कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Sunday, February 27, 2011

ट्विंकल है उदास...चले गए अंकल पै

स्मृति-शेष


किस्से-कहानियां सुनाने वाली दादी अब साथ नहीं रहती...घर छोटे हैं...बिल्डिंगें बड़ी हैं...दादी का जी शहर में नहीं लगता...वैसे भी, कार्टून और एनिमेशन का ज़माना है, वो भी डिज़्नी वाले कार्टून्स का। पिछले दिनों `माई फ्रेंड गणेशा’ और `हनुमान’ जैसे कैरेक्टर ज़रूर देखे थे, लेकिन ऐसा कम ही होता है। बहुतायत में तो अब भी अंगरेज़ हावी हैं, पैंट के ऊपर चड्ढी पहनने वाले हीरो! 
यह कोई आज की बात नहीं है। साठ-सत्तर साल पहले से अब तक, कभी बैटमैन, तो कभी स्पाइडरमैन, तो कहीं-कहीं फैंटम जलवा बिखेरते रहे हैं। प्राण के चाचा चौधरी और अंकल पै की ट्विंकल ने ज़रूर धक्का मारकर इनको कई बार भगाया है। बात यह नहीं कि कॉमिक्स के कैरेक्टर स्वदेशी हों। यह राष्ट्रवाद का मामला तो है नहीं, लेकिन इससे भी कौन इनकार करेगा कि अपने बगीचे में फला-पका आम कुछ ज्यादा ही जायका देता है...नहीं क्या? ऐसे ही, रियल इंडियन हीरोज़ के क्रिएटर थे अंकल पै, यानी अनंत पै।
याद आए? हां, अब उनकी याद ही बाकी है। बीते गुरुवार को अनंत पै का निधन हो गया है। उनके परिवार में पत्नी ललिता हैं और हम सबके जेहन में अंकल की यादें...ट्विंकल की बातें और अमर चित्रकथा की तस्वीरें।
बहुत-से साल गुज़र गए, वैसे ही बचपन बीत गया, लेकिन तब मोहल्ले के परचूनिए से ऑरेंज वाली टॉफियां खरीदने के लिए घर से अठन्नी मिलती थी। कई बार मिलती, तो कई दफा हम किसी ना किसी तरीके से झटक लेते। बहुत दफा टॉफी ना आती, उसकी जगह हम कॉमिक्स ले आते। तीन-चार चवन्नियां मिलाकर, या फिर पैसे कम पड़ते तो किराए पर ही सही। सबसे ज्यादा डिमांड इंद्रजाल कॉमिक्स की होती। बाद में यही मांग ट्विंकल और अमर चित्रकथा की हो गई थी। कॉमिक्स इधर हाथ में आई नहीं कि धमाचौकड़ी शुरू...भाई फील्डिंग-वील्डिंग तो सब ठीक है, लेकिन बैटिंग पहले हम ही करेंगे...की तर्ज वाली होड़—कॉमिक्स तो हमें ही पढ़नी है सबसे आगे होकर। 
बहुत बार पैसे ना होते, तो बिरजू चाचा की दुकान पर जाते। कॉमिक्स देखने का बहाना करते और सर्राटे के साथ एक-एक तस्वीर और शब्द ऐसे पी लेते, जैसे—ताज़ा नींबू का शरबत पिया हो। बाद में बिरजू चाचा भी चालाकी समझ गए थे पर वो किस्सा फिर कभी सही। बात अंकल पै की हो रही थी, उनके जादू की, कारनामे की।

दो साल के थे अनंत, जब माता-पिता नहीं रहे। बारह साल के थे, तब मुंबई आ गए। अपना बचपन मां-बाप के बिना गुज़ारा, लेकिन यह ठान ली—दुनिया भर के बच्चों के चेहरे मुस्कान के खजाने से भर देंगे।
रसायन विज्ञान में पढ़ाई करने के साथ-साथ अनंत समझ चुके थे कि बच्चों का दिल लुभाने, यानी उनके दिमाग में केमिकल लोचा करने के लिए क्या-क्या करना होगा? 1967 में उन्होंने अमर चित्रकथा छापनी शुरू की। यह वह दौर था, जब कॉमिक्स ज्यादातर अंगरेज़ी में मिलती। वह भी ऐसी, जिसके हीरो-हीरोइन हमारे कल्चर से एकदम अलग, यानी तकरीबन डरावने होते। हालांकि बच्चों की ऐसी कोई डिमांड नहीं थी कि हीरो हिंदुस्तानी चाहिए, और फिर रामायण-महाभारत की कहानियां तो सबको मुंहज़बानी याद थीं, ऐसे में उनमें कोई खास इंट्रेस्ट नहीं था...लेकिन कमाल थे अंकल पै।
उन्होंने वही पुरानी कहानियां सुनाईं...बस उन्हें पेश करने का अंदाज़ ऐसा था कि वो आदत बन गईं...नस में उतर गईं...। हिम्मतवाले भीम, हरदम सच बोलने वाले युधिष्ठिर, बंशी बजाते कान्हा, माखन चुराते गोपाल...पढ़कर लगता, जैसे हम किसी नए हीरो से मिल रहे हैं।
1929 में कर्नाटक के करकाला में पैदा हुए अंकल पई का 81 साल की उम्र में निधन हुआ है। इस दौरान उन्होंने भरपूर ज़िंदगी जी है। ठीक उसी जोश के साथ, जिस तरह उन्होंने टाइम्स ग्रुप की नौकरी छोड़कर अमर चित्रकथा का प्रकाशन शुरू किया था। क्या कोई सोच सकता है, पुरानी कहानियों की नई पेशकश का उनका अंदाज़ बेस्ट सेलर बन जाएगा। हां, यह रिकॉर्डेड फैक्ट है कि अमर चित्रकथा की कॉपीज़ दस करोड़ से ज्यादा बिक चुकी हैं।
अंकल पै इस मायने में खास हैं कि उन्होंने इतिहास को फिर से रचा (अमर चित्रकथा), फिर 1980 में हिंदी और अंगरेज़ी, दोनों ज़ुबानों में ट्विंकल प्रकाशित करनी शुरू की। कपीश और ट्विंकल जैसे किरदार अब तक घर के मेंबर्स की तरह लगते हैं—यह अंकल पै का ही तो कमाल है। आज तमाम अखबारों में दिखने वाली कॉमिक्स स्ट्रिप्स के पीछे अनंत पै का योगदान कौन भुला सकता है? 1969 में उन्होंने रेखा फीचर्स की शुरुआत की थी और जगह-जगह कार्टून और कॉमिक्स स्ट्रिप्स भेजने का सिलसिला भी।
पिछले दिनों ख़बर सुनी थी कि अमर चित्रकथा अब आईफोन, आईपॉड और सेलफोन पर उपलब्ध होगी। इसके बाद पता चला कि इस लोकप्रिय सीरीज़ पर टेलिविजन सीरियल भी बनने वाला है। यह सबकुछ होगा। बचपन फिर हंसेगा। अपने पुरखों के कारनामे हम याद करेंगे, सबकुछ होगा...बस अंकल पै ना होंगे।

5 comments:

Arvind Mishra said...

एक लीजेंड बन गए थे अपने जीते जीते ही अनंत पै....
बहुत अच्छा लिखा अपने ...आभार

pratibha said...

Beautifully written....

Rahul Singh said...

सचमुच अविस्‍मरणीय रहेगा अनंत पै का योगदान.

krishnakant said...

अच्छा लिखा चंडीदत्त जी..पूरा ब्लॉग बेहतर है...बधाई..
पिछले साल भी आपका अयोध्या पर लिखा ब्लॉग पढ़ा था..
कैसे हैं आप?
पता नहीं आपको याद है कि नहीं, पिछले साल मैंने मोहल्ला पर एक लेख लिखा था, जिसपर आपने मुझे मेल किया था.
कुछ एक बार बातचीत हुई और फिर मैं ईटीवी चला गया. फिर अमर उजाला और अब वापस दिल्ली आ गया हूँ.
प्रभात खबर में हूँ.
घर मेरा भी गोंडा में है.मेरे पास आपका कांताक्ट है. फोन करूँगा. इस लिंक पर मेरा ब्लॉग विजिट कर सकते हैं.
http://bolkilabaazaadhain.blogspot.com/
कृष्णकांत

Anonymous said...

सरकार, लेख तो अच्छा लिखा है, पर नाम में चूक गए. वह "टिंकल" है, जिसे आप "ट्विंकल" कह रहे हैं. नेट से लेकर आपने तस्वीर भी ट्विंकल की ही लगाई है. सही हिज्जे हैं- "Tinkle". एक बार फ़िर सर्च करें और मेहरबानी करके सुधार लें. वैसे, हो सकता है कि हिंदुस्तान में कहीं "ट्विंकल" नाम का लडका या लडकी भी उदास हो, पर मेरा ख्याल है कि आप अनंत पै चाचा की पत्रिका के बारे में बात कर रहे थे.
- समदर्शी