कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Monday, May 3, 2010

सुकून के सुर...येसुदास

हज़ारों मील लंबे रास्ते, गांव, गलियारे, नुक्कड़, चौराहे, अलग-अलग लहजा, तरह-तरह की ज़ुबान...यही तो है अपना हिंदुस्तान...विविधता से भरपूर देश, यहां के लोग अलग, उनके संस्कार अलहदा, लेकिन कहीं का भी, किसी इलाक़े का बाशिंदा क्यों ना हो...जब वो चैन चाहता है, उसका मन तड़पता है सुकून पाने के लिए, तो वो सुनना चाहता है...कोई गाता मैं सो जाता... जैसी धुन। ये कविता रची है हरिवंश राय बच्चन की, फ़िल्म है आलाप और आवाज़ है कट्टासेरी यूसुफ येसुदास की। 10 जनवरी, 1940 को कोच्चि में जन्मे डॉ. के.जे. येसुदास सरगम की ऐसी बारिश हैं, जिसकी बूंदें प्यासे मन को राग-रंग से सराबोर कर देती हैं। अफ़सोस की बात है, तो यही कि हिंदी फ़िल्म जगत ने ऐसे समृद्ध गायक को नहीं पहचाना। ख़ैर, उनका क्या गया, पर तमाम श्रोता महरूम रह गए एक ऐसी आवाज़ से, जिसे बड़े-बड़े फ़नकार कलाकारों का सरताज मानते हैं।

रहमान को ऑस्कर  मिला है...सारी दुनिया उनका लोहा मानती है और वो खुद येसुदास  के मुरीद हैं...मिठास भरी  आवाज़ में रहमान कहते हैं, ` वो मेरे पसंदीदा गायक और दुनिया में 'सबसे खूबसूरत आवाज़’ हैं।‘ संगीतकार रवींद्र जैन की ख़्वाहिश है—कभी मुझे आंखें मिलें, तो जो चेहरा मैं सबसे पहले देखना चाहूंगा, वो येसुदास का होगा। लता दीदी ने भी येसुदास की बात को हमेशा  सिर-माथे लिया। येसुदास ने एक बार कहा कि अब लताजी की आवाज में कंपन आ गया है, उन्हें गाना बंद कर देना चाहिए। तब अच्छा-खासा बवाल खड़ा हो गया था। लेकिन खुद लताजी ने कहा कि यसुदास सही कह रहे हैं।

येसुदास की आवाज़  में पवित्रता का खास अहसास  है...उन्हें सुनते हुए लगता है—कितनी थकान के बाद मखमली बिस्तर मिल गया है...महकती हुई बहार यकायक आ गई है...और चलो अब सो ही जाएं! `संस्रिति के विस्तृत सागर में, सपनों की नौका के अन्दर, दुख-सुख की लहरों में उठ गिर, बहता जाता, मैं सो जाता…कोई गाता मैं सो जाता’ की गुनगुनाहट जैसे मन के सारे पीर हर लेती है। येसुदास ने 40 हज़ार से ज्यादा गीत गाए।

ज़ुबानें भी अलग-अलग...कहना ना होगा, इन भाषाओं में गीत गाने के लिए तलफ्फुज  की मांग भी अलहदा थी और असर  में भी फ़र्क पैदा करना था, लेकिन क़माल है येसुदास, कहीं भी तो ना कांपी आपकी आवाज़...मलयालम, तमिल, हिंदी, कन्नड़, तेलुगु, बंगाली, गुजराती, उड़िया, मराठी, पंजाबी, संस्कृत, तुलु, मलय, रूसी, अरबी, लैटिन और अंग्रेजी...कोई भी भाषा हो-बोली हो, एक मिठास हर दिल पर तारी हुई...अपना रूहानी असर छोड़ गई।

ऐसे ही थोड़े  किसी को सात बार सर्वश्रेष्ठ  गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता है! पद्मश्री (2002) और पद्मभूषण (1975) जैसे सम्मान बताते हैं—कितना बड़ा है येसुदास का कद। शास्त्रीय़ संगीत  में माहिर येसुदास का एक और गीत है—सदमा फ़िल्म का। गुलज़ार के बोल, इलैयाराजा की संगीत संरचना और येसुदास का वही जादू फिर से...सुरमई अंखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे, रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम....। ग़ज़ब का जादू रचते हैं येसुदास...फिर आती है तनहाई में तड़पते मन को छांव देने के लिए जैसे एक गोद। माथा सहलाने को कोमल सुरों की नाज़ुक उंगलियां।

येसुदास ने हर मौक़े के मुताबिक गीत  गाए। उन्होंने `कभी मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है, जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है...’ के बोल अमर कर दिए, जिनसे जीने की राह मिले, तो `जानेमन जानेमन तेरे दो नयन चोरी चोरी लेके गए देखो मेरा मन’ जैसा गुनगुनाने वाला नग्मा भी सुनाया।

एक लैटिन कैथोलिक  परिवार में जन्मे येसुदास ने संगीत का विधिवत प्रशिक्षण हासिल किया। बेहतरीन रंगमंच कलाकार औगेस्टीन जोसफ अपने बेटे येसुदास को बेहतर गायक बनाना चाहते थे। येसुदास ने गरीबी से संघर्ष करते हुए भी अपने पिता का सपना पूरा किया, उन्होंने ताने सुने, आल इंडिया रेडियो, त्रिवेन्द्रम के अफ़सरों से ये भी सुना—तुम्हारी आवाज़ प्रसारण के लिए उपयुक्त नहीं है...लेकिन हिम्मत नहीं हारी।

अफ़सोस ये है कि 2007 में येसुदास को उपेक्षा  झेलनी पड़ी। "दासेएटन" नाम से मशहूर येसुदा चाहते थे कि गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण स्तुति करें, लेकिन उन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं दिया गया। अपने मलयालम गीत "गुरुवायुर अम्बला नादयिल.." के ज़रिए येसुदा ने अपनी ये पीड़ा जाहिर की थी।

मलयालम फ़िल्म कालापदुकल से येसुदास ने बतौर गायक अपना कैरियर शुरू किया। 1955 से सुरों की दुनिया को अमीर बना रहे येसुदास की आवाज़ हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में सन पचहत्तर में गूंजी। हिंदी फ़िल्म संगीत के दर्शकों का शुक्रिया अदा करना चाहिए संगीतकार सलिल चौधरी का, जिन्होंने येसुदास से 1975 में फिल्म 'छोटी सी बात' का एक गीत गवाया—'जानेमन जानेमन' । इसमें आशा भोसले उनके साथ थीं । 1977 में इनकी आवाज़ फिर सुनाई दी 'आनंद महल' के गीत 'नी सा गा मा पा' में। रवीन्द्र जैन ने 1976 में इनसे 'चितचोर' में गवाया। 1979 में राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्म 'सावन को आने दो' के दो गीत भी मन को लुभाने में सफल रहे। एक—चांद जैसे मुखड़े पर बिंदिया सितारा...और तुझे गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो...।

इससे कुछ साल पहले रूसी भी इस सुरीली गुनगुनाहट के तब दीवाने हुए, जब उन्होंने सोवियत संघ के तमाम शहरों में संगीत समारोहों में गीत सुनाए और रेडियो कजाकिस्तान पर भी पेशकश की। येसुदास ने 1980 में त्रिवेन्द्रम में थारंगी स्टूडियो की स्थापना भी की. 1992 में इसका कार्यालय और स्टूडियो चेन्नई में स्थानांतरित किया गया और फिर 1998 में अमेरिका में भी इसकी शाखा शुरू हुई। भारतीय संगीत को ग्लोबल पहचान दिलाने की एक मज़बूत कोशिश ये भी थी। सात समंदर पार तक भारतीय संगीत की तान पहुंचाने वाले येसुदास ने ज़ख्मी दिलों पर मरहम तो लगाए ही, 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ी जंग के वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए धन भी जुटाया। वतन की हिफाज़त की ख़ातिर अपना चैन भुलाकर जो राहों पर निकल पड़े, वही तो असल फ़नकार है।

हालांकि येसुदास  जंग के हरदम ख़िलाफ़ रहे, यही वजह है कि उन्हें यूनेस्को की तरफ से भी सम्मानित किया गया। वो ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने संगीत को शांति लाने के लिए साधन बनाया और इसमें कामयाब भी रहे। येसुदास की पत्नी हैं प्रभा और तीन बेटे हैं-विनोद, विजय और विशाल। इनमें से विजय येसुदास की परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्हें श्रेष्ठ पार्श्वगायन के लिए 2007 में केरल राज्य फ़िल्म पुरस्कार दिया गया।

क्या आम और क्या ख़ास, येसुदास के मुरीद  हज़ारों लोग हैं। मशहूर  गायिका पी. सुशीला कहती हैं, येसुदास संगीत का सागर हैं। वो अपने व्यवहार से संत  की तरह लगते हैं। ऐसा ही मानते हैं अभिनेता मम्मूटी। वो तो कहते हैं—मैं उनका भक्त हूं। वो जीवित हैं, तो संगीत सांस लेता है। संगीतकार रवींद्रन की राय भी ज़ुदा नहीं है, 'येसुदास परमेश्वर की आवाज हैं।‘

लोगों का इतना प्यार यूं ही नहीं मिलता...हरिहरन जैसे गायकों की मानें, तो येसुदास केरल में लोगों के जीवन का एक हिस्सा हैं। सुबह से देर रात तक चाहे लोरी सुनने के लिए, बसों में चलते हुए, गलियों में-घरों में, होटल-रेस्टोरेंट्स में सुनाई देती है, तो सिर्फ येसुदास की आवाज़।

अन्ना मलाई विश्वविद्यालय से 1989 में डॉक्टरेट, 1992 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1994 में राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय संसद में सदस्यता, दसियों बार राज्य स्तरीय सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक के ख़िताब...येसुदास को इतने ईनाम-इकराम मिले हैं कि सबका उल्लेख किया जाए, तो दो-चार पन्ने भर जाएं...पर अफ़सोस...इतने गुणी व्यक्ति को बॉलीवुड ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी। आखिर क्यों? पता नहीं, इस सवाल का जवाब क्या है?

जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित आलेख

Saturday, May 1, 2010

फिर छिड़े बात किताबों की



(जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित आलेख...चौराहा के पाठकों के लिए)




प्रकाशकों और लेखकों के नज़रिए से मुद्रित किताबों का महत्व और डिजिटल पुस्तकों की चुनौती

पिछली सर्दियों की भोर याद आती है...एक सुबह, यही कोई साढ़े सात भर बजे होंगे. दिल्ली सेंट्रल सेक्रेटेरिएट के पास से गुज़रते हुए लॉन की तरफ नज़र उठी और यकायक खयाल आया—यहीं तो बैठे, सिमटे रहते हैं प्यार करने वाले, तभी फिर सोचा—उफ! मैं भी पागल हूं...कहां, इस वक्त कोई आएगा...धूप जब गुनगुनी होगी, तब कहीं निकलेंगे `कपल्स’...। अभी तो रजाई में मुंह ढांपे, अपने-अपने घरों में नींद ले रहे होंगे. लेकिन ये क्या...सच में दिल तो बच्चा है जी, देखा, एक दरख्त के पास, पत्थर की बेंच पर एक जोड़ा मौजूद था...। उनके क़दमों के पास कुछ गिलहरियां थीं, थोड़ी-सी मूंगफलियां थीं और दोनों कहीं खोए हुए थे। लड़के के हाथ में थमी थी एक क़िताब। वो पन्ने-दर-पन्ने पलटता हुआ कुछ सुनाता जा रहा था और लड़की उसके कांधे से सिर सटाए चुपचाप बैठी थी, आंखें मूंदे हुए, कभी-कभार पलकें उठाती, साथी को एक नज़र देख लेती, फिर बोल पड़ती...`हूं’। ये दोनों वैसे ही थे, जैसे हर प्यार करने वाला जोड़ा होता है...दुनिया से बेख़बर, लेकिन उनके पास एक अनूठी चीज भी थी...एक किताब।
दोनों के दिल जुड़े थे...और ये जोड़ और मज़बूत बना रही थी—पुरानी किताब! फिर कभी वो या वैसा जोड़ा नहीं दिखा...पता नहीं, अगली पीढ़ी में ऐसे प्रेमी होंगे भी या नहीं, जो किताबें पढ़ते हुए अपने प्यार को परवान चढ़ाने की कोशिशें करेंगे!
बात, महज प्रेमियों की नहीं...हर आम-ओ-खास की है...क्या अब भी लोगों को किताबों से मोहब्बत है...क्या हम पुस्तकें खरीदने में, फिर पढ़ने में और उन्हें अगली, और अगली पीढ़ी तक संजोने की कोशिशें करते हैं? आज, जब दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला महज एक दिन पहले संपन्न हो गया है, जेहन में तमाम सवाल उभर रहे हैं..., पर सबसे मौजूं बात ये है—क्या किताबों के लगातार डिजिटल होते जाने के दौर में पुस्तकों के मुद्रित स्वरूप के लिए आकर्षण बचा हुआ है? क्या पाठक कम नहीं हो रहे हैं? पुस्तक मेलों का आयोजन आखिरकार, किस क़दर सफल साबित हो रहा है?
कीमतों का रोना हिंदी के पाठक हमेशा रोते रहे हैं! किताबें चाहिए भी और वो सस्ती भी हों, भला क्यों भाई! घी की कीमत कम कैसे हो? और क्यों हो? ख़ैर, इसका हल एक ज़माने में हिंद वालों ने निकाला। वो पॉकेट बुक्स छापने लगे थे, बाद में राजकमल, वाणी और पता नहीं कितने-कितने पब्लिशर पॉकेट बुक लाए। हाल-फ़िलहाल गौरीनाथ का अंतिका प्रकाशन भी इस मामले में आगे आया है, लेकिन पाठकों की शिकायत है कि महंगी वाली किताबें तो पेपरबैक में छापी ही नहीं जातीं।
बात पेपरबैक वाली किताबों की हो, तो एक और बात याद आती है—पहले पढ़ने का शौक खूब हुआ करता था। पल्प लिट्रेचर ने तो कमाल ही किया, लाइब्रेरीज़ गली-गली में खुली थीं, एक-दो रुपये में चौबीस घंटे का मज़ा। मोहल्लों में रीडर्स क्लब भी बने. वैसे—वहां मैगज़ींस की धूम ज्यादा रहती थी।
अच्छी किताबों की चाहत और पहुंच कम नहीं रही। देवकीनंदन खत्री की ऐयारी वाली कहानियों का मज़ा लेने, चंद्रकांता और भूतनाथ पढ़ने के लिए बहुतों ने हिंदी तक सीखी। पेपर बैक में बड़े साहित्यकार भी आए। चाहे मंटो हों या प्रेमचंद...लेकिन ऐसे पेपरबैक ज्यादा चले नहीं....कुछ तो उनकी घटिया प्रिंटिंग क्वालिटी और दूसरे...प्रकाशकों को बस लिट्रेचर पर अहसान करना था, इसलिए छाप दिया, सो कोई प्रमोशन नहीं।
ताज़ा दौर में पुस्तकों की दुनिया पर तमाम तरह के दबाव हैं। लेखकों की सदैव-स्थिर शिकायत है, प्रकाशकों द्वारा शोषण करने की और पब्लिशर्स का शिकवा है—सरकार बढ़ावा नहीं देती। इस बीच पाठकों की संख्या कम होने और पुस्तकों के डिजिटाइजेशन के साथ मुद्रित साहित्य के लिए आकर्षण कम होने जैसे मुद्दे भी उभर रहे हैं। बेशक—इसी रफ्तार में हिंदी के लेखक दरिद्रतम और अंग्रेजी राइटर सेलिब्रिटी बनते जा रहे हैं। खैर, रोना क्या रोएं और क्यों रोएं! मामला मार्केटिंग का भी है और खुद की अहमियत समझने का। फ़िलहाल, बात दिल्ली में हुए विश्व पुस्तक मेले की ही!
प्रकाशन, पाठक संख्या वगैरह को लेकर उपजी तमाम आशंकाओं को प्रभात प्रकाशन के संचालक डॉ. पीयूष हंसी में उड़ा देते हैं। वो पलटकर एक सवाल खुद ही कर लेते हैं, ` ज़नाब! आपने पुस्तक मेले की भीड़ नहीं देखी क्या? क्या आपको लाइन में लगकर अंदर नहीं आना पड़ा? आपने खुद ही महसूस किया होगा कि कैश काउंटर्स पर कामकाज देख रहे लोग लंच करने के लिए भी नहीं निकल पाते! पांच साल पहले तक ऐसी भीड़ की कल्पना करना भी दिवास्वप्न था, लेकिन अब तो हालात बदल रहे हैं बंधु! लोगों का किताबों पर यकीन और ज्यादा मज़बूत हुआ है।‘
पीयूष ये भी कहते हैं, पुस्तक मेले में 20 रुपये प्रवेश शुल्क लगाया गया। तमाम तकनीकी दिक्कतें और भी थीं, लेकिन भीड़ है कि थमने का नाम नहीं ले रही, तो आप लोगों के उत्साह का अंदाज़ा लगा सकते हैं। वो तर्क देते हैं, आजकल लोगों को मनोरंजन की हर चीज आसानी से मिल जाती है।
इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री खूब विकास कर रही है...यहां तक कि पिछले दिनों थ्री इडिएट्स ने 400 करोड़ का बिज़नेस किया है, लेकिन पुस्तकों का विकल्प कुछ भी नहीं हो सकता। पीयूष के चेहरे की खुशी उन सबको खुश होने की वज़ह दे सकती है, जो किताबों के भविष्य को लेकर ज़रा-सा भी आशंकित हैं।
पेंग्विन बुक्स इंडिया में सीनियर कमिशनिंग एडिटर वैशाली माथुर भी इस आशंका को सिरे से खारिज़ कर देती हैं कि हिंदी के पाठक कम हो रहे हैं। वो कहती हैं, `किताबों के कवर देखकर उनकी तरफ खिंचे चले आते लोगों से पूछिए—पन्ने पलटते हुए उनसे आने वाली सोंधी खुशबू का अहसास, स्याही से उभरे शब्द और हाथ में एक पुस्तक होने की खुशी को किसी तकनीक से तौला नहीं जा सकता।‘
वैशाली ये भी बताती हैं कि पेंग्विन ने पिछले दिनों हिंदी में कई किताबें प्रकाशित कीं, उन सबकी पुस्तक मेले में बेहतरीन बिक्री हुई है। हालत तो ये है कि मांग ज्यादा है और किताबें कम! वो कहती हैं, किताबों के डिजिटल रूप से अभी डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। तकनीकी विकास और ज्यादा हो जाने के बाद ज़रूर प्रकाशन उद्योग को गंभीरता के साथ काम करना पड़ेगा।
सामयिक प्रकाशन के संचालक महेश भारद्वाज कहते हैं—जब तक इंटरनेट घर-घर नहीं पहुंच जाता, मुद्रित किताबों के बाज़ार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। पीसी पर निगाह टिकाए रखकर आप देर तक नहीं पढ़ सकते। वो बताते हैं—साहित्य के पाठकों में कोई कमी नहीं आई है।
हां, कविता को पीछे छोड़कर उपन्यास ज़रूर आगे निकल गया है। महेश मानते हैं कि पुस्तक मेलों का आयोजन दिलचस्पी बनाने और बढ़ाने के लिए बहुत ज़रूरी है। जैसे होली-दीवाली और ईद मनाए जाते हैं, वैसे ही पठन-पाठन संस्कृति का विकास करने के लिए पुस्तक मेले भी होने चाहिए।
युवा लेखक और ब्लॉगर अविनाश वाचस्पति के मुताबिक, डिजिटाइजेशन कितना ही क्यों ना हो जाए, पुस्तकों के मुद्रित स्वरूप के लिए आकर्षण बचा ही रहेगा। किताब तो वो चीज है, जहां चाहो पढ़ो, पढ़ते-पढ़ते थक जाओ, तो सीने पर रखकर सो जाओ। वो दोस्त की तरह हैं...ना किसी डाउनलोड का झंझट है, ना ही अपलोड का। बस खोली और पढ़ ली। अविनाश ये भी बताते हैं कि ब्लॉग्स पर बहुत सारा लेखन हो रहा है, लेकिन शायद ही कोई ब्लॉगर ऐसा हो, जिसके मन में पुस्तक छपवाने की इच्छा ना हो...इससे साफ पता चलता है कि तकनीक की बढ़त के बावज़ूद मुद्रित रूप का जादू सबसे आगे है। वो कहते हैं, पाठक कम नहीं हो रहे हैं, हां—आबादी ज़रूर बढ़ रही है। आप औसत देखिए तो पढ़ने वालों का सदा अधिक ही मिलेगा। पुस्तक मेलों की भीड़ इसका सबसे प्रामाणिक उदाहरण है। वो ये भी सुझाते हैं कि कपड़ों की सेल की तरह पुस्तकों की सेल भी लगाई जाए।
ब्रिटेन के बाथ शहर में बसे भारतीय मूल के हिंदी कवि मोहन राणा तो एक कदम आगे की बात कहते हैं, `डिजिटल होते जाने के दौर में पुस्तकों के मुद्रित स्वरूप के लिए आकर्षण में निखार और प्रसार हुआ है।‘ वो उदाहरण भी देते हैं—हाल में ही मुझे अपने प्रकाशक से ईमेल मिला। मेरी पिछली पुस्तक  "धूप के अँधेरे  में"  की कई प्रतियां पाठकों ने विश्व पुस्तक मेले में खरीदीं. उन्हें मेरी रचना की और मुझे बिक्री की सूचना ऑनलाइन ही तो मिली!  मोहन मानते हैं कि समाज में पुस्तक की मौजूदगी रेखांकित करने के लिए ऐसे आयोजन ज़रूरी हैं। हालांकि उन्हें किताबों की दुकान का पूरक नहीं माना जा सकता।
हिंदी में पाठकों के कम होने की आशंका को वो चिरकालीन बताते हैं—`बरसों से इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है। ये सच है कि व्यक्तिगत रूप से पुस्तकों को खरीदने और पढ़ने की संस्कृति और व्यवहार हिंगी समाज में अभी तक विकसित नहीं हो पाया है, लेकिन जो पाठक थे, वो बरकरार हैं।‘
निजामाबाद, आंध्रप्रदेश के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव मुद्रित किताबों के लिए आकर्षण बचे रहने के प्रश्न को ज्यादा महत्व नहीं देते। वो पूछते हैं, पहले भी तो न्यूज़ चैनल्स की शुरुआत के समय कहा गया था कि प्रिंट मीडिया पर बहुत असर पड़ेगा...क्या ऐसा हुआ? यही बात, इंटरनेट पर किताबों की उपलब्धता और मुद्रित पुस्तकों के बीच आकर्षण की कमी को लेकर भी लागू होती है। श्रीवास्तव ये ज़रूर मानते हैं कि लोगों में पुस्तकें पढ़ने की ललक कम हुई है, लेकिन वो जोड़ना नहीं भूलते—ऐसा दौर अक्सर आता रहता है और इससे परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है।
चर्चित प्रकाशन किताबघर के संचालक मनोज शर्मा से जब हमने किताबों के मेले और डिजिटाइजेशन को लेकर सवाल किए, तो उन्होंने मुस्कान बिखेरी और कहना शुरू किया...` मेरे पास इस वक्त जो सज्जन बैठे हैं, वो एक बड़े सर्च इंजन के भारतीय पदाधिकारी हैं...वो चाहते हैं कि मैं अपनी किताबों की सामग्री इन्हें मुहैया कराऊं, ताकि इनका डिजिटाइजेशन हो सके। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई दिक्कत है। ऐसा प्रयोग तो किताबों के प्रति और ज्यादा मोह बढ़ाएगा। खासकर उन देशों में, जहां हिंदी की पुस्तकें नहीं मिल रही हैं, वहां इंटरनेट की मदद से किताबें पहुंच रही हैं, तो ये अच्छा है।‘ बाकी प्रकाशकों और लेखकों की तरह मनोज शर्मा भी पुस्तक मेलों के आयोजन को दीवाली के त्योहार की संज्ञा देते हैं, और एक और नाम भी दे देते हैं—पठन-पाठन का महाकुंभ!
दिल्ली में इस साल लगे किताबों के मेले में सिर्फ पुस्तकें ही नहीं बिकीं, पढ़ने वाली क़लम जैसी तकनीक और ऑडियो-वीडियो सीडी का बाज़ार भी गर्माया रहा। लोग चाहे पिकनिक मनाने आएं हों या सचमुच किताबें खरीदने...वज़ह चाहे जो भी हो, भीड़ बेशुमार रही।
लोगों का रेला और पुस्तकों का मेला...उम्मीदें लेकर आया... तकनीक कितनी ही आगे क्यों ना बढ़ जाए...किताब खोलते ही नाक के ज़रिए दिमाग तक पहुंच जाने वाली सोंधी महक हरदम अपनी ओर खींचती रहेगी और लोग गुनगुनाते रहेंगे...भेजा है इक गुलाब किसी ने किताब में / जी चाहता है भेज दूं मैं दिल जवाब में।

Tuesday, April 27, 2010

हर दिन होली...

हे ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ....सररररारा सररररारा जोगीरा सररररारा सररररारा...खूब मचाओ धमाल...ना अंग की सुध रहे...ना कपड़ों की...चाहे जींस पहन रखी हो...चाहे बुशर्ट...टी-शर्ट हो या बरमूडा ही सही...आज तो बस गा लो जोगीरा...अरे भाई...होली है...होली है....बुरा ना मानो आज होली है...ठंडे पानी से भरी बालटी लाए हो! साथ में अबीर है क्या? एक चुटकी अबीर...। फाग क्यों नहीं गा रहे भाई?  नहीं आता...तो `रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ की तान ही छेड़ दो। कोई ना छूटे घर में, ना ही बचे कोई गलियन में...राह किनारे, बगियन में...जहां मिले कोई, पकड़ो...धर लो...रंग दो...और रंग जाओ।
क्या कहा? कैसा बेवकूफाना सवाल है ये?  बिना होली के ही होली मनाने की बात कर रहे हो...। ना जी...होली ही है आज...और आज ही क्यों...कल क्यों नहीं थी...कल क्यों ना होगी...परसों क्यों नहीं...पूरे महीने के 28, 30 या 31 दिन तक क्यों नहीं...सनडे, मनडे...हर डे फ़न डे क्यों ना हो! यानी हर दिन मन किसी का क्यों ना हो ले...और खेले होली!
मन का भी तो संविधान होना चाहिए...दिल का भी तो एक विधान होना चाहिए...विधान बिना किसी बाधा के बस उड़ जाने का...नाचने, गाने और मगन होने का। हर दिन रंगों भरा रहे मन...यही तो हो हमारा संविधान...जिसका हर पन्ना बस दिल लिखे...दिल पढ़े और दिल कहे...राष्ट्रगान हो—आओ खेलें होली...। ऐसी होली, जिसमें हमारा बुरा मन अपने ही चेहरे पर कालिख पोत ले और साथी के चेहरे को कर दे गुलाबी।
कहते हैं—रंग मानव जीवन पर असर डालते हैं...ऐसा असर, जो कभी धूमिल नहीं होता, फिर मन क्यों मैला किए बैठो हो भाई! किसी को नौकरी की चिंता, किसी को छोकरी की फ़िकर...किसी को जायदाद मारे डालती है, तो किसी के मन में हरदम रंज़िश का ज़िकर। ऐसे कैसे मनेगी होली...ऐसे कैसे जिओगे बबुआ।
चलो बात करते हैं मौसम की...सुबह अपने साथ चांदी के तार लेकर आती है...धुंध की चांदी...अब दूसरा रंग...अमीरों, जवानों और नेताओं के लिए गुलाबी ठंड...तो गरीबों के लिए काली है ये।
टीवी पर आजकल एक शो आता है...उसमें सितारे अपना सबसे बड़ा फ़ैन तलाशते हैं...वो फ़ैन अपने सितारों के लिए क्या-क्या नहीं करते...मुझे नहीं पता...ये क्या है और क्यों है...पर इस प्रोग्राम में एक राहत देने वाला पहलू ज़रूर है...वो ये कि कार्यक्रम में किसी ज़रूरतमंद को कुछ लाख रुपये दे दिए जाते हैं...कभी देखी है उस गरीब के चेहरे की लाली!
रंगों की अजब ही ज़ुबान है...हया की लाली अलग है...गुस्से की अलग...ज्यादा पी ली तो आंखें अलग तरह से लाल होती हैं और खूब सोने के बाद अलग...चाहत गाढ़ी हो जाए, तो एक और ही ललछाईं झलक जाती है।
गुस्से का कालापन अलग है और भूख के बाद पलकों के नीचे की ज़मीन का कालापन अलग है...। फले-फूले खेतों का हरापन और पीला रंग देखिए और बंजर पड़ी मिट्टी का पीलापन...। अब कौन-सा रंग चुनेंगे आप?
खुशी हाट-बाज़ार नहीं बिकती...कागज़ों के मोल नहीं मिलती...ये मन से ही उपजती है...होंठों से छलकती है...और आखर में सनकर सब तक पहुंचती है। खुशी, उमंग और जुनून के रंग संजोने का वक्त है...हर दिन उम्मीदों के रंग जुटाने के पल हैं...अच्छा...ज्यादा खिलखिलाकर मैं क्रेडिट क्यों लूं...अपने चेहरे का गुलाबीपना कुछ थामता हूं  और बता देता हूं...ये कॉन्सेप्ट ओशो का है...मेरा नहीं!
तो पक्का मनाएंगे ना आज के दिन से अब हर लम्हा हो-ली...तो लीजिए रेजोल्यूशन और दोहराइए मेरे संग-संग...
पलकें खुलते ही / और सुर्ख हो जाते हैं / आंखों के डोरे /  याद आती हैं सुबहें / तुम्हारी चाहतों के लाल रंग में रंगी हुई / पता नहीं, कहां से आती है / तुम्हारे हाथ की पकी रोटियों की सोंधी महक/ हर तरफ गूंजती है तुम्हारी हंसी की खनक / बार-बार / तुमने ही क्यों संजोकर रखीं मेरी चिल्लाहटें / मेरी किलकन के कुछ क़तरे / `क्लचर’ की जगह बांध लिए होते जूड़े के साथ....
अब ये मत कहिएगा इन पंक्तियों में रंग कहां हैं? तलाशिए...मिल जाएंगे...।
 
जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित
 

Sunday, April 25, 2010

फिर गूंजे चाहत संगीत


तुम मेरे लिए नहीं थे पड़ाव भर
ना ही किसी तृष्णा की तुष्टि का साध्य
फिर क्यों
कुंठाओं की धरती पर बलिदान हुआ हमारा प्रेम
पूछता है मेरे प्रेम का ज़िद्दी राग, मुझसे ही जोर-जोर से
हृदय अब भी चाहता है...
बना रहे राग
पर
रात भर, मंद-मंद कर रिसता है
कानों में
कुहुक नहीं,
कसक बन
काश!
थम जाए ये कोलाहल
और फिर गूंजे
चाहत-संगीत

सरगम के समंदर में बहती मिठास

सरगम...इन चार अक्षरों में समाया है वैसा ही जादू, जैसा ढाई अक्षर वाले प्यार की नस-नस में बहता है। प्यार करो या संगीत सुनो...एक ही बात है...और संगीत से प्यार हो जाए, तब? फिर तो मज़ा ही कुछ और आता है। साज़ जगे और जाग गई ज़िंदगी...रग-रग में लहू बनकर तैरने लगी आवाज़, उम्मीद से भर गया दिल का खालीपन, बोझ से भारी सांसें हलकी हुईं और बाजों की मिठास पहुंच गई धड़कन-धड़कन तक। सरज़मीन-ए-हिंदुस्तान के लोग इस बात पर नाज़ कर सकते हैं कि उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संगीत की विरासत मिली है। संगीत भी अनूठा-दैवीय, शांत करने, शांति देने और मस्ताना-दीवाना बना देने वाला। मंदिरों से महफ़िलों तक, मंचों से मूवीज़ तक संगीत ने कितने ही रूप बदले हैं, रंग पाए हैं, लेकिन इसके असर में कमी कभी नहीं आई। संगीत को लेकर भारतवासियों की दीवानगी भी कमाल की है, इसके चलते कई म्यूज़िकल बैंड मशहूर हुए हैं। इनमें से ही एक है—इंडियन ओशन।
फ़र्क बस इतना है कि इंडियन ओशन की शुरुआत दो दशक पहले हुई, जब म्यूज़िकल बैंड का नाम-ओ-निशान तक किसी के जेहन में नहीं था। कहानी दिलचस्प है...हुआ यूं कि 80 के दशक में एक दोस्त के घर पार्टी में दो कलाकार—सुष्मित सेन और अशीम चक्रवर्ती मिले। सुष्मित ने अशीम को गिटार पर कुछ  कंपोजिशन सुनाईं, जो उनको भा गईं। अशीम सात साल की उम्र से ही तबला बजाते थे। मन्ना डे तक के साथ काम कर चुके थे। मन में ख्वाब था, कुछ खास करने का। सुष्मित से मिले, तो लगा—ऐसा ही तो साथी मैं तलाश रहा था। फिर क्या, दोनों साथ ही काम करने लगे। बाद में बैंड भी बना।
बैंड की शुरुआत के समय अशीम विज्ञापन एजेंसी में क्रिएटिव डायरेक्टर थे और सुष्मित मैनेजमेंट की फ़ील्ड में काम करहे थे, लेकिन दोनों को संगीत का नशा ऐसा चढ़ा कि बाकी सारी दुनिया ही बेगानी लगने लगी। 1990 में बैंड की शुरुआत के बाद 1991 में राहुल राम टीम में आए और 1994 में अमित किलम...।
बैंड का अनूठापन ये भी है कि पुराने दिनों में इसकी पेशकश साज़, यानी कंपोजिशन के इर्द-गिर्द ही घूमती थी, बाद में इसमें गायकी शामिल की गई। वैसे, मूल आधार अब भी वाद्य-संरचनाएं ही हैं...। बैंड के फ़नकारों को जब लगता है कि किसी कंपोजिशन के लिए बोल की ज़रूरत है, तभी गीत लिखे जाते हैं। हौले-हौले, सब्र के साथ, सुंदर काम... इंडियन ओशन ने यही मूलमंत्र अपनाया।
बीस साल से भी ज्यादा वक्त और सिर्फ तीस गाने...मतलब साफ है—कुछ भी, अधकचरा पेश कर देने वाले कॉमर्शियल रुझान से ये कलाकार समझौता नहीं करते।
फ़िल्म `ब्लैक फ्राइडे’ का एक गीत बहुत मशहूर हुआ... ' अरे रुक जा रे बंदे,  अरे थम जा रे बंदे'। ये गीत इंडियन ओशन की उपज ही है। पीयूष मिश्रा की पंक्तियां अरसे तक नौजवानों की ज़ुबान पर रची-बसी रहीं!  इंडियन ओशन का संगीत अनूठा है, इतना कह देने भर से काम नहीं चलेगा। धुन और सुर समझने-महसूसने के लिए शब्दों का सहारा लेना नाकाफी होगा। जब मंच पर गीत के बोलों में अल्हड़ भारत की उमंगें मचलती हैं और अनुभवी कलाकार पूरे माहौल को साज़ और आवाज़ से सजा देते हैं, तब वहां जो समां बनता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं!
वैसे तो, इंडियन ओशन का संगीत रॉक फ्लेवर का है, यहां फ्यूज़न का मज़ा भी है, लेकिन असल मायने में पूरे भारत की ज़िंदगी का हर रंग इसके सुरों में सना है, सिमटा है। तरीका अलग है, तेवर अलग हैं पर गिटार, ड्रम और शास्त्रीय आलाप के तालमेल के सहारे बैंड के कलाकार मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ज़िंदगी जैसे ठहर जाती है, कहती है—अब यहां से कहीं नहीं जाना! हर पीर पिघला देने वाले संगीत का असल जादू यहीं पता चलता है, सिर चढ़कर बोलता है।
हाल में इस बैंड के कलाकारों की ज़िंदगी, उनकी जद्दोजहद, सपने, कोशिशें और कामयाबी बयां करने वाली एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म `लीविंग होम— द लाइफ एंड म्युज़िक ऑफ इंडियन ओशन’ रिलीज़ हुई। फ़िल्म के डायरेक्टर जयदीप वर्मा अनोखा रिकॉर्ड बनाने में सफल रहे।
हां! लीविंग होम पहली ऐसी नॉन फ़िक्शन फ़िल्म बन गई, जिसे थिएटर में रिलीज़ किया गया। (हम बता दें कि जुम्मा-चुम्मा इन लंदन और फ़िल्म्स डिवीज़न, पीएसबीटी वगैरह की फ़िल्में इस दायरे में नहीं शामिल की जा सकतीं, क्योंकि उनका कंटेंट अलग होता है और अंतराल भी!)। वैसे, फ़िल्म रिलीज़ होने के लम्हे तक पहुंचने के लिए जयदीप को वर्षों लंबे इंतज़ार से जूझना पड़ा, लोगों को समझाना पड़ा—इंडियन ओशन पर फ़िल्म बनाने की ज़रूरत क्या है और खुद को भी हर वक्त ताज़ा, हौसलामंद और सब्रदार बनाए रखना पड़ा।
फ़िल्म बन जाने से इंडियन ओशन की महानता नहीं बढ़ती, लेकिन इसमें कई ऐसे लम्हे ज़रूर संजोए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इस संगीत-दल के गठन के पीछे क्या ख्वाब थे और इसकी शुरुआत में सदस्यों के हालात ने कैसा रोल अदा किया। मसलन—अशीम कभी नहीं भूल पाए कि उनके घर से कोई बैंड का कार्यक्रम देखने नहीं आया।
किसी का ज़रा-भी नाम हो जाए, सफलता मिल जाए, तो उसका अगला ठिकाना होता है बॉलीवुड, लेकिन इस अनूठे दल ने मुंबई जाने की जगह मन की बात मानने पर ज्यादा ज़ोर दिया।
कलाकारों ने ब्लैक फ्राइडे को संगीत से सजाया। इसके अलावा, मुंबई कटिंग और भूमि जैसी फ़िल्मों के लिए संगीत रचा, लेकिन बाज़ारू संगीत की बाढ़ नहीं लगाई। इसे भी एक मज़ेदार संयोग ही कहा जाएगा कि फ़िल्में करने के मामले में बेहद चूजी आमिर खान की अगली फ़िल्म के तीन गीतों का संगीत भी इंडियन ओशन के फ़नकार ही दे रहे हैं। इसे कहते हैं—एक जैसी रुचि वालों का साथ आना।
इंडियन ओशन अपने अनूठेपन, अलमस्ती और सीधी, अपनत्व भरी लयात्मक बातचीत के लिए महान है...ज़रूरी है। सुरों के कारवां में बहुत-से लोग जुड़ते रहे, कई बिछड़े भी। बीते साल बैंड के संस्थापक, खास गायक और तबला वादक अशीम चक्रवर्ती भी नहीं रहे...उनसे ज़ुदा होने का दर्द इंडियन ओशन के कलाकारों को हमेशा सालता रहेगा। बावज़ूद इसके सरगम का सफर जारी है। ये फ़नकार जानते हैं—किसी का दर्द मिटाना है, तो अपनी तकलीफ़ भुलानी होगी, हमें अपने गीतों के सहारे सबके होंठों पे मुस्कान सजानी होगी।


जयपुर के हिंदी अखबार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग http://www.dailynewsnetwork.in/news/18042010/Hum-log/8217.html में प्रकाशित आलेख


Friday, April 23, 2010

मक्खन-सी तुम्हारी याद

नीले-नीले बाल, संतरी रंग का चेहरा, पॉल्का डॉट्स से सजी फ्रॉक...ये लड़की कौन है? कुछ जानी-पहचानी सी है ना! याद आ गया या बता दूं? ये वही तो है—अमूल मक्खन के रैपर पर मुस्कराती, इठलाती किशोरी...जिसकी शक्ल देखते ही दिमाग में कहीं गूंजने लगती है ये लाइन...`अटरली, बटरली, डिलिशस... ‘ और बस मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन आज ये लड़की उदास है। इसकी आंख में पानी है...। उदास तो आप भी हो जाएंगे ये जानकर कि मक्खन के खास ब्रैंड के लिए इतनी ख़ूबसूरत और नटखट लड़की की तस्वीर उकेरने वाले ऑस्टेस फर्नांडिस अब इस दुनिया में नहीं रहे...।
फर्नांडिस ने अपने प्रशंसकों को उस दौर में आखिरी सलाम बोला है, जब इस एड कैंपेन को गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिलनी तय है। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि चालीस साल से भी ज्यादा समय पहले इस अभियान की नींव रख दी गई थी। फ़िलहाल, ये भारत में सबसे पुराना और सबसे ज्यादा चलाया गया एड कैंपेन बन चुका है। पता नहीं, ये मक्खन के जायके का कमाल है, या फिर अमूल के विज्ञापनों से सजी होर्डिंग्स पर लिखे वन-लाइनर्स का जादू कि हर सुबह फिगर कॉन्शस लोग भी ताजी-सिंकी ब्रेड पर मक्खन लगाकर खाना नहीं भूलते।
ठीक इसी तरह `मक्खन-गर्ल’ के जनक को भी नहीं भुलाया जा सकता। रेडिएस एडवर्टाइजिंग के डायरेक्टर ऑस्टेस फर्नांडिस ने महज 75 साल की उम्र में दुनिया छोड़ दी है। आज वो नहीं हैं, तब और शिद्दत के साथ उन वन-लाइनर्स की याद आ रही है, जिनका आधार फर्नांडिस ने तैयार किया था। यूं तो, इन विज्ञापनों को दाकुन्हा कम्युनिकेशन के चेयरमैन सेल्वेस्टर दा कुन्हा ने ही मूलरूप में तैयार किया है। वो 1966 से ही अमूल से जुड़े रहे हैं, लेकिन ऑस्टेस और दा कुन्हा की की जोड़ी राजकपूर और मुकेश की तरह है, जैसे—एक ने तस्वीर उकेरी और दूसरे ने रंग भरे!
किसी उत्पाद को कोई क्यों खरीदता है और बार-बार की जाने वाली खरीदारी की क्या वज़ह होती है? ऑस्टेस ये बात जानते थे। वो समझते थे—जब तक आप खरीदार का भरोसा नहीं जीत लेते और उसकी ज़िंदगी में अपने उत्पाद की ज़रूरत स्थापित नहीं कर देते, तब तक वो लगातार वही प्रोडक्ट नहीं खरीदता। यही वजह है कि अमूल गर्ल का स्वरूप तैयार करते समय उन्होंने एकदम पास-पड़ोस जैसी नज़र आने वाली चुलबुली लड़की को दिमाग में रखा।
किसी सुपर कंप्यूटर को भी मात कर देने वाली रफ्तार के मालिक फर्नांडिस पर उम्र कभी कोई असर नहीं डाल सकी। वो जब भी काम करते, तो लोग उनकी स्पीड देखते ही रह जाते। एक नायाब कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर के रूप में ऑस्टेस काफी मशहूर हुए। अपने विश्वसनीय सहयोगियों के साथ 1974 में उन्होंने विज्ञापन कंपनी रेडिएस एडवर्टाइजिंग की शुरुआत की। उनकी सहयोगी राधा और ऑस्टेस के नामों के शुरुआती अक्षर मिलाकर ही तो इस कंपनी का नाम रखा गया था, ठीक वैसा ही प्रयोग—जैसा मक्खन विज्ञापन की कैचलाइंस में होता है!
शीतल पेय कंपनी लिम्का के विज्ञापनों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी ऑस्टेस को ही जाता है। उन्होंने रंगों और छवियों के तालमेल के साथ शुरुआती दौर में कलाकारों के बिना ऐसे विज्ञापन बनाए, जिन्हें देखते ही कोल्ड ड्रिंक पीने को दिल ललचाने लगे। भारतीय जीवन बीमा निगम की योजनाओं को लोकप्रिय बनाने में भी उनका बड़ा योगदान है। कैसे? जाहिर है—रचनात्मक ढंग से तैयार किए गए विज्ञापनों के ज़रिए!
ऑस्टेस ने व्यवसाय की पारी सफलता के साथ खेली। उनको हंसी का मर्म पता था। वो जानते थे कि एक ग़मज़दा, मुश्किलों के मारे, रोजमर्रा के कामकाज से दबे, घर-दफ्तर की परेशानी से बोझिल इंसान को हंसाकर अपना बनाया जा सकता है। मध्यवर्गीय भारतीयों की इसी सोच को ऑस्टेस ने अपने व्यापार को सफल बनाने के मंत्र के रूप में भी इस्तेमाल किया। हालांकि ये कोशिश भावनात्मक शोषण नहीं थी। ऑस्टेस ने बस वो नब्ज पकड़ ली थी, जिसे छूने भर से आदमी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। चुभती हुई, गुदगुदाती हुई कुछ लाइनें कानों और आंखों से होकर दिल में उतर जाती हैं और वो गुनगुनाने लगता है...अटरली...बटरली...!

एक लाइन का कमाल
मक्खन के खास ब्रांड `अमूल’ की क्रिएटिव टीम हर बार मस्तमौला अंदाज में समसामयिक विषय पर विज्ञापन तैयार करती रही है। गुजरात में आमिर खान की `फ़ना’ की रिलीज को लेकर दिक्कतें आ रही थीं। हर तरफ गर्मागर्म बहस जारी थी, इसी बीच एक दिन टंग गई एक नई विज्ञापन होर्डिंग...`मना...कभी मना नहीं!’
सौरव गांगुली के ख़राब फॉर्म पर sorrow ganguly  का हास्य हो, या फिर मुगल-ए-आजम रिलीज होते समय फ़िल्म की टाइटिल से तुक मिलाकर लिखी गई लाइन—maskaa-e-aazma...विज्ञापनों की ये शैली अनूठी और यादगार है । ऐसे ही एक वन लाइनर के सहारे महमूद को भी अनूठी श्रद्धांजलि दी गई—हम तेरे तेरे तेरे चाहने वाले हैं।
ओल्ड इज गोल्ड वाले मुंबइया फ़िल्म जगत से लेकर नए दौर के बॉलीवुड तक मक्खन ब्रांड के विज्ञापनों में हर हलचल छाई रही है। नौजवानों की पसंदीदा बनी फ़िल्म दिल चाहता है की रिलीज के मौके पर कैचलाइन थी—डिश चाहता है, तो स्वदेश का स्वागत इस पंक्ति ने किया—स्वाद डिश! महज फ़िल्म जगत की बात नहीं, चर्चा में आया हर विषय मक्खन-विज्ञापन की कैचलाइन के रूप में होर्डिंग्स पर उतर आया है।

जयपुर के हिंदी अख़बार डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हम लोग में प्रकाशित आलेख





Thursday, April 22, 2010

कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी


आज फिर खोली
जंग लगे ताले से बंधी
पुरानी लोहे वाली संदूक
भरभराकर ढहा वर्तमान
किस तरह कस रहा अतीत
जैसे, फिर आईं तुम 
बांह में जकड़ने को भागी-भागी सी...
लौटी भीगी-भीगी शाम
पहली-पहली बारिश की बूंदें लेकर
उतराई आंख के सामने 
हर रात की तस्वीर
झिलमिलाती हुई सही
भीगी पलक में सिमट नहीं रहे लमहे
शुक्रिया संदूक 
तुमने समेटे रखे
पीले-ज़र्द पड़े कुछ खत
धुंधली-फ़ीकी स्याही और चटख तुम्हारी याद...
सुनो
फिर धड़क रहा दिल धक-धक
उस दोपहर
डाकिया पटक गया था
तुम्हारे नाम के हज़ार बैरंग खत
मेरे घर की चौखट पर
हां, मैंने चुकाए थे पैसे
उन बैरंग खतों की एवज में
और 
भर लिए थे जीवन में रंग हज़ार...
सांझ की चादर पर प्रेम-सिंदूर लगाकर
थक कर सो गया उसे ही सिर तक ओढ़कर
रुनझुन-रुनझुन करतीं तुम आईं फिर
पूछा—क्यों लीं मेरे नाम की चिट्ठियां
बांच भी ली होंगी... 
तब से / अब तक / मेरे पास
बंधी रखी हैं / बिना बांची चिट्ठियां तुम्हारी 
आओ...ले लो 
पढ़ लेना तुम्हीं उन्हें
और कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी

Monday, April 19, 2010

अविनाश वाचस्पति रहे पुकार...कहां हो प्यारे टाटा जी




चौराहा पर पहली बार...किसी और की...(नहीं तो, ये अपने ही हैं...) अविनाश वाचस्पति जी की रचना....

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टाटा मोटर्स की इंडिका धोखे से पुराना मॉडल दे दिया गया : खरीदने से अब तक कर रही है लगातार परेशान (माननीय रतन टाटा जी से विनम्र अनुरोध)


मैंने 14 मार्च 2008 को मैसर्स विवेक ऑटोमोबाइल्‍स, करौल बाग से टाटा इंडिका जीएलजी DL 3C AY 5018 की खरीद की थी परन्‍तु मुझे बिना मेरी जानकारी में लाए वर्ष 2007 में निर्मित कार दे दी गई। जिस दिन से कार शो रूम से लेकर चला हूं तभी से तंग कर रही है। विवेक ऑटोमोबाइल्‍स के श्री दिनेश चावला ने कई बार मांगने के बाद भी पूरा भुगतान लेने पर भी ब्‍यौरेवार पूरा विवरण नहीं दिया। कार के साथ नंबर प्‍लेट भी नहीं दी गई जबकि उसके चार्जिस ले लिए गए। मैंने ट्यूबलैस टायर लगवाने के लिए कहा, जिसका अंतर 3000/- रुपये तो लिए गए परन्‍तु उनकी कोई रसीद नहीं दी गई। इस बारे में मैंने कई बार श्री दिनेश चावला को फोन पर भी कहा है और ई मेल भी भेजी हैं परन्‍तु उन्‍होंने आश्‍वासनों के अतिरिक्‍त कुछ नहीं किया। कार की डिलीवरी लेने से एक दिन पहले भी मैंने उन्‍हें ई मेल भेजी थी कि क्‍या इंडिका जीएलजी पेट्रोल वर्जन में सीएनजी किट लगवाने पर समस्‍या आती है तो उन्‍होंने इस संभावना को सिरे से ही नकार दिया। जबकि कार मुझे लेने के दिन से पेट्रोल पर और सीएनजी लगवाने पर (जब तक किट बदलवाकर दूसरी स्‍वीकृत सीक्‍वल किट नहीं लगवाई गई), इसका इंजन भी एक बार बदल चुका है, कभी स्‍टार्टिंग में परेशानी सेल्‍फ संबंधी, कभी सर्विसिंग में लापरवाही (कुल मिलाकर मेरी परेशानियों में दिनोंदिन इजाफा) अब तक बेसाख्‍ता परेशान कर रही है। इस बारे में पूरे इतिहास की आप जांच करवा सकते हैं।
नई कार जिस सुकून और आराम के लिए ली जाती है, वो तो मुझे नसीब ही नहीं हुआ है। बनिस्‍बत इसके मेरे जीवन में इसके आने से परेशानियों का अंबार लग गया है। जिससे राहत के लिए मैंने कई बार टाटा मोटर्स के कस्‍टमर केयर को ई मेल से सूचनाएं दी हैं। कंपनी के अधिकारियों से मिलने पर भी कई बार अनुरोध किया है परन्‍तु नतीजा वही ढाक के तीन पात। आप तक पहुंचने के लिए न तो मुझे ई मेल पता ही दिया गया और न ही मेरी समस्‍या आप तक पहुंच सकी है। मजबूर होकर मुझे सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखनी पड़ी है।
अब इन समस्‍याओं से आजिज आकर मैं अपनी समस्‍या सार्वजनिक कर रहा हूं। जिससे मेरी पुकार आप तक पहुंच सके और मुझे मेरी राशि हर्जाने सहित वापिस मिल सके। मुझे पूरा विश्‍वास है कि आप सत्‍य और न्‍याय पर अमल करते हैं। सफलता हासिल करने के लिए जिन खासियतों की इंसान को जरूरत होती है, वे सब आप में हैं। पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिएगा
माननीय रतन टाटा जी से अनुरोध कि टाटा मोटर्स की इस खराब कार के मामले में हस्‍तक्षेप करने का कष्‍ट करें ?
इस संबंध में पाठक अपनी राय उपर वाले लिंक पर क्लिक करके दे सकते हैं।