कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, August 16, 2012

मन की मौज में न भूलें आजादी के मायने

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख

चण्डीदत्त शुक्ल | Aug 15, 2012, 00:10AM IST
  गांव के एक काका की याद आ रही है। रिश्तेदारी का ख्याल नहीं। शायद पुरखों की पट्टीदारी का कोई छोर जुड़ता होगा उनसे, पर हम सब उन्हें काका, यानी बड़े चाचा के बतौर ही जानते-पहचानते और मान देते। काका का असल नाम भी याद नहीं पड़ता। बच्चे-बड़े सब उन्हें मनमौजी कहते। मनमौजी का मतलब मस्त-मौला होने से नहीं था।

काका निर्द्वद्व, नियंत्रण के बिना, इधर-उधर घूमने वाले, दिन भर ऊंघने और शाम को चौपाल में बैठकर नई पीढ़ी को गालियां देने वाले सनकी बुजुर्ग थे। यानी मौज की खातिर जीने वाले। कोई कहता- काका! कुछ काम-धाम करो। तो वह टोकने वाले पर ही पिल पड़ते, 'तुम्हारी तरह थोड़े हैं कि घर में खाने को ठीक नहीं है। बाप-दादा कमाकर रख गए हैं। हम तो मौज उड़ाएंगे। घर में काकी भी ऐसी मिल गईं, जो कुछ कहती-सुनती नहीं थीं। उम्र के आखिरी दिनों में जरूर काका को सद्गति प्राप्त होने से ऐन पहले सद्ज्ञान मिल गया था। बहुत बीमार थे। अक्सर समझाते - बेटवा, पढ़-लिख लो। ये जो आजाद घूमते रहते हो, यह सब काम नहीं आएगा। विद्या और संस्कार ही आगे तक साथ देते हैं।

अब मनमौजी काका तो रहे नहीं। वे कोई बड़े सूरमा-खलीफा या सेलिब्रिटी भी नहीं कि उनकी चर्चा की जाए, सो आप सोचेंगे कि इतनी जगह उनके बयान में बर्बाद क्यों की गई। बहरहाल, इसकी भी वजह है। मनमौजी दरअसल, एक आदमी का नाम भर नहीं है। यह स्थिति अपनी जिम्मेदारी भुलाकर सिर्फ मस्त रहने, अपने मन का करने की प्रवृत्ति भी हो जाती है और तभी इसके खतरे सामने आते हैं। आज आजादी का दिन है। स्वाधीनता दिवस को हम एक और छुट्टी मान बैठते हैं, तो क्या हम भी मनमौजी काका ही नहीं बनते जा रहे? शायद हम भूल गए हैं कि आजादी का एक पर्याय स्वतंत्रता भी है, यानी अपने लिए, अपना तंत्र। एक अनुशासन, जो बताता है कि अगर हमें कुछ अधिकार मिले हैं तो उनके बरक्स कुछ जिम्मेदारियां भी हैं।

बचपन में जश्न-ए-आजादी मनाने के लिए हम सब बच्चे गांवभर में घूम-घूमकर चंदा इकट्ठा करते। छोटे-छोटे डंडों पर झंडे लगाकर भारत माता की जय के नारे लगाते। यह अहसास अंदर से होता था कि देश आजाद है और उसका उत्सव महज रस्म-अदायगी नहीं है। होली-दिवाली की तरह जरूरी है। पर अब क्या? एक अदद छुट्टी, स्कूलों में लड्डू और सभागारों में कुछ और नारे.. बस!

तीन रोज पहले की बात है। भोपाल में आयोजित एक मीडिया चौपाल में शामिल होने पहुंचा था। इसमें आजादी को अधिकार मान लेने और कोई तंत्र न विकसित करने की बात यकायक शुरू हो गई। बात छोटी-सी है, पर उसके मायने बड़े हैं। एक साथी ने कहा 'सोशल कम्युनिटीज पर जिसका, जो मन करता है, वह लिख देता है।' कुछ ब्लॉगर चिढ़ भी गए, पर बात तो सही है। अगर आपको एक प्लेटफॉर्म मिला है तो उसका इस्तेमाल करते समय दूसरों के हितों, भावनाओं और अपनी बात की गरिमा की चिंता करनी ही चाहिए।

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है। पहलू हजार हैं और सबके सब विचारणीय। देश बदलने की बात तो बड़ी है, लेकिन गौर कीजिए, क्या हम सब अपने आपमें मनमौजी बनते नहीं जा रहे हैं? बहुत पुराना शेर है- हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। हम इस बात को समझें कि आजादी हमें बैठे-बिठाए नहीं मिल गई। हमारे पास अपना तंत्र तो है, लेकिन क्या उसके लिए जरूरी सम्मान और हां, आवश्यक प्रयास हमारे अंदर हैं? क्या हम देश की अस्मिता बढ़ाने के लिए कुछ करते हैं? बात थोड़ी कड़वी है, लेकिन बेहद जरूरी है, समझने वाली है।

Tuesday, July 24, 2012

एक उदास कविता

एक उदास कविता

सबसे बुरा है
उस हंसी का मर जाना
जो जाग गई थी
तुम्हारी एक मुस्कान से.

जमा हुआ दुख
पिघला,
आंख से आंसू बनकर,
तुमने समेट ली थी
पीड़ा की बूंद
अंगुली की पोर पर.

वह सब मन का तरल गरल
व्यर्थ है अब,
जैसे लैबोरेट्री की किसी शीशी में रखा हो
थोड़ा-सा निस्तेज वीर्य, ठंडा गाढ़ा काला खून
या देह का कोई और निष्कार्य अवयव।

खिड़कियों के बाहर
कुछ दरके हुए यकीन लटके हैं
चमगादड़ों की तरह बेआवाज़
शोर करते हैं
झूठे वादे।

कविताएं सिर्फ गूंज पैदा करती हैं
नहीं बदलतीं किस्मत
जैसे कि
प्रेम का लंगड़ा होना
उससे पहले से तय होता है,
जब पहली बार वह भरता है,
दो डग हंसी की ओर।

चलती रहती है
इश्क की सांस
तब
मन के उदर में पलता है कविता का भ्रूण
और खा जाता है एक दिन
वही कोमल एहसास
इच्छा का राक्षस।

ढल जाता है साथ देखा गया ठंडा चांद
गमलों के इर्द-गिर्द उगती रचनाएं
कुम्हलाई पत्तियों की राख में हैं पैबस्त
एक उदास आदमी चीखता हुआ कोसता है खुद को
कहते हुए,
क्यों नहीं है मेरे प्रेम में ताकत?
कैसे घुल-सी गई एक बार फिर
`सुनो, मेरी आवाज़ सुनो' की पुकार!

कौन बताए,
प्रेम का सूरज अस्त होने के लिए ही उगता है
कभी नहीं रुकता कोई
सिर्फ प्रेम के लिए,
प्रेम के सहारे।

प्रेम की कहानियां
इच्छाओं के लोक में
बेसुरी फुसफुसाहट से ज्यादा औकात नहीं रखतीं।

विरह मिलन से बड़ा सत्य है
और बेहद खरी गारंटी भी
जिसके साथ धोखे की रस्सी से बुने कार्ड पर लिखा है-
टूटेगा मन, जो जोड़ने की कोशिश की।

बहुत पहले,
नाज़ुक हाथों को थामकर
लिखी थी एक गुननुगाहट,
पाखंड के
साइक्लोन ने
ढहा दिया रेत का महल।

समंदर किनारे प्रेम की कब्र बनती है,
ताजमहल हमेशा नवाबों के हिस्से आते हैं।
आज राजा
अंग्रेजी बोलते हैं,
चमकते अपार्टमेंट्स में होता है उनका ठिकाना
वहीं ऊंची बिल्डिंगों के बाहर,
कूड़ेदान के पास पॉलीथीन में लिपटे रहते हैं
कुछ सच्चे चुंबन, चंद गाढ़े आलिंगन और हज़ारों काल्पनिक वादे!


निर्लज्ज हंसी और बेबस आंसुओं
अपने लिए गढ़े नए नियमों,
दुत्कारों और आरोपों,
गाढ़े धूसर रंग की शिकायतों
और इन सबके साथ हुए असीम पछतावे के साथ
सब कुछ भले लौट आए
पर नहीं वापस आता,
राह भटका हुआ विश्वास।
छलिया आकाश ने निगल लिया है
एक गहरा साथ!
लुप्त हुई नेह की एक और आकाशगंगा,
प्रेम से फिर बड़ा साबित हुआ,
उन्माद का ब्लैकहोल!

प्रेम की अकाल मृत्यु पर आओ,
खिलखिलाकर हंसें।
हमारे काल का सबसे शर्मनाक सत्य है
मन की अटूट प्रतीक्षा से बार-बार बलात्कार।
कहने को प्रतीक्षा भी स्त्रीलिंग है,
लेकिन उससे हुए दुष्कर्म की सुनवाई महिला आयोग नहीं करता।

Wednesday, June 27, 2012

एक अकेला मैं ही काफी नहीं हू क्या?

महकता है चंदन हर ओर
नहीं है भोर भी,
कि कोई पुजारी तैयार कर रहा हो लेप
देवि या देव के अभिषेक की ख़ातिर।
तुम फिर ठहरकर मेरे घर के बाहर,
जोर से उसांस लेकर चली गई हो कहीं?
सुनो वसंत,
माफी के काबिल नहीं है,
मौसमों के कालचक्र में हेर-फेर की तुम्हारी साज़िश।
ऐन दोपहर में,
जब लंच टाइम होकर गुजरा है,
लोग दफ्तरों में कामकाज के लिए फिर हो रहे हैं उत्सुक,
ऐसे में अगर भोर का वहम पैदा करोगी,
तपते सूरज को शर्म आएगी,
हवा भी सुलगती हुई सर्द होगी,
कितना कुछ तो गड़बड़ होगा,
मुर्गे देने लगेंगे बांग,
प्रभातफेरियां सजानी पड़ेंगी,
आरतियों और घंटियों की ध्वनि से बदल जाएगा सब।
शेयर बाज़ार बिना परिणाम के फिर खुल जाएगा।
कितनी ही अर्थव्यवस्थाओं को,
कार्यालयीय व्यस्तताओं को,
प्रेमियों के तय वादों को,
स्कूलों में हो रहे नए एडमिशन्स को,
बिगाड़कर तुम्हें क्या मिलेगा।
ऐसे तेज़ सांस लेना-छोड़ना बंद रखो।
तुम्हारी एक-एक आहट से यह कमज़ोर दुनिया हो जाती है असंतुलित।
रहम करो देवि,
तुम्हारे अत्याचार का शिकार, एक अकेला मैं ही काफी नहीं हूं क्या?


Monday, May 7, 2012

हां, है न `बहुत कुछ'!

- चण्डीदत्त शुक्ल

जाते हुए,
हंसे बगैर
एकदम उस तरह,
जैसे कोई गैर
अगर तुम यह कहकर निवृत्त हुईं
`और कुछ?'
और मैं नहीं कह सका,
`हां, है बहुत...!'
तो इसके मायने यह नहीं
कि नहीं है तुमसे पहले जैसा प्रेम।
विदा के समय,
बिछु़ड़ते लम्हों में जैसे हमने छोड़ दिया
एक पुराना साथ
यूं ही, ज़ुबान से शब्द अलग हुए
तो उन्हें क्या दोष दूं, बोलो?
कोई, कहां कह पाता है
एक बार में, एक साथ, सब कुछ,
वह, जो कहना संभव ही नहीं होता
महज शब्दों में।
थरथराए होंठ जब सन्निपात का शिकार बन लज्जित हो जाते हैं
आंख तो कहती है कुछ धीरे-से, सकुचाते हुए,
सुनो न उनकी बात।
बताऊं तुम्हें कुछ, सुनोगी, सह सकोगी क्या,
क्या है कुछ कहने को बाकी मेरे मन में,
सुनो वसंत
कुछ अधूरी शामें तुम अपने क्लचर में बांधकर जो गुमशुदा हुई हो,
यह बात ठीक नहीं।
चांद नंगे बदन सारी रात ठिठुरता है
समोसे की शक्ल में तारे ऐंठे हैं
पसीने से भीगे हों जैसे सारी शाम तुम्हारे इंतज़ार में
और तुम भूल गईं आंसुओं का मोयन लगाना.
कुछ अधजली रोटियां बिना खाए छूट गई हैं
लेमन सोडा बेचने वाला भी जान लेता है पूछ-पूछकर
कहां है तुम्हारी दोस्त मियां, बड़े अकेले-अकेले रहते हो!
हैं कुछ बकाए भी,
एक तो उस बंद हो गए सिनेमाघर का,
जहां हमें और भी फिल्में देखनी थीं।
एक वादा था तुम्हारा, एक ऐसे चुंबन का,
जिसके बाद मैं अंतिम सांस लूं।
उस परदेसी फिल्म की तरह,
जिसमें एक बूढ़ा शिशु होकर प्रेयसी की गोद में
लेता है आखिरी हिचकी,
तुम मरने दोगी अपनी बांह में।
पर सब स्वप्न कहां सच होते हैं,
सो यह भी घुल जाने दो
लेकिन सुनो,
सौ ग्राम हरी मिर्च खाने के बाद,
मेरी सी-सी पर कराह उठने वाली तुम,
बताओ तो,
आज वहां फिर क्यों नहीं लौटीं,
जहां से बेदर्द होकर घुमा ले गई थीं गाड़ी।
जानते हुए भी कि तुम नहीं आओगी,
आदत से मज़बूर मैं गया था वापस,
अपने टूटे हृदय को एक और धक्का देने।
कहना तो है तुमसे बहुत कुछ
है न `और कुछ'
पर जानता हूं,
न तुम सुन सकोगी
न मैं कह सकूंगा,
हम दोनों
निकल चुके हैं
बहुत दूर,
कहने-सुनने और उसके असर से,
इसलिए अब मौन हूं।
सुना था,
शब्दों में जब कविता तैरती है
तो पहाड़ हिल उठते हैं
दिशाएं थमती हैं
यात्राएं नए रास्ते चुनती हैं
और मरा हुआ प्रेम फिर ज़िंदा होता है।
यही सोचकर
हर दिन बुनता रहा हूं एक नया मंत्र।
जैसे, वेद की ऋचाएं धर रही हों देह
हवनकुंड में सुलगती लकड़ियों के बीच मुझे राख कर
देने को नया जन्म।
मंत्रों में गुंफित है तुम्हारा नाम सदैव
लेकिन जो कुछ भी बाकी है,
वह शेष ही रहेगा शायद सदैव
जब मेरी एक भी कविता तुम्हारे हृदय में प्रेम नहीं जगा पाती
नहीं चलती हो एक भी कदम नींद से बाहर
तो यह सब मंत्र हुए व्यर्थ
नष्ट सब कविताएं
इनका नाद बहुत धीमा है
और तुम्हारा गुस्सा कुंभकर्णी नींद के हथियार से लैस है।
सोच रहा हूं, बंद कर दूं कुछ भी लिखना
अगर यह सब इतना ही असमर्थ है,
जितना कातर मेरा प्रेम,
तो कविता के न होने से क्या थमा रह जाएगा,
यूं भी, शब्दों में कहां ढोई जा सकी है प्रीति
न ही क़तरा भर भी नफरत।
घृणा ही जी ली होती मुकम्मल
तो क्षणांश को ही सही,मुझसे मिलना जारी क्यों रखतीं
और प्रेम बचा रह गया होता अक्षरों की दीवार में
तब, यह रोती हुई कविता किसी भी तरह शरीर कैसे पाती।
हरदम कविता को जन्म देना प्रेम को वापस नहीं लाता
फिर भी,
इस जन्म में संभव नहीं है,
तुम्हें विस्मृत कर पाना
मेरी कविताओं का जन्म तुम्हारे गर्भ से ही तो हुआ है,
मेरी वसंत।

Saturday, April 28, 2012

शुक्रिया वसंत

- चण्डीदत्त शुक्ल

शुक्रिया वसंत
तुम्हारा मिलना इस बार
नहीं लाया कोई बहार।
कहीं, नहीं फूटी, कोई कुहुक
एक भी फूल नहीं खिला
कहां हंसी कोई चिड़िया
पर
तुम, अपने न होने के बावज़ूद
साथ हुईं,
पल भर को सही।
बोलो, मृत्यु भी क्या छीन सकेगी यह सुख?
जानती हो
जी गया मैं।
यूं भी,
बेहद तकलीफ देता है,
छीजते हुए, सांस समेत तिल-तिल मरना।
इससे कितना अच्छा है न,
हंसते हुए, तुम्हारी गोद में प्राण दे देना।
तुम मिलीं
और मैंने ज्यूं एक पल को त्याग दी सारी निराशा!
आज सांस में हिमालय से ठंड आकर पसरी है।
बहुत ज़रूरी है
तुम्हारे अंदर यकीन का ज़िंदा रहना.
मुझ पर न सही,
किसी पर भी बना रहे विश्वास
वह भी न हो
तो खुद में ज़िंदा और आश्वस्त रहो तुम।
आखिरकार,
उपस्थित रहना
एक खूबसूरत इंसान का
इस दुनिया में
कितना आवश्यक है।
यकीन करना
तुम्हारे हंसने से
आज भी सुबह हो जाती है
और लाल।
दोबाला रफ्तार से धड़कता है दिल।
तुम्हारी देह के बिना भी,
मुझमें
तृप्त होती हैं समस्त वासनाएं।
एक शाम,
अपने मरे हुए यकीनों के साथ ही सही,
आना...
कुछ न कहना,
कुछ न सुनना।
तुम्हें अपनी बांह में पिरोकर
छुए बिना ही
मैं भर दूंगा तुम्हारे मन में प्रेम-सरोवर।
कुछ तो है साथी
जो बनाता है
इस रंगहीन-बेस्वाद दुनिया को
सुंदर और लज्जतदार
वह हो तुम
और मेरा कातर प्रेम!

Monday, April 16, 2012

म्यां, नाराज़ क्यूं हो?

- चण्डीदत्त शुक्ल
 
नाराज़ हो,
मेरे से.
म्यां,
कोई नई बात कही होती.
ये क्या,
भूत भगाने को,
इबादत की खातिर
लोहबान जलाना.
कभी
गुड नाइट छोड़के
मच्छर-मक्खी भगाने कू लोहबान  जलाओ न.
अमां.
दिल के जले से मूं फुल्लाने वाले तुम कोन-से नए आदमी हो
किसी टकीला वाले अंबानी से गुस्सा के देखो.
आशिक को तो गली का कुत्ता भी भूंकता है
पूरा पंचम राग में
तार सप्तक छेड़ते हुए
ऊं-ऊं-उआं करके रोता है,
किसी रात साला किसी दरोगा पे रोके दिखाए
नाराज़ मती होओ
हम इश्क के मारे हैं,
तुम्हारी नाराज़गी बेकार जाएगी।
किब्ला.
इश्क ही कल्लो
नाराज़गी फरज़ी लगैगी
फिर तो,
एक ही कंबल में मूं लपेटे हमारे साथ पड़े रहोगे.
ये रोग किसी छूत से नहीं होता
हां, इस रोग की छूत बड़ी बुरी होवे है...

Saturday, March 17, 2012

कुछ कविताएं आज की...

- चण्डीदत्त शुक्ल @ 8824696345

जागती है मेरे जन्म की हर रात

हां,
बाकी है बहुत कुछ
तुम्हारा मुझ पर.
शेष हो तुम भी कहीं मुझमें,
एक जरूरी बोझ की तरह।
ज्यूं,
पनघट से घर लौटते हुए
पानी से भरी मटकी सिर दुखाती बहुत है
पर उसी तेजी के साथ
हल्का कर देती है प्यास से भरी देह।
तुम्हारी कृतज्ञताओं के कंबल में,
ठिठुरता है मेरा वर्तमान
और दहकता हुआ देखो गुलाबी अतीत।
तुम्हारा स्वप्न होना जीवन का,
किस कदर जगा गया है
मेरे जन्म की हर रात।


ठहरी रहना किसी मोड़ से गुजरते हुए


सारे अच्छे लड़के
शादीशुदा हैं,
या फिर समलैंगिक--
कहीं पढ़ा था मैंने
और
कह रहा हूं
इसी वाचिक हिंसा से भरकर
सारी लड़कियां,
जिन्हें हम प्यार करते हैं,
होती हैं कुछ दूसरे ही किस्म की।
वे या तो रहती हैं किन्हीं और चीजों के प्रेम में
या फिर
स्वप्नों के दंश से झुलसी हैं उनकी इच्छाएं।
अपने अस्तित्व में पिघलते देख
हमारी देहों का बोझ
दोहरी होती हैं हंस-हंसकर
फिर भी नहीं देती हैं खुद का एक कतरा भी!
लगाव की ये सब यात्राएं चुक गई हैं
बालू से तेल निकालते हुए।
तुम,
ठहरी रहना किसी मोड़ से गुजरते हुए
एक निर्जन रास्ते पर।
मैं आऊंगा तुम्हारे उपयुक्त बनकर,
तुम तो हो ही
सनातन मेरी प्रियपात्र।

Friday, March 9, 2012

व्यंग्य : बेगुनाह चच्चा ने खेली एक अनूठी होली



- चण्डीदत्त शुक्ल

chandidutt@gmail.com

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कभी महंगाई ने होली खेली, कभी लापरवाह नेताओं के ऊल-जलूल बयानों ने, लेकिन चच्चा के पस्त हौसलों को धूल चटाते हुए चच्ची बोलीं—मुश्किलें तो रहेंगी ही, हौसले से खेलो रंग और बोलो – होली है, है होली!

 
मार्च का पहला हफ्ता भी बीतने को है और मौसम किसी बेवफ़ा माशूका की तरह ऊल-जलूल, दिल तोड़ने वाली हरकतें करने से बाज नहीं आ रहा। पौ फटते ही ठंडे पानी से नहाने की जो आदत मजबूरी में पड़ी थी, उसका निबाह करने का फायदा ये हुआ है कि हवा में बदलाव आते ही जुकाम-बुखार धर दबोचता है। ऊपर से तुर्रा ये कि सुबह सिहरन भरी बयार चलती है और दोपहर में सिर तपने लगता है। ज्यादा गलती ये कर दी कि चचा के घर का रुख कर लिया। पहुंचा तो देखता हूं कि चचा चारपाई उलटी करके रस्सी पर डंडा पटक रहे हैं। फितरतन हंसी आ गई और उनका पारा फटाक कर ऊपर चढ़ गया। वे हिनहिनाए—`का बाबू नंदलाल, हमको ट्रैफिक का कानून समझ लिया है? जब चाहोगे, तोड़ दोगे। ये जो डंडा हम रस्सी पर पटक रहे हैं, वही तुम्हारी पीठ पर धर देंगे।' अल्पमत की सरकार की तरह हमारी हंसी शैंपेन के झाग माफिक तुरंत बैठ गई। हम रिंरियाए – `अमां चचा, आप भी न पूरे डॉली बिंद्रा हो रहे हैं। बे-बात नाराज़, लड़ने को आमादा। हुआ यूं कि हम सोच रहे थे— आप होली की तैयारी में जुटे मिलेंगे।

पकी हुई दाढ़ी-मूंछें खिजाब से रंगने और नई अचकन से लैस होने में मुत्तिला होंगे, लेकिन जो आपको खटमल मारते देखा तो हंसी आ गई। अब इसे लड़कपन की भूल मानकर माफ़ कर दीजिए।' चचा बुझती हुई लालटेन की तरह और भभक पड़े – `कहना क्या चाहते हो। तुम बयालीस की उमर में लड़के हो और हम बुड्ढे हो गए? अभी हमारी उमर ही क्या है?' चचा को सेंटी होते देख हमने जबान के मंझे को ढील दी और पटरी पे आ गए। हमने कहा – `चचा, सच बात है। आपके बाल ही तो सफेद हैं...' उन्होंने बात लपक ली, बोले – `हां, दिल तो काला ही है बेटा। खैर, और सुनाओ। क्या हाल है?' लेकिन ये कहने के साथ ऐसा भी नहीं कि जवाब का इंतज़ार करते, खुद ही बोलते रहे – `ऐसा है नंदलाल, होली तो हमसे साल 2011 ने जमकर खेल ही ली है। अब हम रस्मअदायगी करें तो करें।'

हमने मुंह के किवाड़ फटाक से खोल दिए – `अमां चचा, आप भी न गड़बड़झाला कर रहे हैं। होली तो आज है और आप पता नहीं क्या-क्या कह रहे हैं। सुबह ही भांग चढ़ा ली क्या?' चचा इस बार न फफके, न भभके, बस मुस्कुरा दिए – `नंदू बेटा, आओ बैठो। हम सुनाते हैं, कैसे मनाई हमने साल भर होली!' हम भी इत्मिनान के साथ, खुले कानों और दोपहर तक जमे रहने के इरादे के साथ वहीं जमीन पर पसर लिए। फिर तो चचा बोलते रहे, नॉनस्टॉप, फुल स्पीड।

चचा ने क्या कहा, हम बताएंगे, लेकिन पहले जरा उनका इंट्रोडक्शन हो जाए। इनका असली नाम तो वालिदान को या हेड मास्टर साहब को पता होगा, हम बस इतना जानते हैं कि सूफियाना मिजाज के चचा खुद को बेगुनाह चच्चा कहलाना पसंद करते हैं। आशिकाना दिल के मालिक हैं, सो जवानी में दो-चार हड्डियां तुड़वा चुके और रेलवे स्टेशन के पास पान की छोटी-सी दुकान चलाते हैं।

चचा कहने लगे – `देखो नंदू, होली का हाल हम तुमसे क्या बताएं। अब तुम हमसे कहोगे चाय पिलाओ, सो पहली कहानी तो यहीं से शुरू हो जाती है। एक जमाना था, जब हम कलेवे में, बोले तो मुए ब्रेकफास्ट में, दूध-जलेबी खाते थे। अब गाना सुनते हैं जलेबी बाई, लेकिन दूध को सेंट की तरह इस्तेमाल में लाते हैं। ऐसे में इस साल की सबसे जबर्दस्त होली तो महंगाई ने खेली है।'

धाकड़ मिजाज चच्ची आंगन में आकर चिल्लाईं– `सुनो जी, न काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के। अब भतीजा आया है तो कंजूसी के रिकॉर्ड न बनाओ। ऐसी किल्लत नहीं पड़ी है कि इसे चाय भी न पिला पाऊं।' चच्ची की बात सुनके हमारी हिम्मत जागी, लेकिन उन्होंने भी दिल तोड़ने की ठान रखी थी। बोलीं – `बेटा नंदू, चचा तुम्हारे बात तो सही कह रहे हैं। बेटा साल भर में पांच बार दूध की कीमत बढ़ी है। मैं कहती ही रह गई कि एक भैंस पाल लो, लेकिन ये हैं कि सुनते नहीं।'

चचा फट पड़े - `और आंगन में तेल का कुंआं भी खोद लूं न... वहीं से पेट्रोल और केरोसीन निकलेगा!'

चच्ची ग़ज़ब वाली नाराज़ हुईं और चचा को कोसते हुए अंदर जा सिधारीं। हमने सोचा, ये मियां-बीवी हर मेहमान के आने के साथ ऐसी ही नौटंकी शुरू कर देते हैं, ताकि चाय न पिलानी पड़े। खैर, चाय की उम्मीद छोड़ हमने चचा की आवाज़ की तरफ कान लगा दिए। वे कहते जा रहे थे – `बेटा, दूसरी होली हमारे साथ विद्या बालन ने खेली। अब इस बुढ़ापे में ऐसी-ऐसी हरकतें दिखा गई है कि खुद तो दोजख में जाएगी ही और हमारा रास्ता भी बंद कर दिया…'। उनके खुले मुंह पर यकायक ढक्कन लग गया तो हमने पलटकर देखा। दूध बहुत कम, पानी ढेर सारा वाली चाय एक डिस्पोजल ग्लास में भरकर बाहर निकल रही थीं। उन्होंने चाय हमें पकड़ाई और चचा को घूरा। चचा बेचारे अपनी परमानेंट मनहूस शक्ल पर और भी बारह बजाकर चुप हो गए।

चची बोलीं – `विद्या बालन क्यों, सन्नी लियोन की बात करो।' वे गिड़गिड़ाए – `हम तो नंदू बेटा से पढ़ाई-लिखाई की बात कर रहे थे।' चची वहीं जमकर बैठ गईं – `जरा हम भी तो सुनें तुम्हारी ये स्पेशल बातचीत।'

हम चाय गुड़गुड़ाने लगे और चचा गप का सिरा पकड़कर आगे बढ़ चले – `बेटा, अन्ना आए थे तो सबने सोचा कि अनशन करके मुश्किल सब हल हो जाएगी, लेकिन हम पहले से जानते थे कि इससे कुछ नहीं होगा। तुम्हारी  चच्ची तो महीने में वैसी ही दस-पंद्रह दिन अनशन करवाती हैं, लेकिन हमसे कोई हल कहां निकलवा पाईं।'

चच्ची जनलोकपाल बिल के समर्थन में मुस्तैद कार्यकर्ता की तरह भड़कीं – तुमसे कुछ होगा तो है नहीं, बस बातें बनाते रहो। इसके बाद हमारी ओर मुड़ीं - `नंदू बेटा। हम जब चौदह साल की उम्र में ब्याह के आए थे, तभी कह रहे थे कि सरकारी नौकरी के लिए टिराई करो। अब देखो, पिछले साल सारी छुट्टियां ऐसी पड़ी हैं कि एक दिन छुट्टी लो और तीन दिन आराम करो, लेकिन इनकी तो सारी कोशिश एकदम रामदेव के आंदोलन की तरह साबित हुई।'

चचा बोले – `हमने एक बार में तुम्हें सेलेक्ट किया, उसका शुकराना अदा नहीं करती हो। सैफरीना की तरह बना देते, तब सही होतीं।' उन्होंने हिम्मत करके इतना कह तो दिया, लेकिन चच्ची की घुड़की खाकर फिर साइलेंट हो गए। कुछ देर तो माहौल यूपी चुनाव की तरह रहा, फिर समर्थन जुटाने के लिए आतुर पॉलिटिकल पार्टीज की तरह नॉर्मल हो गया।

चचा ने उस दोपहर पूरे साल की होली की जो-जो घटनाएं सुनाईं, उनका डिटेल में बयान करना ठीक नहीं है, लेकिन मुख्तसर-सा बयान कुछ यूं है – नंदलाल, होली-दीवाली सब दिल में ही होती है। बाहर निकलकर मनाने चलो तो एक-से-एक संकट सामने है। पिक्चर देखनी हो तो मल्टीप्लेक्स में टिकट से ज्यादा पॉपकॉर्न के पैसे दो।

लाइसेंस लेना हो तो पूरे साल की कमाई रिश्वत में दे दो। ज्यादा नारेबाजी करो तो दो पत्ती गांजा रखके हवालात में ठूंस दें।' हमने ज्यादा जोर दिया तो बोले – `हमारे साथ तो बिग होली कृषि मंत्री साहब ने खेली। पूरे साल बताते रहे कि खेती-किसानी का भविष्य ज्योतिषियों के हाथ में है और खुद बेचारे मुकदमेबाजी से लेकर क्रिकेट की गुगलियां सुलझाने में लगे रहे। हमारा बस चले तो हम अलीगढ़ का एक ताला उन्हें गिफ्ट कर दें। दूसरे साहब हैं तो अंग्रेजों के जमाने से अब तक चली आ रही एक पार्टी के नेता, लेकिन उन्हें मच्छर भी काटता है तो आरएसएस की साजिश बता देते हैं। इनसे भी अव्वल नंबर के हुलियारे निकले आतंकवादी, जो जब देखो, तब अपनी जान तो गंवाते ही हैं, हमारा अमन-चैन भी काफूर कर देते हैं।'

चचा सेंटी हो रहे थे और हम मुंह बाए उनकी बात का जवाब तलाश रहे थे। वे एक्सप्रेस ट्रेन की तरह दौड़ते रहे – `अब बताओ नंदू, मेरे जैसे बेगुनाह के पास क्या है, लेकिन गैस सिलेंडर की कीमतें सुनकर मन करता है, खुदा के पास चला जाऊं। हां, याद आया, होली तो मौत ने भी इस बार बहुत तगड़ी खेली, लेकिन वो भी अपने साथ हमारे अजीज जगजीत सिंह, भूपेन हजारिका, देवानंद को ले गई। अब जन्नत में गाना-बजाना हो रहा है और हम तुम्हारी चच्ची की झिन-झिन सुन रहे हैं… खैर, अपनी-अपनी किस्मत। होली तो हर साल आएगी, लेकिन हम एक सवाल पूछते हैं – हमारी सुध सरकार को कब आएगी?'

चच्चा को हम क्या जवाब देते। उनकी उम्मीदें सोने की कीमत की तरह सारी सीमाएं लांघ रही हैं। हम और फेडअप होते, उससे पहले चच्ची ने हमें बचा लिया। वे साबुन का झाग घोलकर लाईं और चच्चा के घुटे सिर पर उड़ेलकर बोलीं – होली है, होली है मनहूस। मेरे प्यारे शौहर, तुम सच में बूढ़े हो गए हो। मुफलिसी और मुसीबतें तो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं। मियां, ये ही न हों तो ज़िंदगी कितनी बेनूर और बेमज़ा हो जाएगी। है कि नहीं...। दूसरों को कोसना छोड़ो और आओ, जितनी भी रूखी-सूखी है, उसमें ही मस्त रहें, होली खेलें।'

मैंने राहत की सांस ली और चच्चा-चच्ची को होली की मुबारकबाद देकर आगे बढ़ा। मेरे मन में चच्ची की बातें अब भी गूंज रही थीं – हालात से समझौता करके चुप बैठ जाना हल नहीं है, हमें आवाज़ तो उठानी होगी, लेकिन दिक्कतों की दुहाई देकर सिर्फ झींकते रहने से भी कुछ नहीं होगा। ज्यादा अच्छा ये होगा कि हम हंसते रहें और लड़ते रहें। हम ऐसा कर पाए तो हर दिन होली होगी।

चच्ची की बात यादकर मुझे हंसी आ गई, तब तक चार-पांच बच्चे दौड़ते हुए आए और टकरा गए। वे चिल्ला रहे थे – होली है, होली है...। दूर, सूरज बादलों के पीछे थोड़ी देर इंटरवल मनाने निकल लिया था और होलियारे हर तरफ हुल्लड़ मचाने निकल पड़े थे।