कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Saturday, January 23, 2010

फिर भी है तलाश

दर्द है / कितना? / कोई ना पूछे/ बयां करना मुश्किल है!
पर यक़ीन मानो / हम दोनों मुस्कराएं / यही इतना इसका हल है!!
है नफ़रत तुम्हें मेरे वज़ूद से / मैं डरता हूं अपनी खुदगर्जियों के सबूत से /
फिर भी मिलते हैं हम / ढूंढते हैं एक-दूसरे को / मान भी लो, यही हमारे संग का संबल है....




5 comments:

निर्मला कपिला said...

इस संबल के लिये शुभकामनायें रचना अच्छी है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सही हल खोजा है जी!
बधाई!

somyaa said...

bahut dard bhara hai iss rachna mein... Muskurana hal ho toh sakta hai per itni himmat hai kismein??

अबयज़ ख़ान said...

काश इस दर्द की दवा करे कोई... बहुत खूबसूरत

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत