कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, July 8, 2010

गूगल बज़ से साभार


कुछ पंक्तियां...., जो बज़ पर आईं सीधे



बरसती थीं जब अथाह तुम / समेटे रहा अपनी अंजुरी मैं / तरसता हूं अब एक बूंद की छुअन को / मन पठार में कितनी प्यास समेटे...Edit
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बहुत दिन बाद हुई बारिश / लबालब हुए हम दोनों / फिर भीगे, मन भरकर / एक मैं था / और एक तुम्हारी याद....Edit
Sheelu Ji - awesome sir ji, awesome....2:23 am
shikha varshney - oye hoye ..beautiful..2:48 am
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तेरी याद भी पाज़ी है / मुझे बहुत रुलाती है /
अंखियां भर आती हैं / हां नींद ना आती है...
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3 people liked this - Sheelu Jishikha varshney and पवन कुमार

प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद...वैसे,  डिज़ाइन कॉपी करने का आइडिया कैसा रहा?




2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया!
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अच्छा लगा देखकर!

निर्मला कपिला said...

बरसती थीं जब अथाह तुम / समेटे रहा अपनी अंजुरी मैं / तरसता हूं अब एक बूंद की छुअन को / मन पठार में कितनी प्यास समेटे..
वाह बहुत अच्छी लगी सभी पँक्तियां मगर ये दिल को छू गयीं। आभार।