कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, April 9, 2009

डायरेक्ट दिल-से

मेरा दिल है तू, ज़िगर भी तू...तू ही ज़िंदगी की सुबो-शाम है
तू यकीं जो कर तो कहूं ये मैं, मेरे लब पे तेरा ही नाम है
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वो जानते हैं नहीं कि ये आशिकी भी क्या चीज है...
जो दिल मिले, तो तख्त क्या, सारी दुनिया ही नाचीज़ है
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अब आ भी जा, न बन संगदिल...
बग़ैर तिरे सूनी है दिल की महफ़िल
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पत्थर हैं, उनकी हिम्मत है क्या जो आशिकी की राह में रोड़ा बनें...
तू देख हमारी चाहतों की आग के आगे दम उनका निकल जाएगा
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शब-ए-ग़म का बोझ उठाके भी यारों हम जिए जाते हैं ...
जो अश्क मोहब्बत में मिले हैं, उन्हें हंसके पिए जाते हैं
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जो पागल हुए, तो तू कहा...बस तेरी रहगुज़र की आरज़ू
होश आने का सबब नहीं, मन में है इंतज़ार की जुस्तजू
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दीवानगी मुझ पे यूं कहर ढाएगी ये सोचा ना था,
तू मेरी राह से होके गुज़र जाएगी ये सोचा ना था

Saturday, March 28, 2009

तुम ही बताओ...क्या हो गए हम

कभी गुल थे हम, चमन भी खुद / खुद हौसले की ज़ुबान थे / वही बुत बने पत्थर हुए /
तुम ही बताओ क्यों आज, अपने से लगते नहीं, जो कभी दिल के इतने क़रीब थे


तेरी दीद की है आरज़ू / बस सुस्त सी खुद से गुफ्तगू / न उम्मीद के चराग़ हैं / न मोहब्बतों के दीए जले / हम सुस्त-सुस्त से बैठे हैं / बस आह की हैं रवायतें / अब ढल गए तारे सभी / जिन्हें छूने की थीं कभी कोशिशें
यूं ही वक़्त पे हम रो रहे / जैसे दीया बन के जल रहे / जो हालात खुद पैदा किए / उन्हें दफ्न होने तक ढो रहे

यूं आह में ग़ुम हुई चाह है / भटकी जैसे ज़िंदगी की राह है / जो साथ तुम थे रोशनी थी / अब हर पल लगे जैसे स्याह है

राहे जुनून में यूं भटकन है / ये हमको कहां मालूम था / शौक-ए-मोहब्बत की चाह का / ये हस्र कहां मालूम था

Friday, March 27, 2009

शेर के नाम पर कुछ ढेर...

मज़े की बात...
जब ताज़ा-ताज़ा जवान होने लगा था, तब भी हमउम्रों का मज़ाक उड़ाता था--मियां, आजकल इश्क फ़रमा रहे हैं, जल्द ही शायर हो जाएंगे। उम्र ढली, अब तो शक्ल से भी पता चल जाता है कि मियां ढेर हो रहे हैं, अब क्या करें दिल का, जो इस उम्र में शायराना हो रहा है। ख़ैर, इन दिनों शायरी के नाम पर कुछ भी अल्लम-गल्लम तान दे रहा हूं। चूंकि, ब्लॉग पर कितनी भी गुंडागर्दी, अदब का सत्यानाश, काफिए-बहर की दुर्दशा की जा सकती है, इसलिए यहां चेंप भी दे रहा हूं। वैसे, भगवान जिलाए रखे शुभचिंतकों को, वो तो अब भी कह देंगे--कोई बात नहीं म्यां...लिखते रहो, कभी न कभी शायर भी बन जाओगे...वैसे सच्ची-सच्ची बोलूं...मुझे पता है, ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि ग़ज़लें लिखने, शेर गढ़ने में जिस कदर अनुशासन नाम की चीज की ज़रूरत होती है, वो हमारी तबीयत से सिरे से ही गायब है...ख़ैर, जितने ज्यादा शेर के नाम पर ढेर नहीं, उनसे ज्यादा तो भूमिका ही हो गई...अब डायरेक्ट शेर



अब रात भी चुकी तमाम, न सहर का है नामोनिशां...
रुक जाएं अब हों हमक़दम, फिर बन सकें जान-ए-जां



तिरे होंठों पे छाए दर्द का है मुझको भी ग़िला
...चलो हो चुकीं शिकायतें, अब खत्म हो ये सिलसिला


तेरी आंख में जो अश्क हैं, उन्हें तू यूं ही जार-जार बहने दे...
मेरे सीने में भी है आग खूब, ये भी यूं ही तो बुझ पाएगी

जो जख़्म दिए हैं सीने पे, उन्हें सोच के तू ये भूल जा...
मेरी निगाह से खिले थे ग़ुल, जो झुलस गए, तो झुलस गए

Thursday, March 26, 2009

दो और दो लाइनां...

दूरी...
जख्म रूहों से इस क़दर बावस्ता हैं, आंख से अश्क की जगह खूं निकलने लगा
लाख चाहा भुलाना तुम्हें मगर ना हुआ, जब भी आहट सुनी तो मचलने लगा

दूर हमसे तू चला, दूर है तेरा गांव
मन भी बस में नहीं, मिले कहां से छांव



बेगारी...
दफ्तर-दफ्तर, पीसी-पीसी, उफउफउफउफ सीसीसीसी
कहां क्रिएटिविटी, कहां है पैशन, कीबोर्ड पे चटनी पीसी

Monday, March 23, 2009

चंद लाइनें...

इस बीच चौराहा पर नहीं आया...मनःस्थिति ही कुछ ऐसी थी...हालत अब भी वही है, फिर भी बेशर्मी के साथ फेसबुक पर स्टेट्स मैसेज के रूप में कुछ लाइनें ज़रूर लिखता रहा.

वही पेश हैं...सबसे पहले वो, जो मुझे पसंद है...


फ़ाकामस्ती का आलम नहीं देखा हमने /
फिर भी मुफ़लिसी का डर सताता है /
दिल तो बंजारा है /
सुख में भी आवारगी के गीत गाता है...





1.
क़सक यूं दिल पे तारी हुई,
ज़िंदगी महज बेचारी हुई,
आंखें जिनमें पनपता था राग प्यार का,
सुरमई न रहीं, सिर्फ खारी हुईं

2.
आज तनहा हुए हम कुछ इस तरह,
जैसे दिल के सारे तार चटक गए
तुम्हें पाने की आरज़ू में
चले तो संग थे फिर भी राह भटक गए

3.
जब साथ बिन दिल रोता है और मन जलते हैं
महबूब हमारे तब कांच के टुकड़ों पर चलते हैं

4.
दिल की लगी ऐसी बढ़ी चेहरे का नूर छिन गया /
आहों में यूं उदासी बसी सांसों से चंदन छिन गया

5.
वो दिन भी क्या थ, जब कबूतर की चोंच पर टिके रहते थे प्यार के संदेश /
अब फोन पल को नहीं मिलता, तो लगता है छूट गया है देश

6.
दिन गुज़रा उनकी याद में, शाम तनहा ही रही
रात महकी साथ से, ज़िंदगी फिर बढ़ती गई
ये मोहब्बत भी क्या, इल्लत मिली हमको
दिल तो हाथ से गया ही, जान भी जाती रही

Sunday, February 22, 2009

लड़की सिर्फ वसंत नहीं होती...



भाप सी उठीं तुम
आंख सी छलकीं
वसंत सी खिलीं
उमड़ी नस-नस तक
पतझड़ सी बिखरीं रेशा-रेशा
ग्रीष्म सी दहकीं, सुलगीं, धुआं-धुआं हुईं
पिघलीं कतरा-कतरा, बूंद-बूंद
पहले थीं बचपन
मादा या नर भेद से अलग
गुनगुनी धूप में बस्ता राह पर पटक
भटकतीं पानी में हाथ भिगोने
जैसे भिगो लेना हो मन
सब सराबोर करने की इच्छा...
कोमल, सुंदर, अद्भुत, कितना अच्छा
चांद पर घर का सपना
कहां पूरा हुआ छोटा-सा स्वप्न भी
आशा से देखा खेलते बच्चों को,
उनका हिस्सा भी कहां बनीं
सिसकीं तब, जब आंसू पोंछने का हुनर भी नहीं सीखा था
न गले में दबाकर, जीभ से पीकर, नाक में समेटकर आंसुओं को आंख तक न पहुंचने देने का कौशल पाया था

तब, राह चलते एक दिन
बचपन छीन लिया एक भद्दी सी बात ने
कितना गहरा था वो धक्का
यकायक बच्चे का सावन मादा होने के जंगल तक सिमट गया और ले गया साथ तुम्हें

फिर बिखरीं
टूटीं, दरकती रहीं बार-बार
वर्षों लंबे नर्क में
भगवान बनाए
मूर्तियां सजाईं
उन्हें पूजा, पाया धिक्कार का प्रसाद
कहां समझ पाया कोई मन तुम्हारा
मृत्यु मांगी, झटक देनी चाही ज़िंदगी
फिर उबर आईं तुम...हर बार की तरह
कुछ स्वप्न फिर बुने
कुछ क़दम तुम चलीं
बना रहा फिर भी मंज़िलों को लेकर भ्रम
जैसे भगवान टूटे, वैसे ही टूटती रहीं राहें
फिर मैं मिला एक दिन
झूठ और सच के अंतर्द्वंद्व के बीच
कहीं उपजने लगा प्रेम
प्रेम, जिससे सच्चा कुछ नहीं
न तुम, न मैं, न वो काला समय
जिसमें सिर्फ प्रेम की तलाश नहीं थी
थीं कई अंधेरी घाटियां
कई गहरे काले गड्ढे
वो जो नहीं मिला, जो चाहा था, उसका खोखलापन तुमने दबा दिया था गहरे गड्ढे में
पर शंकाएं और सच भारी पड़े प्रेम पर
मैंने कुरेदे गड्ढे, फिर निकालीं सड़ी-गली दफन हुई रातों, दिनों, दोपहरियों की लाशें
तुम टूट गई हो...अविश्वास के अंधेरे से घिरी
मरघट की दुर्गंध से त्रस्त
तुम्हारी आस्था एक बार फिर छिन्न-भिन्न है
तुम जो वसंत थीं, थीं लड़की
आज फिर मादा हो...बार-बार भोगे, नोचे, छले जाने को अभिशप्त मादा
और मैं
सिर्फ नर बनकर रह गया हूं...
प्रेम कहां पाता है कोई नर...पुरुष...मर्द
कहां पाऊंगा मैं भी
तुम्हें अपनी हथेलियों में समेटते हुए
अतीत की कालिमा को ही बार-बार उंगलियों से छुड़ाने की कोशिश करूंगा
और तुम भी अब कहां हो पाओगी
रात भर जागने के बाद जेएनयू के गंगा ढाबे के पास मिली सुबह की तरह सहज...
फिर भी यही चाहता हूं
आवरण उतर जाएं, मुस्कराते हुए कुटिलताएं न करूं
चाहूं तुम्हें तो कहूं, बोलूं तो निभाऊं, चाहूं तो चाहूं
बस तुम्हें...बस तुम्हें...

Saturday, February 21, 2009

क्या आंखें प्यार में नहीं रोतीं


तुम्हें देखने की कोशिश में
अक्सर धुंधला जाती है नज़र
आंसुओं में घुल-ढक जाती रोशनी
बायलोजिकल उपज हैं ये
सच है साथी
कैसे हो सकता है आंसुओं का महिमामंडन
रक्त, कफ और वीर्य की तरह
ये तो पैथालोजी लैब के लिए टेस्ट का सामान भर हैं
किसी कसक से इनका क्या वास्ता
भरोसे दरक जाएं, तो भरोसा नहीं होते
जो चटख जाए, वो प्यार ही कहां भला
याद है वो बारिश, जब एक छतरी फेंककर तुम मुस्कराई थीं
और पानी में सन गए थे हम-तुम
तब भी तो रो दिया था मैं
पर आंसुओं और महिमामंडन का रिश्ता इससे तो नहीं बनता
बुनता रहूं भले ही मैं इनका संबंध
तुम तो जानती हो ना
ये छलने की नई तरकीब भर है, है ना...

Tuesday, February 17, 2009

आज फिर


आज फिर बहुत उदास हूं
आज फिर तुमसे नाराज हुआ
आज फिर एक शाम आई
आज फिर तुमसे दूर हूं
आज फिर तुमसे ही की तुम्हारी शिकायतें
आज फिर मांगी तुमसे सफाइयां
आज फिर नहीं हुआ तुम पर यक़ीन
आज फिर तुम्हें जता दिया अविश्वास
आज फिर तुम पर ही किया भरोसा
आज फिर तुम्हारे ही सीने से टिका दिया सिर
आज फिर तुमसे ही मांगा सहारा
आज फिर कह रहा हूं
आज जैसा आज फिर कभी न आए