रही है। अदम ही क्यों, बाबा नागाजरुन, मंटो, मुक्तिबोध, निराला समेत दर्जनों ऐसे नाम हैं, जिन्हें यूं तो बहुत सम्मान मिला, लेकिन सांस रहते नहीं। जीवन में अगर हासिल हुआ भी, तो तब, जब वे सम्मान और धन का लाभ उठाने की स्थिति में नहीं रह गए थे। जिंदगी रहते हुए तो ऐसे रत्नों को महज मुफलिसी और मुकदमे ही मिले।
यह संयोग नहीं कि बहुत-से अफसर तुकबंदियां भी करें तो साहित्यिक अकादमियों के अध्यक्ष-सचिव बना दिए जाते हैं और माटी से जुड़े साहित्यकारों को सरकारी तौर पर तब स्वीकृति मिलती है, जब वे दुनिया से कूच कर चुके होते हैं। अदम का स्वास्थ्य बेहतर हो, वे खूब जिएं, कामना यही है, लेकिन ये बड़ा सवाल है कि जिस समाज की बेहतरी के लिए कलमकार तिल-तिलकर मरते रहते हैं, उन्हें जिलाने की, प्रतिष्ठा और प्यार देने की कोशिश हमारा समाज और सत्ता क्यों नहीं करते? दुनिया के कई मुल्कों में सड़कों पर कलाकारों और साहित्यकारों के बुत लगाए जाते हैं, लेकिन अपने देश के रास्ते नेताओं की मूर्तियों से कब खाली होंगे?

अदम जी की कविताएं आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं…


Monday, November 28, 2011

तुम्हें खोकर, खो दिया सब कुछ!


- चण्डीदत्त शुक्ल

एक डूबता हुआ सूरज
फिर खिल उठा
खुल गए कई बंद रास्ते
न, तुम कहां आए
आई बस ज़रा-सी याद तुम्हारी
और दिन थम गया
रात रुक गई
सांस चलने लगी तेज़, और तेज़
एक तुम्हारी याद इतनी कारसाज़
तो सोचो मुकम्मल तुम,
हो कितनी अपूर्व
अतुलनीय प्रेम की बेमिसाल तस्वीर पूरी की पूरी तुम
इसीलिए इतनी दृढ़?
जानती हो,
ईश का अभिशाप मिला है मुझको
न हो सकूंगा खुश निमिश भर को
इसीलिए,
नहीं आती हो मेरे जीवन में तुम क्षण भर के लिए भी...
है न?
दुनिया के सारे वसंत अपने रुमाल में बांधकर
ओझल हो तुम वसंतलता
मेरे संसार से,
तभी तो,
हर दिन सूरज निकलता है,
रात ढलती है
सांझ होती है
उम्र के कैलेंडर में एक-एक दिन जुड़ता जाता है
और
साथ-साथ घटती जाती है ज़िंदगी मेरी
पर
स्थगित रहता है सावन...
झुंझलाते होंठों और खिन्न आंखों के साथ
बस, कभी-कभार
बहुत दम लगाकर आ जाती है तुम्हारी याद
यह एहसास दिलाने के लिए
हां, मैंने सब कुछ खो दिया है
तुम्हें खोकर
मेरे प्रेम!


<दिल की वीरान बस्ती का एक उदास टापू...>

Sunday, November 20, 2011

रामकुमार सिंह की गिलहरी का फ्री-हैंड रिव्यू

रामकुमार की गिलहरी की फ्री-हैंड समीक्षा
एक अक्सरहा सुना शेर है, कुछ यूं — बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर वे भी हम जैसे हो जाएंगे। बात एकदम सही है, लेकिन बचपन जैसे ही जवानी तक पहुंचने के आधे रास्ते तक पहुंचकर ठिठकता है, गोया किशोर होता है, उसके मन में बहुतेरी उत्सुकताओं के बवंडर मचलने लगते हैं। अफ़सोस… साधारण-सी उत्सुकता का हल साफतौर पर, सही तरीके से कभी नहीं मिलता। नैतिकता के कितने ही पैबंदों में उलझा जब कोई समाधान सामने आता है, तो उसमें धज्जियों की भरमार ऐन सामने होती है। `वह’, यानी एक गंवई किशोर की कहानी भी इससे ज़ुदा नहीं है। बच्चा जब जानना चाहता है कि उसका जन्म कैसे हुआ, तो पता चलता है — `माँ ने चावल खा लिए थे. रात को उसके पेट में भी दर्द हुआ. अगली सुबह वह खेत पर नहीं जा पाई थी. उस दिन वह पैदा हो गया था’. वह दौर, जब `वह’ ननिहाल में मौजूद भूरे कुत्ते को टहलाता, खिलाता, खिजाता बड़ा हुआ था, इन दिनों 11 साल का होने पर कलिंग की लड़ाई के संदर्भ और लोकसभा की सीटों और विज्ञान की किताब से निकालकर परागण, नर और मादा के भेद को पढ रहा था, तब बच्चे कैसे पैदा होते हैं, इसके जवाब में उसे चावल खा लेने से बच्चा होने की परिभाषाएं समझाई जा रही थीं…हालांकि `ज्योंही स्कूल की छुट्टी होती तो उसके गली के गुरु सक्रिय हो जाते’। इन्हीं दिनों में वह `कई नई बातें सीख रहा था’. घर में आई भाभी `गोरी गोरी-सी. मखमली-से गाल’ वाली। सहपाठी बताते कि ‘तेरा भाई, तेरी भाभी के साथ सोता है.’ और इसी बीच `वह’ जान पाता कि जब दो लोग साथ सोते हैं, तब `इसी से बच्चे पैदा होते हैं’। गली के गुरु उससे उम्र में कुछ महीने बड़े हैं और वह भले ही अब तक सोचता रहा था कि `बच्चे पैदा होने से रोकने हों तो त्योहार के दिनों में चावल नहीं खाने चाहिए’, लेकिन अब उसका ‘पॉइन्ट ऑव व्यू’ भी बदल रहा था। इसी बीच `वह’ एक और ज्ञान प्राप्त करता है कि साथ सोना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि `शिव भगवान और पार्वती ने ऐसा कहा है.’। नई-नई बातों के बीच बकरियों को तंग करते बकरों को देखते हुए साथी बनवारी एक अलग ही समझदारी दिखाता है ‘ओए राजू, आदमी भी स्साला औरतों को इसी तरह परेशान करता है.’ और राजू को वह ये भी बताता है कि `हेमू चाचा दारू पिए हुए थे. चाची के कपड़े खींच रहे थे.’ ‘कभी गौर से देखना, हेमू चाचा की शक्ल इस बकरे से मिलती है.’
… कुछ तो गंदा था इसमें। क्या और कितना, राजू नहीं जानता। इस बीच `उससे उमर में चार पांच साल ही तो बड़ी’ भाभी उसे एक अलग ही प्रदेश में ले जाती हैं। कितनी ही सुप्त कामनाओं, उत्सुकताओं और रोमांच के वर्जित प्रदेश में। एक अलभ्य, बहु-प्रतीक्षित दर्शन-सुख के इस प्रदेश के बाद राजू और बनवारी योजना बनाते हैं– राजू के दिमाग में एक ही बात चलती है — ‘शिवभगवान, पार्वती का आदेश और चिपमचिपा.’ … बात यहीं खत्म नहीं होती। `अगले दिन भाभी की पीठ पर उनका सामूहिक हमला होने वाला था’।
ख़ैर… मैं भटक गया। यह सब एक कहानी का बयान है, शीर्षक है `गिलहरी’, जिसकी पूरी कथा ही मैं सुनाने में अटक गया था। लिखना ये चाहता था कि बहुत अरसे बाद कोई रोचक और अद्भुत कहानी पढ़ी है। जो पहली बार में शुद्धता और नैतिकतावादियों को अश्लील लगेगी। यक़ीनन और पुरज़ोर लगेगी, लेकिन जिन्हें प्रेम, देह, लालसा, उत्सुकता और बचपन की छानबीन खुले दिमाग से करने का मन होगा, वे इस कहानी को सह पाएंगे। कहानी लिखी है रामकुमार सिंह ने। रामकुमार जी से महीने में एक-दो-तीन बार मिलना होता भी है। उनकी कुछ कहानियां पहले भी पढ़ी हैं, लेकिन इस बार भाषा, ट्रीटमेंट और कथ्य की बुनावट के लिहाज से वे पुराने लेखन पर भारी पड़े हैं।
रामकुमार जयपुर में रहते हैं। एक अखबार में काम करते हैं। दो-तीन फिल्मों में कहानियां और गीत का डिपार्टमेंट संभाल चुके हैं….पर यह उनका सामान्य-सा परिचय है। सच तो ये है कि रामकुमार प्रचार और संपर्क जुटाने से कतिपय दूर, एक बेहतरीन लेखक हैं। कहानियों के मामले में कम से कम बहुत बेहतरीन। बाकी का काम भी अच्छा है।
कुछ ज्यादा ही उत्साहित हूं, इसलिए बार-बार भटक रहा हूं। गिलहरी कहानी की भाषा पर कुछ कहने का भी मन है। यह कहानी मुहावरों, शब्द संरचना-चमत्कार-इमेज़री-विज़न-
इफेक्ट्स-कोलाज से दूर है। सीधी-सपाट, शायद इसीलिए सीधा असर करती है। रामकुमार की भाषा में `विट’ है और यह अक्सर हंसाते हुए परेशान भी करता है, तब वे तीखी बातें सीधे-सरल तरीके से कह जाते हैं। इस तथाकथित रिव्यू में इन्वर्टेड कॉमा `’ में शामिल सभी वाक्य कहानी गिलहरी से कॉपी किए गए हैं. प्रमाण सामने है, देख लीजिए।
खास बात एक और बाकी है। गिलहरी यहां प्रतीक है। एक पेड़ की डाल से कूदकर दूसरे पर चढ़ने की कोशिश में कुत्ते के मुंह में समाती हुई गिलहरी। और उसकी जान ख़तरे में इसलिए है, क्योंकि किसी ने उसे बताया था कि गिलहरी के सिर में चवन्नी छुपी होती है। शायद ऐसा ही कुछ। क्या स्त्री का रूप-सौंदर्य-देह भी ऐसी ही है। ऐसा ही आकर्षण? और पुरुष यहां किस रूप में मौजूद है? हो सकता है– रामकुमार ने ऐसा न सोचा हो… और यह मेरा शरारती दिमाग हो…।
कहानी चौंकाती है अपने क्लाइमेक्स के ज़रिए। एक किशोर नहीं जानता कि क्या वर्जनीय है, लेकिन जिस तरह राजू की मृत्यु होती है, वह तो संकेत ही है — अंधेरे गलियारे में ठोकर लगती है। बिना किसी नैतिक शिक्षा के यह कहानी हाजिर है, कई तहों को टटोलती हुई। व्यंग्य, चुटकियां, चिंता के अनेक पुटों के साथ।
गिलहरी में हम ढेरों प्रतीक देखते हैं। कहीं स्पष्ट तो कहीं कथ्य के संग गुंफित। यहां जो गांव है, वह पूरी तरह उन्मुक्त है और ठीक उसी हद तक बंधा हुआ भी। रामकुमार को बधाई इस बात की भी दी जानी चाहिए कि वे बंद निगाह और ठस, जकड़े दिमाग के साथ सबकुछ पवित्र-पवित्र नहीं बताते रहते। गिलहरी बालपन से उबरे, उम्र में बढ़े और दिल से ठहरे हुए बचपन में मन की बहुत-सी परतें खोलती है और उतना ही हमें उलझाती भी है। गिलहरी के कूदने से रोमांचित हुए राजू की दोस्त कोई लड़की हो सकती है या नहीं, यह बड़ा सवाल नहीं है। प्रश्न ये भी नहीं है कि `नरम और गुनगुना’ और `रुई के फाहों की तरह हवा में तैरते बादलों’ का ज़िक्र दरअस्ल, किन चीजों के लिए किया गया है और ये अश्लील-श्लील के आईने में कितने फिट होते हैं, सवाल बस एक है — नैतिकता के मायने इतने रूढ़ क्यों हैं कि सहज उत्सुकताओं को गिलहरी की मौत मरना पड़ता है।
* रामकुमार शायद हंसेंगे मेरी इस राय पर, लेकिन मेरी नज़र में गिलहरी को सेक्स एजुकेशन की पाठ्य सामग्री में शामिल किया जाना चाहिए।
- बहुत पहले प्रियंवद की कहानी खरगोश पर बनी टेलीफिल्म देखी थी। बेहद उम्दा उस कहानी के बाद रामकुमार की गिलहरी पढ़ना रोमांचक है। दोनों कहानियों में ऐसे ही अनदेखे-छुपे संसार के लिए कौतूहल और नायिकाओं के कदरन समान व्यवहार का हवाला है, लेकिन गिलहरी का अंत और अलग भावभूमि, क्षेत्र और ट्रीटमेंट, खासतौर पर क्लाइमेक्स इसे खरगोश से अलग करता है। यूं, दोनों की तुलना नहीं है। महज ऐसी ही एक कहानी याद आई, इसलिए ज़िक्र किया। मुझे यकीन है कि मेरा नाम जोकर में अपनी टीचर को चाहने वाला ऋषि तो प्रियंवद और रामकुमार के दिमाग में नहीं रहा होगा… क्योंकि ऐसा बचपन तो हम सबका होता है… एक-सा। तमाम दुत्कारों, वर्जनाओं, कल्पित कहानियों के बावज़ूद, कहीं-कुछ टटोल-तलाश लेने की होड़ में भागता और अक्सर बिंधता हुआ।
श्लील-अश्लील के चश्मे पहनने वालों से क्षमा याचना सहित एक सुझाव… गिलहरी ज़रूर पढ़ें। अच्छी कहानी है। मुझे यह कहानी पढ़ते हुए मंटो की मुतरी भी याद आई… क्यों, शायद वहां मूत्रालय में लिखे हुए संवाद भी अतृप्त मन की परतों से बहकर कहीं उभर आए होंगे।

कहानी पढ़ने का मन हो, तो यहां क्लिक करें

Tuesday, November 1, 2011

जब मिले दो दोस्त... अभिषेक मिश्र की कलम से...

एक मुलाकात

- अभिषेक मिश्र
गत शुक्रवार को एक छोटे से एक्सीडेंट से गुजरने के बाद अगले दिन शनिवार की छुट्टी होते हुए भी कमरे में ही पुरे आराम की दुह्साध्य परिस्थिति के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर ही रहा था कि फेसबुक से गुजरते हुए चंडीदत्त शुक्ल जी के स्टेटस पर नजर पड़ गई जो अपनी एक दिवसीय यात्रा पर दिल्ली पधारने वाले थे. चंडीदत्त शुक्ल जी से ऑनलाइन तो मेरा संपर्क कई सालों से रहा जब वो नोएडा में 'दैनिक जागरण' से जुड़े हुए थे. अरुणाचल जाने के बाद मेरा संपर्क इंटरनेट से टूट गया और इन जैसे कई अन्य व्यक्तियों से भी. नेटवर्क जोन में वापसी के बाद इनसे पुनः संपर्क हुआ तो पता चला अब ये जयपुर में हैं और मेरी कुछ पसंदीदा पत्रिकाओं में से एक 'अहा ! ज़िन्दगी' से जुड़ गए हैं. 

पिछले दिनों अपनी अचानक हुई जयपुर यात्रा में मुझे याद भी न रहा कि ये भी यहीं हैं, वर्ना अपनी साईट विजीट में इनके दर्शन को भी ऐड जरुर कर लेता. अब इनके दिल्ली आने के अवसर को मैं छोड़ना नहीं चाहता था, और यह शनिवार को मेरे बाहर निकलने की एकमात्र प्रेरणा थी. 

कला-विज्ञान-संस्कृति से जुड़े लोगों से मिलने या संपर्क का अवसर मैं छोड़ना नहीं चाहता, यह मेरी कुछ कमजोरियों में से एक है. मेरी इस 'प्रवृत्ति' का शिकार कई लोग हो चुके हैं जिनमें ब्लॉग जगत के ही श्री अरविन्द मिश्र, यूनुस खान आदि भी शामिल हैं. इससे पहले केंद्रीय सचिवालय मेट्रो पर ही एक अन्य ब्लौगर नीरज जाट से भी मुलाकात हो चुकी थी, जिसके सन्दर्भ में यहाँ  भी देखा जा सकता है. यही मेट्रो स्टेशन इस दिन फिर हमारी मुलाकात का गवाह बनाने जा रहा था, जहाँ हमारा मिलना नियत हुआ था. 


चंडीदत्त जी एक कमाल के लेखक, कवि और साथ ही ब्लौगर भी हैं. उनका लिखना पाठकों पर जादू सा असर करता है और उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है. इसका एक उदाहरण मैं उनके फेसबुक पेज से ही दे रहा हूँ, जिसमें उन्होंने इस सामान्य सी मुलाकात को अपने खुबसूरत शब्दों में पिरोकर एक यादगार शक्ल दे दी है - 

कुछ अलसाई सुबहें इस कदर हावी होती हैं कि गुजिश्ता दिन भागते हुए बीतता है और कसम से, ऐसी दोपहरियों के बाद की शामें अक्सर तनहाई की आग से लबरेज़ करते हुए जिस्म को सिहरन से भर देती हैं। 
कुछ ऐसा ही तो मंज़र था उस रात, जब चांद ने सरसराती हवा का आंचल थामकर सांझ को ढलने का इशारा किया और नीले आसमान के दिल के ऐन बीच जा बैठा। ठिठुरती रात ने ओस से कहा-- तुम इतनी सर्द क्यों हो आज...और वो जैसे लजाकर घास के सीने में और गहरे तक दुबक गई। क़दमों के नीचे पत्ते चरमरा रहे थे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति के घर के ठीक बगल सड़क पर खंबों के माथे के ऊपर जगमगाती स्ट्रीटलाइट के नीचे कोई था, जो मेरे इंतज़ार में था और इसी फ़िक्र में मैं भी तो था...ऐन उसी वक्त, इंसानी कारीगरी का बेमिसाल नमूना- दिल्ली मेट्रो के एक शुरुआती डिब्बे में सवार मैं भी बार-बार अपनी घड़ी देखता हुआ वक्त को जैसे रोक लेने की कोशिश में जुटा था...
हर दो-तीन मिनट बाद पीछे छूट जाते प्लेटफॉर्म को अपनी रफ्तार से मुंह चिढ़ाते और जैसे साथ ही फिर मिलने का दिलासा देती मेट्रो जैसे ही मंज़िल तक पहुंची, एस्केलेटर पर मेरे क़दम जम गए और जैसे ही खुद चलती सीढ़ियां रुकीं, बेताब निगाहों ने बाहर झांककर यकीन करना चाहा-- है तो सही, वो शख्स, जिससे मिलना आज मुमकिन हुआ है। नज़रें चेहरा नहीं तलाश पाईं पर फोन के पार एक आवाज़ मौजूद थी--हां जी...आता हूं। रात के सवा नौ बजे, राह को लांघ, वो मेरे सामने था। ये ज़िक्र है--झारखंड के रहने वाले, बनारस में पढ़े, अरुणाचल में नौकरी कर चुके और फिलहाल, फरीदाबाद में सेवारत अभिषेक मिश्र का। ब्लॉगर, पत्रकार, लेखक, संगीतप्रेमी... ये तमगे दरअसल छोटे और नाकाफ़ी हैं अभिषेक का बयान करने के लिए। यकीनन...वो सबसे पहले और सबसे ज्यादा एक स्वीट इंसान हैं। एक दिन पहले ही एक एक्सीडेंट से जूझने और रा-वन देखने की हिम्मत रखने वाले अभिषेक उस रात भी महज मुझसे मिलने फरीदाबाद से चले आए थे। ये बस मोहब्बत थी। बिना किसी काम, बगैर किसी प्रोफेशनल रुचि की। रात ढलती रही, वक्त अब खुद पुरज़ोर सिफारिश कर रहा था कि मुझे गुजरना है पर कुछ तो था, जो गुज़र नहीं पाया। हम दोनों एक कृत्रिम झील के किनारे बैठे, बिना किसी कृत्रिमता के दुनिया-जहान की बातें करते रहे। बहुत देर तक भी नहीं...बमुश्किल, 45-50 मिनट। फिर विदा हुए, फिर मिलने की कोशिश के वादे के साथ..."

इन पंक्तियों से चंडीदत्त जी के शब्द कौशल की संपूर्ण तो नहीं मगर एक छोटी सी झलक जरुर मिल गई होगी. उनके जैसे व्यक्तित्व के साथ बिताये वो चंद लम्हे मेरे भी स्मृति पटल पर संगृहीत रहेंगे और आशा करता हूँ कि वो पत्रकारिता में और भी ऊँचाइयाँ हासिल करते हुए हमें भी गौरवान्वित करते रहेंगे. 
चलते-चलते उन्ही की लिखी कुछ पंक्तियाँ -   

तुम रहना स्त्री, बचा रहे जीवन

हे सुनो न स्त्री
तुम, हां बस तुम ही तो हो
जीने का ज़रिया,
गुनगुनाने की वज़ह.
बहती हो कैसे?
साझा करो हमसे सजनी…
होंठ पर गीत बनकर,
ढलकर आंख में आंसू,
छलकती हो दंतपंक्तियों पर उजास भरी हंसी-सी!
उफ़…
तुम इतनी अगाध, असीम, अछोर
बस…एक गुलाबी भोर!
चांद को छलनी से जब झांकती हो तुम,
देखा है कभी ठीक उसी दौरान उसे?
कितना शरमाया रहता है, मुग्ध, बस आंखें मींचे
हां, कभी-कभी पलक उठाकर…
इश्श! वो देखो, मुए ने झांक लिया तुम्हारा गुलाबी चेहरा…
वसंतलता, जलता है वो मुझसे,
तुमसे,
हम दोनों की गुदगुदाती दोस्ती से…
स्त्री…
तुम न होतीं,
तो सच कहो…
होते क्या ये सब पर्व, त्योहार, हंसी-खुशी के मौके?
उत्सव के ज्वार…
मौसम सब के सब, और ये बहारें?
कहां से लाते हम यूं किसी पर, इस कदर मर-मिटने का जज़्बा?
बेढंगे जीवन के बीच, कभी हम यूं दीवाने हो पाते क्या?
कहो न सखी…
जब कभी औचक तुम्हें कमर से थामकर ढुलक गया हूं संपूर्ण,
तुमने कभी-कहीं नहीं धिक्कारा…
सीने से लगाकर माथा मेरा झुककर चूम ही तो लिया…
स्त्री, सच कहता हूं.
तुम हो, तो जीवन के होने का मतलब है…
है एक भरोसा…
कोई सन्नाटा छीन नहीं सकेगा हमारे प्रेम की तुमुल ध्वनि का मधुर कोलाहल
हमारे चुंबनों की मिठास संसार की सारी कड़वाहटों को यूं ही अमृत-रस में तब्दील करती रहेगी.
तुम रहना स्त्री,
हममें बची रहेगी जीवन की अभिलाषा…
उफ़… तुम्हारे न होने पर हो जाते हैं कैसे शब्दकोश बेमानी
आ जाओ, तुम ठीक अभी…
आज खुलकर, पागलों की तरह, लोटपोट होकर हंसने का मन है

Tuesday, October 18, 2011

चांद, स्त्री और तुम्हारे खोने की रपट : तीन कविताएं

# चण्डीदत्त शुक्ल @ 08824696345 #

बिना तुम्हारे वसंत ने किया नामंजूर

राम की तो राम जानें /
खग-मृग से उन्होंने क्या पूछा,
क्या सुना जवाब
पर व्याकुल, एकाकी मैं…
तलाशता रहा तमाम ठीहे,
जहां, कोई खग दिखे,
चोंच में तिनका या चिट्ठियां दबाए…
पर, नदारद सब के सब
पक्षिशास्त्र की किताबों में शामिल ब्योरों बीच कहीं गुटरगूं करते होंगे।
मृग,
`जू’ में तालियां बचाते बच्चों के कंकड़ों और व्यर्थ के कुरकुरे संग कन्फ्यूज़ हैं…
सो, खग-मृग के बिना,
मृ़गनयनी तुम्हारे न होने की रपट मैं कहां दर्ज कराता,
किससे पूछता सवाल
बिरला मंदिर के ऐन सामने, कौन-सा है असली पंडित पावभाजी वाला…
यह जरूर तलाशता था…, तभी चिल्लाया कानों के ठीक बगल कोई…
कहो कहां है तुम्हारी वसंतलता…
कहां गई वो मृगनयनी!
मैं निस्तब्ध, अवाक्…
निरुत्तर हूं,
उन शहरों के सभी रास्ते,
जहां हम-तुम साथ-साथ हमेशा `रंगे हृदय’ पकड़े गए थे,
मुझसे सवाल करते हैं,
अकेले, तुम अकेले, कहां गई वह…
जिसके साथ तुम ज़िंदा थे भरपूर।
अब उदास मुंह लिए कैसे फिर सकते हो?
राहों ने मेरे तनहा क़दम संभालने से इनकार कर दिया है।
अल्बर्ट हॉल में संरक्षित ममी ने पूछा–
तुम वहां, बाहर, क्या करते हो…
बिना प्रेम का लेप लगाए,
वक्त की दीमक तुम्हें खा लेगी, बेतरह!
शाम के तारे,
दोपहर का ताप
और सुबह का गुलाल…
नहीं सहा जाता कुछ भी मुझसे
न ही मुझे स्वीकार करता है कोई बगैर तुम्हारे…
वसंत,
तुम्हारे न होने को मंजूर कर लिया है मैंने.
इन दिशाओं से, रास्तों और राहगीरों से भी कह दो
मान लें,
हम-तुम कभी साथ नहीं चले,
नहीं रहे!


तुम रहना स्त्री, बचा रहे जीवन

हे सुनो न स्त्री
तुम, हां बस तुम ही तो हो
जीने का ज़रिया,
गुनगुनाने की वज़ह.
बहती हो कैसे?
साझा करो हमसे सजनी…
होंठ पर गीत बनकर,
ढलकर आंख में आंसू,
छलकती हो दंतपंक्तियों पर उजास भरी हंसी-सी!
उफ़…
तुम इतनी अगाध, असीम, अछोर
बस…एक गुलाबी भोर!
चांद को छलनी से जब झांकती हो तुम,
देखा है कभी ठीक उसी दौरान उसे?
कितना शरमाया रहता है, मुग्ध, बस आंखें मींचे
हां, कभी-कभी पलक उठाकर…
इश्श! वो देखो, मुए ने झांक लिया तुम्हारा गुलाबी चेहरा…
वसंतलता, जलता है वो मुझसे,
तुमसे,
हम दोनों की गुदगुदाती दोस्ती से…
स्त्री…
तुम न होतीं,
तो सच कहो…
होते क्या ये सब पर्व, त्योहार, हंसी-खुशी के मौके?
उत्सव के ज्वार…
मौसम सब के सब, और ये बहारें?
कहां से लाते हम यूं किसी पर, इस कदर मर-मिटने का जज़्बा?
बेढंगे जीवन के बीच, कभी हम यूं दीवाने हो पाते क्या?
कहो न सखी…
जब कभी औचक तुम्हें कमर से थामकर ढुलक गया हूं संपूर्ण,
तुमने कभी-कहीं नहीं धिक्कारा…
सीने से लगाकर माथा मेरा झुककर चूम ही तो लिया…
स्त्री, सच कहता हूं.
तुम हो, तो जीवन के होने का मतलब है…
है एक भरोसा…
कोई सन्नाटा छीन नहीं सकेगा हमारे प्रेम की तुमुल ध्वनि का मधुर कोलाहल
हमारे चुंबनों की मिठास संसार की सारी कड़वाहटों को यूं ही अमृत-रस में तब्दील करती रहेगी.
तुम रहना स्त्री,
हममें बची रहेगी जीवन की अभिलाषा…
उफ़… तुम्हारे न होने पर हो जाते हैं कैसे शब्दकोश बेमानी
आ जाओ, तुम ठीक अभी…
आज खुलकर, पागलों की तरह, लोटपोट होकर हंसने का मन है




हट पाजी चांद
चल हट पाजी,
तू क्या इतराए है
बादलों की मुंडेर पर
जुल्फ खोले हुए…
चांद कहता है खुद को…
देखा है कभी,
मेरी आंख में बसा `टिकुली’ जैसा चांद?
वो न वसंत-नयन की चमक है प्यारे…
कभी मद्धम नहीं होती /
मेरी ज़िंदगी की रोशनी!
तुम्हारी तो राह घेरता राहु
डराता है सूरज।
वसंतलता सम्मुख नत सब मौसम…
बनना हो तो चांद बनो उसकी तरह…
भरी दोपहर में है वो शीतल
और ममता की उष्णता से लबालब हर समय…
बोलो…तुम हो पाओगे ऐसे?
नहीं, तो जाओ चांद…
छुप जाओ…! 


चण्डीदत्त शुक्ल। पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, दैनिक जागरण, फोकस टीवी, स्वाभिमान टाइम्स में विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर नौकरी के बाद अब दैनिक भास्कर की मैगज़ीन डिवीज़न में फीचर संपादक। चौराहा के मॉडरेटर।

Tuesday, October 4, 2011

चण्डीदत्त शुक्ल की तीन कविताएँ

 

अलसाई तुम्हारी पलकों के ठीक बीच में बड़ी-सी, इला अरुणा मानिंद बिंदी

उम्मीदों से लबालब भरी इस सुबह के वक्त
ऐन ललमुंहे सूरज के चेहरे से भरकर एक चुटकी अबीर
लगा रहा हूं ख्वाब देखती, अलसाई तुम्हारी पलकों के ठीक बीच में
बड़ी-सी, इला अरुण मानिंद बिंदी।
बहुत सुलग रहा है आज का दिन
तापमान फिर उछाल मार रहा है…
उंह! कहकर, चिंहुकती हुई तुम खोल दो रतनार आंखें
बड़ी-बड़ी, सफेद पुतलियों से होती हुई बर्फीली चमक
ठंडे कर दे सूर्य के कपोल
और तुम्हारी सांसों की खुशबू से महक उठे हवा भरपूर।
वसंतलता…
तुम्हारे देखने भर से, जब संवर जाता हूं पूरा का पूरा मैं
तो…
क्यों भरपूर नींद के मोह में तुम मूंदे रखती हो नयन?
टिकटिकी भर निहारा करो न…

जीभ पर आकर झट-से घुली कुल्फी सा तुम्हारा ढुलक जाना मुझ पर

कुल्फी,
मिट्टी के बर्तन में धरी,
सिमटी, सकुचाती
खुलने और परोसे जाने के इंतज़ार में
नमक के आलिंगन में शरमाती हुई
जीभ पर आकर घुल जाती है, झट-से
जैसे,
तुम विरह के बाद ढुलक गईं हर बार
मेरे हृदय के सारे पैरहन खोलकर
और अंग-अंग में
व्याप्त कर गईं ठिठुरन
जलन भरी, दहकाती शीत बनकर…

महज तुम्हारी अनुपस्थिति से

तुम्हें भूलना
अगर होता महज खुद को नियति के हवाले छोड़ देना
यकीन मानो
कब का बिसरा चुका होता अपना प्रेम
पर
जब-जब चाहा मान लेना नियति का सत्य
तुम्हारे न होने ने मुझे यूं कुरेदा
ज्यूं,
दुनिया से गायब हो गया हो पूरा का पूरा जीवन
नदियों से कलकल
मौसमों से उल्लास
फूलों की महक
चिड़ियों का कलरव
बच्चों की खिलखिल और हिक्क करके मुंह चिढ़ाना
शहर से दूर /
गांव में / मनीऑर्डर का इंतज़ार करते / बूढ़े पिता की निगाह के सामने /
ढह जाना नदी पर बना जर्जर पुल…
तेरह साल के किशोर की हांक न सुनकर भैंसों का खेत में उमड़कर घुस जाना
और फिर भ्रष्ट होना किसी आदर्श का
नष्ट हो रहा हो जैसे कोई और रिश्ता.
महज तुम्हारी अनुपस्थिति से गड़बड़ा जाएं सारे अकादमिक सत्र जैसे
व्याकरण अपने अनुशासन भूल जाएं
और मन बेताल हो, नाचने की जगह दौड़ने को उद्यत हो
एक तुम्हारी गुमशुदगी कैसे गैरहाज़िर कर देती है
मुझसे मेरा ही जीवन…
तुम्हें भूलना,
भूल जाना है सारी दुनिया को
दुनिया में रहते हुए,
इंसानों के साथ
इंसानियत के बगैर

chandidutt shukla
(चंडीदत्त शुक्‍ल। यूपी के गोंडा ज़िले में जन्म। दिल्ली में निवास। लखनऊ और जालंधर में पंच परमेश्वर और अमर उजाला जैसे अखबारों व मैगजीन में नौकरी-चाकरी करने, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद दैनिक जागरण, नोएडा में चीफ सब एडिटर रहे। अब फोकस टीवी के प्रोग्रामिंग सेक्शन में स्क्रिप्टिंग की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद आजकल अहा ज़िन्दगी/ भास्कर लक्ष्य में फीचर संपादक हैं । ब्लॉग … chauraha)
Filed in: कविता