कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Tuesday, May 4, 2010

मजदूर और मजबूर....मीडिया





दोस्तों,

फोकस टेलिविजन में मेरे वरिष्ठ, हिंदी आउटपुट डेस्क के प्रमुख प्रमोद कुमार प्रवीण ने मज़दूर दिवस पर एक कविता लिखी। अभिव्यक्ति और प्रतीकों के लिहाज से अनूठी ये कविता इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि मीडिया के मज़दूरों पर सधी हुई टिप्पणी भी यहां पढ़ने-समझने को मिलती है...







हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।

एक मई, यानी मजदूर दिवस पर, मीडिया के मजदूरों की मज़बूर-गाथा के दो शब्द....

6 comments:

दीपक 'मशाल' said...

Badhiya kavita.. aabhar Chandi bhai

अविनाश वाचस्पति said...

ऐसे दो शब्‍द सही मायनों में सच कह जाते हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

श्रमिक ही देश की रीढ़ की हड़्डी हैं!

संजय भास्कर said...

......खूब !!

संजय भास्कर said...

..बहुत खूब !!

@ngel ~ said...

saaf sabdon mein sachha bayaan... !!! is disha mein kya koi kadam nahi uthaya ja sakta jahaan patrakaar ka darja uthe sath hi use uski imaandaari aur guno ke dum per paarishramik mile...